Vatican Radio HIndi

वर्ष का छठा रविवार, 12 फरवरी, 2012

In Sunday Reflection on February 9, 2012 at 11:27 am

लेवी ग्रंथ 13 : 1-2, 45-46

कुरिन्थियों के नाम 10 : 31-11 : 1

संत मारकुस 1 : 40-45

जस्टिन तिर्की, ये.स.

चुन्नु की कहानी

आज आइये हम एक बच्चे के बारे में चर्चा करें। बच्चे का नाम था – राजू पर उसकी माँ उसे प्यार से ‘चुन्नु’ कह कर पुकारती थी। चुन्नु तीन साल का था। वह सुबह से ही अपने घर के आँगन में खेलता था। कभी गुड़ियों कभी आँगन में गिरी पत्तियों से खेलता तो कभी घर की बिल्ली से तो कभी पिल्लों से। राजू की माँ पास के एक प्राइमरी स्कूल की शिक्षिका थी। मैं जब भी उधर से गुज़रता तो राजू मेरे पास आता और कहता ‘चाचा’। मैं भी उसे प्यार से पुचकारता और एक टॉफी अवश्य ही दिया करता था। जब भी चुन्नु मुझे देखता तो खुश हो जाता था और मैं भी प्रसन्न हो जाता चुन्नु को देख कर। कई बार तो मैं उसे गोद में उठा लेता। उसे प्यार करता मिठाई देता और फिर हाथ हिला कर उससे विदा लेता था। एक दिन की बात है मैं शहर गया था और वहाँ से चुन्नु के लिये कुछ मिठाइयाँ और कुछ फल ले आया था। जब दूसरी सुबह को मैं अपने काम पर जाने के घर से निकला तो देखा चुन्नु आँगन में नहीं खेल रहा है। मैंने मिठाई की पोटली और फल हाथ में लिये चुन्नु को खोजने लगा पर वह मिला नहीं। तब मैंने आवाज़ लगायी ‘चुन्नु बेटे’ कहाँ हो। कोई जवाब नहीं आया। मैंने उनकी माँ से पूछा कि चुन्नु कहाँ है? मम्मी ने अंदर से ही जवाब दिया “बस आँगन में खेल रहा होगा।”  मैंने कहा, “वह आँगन में नहीं है।” जब मैं खोजता हुआ घर के पिछवाड़े में गया तो देखा कि वह गुसलखाने से निकले रहे गंदे पानी में खेल रहा था। इतना ही नहीं उसके हाथ-पैर गन्दे थे और उसके चेहरे में भी कीचड़ लगे हुए थे। मुझे देख कर वह ‘चाचा मिठाई’ कहता हुआ मेरे पास आया। जब वह मुझे पकड़ना चाहा तब मैंने कहा, “मुझे छूना नहीं, गन्दा लड़का। पहले हाथ-पैर धो लो तब मिठाई।”  वह रुँआसा हुआ पर मैंने उसे मिठाई नहीं दी।तब तक उसकी माँ बाहर आयी और उसने बिना किसी सवाल के बच्चे को अपने हाथों से उठा लिया और बड़े प्यार से कहा, “बेटे पानी में नहीं खेलते हैं ना।”  और फिर उसे धोने लगी और देखते-देखते ही चुन्नु साफ हो गया, नया पकड़ कपड़ा पहन लिया और सुन्दर लगने लगा। मम्मी ने उसका चुम्बन किया दुलारा, पुचकारा और कहा,”मेरा राजा बेटा,  मेरा सुन्दर बेटा।”  और तब मैंने चुन्नु को मिठाई दी। मम्मी ने कहा अंकल को “थैंक यू बोलो ” और चुन्नु ने मिठाई मुँह में डालते हुए कहा “थैंक्यू अंकल।” माँ के लिये पुत्र सदा पुत्र ही रहता है चाहे वह भला कार्य से घर की ख्याति बढ़ा रहा हो या फिर बुरे लत से घर की लाज़ को मिट्टी में मिला रहा हो। चाहे वह स्वस्थ हो या बीमार हो माँ की ममता सदा अपने पुत्र के लिये एक-सा बनी रहती है।

आज हम रविवारीय आराधना चिन्तन के अन्तर्गत पूजन-विधि पंचांग के वर्ष ‘ब’ के छटवें सप्ताह के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर मनन चिन्तन कर रहे हैं। आज प्रभु हमें यह बताना चाहते हैं कि वे पापों, गुनाहों या किसी भी प्रकार की बुराइयों के कारण हमें अपने से दूर नहीं रख सकते हैं । वे तो चाहते हैं कि हम सदा उसके पास लौटते रहें, उसके कृपापात्र बने रहें और सदा ईश्वरीय कृपा के सहभागी बने रहें।

आइये हम संत मारकुस के सुसमाचार के पहले अध्याय के 40 से 45 पदों को पढ़ें जिसमें येसु ने समाज से बहिष्कृत व्यक्ति को शारीरिक, आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से शुद्ध किया।

 सुसमाचार पाठ

एक कोढ़ी येसु के पास आया और घुटने टेक कर उन से गिड़गिड़ाते हुए बोला “आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।”  येसु को तरस आया उन्होंने हाथ बढ़ा कर यह कहते हुए उसका स्पर्श किया, “मैं यही चाहता हूँ -शु्द्ध हो जाओ।” उसी क्षण उसका कोढ़ दूर हुआ औऱ वह शुद्ध हो गया। येसु ने उसे यह कड़ी चेतावनी देते हुए तुरन्त विदा किया, “सावधान ! किसी से कुछ न कहो। जाकर अपने को याजकों को दिखाओ और अपने शुद्धीकरण के लिये मूसा द्वारा निर्धारित भेंट चढ़ाओ, जिससे तुम्हारा स्वास्थ्य लाभ प्रमाणित हो जाये।” परन्तु वह वहाँ से विदा हो कर चारों ओर खुल कर इसकी चर्चा करने लगा। इससे येसु के लिये प्रकट रूप से नगरों में जाना असंभव हो गया, और वह निर्जन स्थानों में रहने लगा। फिर भी लोग चारों ओर से उनके पास आते थे।

प्रार्थना की विशेषतायें

आज के सुसमाचार में  जिसने बात ने मुझे प्रभावित किया है वह है – उस कुष्ट रोगी की छोटी प्रार्थना। क्या आपने ग़ौर किया कि उसकी प्रार्थना क्या थी। उस रोगी ने येसु से कहा, “कि अगर आप चाहें तो आप मुझे आप शुद्ध कर सकते हैं।” कितनी सरल प्रार्थना है एक रोगी की। एक ऐसे व्यक्ति की जिसे समाज ने बहिष्कृत कर दिया है। एक ऐसे व्यक्ति की जिसे कोई अपने साथ रखना नहीं चाहता है। एक ऐसे व्यक्ति की जो शारीरिक रूप से कमजोर है, जो सामाजिक रूप से कमजोर है और जो अकेला है। हम सबों को मालूम है कि हमारे समाज में भी कई लोगों को इस प्रकार के अकेलापन का सामना करना पड़ता है। कभी अपने जन्म को लेकर हमें कोई छोटा समझता तो कभी हमारे जन्म स्थान को लेकर तो  कभी महारे ग़रीब परिवार को लेकर । कई बार तो  हमें इसलिये उचित आदर दिया जाता क्योंकि हमारा रंग औरों से भिन्न है। इतना ही नहीं कई बार हम इसलिये भी तिरष्कृत किये जाते हैं क्योंकि  हमारी पढ़ाई-लिखाई अच्छे स्कूलों में नहीं हुई है यह कई बार तो हम इसलिये भी किसी के हँसी के पात्र हुए क्योंकि हम शारीरिक रूप से कमजोर हैं या वैसे सुन्दर नहीं दिखाई देते जैसे लोगों के मन में सुन्दरता के संबंध में समझदारी है।

क्या आपने विचार किया है कि ऐसी परिस्थितियों में हम क्या प्रार्थना चढ़ाते हैं भगवान को? मुझे याद है जब मुझे शारीरिक तकलीफ थी तो मैं कहा करता था प्रभु आपने मुझे यह तकलीफ क्यों दी? क्यों आपने मेरे साथ सौतेला व्यवहार किया।क्यों आपने इतनी कम उम्र में ऐसी तकलीफ़ दी? क्यों आपने मुझको यह दिया और दूसरों को नहीं? मेरे मन-दिल में सवाल-ही-सवाल थे कि क्यों ईश्वर ने मुझे औरों से कम वरदान दिये। और इस तरह से मेरी प्रार्थना, प्रार्थना नहीं ईश्वर से एक प्रकार की ‘शिकायत’ होती थी। आज जब मैं उस कुष्ट रोगी के बारे में मनन-चिन्तन करता हूँ तो इस बात को मैं बहुत स्पष्ट रूप से पाता हूँ कि उस कोढ़ी की प्रार्थना के समान और कोई प्रार्थना हो ही नहीं सकती।

दो बातें

आप मुझे पूछेंगे कि उस रोगी की प्रार्थना क्यों इतनी अच्छी और प्रभावपूर्ण थी। उस कुष्ट रोगी की प्रार्थना में एक निवेदन है जो एक नम्र व्यक्ति ही कर सकता है। वह कहता है कि “आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।” ग़ौर करने से हम पाते हैं कि इस प्रार्थना में दो भाग हैं पहला तो है कि वह व्यक्ति शुद्ध होना चाहता है और दूसरा उसे  ईश्वर की अच्छाई पर उसे पूरा भरोसा है। दूसरे शब्दों में वह कुष्ट रोगी कहता  वैसे मैं बेसहारा हूँ, अपने से कुछ कर नहीं सकता। अगर आपकी इच्छा हैं तो मैं ऐसा ही रहने के लिये तैयार हूँ पर अगर आप चाहते हैं कि मेरा शुद्ध होना आपके नज़रों में भला है तो आप मुझे चंगा कर दीजिये।

दूसरी बात, इस निवेदन में विश्वास भी है कि येसु ही उन्हें शुद्ध कर सकते हैं। रोगी पूर्ण रूप से प्रभु पर समर्पित है। वह ईश्वर से जुड़ा हुआ है और उससे जुड़ा ही रहना चाहता है। वह ईश्वर की इच्छा को अपने जीवन में सबसे बड़ा मानता है। वह नहीं कहता है कि आपको चंगा करना ही पड़ेगा। वह नहीं कहता है कि मुझे लगता है कि आप मुझे चंगा कर सकते हैं। वह यह भी नहीं कहता है कि मैंने सुना है कि आपने बहुतों को चंगा किया है अतः मेरे साथ भई वैसा ही कर सकते हैं। बस वह कहता है “आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।”  अगर इसे हम दूसरे शब्दों में कहें तो यह कहा जा सकता है कि वह कुष्ट रोगी कह रहा है कि प्रभु मैं तो चाहता हूँ कि स्वास्थ्य लाभ करूँ पर आप अगर मुझे योग्य समझते हैं तो मेरी इस इच्छा में आपकी इच्छा पूरी हो।

नम्रता, विश्वास व समर्पण

आपने गौर किया होगा कुष्ट रोगी में नम्रता है, उसमें इश्वरीय शक्ति पर अटूट विश्वास है और वह ईश्वर को समर्पित है। वह कहता है “अगर आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।” उसकी विनती में यह भाव स्पष्ट है कि मैं अपने आपको स्वीकार करता हूँ, अपनी बीमारी को स्वीकार करता हूँ और अच्छाई की इच्छा रखता हूँ पर आपकी इच्छा पूरी होने तक मैं धर्यवान बना रहूँगा। यह इसलिये क्योंकि मैं जानता हूँ कि आपकी योजना से मेरे जीवन के लिये और कोई बड़ी योजना नहीं है। अब आप ही सोचिये किसी भी विनती या सच्ची याचना के लिये इससे अच्छा और योग्य मनोभाव और हो ही क्या सकता है?

अब आइये हम सुनें प्रभु के जवाब को। वे कहते हैं, ” मैं चाहता हूँ कि तुम शुद्ध हो जाओ। एक अच्छी प्रार्थना और एक उचित पुरस्कार। कुष्ट रोगी उसी क्षण शुद्ध हो गया। हम समझ सकते हैं एक सच्ची प्रार्थना को, दिल से माँगे निवेदन को ऐसा आस्थापूर्ण समर्पण को जिसमें है विश्वास है, आशा  है प्रभु कैसे अस्वीकार कर सकते हैं?

प्रभु आज हम सबको इस कुष्ट रोगी की चंगाई के द्वारा यही बताना चाहते है कि समर्पण और विश्वास से पूर्ण  प्रार्थना कभी असफल नहीं होती है। आज प्रभु हमें बताना चाहते हैं कि पूर्ण चंगाई के लिये हमारे दिल में समर्पण से पूर्ण दृढ़ इच्छा होनी चाहिये। प्रभु हमें यह भी बताना चाहते हैं कि प्रभु के दरबार में आनेवाला कभी खाली हाथ वापस नहीं जाता है। प्रभु तो चाहते ही हैं कि हम प्रतिदिन नया बनें, अच्छा बनें, सुन्दर बने और अपने परिवर्तित और परिष्कृत जीवन के द्वारा अपने घर आँगन की शोभा तो बढ़ायें ही इस जग को भी नवीन कर दें। हम चाहे कितने ही अयोग्य क्यों न हों, किसी भी चिन्ता में डूबे क्यों न हों, किसी भी बुरे लत में फसे क्यों न हों, हीन-भाव से ही दबे क्यों न हों या किसी भी दुःख-दर्द के गर्त्त में क्यों ने पड़ें हों प्रभु चाहते हैं कि हम इनसे मुक्त हो जायें।वे हमसे कह रहे हैं, ” मैं चाहता हूँ तुम शुद्ध हो जाओ ठीक चुन्नु की मम्मी की तरह जिसने उसे गंदगी से उठा लिया, साफ किया, चुम्बन दिया औऱ कहा, “मेरा राजा बेटा ! मेरा सुन्दर बेटा !”

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