Vatican Radio HIndi

वर्ष का सातवाँ रविवार

In Sunday Reflection on February 15, 2012 at 11:00 pm

19 फरवरी, 2012, ‘B’

नबी इसायस का ग्रंथ 43 : 18-19, 21-22, 24-25

कुरिन्थियों के नाम 1 : 18-22

संत मारकुस 2 : 1-12


जस्टिन तिर्की,ये.स.

राजू और विजय

आइये आज आप लोगों को दो दोस्तों के बारे में एक कहानी बतलाता हूँ। एक का नाम था राजू और दूसरे का नाम था विजय। राजू की सिर्फ माँ जीवित थी और विजय के माता-पिता की मृत्यु हो गयी थी। विजय सदा ही राजू के घर में ही आकर रहा करता था। दोनों साथ-साथ पढ़ते, खेला करते, हँसी मज़ाक किया करते थे और जब भी कहीं जाते तो साथ ही जाते थे। दोनों की दोस्ती से माँ बहुत खुश हो गयी। एक बार की बात है कि राजू और विजय में किसी बात के लिये मनमुटाव हो गया। दोनों झगड़ पड़े और झगड़ा की इतनी हद तक हो गयी कि लडाई के क्रम में राजू की मृत्यु हो गयी। राजू की माँ बहुत रोयी। पुलिस ने विजय को पकड़ा और उसे जेल की सजा सुनायी गयी। उसे जेल के अन्दर बन्द कर दिया गया। विजय जेल में किसी से मिलना नहीं चाहता था। एक दिन राजू की माँ विजय से मिलने आयी । विजय ने मिलने से साफ़ इन्कार कर दिया। कुछ दिनों के बाद राजू की माँ विजय से फिर मिलने आयी पर उसने फिर इंकार कर दिया। जब राजू की माँ ने जेलर से बार-बार आग्रह किया कि वह विजय से एक बार मिलना चाहती है तो जेलर ने विजय से कहा कि वह राजू की माँ की ख़ातिर उससे मिले। विजय राजी हो गया। माँ मिलने आयी। उसने विजय से हाल-चाल पूछा पर उसने कोई उत्तर नहीं दिया। राजू की माँ ने कहा कि वह विजय से कुछ माँगना चाहती है। विजय ने कहा कि उसके पास कुछ नहीं है वह कुछ नहीं दे सकता है। पर राजू की माँ ने कहा कि वह उससे एक निवेदन करना चाहती है। पर विजय ने माँ की एक नहीं मानी। जेल की खिड़की से दूर जाते हुए राजू की माँ ने कहा, “विजय जब मैं दूसरी बार आऊँगी तो तुमसे एक विशेष बात करूँगी”।विजय लाज़ और दोषभावना से ग्रसित हो राजू की माँ को बिना देखे ही “हाँ” कहा था।  कुछ दिन बाद जब राजू की माँ दूसरी बार विजय से मिलने आयी तो उसने विजय से कहा, “विजय, तुमसे सिर्फ़ एक ही बात कहने यहाँ आयी हूँ”। विजय ने कुछ नहीं कहा। राजू की माँ ने कहा, “राजू मेरा एक ही बेटा था, वह अब नहीं है। क्या तुम मेरा बेटा बन सकते हो”। विजय ने एक बार माँ की ओर देखा, मानो तुम यह क्या! यह क्या कह रही हो ? माँ ने दोबारा वही कहा विजय क्या तुम मेरा बेटा बन सकते हो। और विजय रो पड़ा।

माँ की ममता और वात्सल्यता की चरमसीमा में न केवल प्यार था पर क्षमाशीलता और अगाध प्रेम  का एक ऐसा मिश्रण था जो अतुलनीय है। श्रोताओ रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अन्तर्गत् पूजन-विधि पंचांग के वर्ष के सातवें रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहें हैं। प्रभु आज हमें आमंत्रित कर रहे हैं ताकि हम क्षमा जैसे एक महान् गुण के बारे में मनन करें उसे अपनायें और मानव जीवन को पूरी आध्यात्मिक खुशी के साथ बिता सकें। आइये आज हम संत मारकुस रचित सुसमाचार के दूसरे अध्याय के 1 से बारह पदों को सुनें जिसमें येसु ने हमें बताया है कि वे इस दुनिया में  आये ताकि हम क्षमा का पाठ सिखायें और नया और पूर्ण जीवन जीयेँ

सुसमाचार पाठ

जब येसु क़फ़रनाहूम लौटे, तो यह खबर फैल गयी कि वह घर पर हैं और इतने लोग इकट्ठे हो गये कि द्वार के सामने जगह नहीं रही। येसु उन्हें सुसमाचार सुना ही रहे थे कि कुछ लोग एक अर्धांगरोगी को चार आदमियों से उठा कर उनके पास ले आये। भीड़ के कारण वे उसे येसु के सामने नहीं ला सके, इसलिये जहाँ येसु थे उसके ऊपर की छत उन्होंने खोल दी और छेद में से अर्धांगरोगी की चारपाई नीचे उतार दी। येसु ने उन लोगों का विश्वास देखकर अर्धांगरोगी से कहा, “बेटा। तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं।”कुछ शास्त्री वहाँ बैठे थे। वे सोचने लगे – यह क्या कहता है? यह ईश-निन्दा करता है। ईश्वर के सिवा कौन पार क्षमा कर सकता है ? येसु को मालूम ही था कि वे मन-ही-मन ऐसा सोच रहे हैं । उन्होंने शास्त्रियों से कहा, “मन-ही-मन क्या सोच रहे हो ? अधिक सहज क्या है अर्धांगरोगी से यह कहना, ‘तुम्हारे पापा क्षमा हो गये अथवा कहना, उठो अपनी चारपाई उठा कर चलो-फिरो? परन्तु इसलिए कि तुम लोग यह जान लो कि मानव पुत्र को पृ्थ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार मिला है” और वह अर्धांगरोगी से बोले – ” मैं तुम से कहता हूँ, उठो और अपनी चारपाई उठा कर घर जाओ।” वह उठ खड़ा हुआ और चारपाई उठा कर तुरन्त सबों के देखते-देखते बाहर चला गया। सब के सब अचंभे में पड़ गये और यह कह कर ईश्वर की स्तुति करने लगे – ऐसा चमत्कार हमने कभी नहीं देखा।

‘क्षमा’ पर चिन्तन

प्रभु के जिन शब्दों ने मुझे प्रभावित किया वे हैं “तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं”। प्रभु बताना चाहते हैं कि जो भी उनके पास विश्वास के साथ आये वे बिना वरदान के वापस नहीं जायेंगे और उन्हें पापों की क्षमा मिल जायेगी। क्या आपने कभी इस बात पर ग़ौर किया होगा कि इस छोटे से शब्द ‘क्षमा’ में कितनी सारी बातें छिपी हुई हैं। आम तौर से ‘क्षमा कर देना’ में तीन बातें छिपी रहती हैं। पहली तो क्षमा करने वाला व्यक्ति सहनशील होता है इसलिये वह दूसरे व्यक्ति को एक मौका देता है और दूसरा कि क्षमा देने वाला व्यक्ति शांति और सौहार्दपूर्ण जीवन का समर्थक होता है वह चाहता है कि सामुदायिक जीवन हँसी-खुशी से बीते। तीसरा कि वह व्यक्ति आशावादी होता है। वह यह विश्वास करता है कि भविष्य में व्यक्ति को बदला चुकाने या सजा देने के बदले वह प्यार भरा अवसर देता है ताकि व्यक्ति खुद ही अपने जीवन का सुधार करे और आपसी रिश्ते को मजबूत कर सके। सुसमाचार में वर्णित आज की घटना में ये तीनों बातें मौजूद हैं।

जब प्रभु ने कहा,  ‘तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं’ तो क्या आपने सोचा कि प्रभु ने ऐसा क्यों कहा? क्यों प्रभु को पक्का विश्वास हो गया कि जो लोग प्रभु के पास आये हैं वे क्षमा के योग्य हैं? अगर आपने इस बात को भी ध्यान दिया होगा कि प्रभु ने कहा कि ‘उन लोगों’ के विश्वास को देखकर पाप क्षमा की बात कही। यह बात विचारणीय है कि वे लोग कौन थे और उन्होंने क्या किया? वे चार व्य्कति  बीमार व्यक्ति को ढोकर लाने वाले उसके पड़ोसी थे और जब वह व्यक्ति येसु के पास नहीं पहुँच पाया तब उन्होंने उस रोगी को छत्त के रास्ते येसु के सामने रख दिये।

उन चार व्यक्तियों के प्रयासों को अगर हम विचार करें तो हम यह भी पाते हैं कि चारों व्यक्तियों ने हमारे लिये प्रेम, सहानुभूति, सहयोग और एक अच्छे सामुदायिक जीवन का कितना सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया। आज के सुसमाचार में वर्णित घटना ही में हम पाते हैं कि सामुहिक प्रयास से प्रसन्न होकर प्रभु ने  अर्धांगरोगी को चंगाई प्रदान किया। दूसरों की भलाई के लिये किया गया भला कार्य प्रभु के लिये विश्वास का साक्ष्य देना है। कई बार इस बात को समझने का प्रयास करते हैं कि विश्वास क्या है? कई बार इस बात को समझने का प्रयास करते है कि प्रभु में विश्वास करने का क्या अर्थ है? आज अर्धांगरोगी को क्षमा देते हुए प्रभु ने विश्वास का अर्थ भी समझाया है। विश्वास का अर्थ यह है हम ईश्वरीय अच्छाई पर भरोसा रखते हुए एक साथ मिलकर दूसरों की मदद करना, भलाई का कार्य करना, व्यक्ति की चंगाई के लिये प्रार्थना करें ज़रूरतमंदों को अच्छे मार्ग पर लाने के लिये प्रयास करना।

प्रभु विश्वास की बात करते हुए हमें यह बताना चाहते हैं कि यदि हम क्षमा चाहते हैं यदि हम शुद्ध होना चाहते हैं, यदि हम शांति चाहते हैं, यदि ईश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन जीना चाहते हैं तो हमें चाहिये कि हम प्रभु की दया, क्षमा और मु्क्ति पर पूर्ण भरोसा रखते हुए भला, अच्छा और सच्चा जीवन जीने के लिये प्रयासरत रहें।

क्षमा की ज़रूरत

सच पूछा जाये तो आज तेजी से बदलती दुनिया को एक गुण की सख्त ज़रूरत है और वह है – क्षमा की। अगर हम दुनिया की घटनाओं पर नज़र फेरेंगे तो आप पायेंगे की व्यक्ति के दिल में चैन नहीं हैं, शांति नहीं है आत्मसंतुष्टि नहीं है इसके पीछे कहीं-न-कहीं एक बात की कमी है। या तो व्यक्ति ने क्षमा नहीं दिया है या क्षमा नहीं पाया है। कई बार हम खुद ही कहते हैं कि मैंने जो ग़लती की है उसके लिये मैं खुद को क्षमा नहीं कर सकता कई बार हम दोस्तों को दगाबाज़ कह कर क्षमा नहीं देना चाहते, कई बार हम अपने पिता को पियक्कड़ कह क्षमा नहीं कर पाते हैं कई बार हम अपने अधिकारियों को पक्षपाती कह कर क्षमा नहीं कर पाते हैं कई बार तो भगवान को भी अन्यायी इसलिये कह डालते क्योंकि वह किसी को ज़्यादा देता किसी को कम। श्रोताओ क्षमा नहीं देने या क्षमा का अनुभव नहीं करना हमारे जीवन में एक ऐसे वरदान का अभाव जिसके कारण हम आसानी से अपने दिल की शांति खो दे सकते हैं। आसानी से मानसिक आध्यात्मिक और कभी-कभी शारीरिक रोग के शिकार हो जाते हैं।

क्षमा का पुरस्कार

क्या इस दुनिया में क्षमा का अभाव हैं । मैं तो ऐसा नहीं मानता। मेरा तो पक्का विश्वास है कि क्षमा  की भावना हमारे दिल में कूट-कूट भरी हुई है। मृत्यु के पहले की प्रभु येसु प्रार्थना कि हे पिता उन्हें क्षमा करना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहें हैं ने दुनिया के अनेक लोगों को प्रभावित किया है। मिसेस स्टेन ने अपनी पति और उसके दो मासूम बच्चों के जलाये जाने के बाद कहा कि वे दुःखी हैं पर क्रोधित नहीं। समाज सेविका रानी मरिया के ह्त्यारे को उसकी बहन ने राखी बाँधा संत पापा जोन पौल द्वितीय ने अपने उपर गोली चलाने वाले को क्षमा दी। हमने कई बार क्षमा और आशा के भाव से ‘ सॉरी ‘  कहे हैं और अपने मित्रों के मुख से यह कहते सुने चलो एक नयी शुरुआत कर लें, बुरी बातों को भूल जायें और अच्छी बातों की नींव पर परिवार का निर्माण करें। श्रोताओ क्षमा शब्द छोटा है पर इस भाव को बढ़ाने इसका उपयोग करने और इसी के बल पर आशामय जीवन जीने के पुरस्कार अपार हैं। क्षमा करने के कई चमत्कार हुए हैं और होते रहेंगे। क्षमा के प्रयास भी कभी व्यर्थ नहीं जाते। क्षमा खुद की आत्मा को तो सुकून देती है दूसरे को भी नया जीवन देती है जैसा कि उसने उस विजय के जीवन को नवीन कर दिया जिसने राजू की हत्या कर दी थी फिर भी राजू की माँ ने क्षमाशीलता की चरमसीमा का परिचय देते हुए ‘ बेटा ‘  कहा।

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