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‘गंभीर संकट’ का जवाब ‘विश्वास का वर्ष’

In Church on January 29, 2012 at 10:16 am

वाटिकन सिटी, 28 जनवरी, 2012 (सीएनए) संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें ने कहा,  “विश्वास का वर्ष 2012 -13, संकट के क्षण में मानवता को जागरुक करेगा।” 

उक्त बात संत पापा ने उस समय कही जब उन्होंने 27 जनवरी, शुक्रवार को काथलिक सिद्धांत के लिये कार्यरत कलीसिया के सर्वोच्च अधिकारियों को संबोधित किया।

संत पापा ने कहा, “विश्व के कई भागों में विश्वास के लोप होने का ख़तरा पैदा हो गया है मानो यह तेल बिना दीया हो।”

उन्होंने कहा, “हम आज विश्वास संबंधी एक गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। धार्मिक भावना का अभाव होना, कलीसिया के लिये सबसे बड़ी चुनौती बन गयी है।”

पोप ने आशा व्यक्त करते हुए कहा, “11 अक्तूबर 2012 से 24 नवम्बर, 2013 तक जारी रहना वाला ‘विश्वास का वर्ष’ दुनिया के लोगों को ईश्वरीय उपस्थिति का अनुभव कराएगा, जिससे व्यक्ति को विश्वास मजबूत होगा ताकि वह अपने को उस पिता ईश्वर को समर्पित करे जिन्होंने हमें येसु मसीह के द्वारा हमें नवजीवन दिया ।”  

संत पापा ने कहा, “विश्वास का नवीनीकरण पूरी काथलिक कलीसिया की प्राथमिकता हो जो विश्व के ईसाइयों को एकता के सूत्र में बाँधे।” 

उन्होंने इस बात को भी स्वीकार किया कि अन्तरकलीसियाई प्रयास लोगों के विश्वास को मजबूत करने में सदा सहायक नहीं रहा है।

 उन्होंने कहा, “अन्तरकलीसियाई वार्ता से कई अच्छी बातें निकल कर सामने आयीं हैं पर इससे तटस्थता और ‘झूठा इरेनिसिज़्म’ बढ़ा है अर्थात् एक ऐसी एकता बढ़ी है जो सत्य के कम महत्त्व देती।”

आज दुनिया में यह बात हावी होती जा रही है कि ” सत्य तक पहुँच पाना कठिन है और इसलिये दुनिया को बेहतर बनाने के लिये हमें कुछ नियमों के पालन करने तक ही सीमित रखना चाहिये। ”

संत पापा ने कहा, “ऐसे समय में छिछली नैतिकता की जगह विश्वास को स्थान दिया जाना चाहिये जो विभिन्न ख्रीस्तीय समूहों के बीच वार्ता के लिये सहायक सिद्ध हो।”

“वास्तव में सच्चा अन्तरकलीसियाई वार्ता का मुख्य बिन्दु है या सार है ‘विश्वास’ जिसमें व्यक्ति ईशवचन द्वारा प्रकाशित सत्य को प्राप्त करता है।”  

 संत पापा ने कहा, “विवादास्पद मुद्दों को अन्य कलीसियाओं के साथ आम बातचीत के समय बेक़दर या नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।”

 उन्होंने कहा, “विश्वास और नीति की बातों को भ्रातृत्व और सम्मान का भाव रखते हुए, पूरे साहस के साथ बरकरार रखा जा सकता है। आपसी वार्तालाप में हम मानव जीवन, परिवार, यौनसंबंधी बातें, जैव नैतिकता, स्वतंत्रता, न्याय और शांति जैसे बातों की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं।”

 संत पापा ने कहा, “कलीसिया की सच्ची परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए ही हम मानव और सृष्टि की रक्षा करते हैं।” 

जस्टिन तिर्की, ये.स.

 http://www.radiovaticana.org/in1/index.asp

आर्थिक मंदी का कारण – जन्मदर में कमी

In Church on January 21, 2012 at 7:30 pm

रोम, 21 जनवरी, 2012 (ज़ेनित) ” आर्थिक मंदी का कारण है 70 के दशक से जन्मदर में भारी कमी आना।”

उक्त बात वाटिकन बैंक के रूप में विख्य़ात ‘आईओआर’ अर्थात् ‘इस्तीत्यूतो पेर ले ओपेरे दी रेलिजियोने’ के अध्यक्ष एत्तोरे गोत्ती तेदेस्की ने उस समय कहीं जब उन्होंने इताली संसद में ‘परिवार’ विषय पर आयोजित एक विचारगोष्ठी में अपने विचार रखे।

एत्तोरे ने कहा, ” यदि हम छः व्यक्ति सरकार के अंग होते तो आर्थिक समस्या का समाधान निकाल लेते क्योंकि हमें मालूम है कि समस्या की जड़ कहाँ है -परिवार में।

तेदेस्की ने कहा, ” जब जन्मों पर व्यवधान डाला जाता है और पश्चिमी देशों में जब परिवार तथा बच्चों को नज़रअंदाज़ किया जाता है तब पाँच तरह का नकारात्मक प्रभाव होना स्वभाविक है।”

अर्थव्यवस्था का विकास न होना, बचत नहीं होना, विवाह नहीं होना, बुजूर्गों का अभाव और रोजगार का अभाव।

उन्होंने कहा, ” पिछले 30 सालों बच्चों का जन्मदर कम रहा, इसलिये देश की जनसंख्या उतनी ही रह गयी है जितनी सन् 1980 में थी। इसलिये जीडीपी नहीं बढ़ा है क्योंकि यह तब ही बढ़ता है जब अधिक उपभोक्ता होते हैं।

लोगों में बचत की भावना का अभाव है, इसलिये बैंकों में नकदी या रुपये नहीं है। सन् 1975 से 80 ईस्वी में इताली परिवारों की बचत-दर 27 प्रतिशत थी। अर्थात् प्रत्येक 100 लीरे में 27 लीरे बचाये जाते थे जिसका निवेश किया जाता था।

आज जो कुछ कमाया जाता है उसे समाप्त कर दिया जाता है इसलिये आर्थिक बाज़ार के कोई श्रोत नहीं रह गये हैं। इसके साथ ही आज 32 वर्ष के पूर्व कोई विवाह नहीं करता है क्योंकि युवाओं के पास अपना घर नहीं है। यदि वे किसी विशेष व्यवसाय से भी जुड़े हैं तो भी वे 30 वर्ष पहले की कमाई का आधा कमाते हैं क्योंकि उनके लिये  टैक्स की बढ़ोत्तरी 25 से 50 प्रतिशत हो गयी है।

बच्चों के जन्म दर कम हो गया है जिससे जनसंख्या का एक बड़ा भाग पेंसनभोगी हो गया है। आर्थिक रूप से निर्धारित लागत में वृद्धि कहा जाता है। देश के पास उनकी देख-भाल के लिये रुपये का अभाव है।

उन्होंने कहा, ” उपभोग करने के लिये हमने एशिया का सहारा लिया है। पहले जिन वस्तुओं का उत्पादन पश्चिमी दुनिया में होता था अब हम उसका आयात कर रहे हैं क्योंकि इसका मूल्य कम है। उत्पादन हटा दिये जाने से रोज़गार में हटा दिये गये हैं इस तरह से बेरोज़गारी की समस्या बढ़ी है।  

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