Vatican Radio HIndi

Archive for February 23rd, 2012|Daily archive page

रविवारीय सुसमाचार पर चिन्तन 26 फरवरी, 2012

In Sunday Reflection on February 23, 2012 at 1:24 pm

चालीसे का पहला रविवार वर्ष ‘ब’

26 फरवरी, 2012

उत्पति ग्रंथ 9, 8-15

संत पेत्रुस का पत्र 3, 12-15

संत मारकुस 1, 12-15

अजय की कहानी

आप लोगों को आज एक बालक की कहानी बताता हूँ जिसका नाम था – अजय। अजय के घर में सिर्फ उसकी माँ थी। अजय जब पाँच साल का था उसी समय उसके पिता की मृत्यु हो गयी थी। उसकी माँ शहर में रोज काम करने जाती थी और जो पैसे मिलते थे उसी से उन दोनों का जीवन-बसर हो रहा था। जब अजय सुबह को स्कूल जाता था तब उसकी माँ भी अपने काम पर चली जाती थी। एक दिन की बात है अजय स्कूल से एक पेंसिल लाया और उसने उसे अपनी माँ को दिखाया। माँ ने उससे पूछा तक नहीं कि उसे वह पेंसिल कहाँ से मिली। इसके ठीक विपरीत उसने उसे प्रोत्साहन देते हुए कहा कि शाबाश बेटे यह अच्छी पेंसिल तुमने घर ले आया। दूसरे दिन अजय ने एक किताब लायी फिर माँ का प्रोत्साहन मिला। फिर अगले दिन कोई कॉपी कोई रबर तो कोई नयी कलम घर आती गयी। माँ ने बच्चे के इस व्यवहार के लिये न हीं कोई सवाल किया न नहीं कोई परेशानी ही दिखायी। अजय घर से बाहर जाता तो अवश्य ही कोई- न-कोई नयी वस्तु ले आता था। कभी-कभी तो माँ ने उसकी जेब में कुछ पैसे भी देखे। पर माँ को इस बात का साहस ही न होता कि वह पूछे कि वे पैसे कहाँ से आते हैं। समय बीतता चला गया। अजय जवान हो गया अब तो वह 20 साल का एक छरहरा जवान ल़ड़का बन गया था। एक समय की बात है कि अजय कुछ दिनों के लिये बाहर चला गया था और वह सप्ताह भर भी नहीं आया। माँ परेशान हो गयी कि आख़िर अजय गया कहाँ। एक दिन किसी ने बताया कि स्थानीय समाचार पत्र में उसका नाम छपा था। वह किसी बैंक डकैती के आरोप में गिरफ़्तार हुआ उसे फाँसी की सजा सुनायी गयी। जब अजय को उसकी अंतिम इच्छा के बारे में पूछा गया तब उसने अपनी इच्छा जतायी कि वह अपनी माँ से मिलेगा। उसकी माँ उससे मिलने जेल गयी । अजय अपनी माँ से गले मिला और उसके बाद उसने कहा चुम्बन देते हुए अपनी माँ की जीभ काट लिया। वहाँ पर उपस्थित लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया है तब उसन कहा कि अगर मेरी माँ ने मेरी चोरी करने की आदत के बारे में बचपन में ही टोका होता तो मुझे आज फाँसी की सज़ा नहीं होती। छोटी बुरी आदत के प्रलोभन में फँसकर व्यक्ति कई बड़ी गलतियाँ कर बैठता है।पर अगर प्रलोभनों को जीत जाता है तो वह एक मजबूत और शक्तिशाली इंसान बन जाता है। रविवारीय आराधना विधि कार्यक्रम के अन्तर्गत् पूजन-विधि पंचांग के वर्ष के चालीसा काल के पहले रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहे हैं। प्रभु हमें अपने उदाहरण से ही यह बताना चाहते हैं कि प्रलोभन हमारे जीवन का एक हिस्सा है। अगर हम जीत जाते हैं तो ईश्वर के कार्य को मजबूती से बढ़ा पाते हैं पर अगर हम छोटे-छोटे प्रलोभनों पर विजय प्राप्त नहीं कर पाते हैं तो हम कमजोरियों के ऐसे दलदल में फँसते हैं जहाँ से हम जितना बाहर आना चाहते हैं हैं उतने ही नीचे खिसकते जाते हैं। श्रोताओ आइये हम आज के लिये प्रस्तावित सुसमाचार पाठ को पढ़ें जिसे संत मारकुस रचित सुसमाचार के पहले अध्याय के 12 से 15 पदों से लिया गया है।

सुसमाचार पाठ

येसु के बपतिस्मा के बाद आत्मा उन्हें निर्जन प्रदेश में ले चला। येसु चालीस दिन वहां रहे और शैतान ने उनकी परीक्षा ली। वह बनैले पशुओं के साथ रहते थे और स्वर्गदूत उनकी सेवा करते थे। योहन के गिरफ़्तार हो जाने के बाद येसु गलीलिया आये और यह कह कर सुसमाचार का प्रचार करने लगे, ” समय पूरा हो चुका है। ईश्वर का राज निकट आ गया है । पश्चात्ताप करो और सुसमाचार पर विश्वास करो। ”

मेरा विश्वास है कि आपने आज के सुसमाचार को ध्यान से पढ़ा है। आज प्रभु के दिव्य वचन बहुत लम्बे तो नहीं है पर इसमें जिन बातों की चर्चा की गयी है वे हमारे लिये अति महत्त्वपूर्ण हैँ। जिन बातों की आज के सुसमाचार में इंगित सिर्फ़ किया गया है उनमें पहली बात है कि येसु को शैतान ने परीक्षा ली। आपको यह जान कर परेशानी हुई होगी या फिर बार-बार सुनते-सुनते अब परेशानियाँ भी नहीं होतीं होगी। मैं तो परेशान हुआ कि प्रभु को भी शैतान की परीक्षा झेलनी पड़ी। क्या प्रभु को भी प्रलोभनों का सामना करना पड़ा। जी हाँ , प्रभु को भी आम ईशभक्तों की तरह परीक्षाओं में पास होना पड़ा और तब ही वे सच्चे रूप में विजयी हुए और सच्चे रूप में लोगों के लिये प्रलोभनों और जीवन के अवरोधों को पार करते हुए मुक्ति का मार्ग दिखाने में सक्षम हो पाये। कई बार मेरे मन में यह विचार उठता है कि ईश्वर मनुष्य से परीक्षायें क्यों लेते हैं। कभी तो मुझे यह सोचने का मज़बूर होना पड़ा है कि ईश्वर अपने प्रियजनों को क्यों शैतान से पूर्णतः बचा नहीं लेते हैं। मेरे आध्यात्मिक फादर ने मुझे बताया कि ईश्वर हमारा कल्याण चाहते हैं पर हमारी स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं ताकि हम पूरी स्वतंत्रता से ईश्वर को हाँ कहें और उसकी इच्छा के अनुसार अपना जीवन जीते हुए एक दिन येसु के योग्य बन सकें। कई बार हम सोचते हैं कि ईश्वर कमजोरियों में फँसने के लिये हमें छोड़ देते हैं। कई बार हम यह भी सोचने लगते हैं कि जब भी हम कुछ अच्छा कार्य करना चाहते हैं तो हम प्रलोभनों और परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है। क्या आपने कभी इस बात पर भी ग़ौर किया है कि प्रलोभन और परीक्षायें अपने आप में बुरी भी नहीं हैं।

प्रलोभन

अगर आप अपने जीवन को ग़ौर करेंगे तो आप पायेंगे कि इन प्रलोभन हमारे जीवन में कई अनमोल वरदान ले आयें हैं। धर्म के विद्वानों ने बताया है कि प्रलोभन आना मानव जीवन का अभिन्न अंग है और हमारे जीवन में लगातार आने वाले प्रलोभनों के कई अच्छे कारण हैं और इससे मानव जीवन को बहुत लाभ होता रहा है। पहली बात तो यह कि ईश्वर हमारे जीवन में प्रलोभनों को आने देते हैं ताकि हम अनुभव के द्वारा यह सीखें कि हम जीवन में विजयी हो सकते हैं ताकि हम रोज दिन शैतान के सामने मजबूत होते रहे। दूसरी बात ईश्वर हमें इस भ्रम से बचाना चाहते हैं कि सब कुछ ईश्वरीय वरदान है और मनुष्यों को इस जीवन में कुछ नहीं करना है ताकि भाग्यावादी न वन जाये। तीसरी बात कि प्रलोभनों से शैतान को यह पता चले कि मानवपु्त्र ने शैतान पर पूर्ण रूप से विजय पायी है और शैतान मानव से बड़ा नहीं है।चौथी बात श्रोताओ कि जब हम जीवन में संघर्ष करें तो हम अपने जीवन में सुदृढ़ होवें। और पाँचवी बात जिस जो हमें प्रलोभन से मिलते हैं वह है कि हमें यह आभास मिले कि ईश्वर का वरदान कितना मूल्यवान है। इन्हीं कारणों से ईश्वर हमारे जीवन में प्रलोभनों को आने देते हैं। प्रभु स्वयं ही प्रलोभनों पर विजयी होकर हमें यह बताया है कि हर प्रलोभन के समय हमें इस गुण और विश्वास में सुदृढ़ होना है कि हम ईश्वर की संतान हैं और हम ईश्वर के लिये ही आजीवन कार्य करते रहेंगे।

ईश्वर का राज्य, पश्चात्ताप और विश्वास

आज के सुसमाचार में हम और तीन महत्त्वपू्र्ण बातों की चर्चा पाते हैं। येसु पूरी दुनिया को सुसमाचार सुनाने लगे। अगर उनकी बातों को बहुत ही संक्षेप में कहा जाये तो हम कह सकते हैं उन्होंने कहा समय के बारे में ईश्वर का राज्य बारे में, पश्चात्ताप और विश्वास के बारे में। कभी आपने सोचा है कि इन चार बातों को समझने से हमें जीवन की खुशी मिल सकती है। प्रभु ने समय के बारे में कहा कि यह पूरा हो चुका है। कई बार हम यह सोचते-सोचते ही अपना जीवन गँवा देते हैं कि हम भली बातें सोचेंगे, करेंगे और भला बनेंगे। प्रभु का कहना है जो अच्छी बातें सोचते हैं उसे करने का समय आ गया। दूसरी बात प्रभु हमें बता रहे हैं वह कि हम इस बात को जानें कि ईश्वर का राज्य हमारे पास है हमारे घरों में है हमारे दिलों में है। बस ज़रुरत है कि हम उसे देखें पहचानें और उसे अपने जीवन में उचित स्थान दें। कई बार आपने लोगों को यह कहते हुए सुना होगा कि दुनिया ख़राब है लोग ख़राब है कोई अपने नहीं हैं दुनिया रसातल की ओर जा रही है। इन सब सोच-विचारों के जवाब में प्रभु आज कह रहे हैं कि स्वर्ग का राज्य मुझमें है हर दूसरे जन में है हमारे अन्तरतम् है हमारे चारों ओर है। बस हमें ज़रुरत है उसे देख पाने की। प्रभु की तीसरी बात भी स्वर्ग राज्य को खोजने के क्रम की अगली कड़ी है। प्रभु का आमंत्रण है कि हम पश्चाचत्ता करें। पश्चात्ताप अर्थात् हम प्रभु की ओर मुढ़ें। प्रभु के मार्ग को पहचानें और उसकी ओर लौटें।अपने पुराने रास्ते को छोड़ कर हम प्रभु की इच्छा के अनुसार आचरण करें। श्रोताओ यह भी सत्य है कि प्रभु की इच्छा के अनुसार चलने के लिये यह भी ज़रुरी है कि उनकी इच्छा को जानें । प्रभु हमें इस बात के लिये भी हमें आमंत्रित कर रहे हैं कि हम उनकी बातों पर विश्वास करें। मुझे इस बात का भी पक्का विश्वास है कि जिन बातों की प्रभु ने आज चर्चा की है उस हमने कई बार सुना है पर आज जब हम चालीसे के विशेष काल में हैं तो मैं आप लोगों का ध्यान इस ओर करना चाहूँगा कि क्या आपने इन बातों को सुन कर क्या आपने ने खुद को सुन्दर बेहत्तर और भला बनाने का प्रयास किया है। क्या आपने कभी सोचा है कि ईश्वर मेरे पास ही है कि हर दूसरे व्यक्ति में ईश्वर का वास है कि हमें विभिन्न नासमझियों के बावजूद एक-दूसरे के साथ अच्छा रिश्ता बनाने के लिये प्रयासरत रहना है। क्या कभी आपने इस बात पर ग़ौर किया है कि मानव के ईश्वर का प्रतिरूप है और उसके अंदर में अच्छाई और भलाई का केन्द्र है और इसी की ओर उसे बार-बार लौट के आना है ताकि हम ईश्वर का गहरा अनुभव कर सकें। हम अच्छाई, भलाई और सच्चाई को पाने के लिये जितने उत्साहित है शैतान भी उतनी उत्साह से हमें अपने मार्ग से भटकाने के लिये प्रयत्नशील है और हम कई बार उसके भंवर में फँस जाते हैं ठीक उस अजय की तरह जिसने कभी अपने कर्मों पर विचार नहीं किया और छोटे-छोटे प्रलोभनों में फँसता चला गया और ईश्वर से दूर चला गया।

प्रभु हमें इस चालीसे काल में झकझोरते हुए बुला रहे हैं और कह रहे हैं भले काम के लिये पश्चात्ताप के लिये और ईश्वर की ओर लौटने के लिये कभी देर नहीं होती। प्रभु तो सदा हमारे पास रहते हैं हम ही प्रभु से दूर भटक जाते हैं। हम कभी न समझें कि समस्या हमसे बड़ी है बुराई हमसे बड़ी है या प्रलोभन हमसे बड़े हैं। प्रलोभन और परीक्षायें तो हमारे लिये एक अवसर है जिसमें हम शैतान को बता सकते हैं कि हम अपने विश्वास में कितने मजबूत है कि हम ईश्वर को कितना प्यार करते हैं और सत्य भला और अच्छा ही जीतेगा भला ही राज्य करेगा।

Advertisements

संत पापा का बुधवारीय संदेश

In Church on February 23, 2012 at 8:18 am
  • जस्टिन तिर्की.ये.स.

वाटिकन सिटी, 22 फरवरी, 2012 (सेदोक, वी.आर) बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें ने वाटिकन स्थित संत पौल षष्टम् सभागार में देश-विदेश से एकत्रित हज़ारों तीर्थयात्रियों को विभिन्न भाषाओं में सम्बोधित किया।

उन्होंने अंग्रेजी भाषा में कहा – मेरे अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, आज काथलिक कलीसिया राखबुध का त्योहार मना रही है। यह पास्कापर्व के पूर्व के चालीस दिन की विशेष यात्रा का पहला दिन भी है। आज के दिन विश्व के सब ख्रीस्तीय में इस बात के लिये आमंत्रित किये जाते हैं कि वे पश्चात्ताप, परिवर्तन और नवीनीकरण की तीर्थयात्रा करें।

पवित्र धर्मग्रंथ बाइबल में 40 संख्या का व्यापक प्रतीकात्मक अर्थ है। इसके द्वारा हम यहूदियों की उस यात्रा की याद करते हैं जो उन्हें रेगिस्तान में करना पड़ा था जो उनके लिये आशा, विशुद्धि और ईश्वर के निकट आने का वक्त तो था ही प्रलोभन और परीक्षा का समय भी था।

यहूदियों द्वारा रेगिस्तान में चालीस साल तक की यात्रा करने की घटना से प्रेरित होकर येसु ने भी अपने सार्वजनिक जीवन आरंभ करने के पूर्व चालीस दिनों तक पिता ईश्वर के साथ अंतरंग प्रार्थनामय समय बिताया। यह समय उनके लिये बुराई के रहस्य को समझने का समय था।

कलीसिया चालीसे काल के आत्मसंयम द्वारा यह चाहती है कि अनुयायी अपने विश्वास सुदृढ़ करें और येसु के पास्का रहस्यों का अनुकरण करें। कलीसिया चाहती है कि इन चालीस दिनों में ख्रीस्तीय येसु के दिव्य वचनों और उदाहरण पर चिन्तन करते हुए आध्यात्मिक शुष्कता, स्वार्थ और सांसारिकता जैसी वीरानी या चुनौतियों को जीत सके।

ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि पूरी कलीसिया के लिये यह समय कृपा का समय हो जब ख्रीस्तीय विन्ती, उपवास और आत्मसंयम के द्वारा क्रूसित और जीवित येसु के साथ एक हो सकें और पास्कापर्व के आनन्द और आशा प्राप्त करें।

इतना कहकर संत पापा ने अपना संदेश समाप्त किया।

उन्होंने इंगलैंड, बेलजियम,आयरलैंड, नॉर्वे, अमेरिका तथा अन्टवेर्प धर्मप्रांत के तीर्थयात्रियों, उपस्थित लोगों एवं उनके परिवार के सभी सदस्यों पर प्रभु की कृपा, आध्यात्मिक और सफलतापूर्ण चालीसा काल की कामना करते हुए अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

राख बुधवार से काथलिक कलीसिया का चालीसा काल शुरु

In Church on February 23, 2012 at 8:11 am
  • जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

वाटिकन सिटी, 22 फरवरी सन् 2012 (सेदोक): विश्व व्यापी काथलिक कलीसिया ने बुधवार, 22 फरवरी को, राख बुधवार की धर्मविधि सम्पन्न कर चालीसा काल का शुभारम्भ किया।

कलीसियाई परम्परा को जारी रखते हुए बुधवार, 22 फरवरी की सन्ध्या सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें, रोम स्थित सन्त आनसेलमो गिरजाघर जाकर राख बुध की धर्मविधि सम्पन्न करेंगे तथा इसके बाद सन्त सबिना गिरजाघर में ख्रीस्तयाग अर्पित करेंगे।

पास्का महापर्व से पूर्व पड़नेवाले चालीस दिनों के दौरान विश्व के काथलिक धर्मानुयायी प्रार्थना, ध्यान मनन चिन्तन, पश्चाताप, दान पुण्य, उपवास एवं परहेज़ रखकर प्रभु येसु मसीह के दुखभोग एवं क्रूसमरण की याद करते हैं। यह पवित्र काल राख बुधवार के दिन आरम्भ होता है तथा पास्का महापर्व से पूर्व, पुण्य सप्ताह की धर्मविधियों से समाप्त होता है।

अपने माथों पर भस्म रमा कर, काथलिक धर्मानुयायी, राख बुधवार का आरम्भ करते हैं। यह धर्मविधि मनुष्य को स्मरण दिलाती है कि वह क्षणभंगुर है, मिट्टी का है और एक दिन उसे वापस मिट्टी में मिलना है इसलिये अपने पापों पर वह पश्चाताप करे, प्रभु ईश्वर से क्षमा की याचना करे तथा अपना मन त्याग, तपस्या एवं मनन चिन्तन में लगाकर प्रभु का कृपा पात्र बने।

कुछ दिन पूर्व वाटिकन प्रेस ने, चालीसा काल के उपलक्ष्य में लिखे सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें के सन्देश की प्रकाशना की थी। इस सन्देश में सन्त पापा ने सभी काथलिक धर्मानुयायियों से आग्रह किया है कि चालीसा काल के दौरान वे अपने लिये ही नहीं बल्कि अपने इर्द गिर्द रहनेवालों केलिये भी उत्कंठित रहें।

%d bloggers like this: