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निराशा के क्षण येसु हमारे साथ होते हैं, संत पापा

In Church on April 29, 2017 at 3:54 pm

मिस्र, शनिवार, 29 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने मिस्र की प्रेरितिक यात्रा के दूसरे दिन 29 अप्रैल को मिस्र की राजधानी काहिरा स्थित ‘सैन्य स्टेडियम’ में ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

उन्होंने प्रवचन में कहा, ″आपको शांति मिले।″ पास्का के तीसरे रविवार का सुसमाचार पाठ, आज हमें एमाउस की यात्रा पर दो शिष्यों को प्रस्तुत करता है जो येरूसालेम से वापस जा रहे थे। संक्षेप में, इसे तीन शब्दों में प्रकट किया जा सकता है, मृत्यु, पुनरुत्थान और जीवन।

मृत्यु- दो शिष्य निराशा एवं मायूसी की हालत में सामान्य जीवन की ओर लौट रहे थे। प्रभु मर चुके हैं अतः उन्हें आशा का कोई निशान नहीं दिखाई पड़ा। वे निराश और आशाहीन महसूस कर रहे थे। वे वापस लौटने की यात्रा पर थे जो येसु के क्रूस पर ठोंके जाने की दर्दनाक पीड़ा से दूर होने का प्रयास था।

क्रूस की पीड़ा ″ठोकर″ एवं ″मूर्खता″ के समान थी (1 Cor 1,18; 2,2), ऐसा प्रतीत हुआ कि उनकी हर आशा दफना दी गयी है। उन्होंने जिसके ऊपर अपने जीवन का निर्माण किया था वह मर चुका है तथा अपनी पराजय के साथ उनकी सभी आकांक्षाओं को कब्र पर बंद कर लिया है।

इस प्रकार वे विश्वास करने में असमर्थ थे कि प्रभु और मुक्तिदाता जिन्होंने मुर्दों को जिलाया, बीमारों को चंगा किया, क्या उनकी मृत्यु इतनी अपमानजनक तरीके से हो सकती है। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने क्यों उन्हें इस अपमान से नहीं बचाया।

ख्रीस्त का क्रूस ईश्वर के प्रति लोगों के अपने विचार का क्रूस था तथा ख्रीस्त की मृत्यु वैसा ही था जैसा वे ईश्वर के बारे सोचते थे, किन्तु वास्तव में वे मर गये, दफनाये गये तथा कब्र में बंद हो गये जिनकी समझ सीमित थी।

संत पापा ने कहा कि कितनी बार हम अपने को अपाहिज बना देते हैं जब हम ईश्वर के प्रति अपने सोच से परे जाना नहीं चाहते और ईश्वर के स्वरूप की कल्पना मनुष्य की कल्पना के अनुसार करते हैं। हम कितनी बार यह विश्वास नहीं कर पाने के कारण निराश हो जाते हैं कि ईश्वर सत्ता और अधिकार का ईश्वर नहीं किन्तु प्रेम, क्षमा एवं जीवन के ईश्वर हैं।

शिष्यों ने येसु को रोटी तोड़ते समय, यूखरिस्त में पहचान लिया। संत पापा ने कहा कि जब तक हम हमारी दृष्टि को धूमिल कर देने वाले पर्दे को नहीं हटाएँगे तथा हमारे हृदय की कठोरता एवं हमारे पूर्वाग्रहों को नहीं तोड़ेंगे, तब तक हम ईश्वर के चेहरे को नहीं पहचान पायेंगे।

पुनरूत्थान- उदासी की घोर अंधेरी रात में, उनकी सबसे बड़ी निराशा के क्षण में, येसु अपने दो चेलों के पास पहुँचते हैं तथा उनके साथ चलते हैं। यह दिखलाने के लिए कि वे स्वयं मार्ग, सत्य और जीवन हैं। (यो.14:6). येसु उनकी निराशा को जीवन में बदल देते हैं क्योंकि जब मानवीय आशा समाप्त हो जाती है तभी वहाँ ईश्वर की आशा चमकने लगती है। ″जो मनुष्यों के लिए असम्भव है वह ईश्वर के लिए सम्भव है। (लूक 18:27; cf. 1:37).  जब हम असफलता एवं निस्सहाय होने के गर्त पर पहुँच जाते हैं, जब हम खुद को सर्वोत्तम एवं पूर्ण समझने के संदेह से ऊपर उठ जाते हैं तथा अपनी दुनिया में केंद्रित नहीं होते तब ईश्वर हमारे पास आते हैं तथा हमारी रात को प्रातः में बदल देते हैं, हमारी परेशानियों को आनन्द तथा हमारी मृत्यु को पुनरुत्थान में परिवर्तित कर देते हैं। वे हमारे कदमों को येरूसालेम की ओर ले चलते हैं जीवन की ओर तथा क्रूस की विजय की ओर। (इब्रा. 11:34).

पुनर्जीवित ख्रीस्त के साथ मुलाकात के बाद, शिष्य आनन्द, साहस तथा उत्साह से भर कर वापस लौटे। वे अब साक्ष्य देने के लिए तैयार थे। पुनर्जीवित ख्रीस्त ने अविश्वास एवं दुःख के उनके कब्र से उन्हें बाहर निकाला। क्रूसित एवं पुनर्जीवित ख्रीस्त से मुलाकात करने के बाद उन्होंने सम्पूर्ण सुसमाचार, संहिता एवं नबियों की भविष्यवाणी के अर्थ और परिपूर्णता को समझ लिया था।

संत पापा ने कहा कि जो लोग क्रूस के अनुभव एवं पुनरुत्थान की सच्चाई से होकर नहीं गुजरते हैं वे निराशा की स्थिति में अपने को कोसते हैं क्योंकि हम तब तक येसु से नहीं मिल सके जब तक कि ईश्वर के प्रति हमारे संकीर्ण विचार को क्रूसित नहीं कर देते जो उन्हें शक्तिशाली और सत्ताधारी के रूप में प्रकट करता है।

जीवन- पुनर्जीवित येसु के साथ मुलाकात ने उन दोनों शिष्यों का जीवन बदल दिया क्योंकि पुनर्जीवित ख्रीस्त से मुलाकात प्रत्येक का जीवन बदल देता तथा बांझ को फलप्रद बना देता है। पुनरुत्थान पर विश्वास कलीसिया की उपज नहीं है किन्तु खुद कलीसिया का जन्म पुनरुत्थान पर विश्वास से हुआ है जैसा कि संत पौलुस कहते हैं, ″यदि ख्रीस्त नहीं जी उठे हैं तब हमारी शिक्षा व्यर्थ है तथा आपका विश्वास भी व्यर्थ है।” (1 को. 15:14).

पुनर्जीवित प्रभु शिष्यों की नजरों से ओझल हो जाते हैं यह बतलाने के लिए कि हम येसु को पकड़ कर नहीं रख सकते जैसा कि वे इतिहास में प्रकट हुए। धन्य हैं वे जो बिना देखे विश्वास करते हैं। (यो. 21:29; cf. 20:17).  कलीसिया को जानने एवं विश्वास करने की आवश्यकता है कि उसमें येसु उपस्थित हैं तथा उन्होंने यूखरिस्त, सुसमाचार एवं संस्कारों के माध्यम से उसके लिए अपना जीवन अर्पित किया है। एमाउस के रास्ते पर शिष्यों ने इसका एहसास किया तथा वे येरूसालेम लौटे ताकि वे अपना अनुभव दूसरों को बांट सकें। ″हमने जी उठे येसु को देखा है … जी हाँ वे सचमुच जी उठे हैं। (cf. Lk 24:32).

एमाउस के रास्ते पर शिष्यों का अनुभव हमें सिखलाता है कि यदि हमारा हृदय ईश्वर एवं उनकी उपस्थिति के भय से भरा है तो पूजा स्थलों पर उपस्थित होना व्यर्थ है। प्रार्थना करना भी व्यर्थ है यदि हमारी प्रार्थना भाई-बहनों के प्रेम में परिवर्तित नहीं होती। हमारी सारी धार्मिकता ही व्यर्थ है यदि यह गहरी आस्था एवं उदारता से प्रेरित न हो। हमारे प्रतिरूप के बारे सोचना भी बेकार ही है जब ईश्वर हमारी आत्मा और हृदय देखते हैं। (cf. 1 सामु. 16:7) ईश्वर दिखावा पसंद नहीं करते। उनके  लिए बुरे अथवा दिखावे के विश्वासी बनने की अपेक्षा अविश्वासी रहना अच्छा है।

सच्चा विश्वास हमें अधिक उदार, अधिक दयालु, अधिक ईमानदार एवं अधिक मानवीय बनाता है। यह हमारे हृदय को बिना भेदभाव सभी से प्रेम करने हेतु प्रेरित करता है। यह दूसरों को दुश्मन के रूप नहीं देखने किन्तु प्यार के योग्य भाई-बहन के रूप में देखने तथा उनकी सेवा एवं मदद करने हेतु प्राणित करती है। यह मुलाकात, वार्ता, सम्मान एवं भाईचारा की संस्कृति को फैलाने, उसकी रक्षा करने एवं जीने हेतु प्रेरित करती है। यह हमें उन लोगों को क्षमा देने हेतु साहस प्रदान करती है जिन्होंने हमारी बुराई की है। उन लोगों की ओर हाथ बढ़ाने जो गिरे हैं, नंगे को पहनाने, भूखे को खिलाने तथा कैदियों से मुलाकात करने, अनाथों की सहायता करने और प्यासों को पानी पिलाने हेतु प्रेरित करती है। बुजूर्गों एवं जरूरतमंदों की सहायता हेतु आगे ले जाती है। (cf. मती. 25). सच्चा विश्वास हमें दूसरों के अधिकारों की रक्षा हेतु उसी उत्साह एवं उमंग के साथ प्रोत्साहन देता है जिस उत्साह से हम खुद की रक्षा करते हैं। निश्चय ही, हम जितना अधिक विश्वास एवं ज्ञान में बढ़ते हैं उतना ही अधिक विनम्रता में भी बढ़ते तथा अपने छोटे होने का एहसास कर पाते हैं।

संत पापा ने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, ″ईश्वर उसी विश्वास से प्रसन्न होते हैं जो जीवन द्वारा घोषित किया जाता है क्योंकि एक प्रकार का कट्टरपंथ स्वीकार्य हो सकता है जो चैरिटी का पथ अपनाये, अन्य कोई कट्टरपंथ ईश्वर से नहीं आता और न ही उन्हें प्रसन्न करता है।

अतः एमाउस के चेलों की तरह हम, आनन्द, साहस और विश्वास से भरकर हमारे अपने येरूसालेम की ओर लौटें अर्थात् अपने दैनिक जीवन की ओर, अपने परिवार, अपने कार्यों तथा अपने प्यारे देश की ओर। जी उठे ख्रीस्त के प्रकाश के लिए अपना हृदय खोलने से न डरें तथा उन्हें हमारी अनिश्चतताओं को हमारे तथा दूसरों के लिए सकारात्मक शक्ति में बदलने दें। मित्रों एवं शत्रुओं सभी से प्रेम करने से न डरें क्योंकि एक विश्वासी का बल एवं खजाना, प्रेम भरे जीवन में निहित होता है।

संत पापा ने प्रार्थना की कि हमारी माता मरियम एवं पवित्र परिवार, जिन्होंने इस सम्मानित भूमि पर विचरण किया है, हमारे हृदय को आलोकित करें तथा मिस्र की इस प्यारी धरती को आशीष प्रदान करें जिसने ख्रीस्तीयता के उदय के समय संत मारकुस द्वारा सुसमाचार प्रचार का स्वागत किया तथा समस्त इतिहास में कई शहीदों एवं अनगिनत संतों को प्रदान किया है। ख्रीस्त जी उठे हैं वे सचमुच जी उठे हैं।


(Usha Tirkey)

संत पापा का कॉप्टिक ऑरथोडोक्स कलीसिया के धर्मगुरु को संबोधन

In Church on April 29, 2017 at 3:52 pm

काहिरा, शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017 (सेदोक): काथलिकों के सार्वभौमिक धर्मगुरू संत पापा फ्रांसिस ने अपनी मिस्र की दो दिवसीय प्रेरितिक यात्रा के दौरान शुक्रवार 28 अप्रैल को काहिरा के कॉप्टिक ऑरथोडोक्स महागिरजाघर में कॉप्टिक ऑरथोडोक्स कलीसिया के धर्मगुरु तावाद्रोस द्वितीय से मुलाकात की और अपने संबोधन के दौरान हिंसा के रोकथाम पर जोर देते हुए विश्व को ख्रीस्त के प्रेम का साक्ष्य देने पर बल दिया।

इस मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा कि हमने फिलहाल ही प्रभु के पुनरुत्थान का महोत्सव मनाया है जो ख्रीस्तीय जीवन का केन्द्र बिन्दु है। हम पुनरुत्थान के संदेश को घोषित करते और प्रथम शिष्यों की अनुभूति को यह उच्चरित करते हुए अपने जीवन में जीने की कोशिश करते हैं, “वे येसु को देख कर आनंदित हुए।” (यो.20.20) पास्का की यह खुशी हमारा प्रेममय मधुर आलिंगन शांति की एक निशानी है। एक तीर्थयात्री के रुप में मैं सहृदय अपनी कृतज्ञता अर्पित करता हूँ क्योंकि मेरा यहाँ आना निश्चय ही एक भाई के रुप में मुझे बहुप्रतीक्षित कृपाओं से भर देगा। मुझे इस प्रेममय मिलन की प्रतीक्षा थी क्योंकि मैं प्रत्यक्ष रुप से आपके धर्मगुरु की रोम यात्रा की याद करता हूँ जिसे उन्होंने 10 मई 2013 को अपने निर्वाचन के उपरान्त किया था। वह दिन कॉप्टिक और ख्रीस्तीय कलीसिया की मित्रतापूर्ण मिलन की वर्षगाँठ को याद करने का एक अवसर बना।

संत पापा ने कहा कि जब हम अन्तरकलीसियाई यात्रा में खुशी पूर्वक आगे बढ़ रहे हैं तो मैं संत  पेत्रुस और संत मारकुस, इन दोनों धर्मपीठों के संबंधों की केन्द्र-बिन्दु को याद करता हूँ जिसकी घोषणा करते हुए हमारे पूर्वाधिकारी ने एक सामान्य घोषणा पर 10 मई सन् 1973 को हस्ताक्षर किया था। सदियों के “कठिन इतिहास” जहाँ ईश शास्त्र में भिन्नता और कई गैर-धार्मिक कारकों का विकास उनका प्रसार और उनकी बढ़ोतरी ने हमारे बीच अविश्वास को जन्म दिया लेकिन उस दिन ईश्वर की कृपा से हमने इस बात में आपसी सहमति जताई कि “येसु ख्रीस्त अपनी दिव्यता में सम्पूर्ण ईश्वर और अपनी मानवता में पूर्ण मानव हैं।” (Common Declaration of Pope Paul VI and Pope Shenouda III, 10 May 1973).

इस घोषणा के तुरन्त बाद के महत्वपूर्ण शब्द जहाँ हम येसु को “हमारे प्रभु, ईश्वर, मुक्तिदाता और राजा की संज्ञा” देते हैं। इन शब्दों के माध्यम से संत मारकुस और संत पेत्रुस के धर्मपीठ येसु के प्रभुत्व को घोषित करते हैं। इसके साथ ही हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि हम येसु के हैं वे हमारे सब कुछ हैं।

उन्होंने कहा कि इससे भी बढ़कर हम इस बात का अनुभव करते हैं कि हमारा संबंध उनके साथ है अतः उनके शिष्यों के रुप में हम अलग-अगल मार्ग में नहीं चल सकते क्योंकि यह उनकी शिक्षा को खंडित करता है, “हम एक हों जिससे विश्व हम पर विश्वास करे।” (यो.17.21) ईश्वर अपनी नजरों में हमें पूर्ण एकता में बने रहने का आहृवान करते हैं। संत पापा जोन पौल द्वितीय इस बात पर बल देते हुए कहते हैं, “हमें इसे खोने हेतु समय नहीं है। येसु ख्रीस्त में हमारी एकजुटता, पवित्र आत्मा और एक बपतिस्मा हमारे लिए एक मूलभूत सच्चाई की ओर इंगित करता है।” (अन्तर कलीसियाई संगोष्टी, 25 फरवरी 2000) इसके परिणाम स्वरूप हमारे विश्वास के कारण हमारे बीच एक प्रभावकारी एकता स्थापित होती है जिसकी नींव स्वयं येसु हैं और हम उनमें एक नई सृष्टि बनते हैं। “एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए हम लोग बुलाये गये हैं।” (एफे.4.5)

यह एक प्रेरणात्मक यात्रा है जहाँ हम अपने में अकेले नहीं हैं वरन् येसु ख्रीस्त हमारे साथ चलते और हमारी सुरक्षा करते हैं। इस यात्रा में हम अपने महान संतों और लोहू गवाहों का सानिध्य प्राप्त हैं जो ईश्वरीय एकता में निवास करते हुए हमें अपने जीवन में एक सजीव “नवीन येरुसालेम” बनने को प्रेरित करते हैं। उन संतों के बीच हम पेत्रुस और मारकुस को अपने प्रतिदिन के जीवन में पाते हैं। वे एक-दूसरे के साथ एक विशेष एकता में संलग्न थे। संत मारकुस अपने सुसमाचार के केन्द्र बिन्दु में संत पेत्रुस के विश्वास उद्घोषणा की चर्चा करते हैं, “आप मसीह हैं।” यह उत्तर येसु के एक अति आवश्यक प्रश्न का है, “और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँॽ (मार.8.29) आज बहुत से लोग इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकते हैं लेकिन हम जो इसका जवाब देने को सक्षम हैं उन्हें येसु को जाने की एक विशेष खुशी होती है। हमें उन्हें एक साथ जानने की एक अत्यन्त खुशी की अनुभूति होती है।

संत पापा ने कहा कि हम सब एक साथ मिलकर अपने विश्वास को विश्व के सामने व्यक्त करते हुए उनका साक्ष्य देने हेतु बुलाये गये हैं, विशेषकर, अपने जीवन के द्वारा जिससे हम अपने आचार-विचार और व्यवहार के माध्यम से व्यक्त करते और उनकी उपस्थिति का एक ठोस प्रेम पूर्ण संवाद प्रस्तुत करते हैं। काप्टिक ऑरथोडक्स और काथलिक कलीसिया के रुप में हम एक साथ मिलकर इस प्रेम की भाषा को अपने भाई-बहनों के बीच अपने कार्यों के द्वारा कर सकते हैं जो येसु पर विश्वास करते हैं। इस तरह हम अपने जीवन के द्वारा एकता की एक मजबूत मिसाल पेश कर सकते हैं जहाँ पवित्र आत्मा, निश्चय ही, हमारे लिए आशातीत मार्गों का खुलासा करेंगे।

संत पापा ने संत पेत्रुस और संत मारकुस के बीच प्रेमपूर्ण संबंध को जिक्र करते हुए कहा कि पेत्रुस मारकुस को “मेरा पुत्र” कह कर संबोधित करते हैं। (1पेत्रु.5.13) सुसमाचार रचयिता संत मारकुस का संत पौलुस के साथ भ्रातृत्वपूर्ण संबंध रहा जिसका जिक्र हमारे लिए संत पौलुस के प्रेरितिक पत्रों में मिलता है। वे उन्हें प्रेरिताई हेतु उपयोगी, भ्रातृत्व प्रेम और प्रेरिताई में संलग्न व्यक्तित्व की संज्ञा देते हैं। (1तिम.4.11, फिलो. 24, कलो. 4.10) धर्मग्रंथ का ये संदेश हमें एक-दूसरे के साथ प्रेम पूर्ण संबंध में संयुक्त करते हैं।

हमारी अन्तरकलीसियाई यात्रा जो रहस्यात्मक और अपने में महत्वपूर्ण है अन्तरकलीसियाई शहीदों से प्रभावित और स्थापित है। संत योहन इसकी चर्चा करते हुए कहते हैं, “येसु ख्रीस्त जल और रक्त” द्वारा आते हैं (1यो.5.6) “जो उन पर विश्वास करता है उसे संसार पर विजयी प्राप्त होती है।” (1यो.5.5) जल और लोहू हमें अपने बपतिस्मा की याद दिलाती है जो हमारे लिए प्रेम की निशानी है। मिस्र की इस पवित्र भूमि में कितने ही ख्रीस्तीयों ने अपने विश्वास के कारण एक साहसिक अगुवे के रुप में अपने प्राणों की आहूति दी और बुराइयों पर विजय प्राप्त की है। कॉप्टिक कलीसिया की शहादत पूर्ण इतिहास इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। आज भी कितने ही निर्दोष सुरक्षा विहीन ख्रीस्तीयों का बहता रक्त हमें एकता में पिरोकर रखता है। संत पापा ने कहा कि जिस तरह स्वर्गीय येरुसालेम एक है उसी तरह हमारी शहादत भी एक है। आप के दुःख-दर्द हमारे दुःख-दर्द हैं। इस साक्ष्य को अपने में मजबूत करते हुए हमें हिंसा को रोकने हेतु अपने में संवाद, अच्छाई और एकता के बीज बोने की जरूरत है जिससे भविष्य में शांति बहाल हो सकें।

इस प्रभावकारी पवित्र भूमि का इतिहास केवल शहीदों के द्वारा प्रतिष्ठित नहीं होता है। प्राचीन समय में हुए सतावट का अंत होने पर ईश्वर में एक नये आत्मत्यागी जीवन की शुरुआत हुई जहाँ लोगों ने मरुभूमि में एक मठवासी जीवन की शुरूआत की। इस तरह ईश्वर के द्वारा मिस्र और लाल सागर में किये गये चमत्कारिक कार्य नये जीवन, पवित्रता के रुप में मरुभूमि में प्रस्फुटित हुई। मैं इस पवित्र भूमि में एक तीर्थयात्री के रुप में आया जिसे ईश्वर ने अपने प्रेम में चुना है। वे यहाँ सिनाई पर्वत पर आये (निर्ग.24.16) और अपनी नम्रता में उन्होंने एक छोटे बालक के रुप में यहाँ पनाह ली।(मती.2.14)

अपने संबोधन के अंत में संत पापा ने कहा कि ईश्वर हमें आपसी एकता में अपनी शांति का संदेशवाहक बनाये। हमारी इस तीर्थयात्रा में माता मरियम हमारे हाथों को पकड़ कर हमारी अगुवाई करे, जिन्होंने येसु को यहाँ लाया, जिसे मिस्र के महान ईश शास्त्रियों ने “थियोटोक्स” ईश्वर की माता की संज्ञा दी। इस संज्ञा में मानवता और ईश्वरता का समिश्रण है क्योंकि ईश्वर की माता द्वारा ईश पुत्र सदा के लिए मानव बना। कुंवारी माता जो सदैव हमें येसु के पास ले चलती, जो ईश्वर और मानव के मिलन को मधुर संगीत का रुप देती है हमें इस धरा को पुनः एक बार स्वर्ग में परिणत करने में सहायता करे।

सन्त पापा फ्राँसिस एवं कॉप्टिक पोप तावाद्रोस की संयुक्त घोषणा

In Church on April 29, 2017 at 3:50 pm

 

काहिरा, शनिवार, 29 अप्रैल सन् 2017 (सेदोक): काहिरा में, शुक्रवार 28 अप्रैल को, कॉप्टिक ख्रीस्तीय कलीसिया की प्राधिधर्माध्यक्षीय पीठ में सन्त पापा फ्राँसिस एवं कॉप्टिक ख्रीस्तीय कलीसिया के धर्मगुरु पोप तावाद्रोस द्वितीय ने एक संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किये। उन्होंने प्रभु येसु ख्रीस्त द्वारा सिखाई गई “हे पिता हमारे” प्रार्थना के समान अनुवाद एवं येसु के पुनःरुत्थान महापर्व को दोनों कलीसियाओं द्वारा एक ही दिन मनाने का आह्वान किया।

सार्वभौमिक काथलिक कलीसिया के परमधर्मगुरु सन्त पापा फ्राँसिस तथा कॉप्टिक ख्रीस्तीय कलीसिया के धर्मगुरु पोप तावाद्रोस द्वितीय के बीच संयुक्त घोषणा चालीस वर्ष पूर्व सन्त पापा पौल षष्टम एवं भूतपूर्व कॉप्टिक धर्मगुरु पोप शिनोडा तृतीय के बीच सन् 1973 में सम्पन्न मुलाकात के बाद की गई। तत्कालीन मुलाकात सदियों से अलग हुई काथलिक एवं कॉप्टिक कलीसियाओं के बीच सम्बन्धों के सुधार हेतु मील का पत्थर सिद्ध हुई थी जिसके बाद पूर्वी ऑरथोडोक्स कलीसियाओं के साथ धर्मतत्ववैज्ञानिक वार्ताओं का सूत्रपात हो सका था। शुक्रवार को तावाद्रोस ने उस समय से अब तक हुए विकास का स्मरण दिलाया तथा सामान्य प्रार्थनाओं द्वारा प्रभु येसु ख्रीस्त में अपने विश्वास को सुदृढ़ करने का आह्वान किया।

संयुक्त घोषणा में कहा गया कि काथलिक एवं कॉप्टिक ख्रीस्तीय मानव जीवन, विवाह और परिवार की पवित्रता, सृष्टि के प्रति सम्मान आदि मूल्यों का साक्ष्य एक साथ मिलकर दे सकते हैं। घोषणा में समस्त विश्व के उन ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों के लिये प्रार्थनाओं को सघन किये जाने का आह्वान किया गया जो ख्रीस्तीय धर्म और विश्वास के कारण हत्या एवं उत्पीड़न के शिकार बनाये जाते हैं, विशेष रूप से, मिस्र एवं मध्य पूर्व के अन्य देशों में।

घोषणा का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य कॉप्टिक एवं काथलिक कलीसियाओं में बपतिस्मा संस्कार को लेकर बने तनाव को दूर करना रहा। शुक्रवार को काथलिक कलीसिया के परमाध्यक्ष सन्त पापा फ्राँसिस एवं कॉप्टिक कलीसिया के धर्मगुरु तावाद्रोस ने घोषणा की कि वे बपतिस्मा संस्कार को दुहरायेंगे नहीं। उन्होंने कहा, “यदि कोई विश्वासी एक कलीसिया से दूसरी कलीसिया में जाना चाहे तो काथलिक एवं कॉप्टिक कलीसियाओं में सम्पादित बपतिस्मा मान्य होगा, इसे दुहराया नहीं जायेगा।”

मिस्र में अपनी यात्रा के दूसरे एवं आखिरी दिन सन्त पापा फ्राँसिस ने मिस्र के काथलिक विश्वासियों के लिये काहिरा स्थित सैन्य स्टेडियम में ख्रीस्तयाग अर्पित किया। इस समारोह में लगभग 30,000 विश्वासियों के शामिल होने का अनुमान है।

मिस्र से विदा लेने से पूर्व सन्त पापा फ्राँसिस ने काथलिक धर्मसमाजियों, धर्मसंघियों एवं धर्मबहनों के साथ सान्ध्य वन्दना का नेतृत्व किया तथा उन्हें अपना सन्देश दिया। श्रोताओ, इसी के साथ मिस्र में सन्त पापा की प्रेरितिक यात्रा पर हमारी संक्षिप्त रिपोर्ट समाप्त होती है। मिस्र में सन्त पापा फ्राँसिस की यह पहली तथा इटली से बाहर 18 वीं विदेश यात्रा थी। हमारी आशा है कि इस्लामी चरमपंथियों एवं आतंकवादियों के अनवरत हमलों से पीड़ित मिस्र के समस्त नागरिक और, विशेष रूप से, यहाँ के ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों के लिये सन्त पापा फ्राँसिस की राष्ट्र में उपस्थिति आशा की एक किरण सिद्ध हो।


(Juliet Genevive Christopher)

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