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काथलिक मासिक पत्रिका में येसु की तस्वीर का अनादर

In Church on March 3, 2012 at 10:05 pm

जस्टिन तिर्की,ये.

अहमदाबाद, 3 मार्च, 2012 (उकान) गुजरात की काथकलिक मासिक ‘पावन ह्रदय दूत’ में येसु मसीह की तस्वीर का अनादर करने के लिये स्थानीय थाने में एक शिकायत दर्ज़ की गयी।

मासिक पत्रिका के एक पाठक मनोज मकवान ने स्थानीय पुलिस थाना में यह कहते हुए एक शिकायत दायर किया कि फरवरी महीने की ‘पावन ह्रदय दूत’ पत्रिका में येसु के एक हाथ में दारू की कैन और दूसरे में सिगरेट पकड़े दिखलाया गया है जिससे धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाती है।

घटना की जानकारी देते हुए आनन्द पुलिस थाना के पुलिस इंस्पेक्टर पी. के. देओरा ने बतलाया कि उन्हें प्रकाशक की ओर से एक ज्ञापन प्राप्त हुआ जिसमें उन्होंने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिये ख्रीस्तीय समुदाय से माफी माँगी है।

प्रकाशक ने बतलाया कि तस्वीर इंटरनेट से ली गयी थी और ब्लैक एंड व्हाइट और अस्पष्ट होने के कारण बीयर कैन और सिगरेट दिखाई नहीं देती। उन्होंने कहा कि वे अपनी लापरवाही स्वीकार करते हैं।

पत्रिका के प्रकाशक गुजरात साहित्य प्रकाशन ने अपने आधिकारिक वेबपेज़ में भी इस ग़लती के लिये क्षमापत्र प्रकाशित किया है।

विदित हो कि अहमदाबाद के आनन्द शहर में अवस्थित गुजरात साहित्य प्रकाशन साउथ एशिया के जेस्विटों द्वारा संचालित प्रेस हैं

अमेरिकी काँग्रेस और फिल्म हस्तियों ने पास्टर के रिहाई की अपील की

In Peace & Justice on March 3, 2012 at 10:01 pm

जस्टिन तिर्की,ये.

वाशिंगटन, 3 मार्च, 2012 (सीएनए) अमेरिकन काँग्रेस और  देश के अनेक प्रसिद्ध हस्तियों ने ख्रीस्तीय विश्वास के त्याग से इंकार कर देने के लिये मौत की सजा प्राप्त इरानी पास्टर युसेफ़ नदारखानी की मुक्ति के प्रयास तेज़ कर दिये हैं।

1 मार्च को अमेरिका के ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेनटेटिवस’ ने पूर्ण बहुमत से एक प्रस्ताव पास कर पास्टर युसेफ नदारखानी को स्वधर्मत्याग के आरोप में ‘अनवरत यातना देने, जेल में रखने और सजा सुनाने’ के लिये ईरानी सरकार की कड़ी आलोचना की।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि ईरानी सरकार नदारखानी और उसके साथ जितने लोग भी धार्मिक विश्वास के लिये जेल में बंद लोगों को निर्दोष क़रार दे और तुरन्त बिना शर्त के रिहा कर दे।

अमेरिकी काँग्रेस के निम्न सदन में लाये गये प्रस्ताव पर अपने विचार रखते हुए जोसेफ पिट्स ने कहा, “ईरान का संविधान स्वयं ही संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकारों की घोषणा और नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय अधिनियम की तरह धार्मिक स्वतंत्रता को मान्यता देता है। ईरान ने दोनों अंतरराष्ट्रीय अधिनियमों पर हस्ताक्षर कर अपनी स्वीकृति दी। Read the rest of this entry »

डब्लिन यूखरिस्तीय कांग्रेस में युवाओं के लिए उँचा लक्ष्य

In Church on March 3, 2012 at 9:56 pm
  • जस्टिन तिर्की,ये.

डबलिन, आयरलैंड, 3 मार्च, 2012(ज़ेनित) आयरलैंड के डबलिन में अगले जून में आयोजित अंतरराष्ट्रीय यूखरिस्तीय काँग्रेस में हज़ारों युवाओँ के भाग लेने की उम्मीद की जा रही है।

आयोजकों के अनुसार युवाओं के इस महासभा में आयरलैंड के करीब 2500 युवा सम्मिलित होंगे और “गो, बी चर्च” अर्थात् “जाओ कलीसिया बनो” कार्यक्रम से लाभान्वित हो पायेंग।

कार्यक्रम के अनुसार कियारा लूचे यूथ स्पेश नामक जगह में आयोजित इस सेमिनार में 17 से 25 आयु के युवा हिस्सा लेंगे।

ज़ेनित समाचार के अनुसार जून में होने वाले युवा सम्मेलन की तैयारी के तहत् आयोजित एक सेमिनार में बोलते हुए धर्माध्यक्ष दोनाल मैक्योन ने कहा,”कलीसिया एक कठिन दौर से गुज़र रही है जहाँ युवाओं को विशेष भूमिका अदा करने की आवश्यकता है।”

उन्होंने बतलाया कि अगले युवा यूखरिस्तीय काँग्रेस में युवा ईश्वर, प्रेम, चँगाई और ईशमय एकता के अर्थ को समझेंगे और उसे अपने जीवन में लागू करेंगे।

धर्माध्यक्ष मैक्योन ने कहा, “यूखरिस्तीय काँग्रेस ईश्वर प्रदत्त अवसर है ताकि हमें प्रेम एकता, समुदाय और सेवा के रहस्य पर चिन्तन करते हुए अपने विश्वास को मजबूत कर सकें।”

विदित हो कि अंतरराष्ट्रीय यूखरिस्तीय काँग्रेस 2012 को धन्य कियारा बदानो को समर्पित किया गया है जो फोकोलारे आन्दोलन से जुड़ी एक साधारण युवती थी जिसकी मृत्यु 18 वर्ष की आयु में कैंसर के कारण हो गयी।

कियारा को सन् 2010 में संत धन्य घोषित किया गया। कियारा दूसरों की ज़रूरतों के प्रति अति संवेदशील थी और उसके मित्र उसे ‘लूचे’ अर्थात् ‘ज्योति’ कहा करते थे।

संत पापा की आध्यात्मिक साधना समाप्त

In Church on March 3, 2012 at 9:53 pm
  • जस्टिन तिर्की,ये.

वाटिकन  सिटी, 3 मार्च, 2012 (ज़ेनित) संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें ने3 मार्च शनिवार को अपना वार्षिक आध्यात्मिक साधना समाप्त किया।

वाटिकन सूत्रों ने आध्यात्मिक साधना के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि उपदेशक कार्डिनल लौरेन्ट मोनसेन्गवा ने संत पापा और रोमन कूरिया के सदस्यों को ‘ख्रीस्तीयों का ईश्वर में एक होने’ विषय पर चर्चा करते हुए ईश्वर – एक ज्योति, सत्य, दया और मार्गदर्शक जैसी बातों पर प्रवचन दिये।

उन्होंने ‘क्रूस का चिह्न’ के बारे में बोलते हुए कहा, “यह मात्र एक आदत से बढ़कर है। यह एक ऐसा चिह्न है, जिसमे प्रेमभरा बलिदान निहित है, यह पुनरुत्थान के लिये मृत्यु है। इसलिये इसका प्रयोग करने वाला सांसारिकता, मान-सम्मान, धन और अधिकार का त्याग करता और अपने सब कार्यों को येसु को अर्पित करता है।”

कार्डिनल लौरेन्ट ने ईश्वर – सत्य, मार्ग और जीवन विषय पर चर्चा करते हुए आध्यात्मिक साधना में भाग ले रहे सदस्यों को आमंत्रित किया कि वे “मानव शोषण और दमन के प्रति तटस्थ न बने रहें।”

उन्होंने कहा, “हालांकि पाप का रहस्य हमारी समझ के परे है फिर भी लोगों के रक्षक बने रहें।”

उन्होंने कहा, “हमे चाहिये कि हम ज्योति में चलें। दूसरे शब्दों में हम पाप का त्याग करें और सत्य को अपने जीवन में स्थान दें ताकि हम सहज ही ईश्वर की ओर लौट सकें।

उपदेशक कार्डिनल लौरेंट ने पुरोहितों से कहा, “हमारी उदारता हमें पापों से मुक्त नहीं करती। हमें चाहिये कि हम दूरदर्शी बने और अनावश्यक रूप से खुद को प्रलोभनों में न पड़ने दें। साथ में याद रखें कि हर परिस्थिति में ईश्वर हमारे साथ है। हम ईश्वर को तब तिरस्कृत करते हैं जब हम उनकी दया पर विश्वास नहीं करते।”

कार्डिनल ने कहा, “सत्य में चलने का अर्थ है धन्यताओं के अनुसार जीवन बिताना जिसका अर्थ है ढोंगीपूर्ण जीवन का त्याग करना।”

“कलीसिया को चाहिये कि वह आंतरिक और बाहरी मिथ्या और धोखेबाज़ी पर विजय प्राप्त करे ताकि लोग सुसमाचार के सत्य को जानें और उसके अनुसार जी सकें।”

चालीसा का पहला रविवार

In Church on March 3, 2012 at 5:17 pm

26  फरवरी , 2012

उत्पति ग्रंथ 9, 8- 15

संत पेत्रुस का पत्र  3, 18- 22

संत मारकुस 1, 12- 15

                      अजय की कहानी

आप लोगों को आज एक बालक की कहानी बताता हूँ जिसका नाम था – अजय। अजय के घर में सिर्फ उसकी माँ थी। अजय जब पाँच साल का था उसी समय उसके पिता की मृत्यु हो गयी थी। उसकी माँ शहर में रोज काम करने जाती थी और जो पैसे मिलते थे उसी से उन दोनों का जीवन-बसर हो रहा था। जब अजय सुबह को स्कूल जाता था तब उसकी माँ भी अपने काम पर चली जाती थी। एक दिन की बात है अजय स्कूल से एक पेंसिल लाया और उसने उसे अपनी माँ को दिखाया।  माँ ने उससे पूछा तक नहीं कि उसे वह पेंसिल कहाँ से मिली। इसके ठीक विपरीत उसने उसे प्रोत्साहन देते हुए कहा कि शाबाश बेटे यह अच्छी पेंसिल तुमने घर ले आया। दूसरे दिन अजय ने एक किताब लायी फिर माँ का प्रोत्साहन मिला। फिर अगले दिन कोई कॉपी कोई रबर तो कोई नयी कलम घर आती गयी। माँ ने बच्चे के इस व्यवहार के लिये न हीं कोई सवाल किया न नहीं कोई परेशानी ही दिखायी। अजय घर से बाहर जाता तो अवश्य ही कोई- न-कोई नयी वस्तु ले आता था। कभी-कभी तो माँ ने उसकी जेब में कुछ पैसे भी देखे। पर माँ को इस बात का साहस ही न होता कि वह पूछे कि वे पैसे कहाँ से आते हैं। समय बीतता चला गया। अजय जवान हो गया अब तो वह 20 साल का एक छरहरा जवान ल़ड़का बन गया था। एक समय की बात है कि अजय कुछ दिनों के लिये बाहर चला गया था और वह सप्ताह भर भी नहीं आया। माँ परेशान हो गयी कि आख़िर अजय गया कहाँ। एक दिन किसी ने बताया कि स्थानीय समाचार पत्र में उसका नाम छपा था। वह किसी बैंक डकैती के आरोप में गिरफ़्तार हुआ उसे फाँसी की सजा सुनायी गयी। जब अजय को उसकी अंतिम इच्छा के बारे में पूछा गया तब उसने अपनी इच्छा जतायी कि वह अपनी माँ से मिलेगा। उसकी माँ उससे मिलने जेल गयी । अजय  अपनी माँ से गले मिला और उसके बाद उसने कहा  चुम्बन देते हुए अपनी माँ की जीभ काट लिया। वहाँ पर उपस्थित लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया है तब उसन कहा कि अगर मेरी माँ ने मेरी चोरी करने की आदत के बारे में बचपन में ही टोका होता तो मुझे आज फाँसी की सज़ा नहीं होती। छोटी बुरी आदत के प्रलोभन में फँसकर व्यक्ति कई बड़ी गलतियाँ कर बैठता है।पर अगर प्रलोभनों को जीत जाता है तो वह एक मजबूत और शक्तिशाली इंसान बन जाता है। Read the rest of this entry »

चालीसा का पहला रविवार

In Church on March 3, 2012 at 4:55 pm

चालीसा का पहला रविवार.

चालीसा का दूसरा रविवार,

In Church, Sunday Reflection on March 3, 2012 at 12:08 pm
  • जस्टिन तिर्की, ये.स,

4 मार्च, 2012, ‘B’
उत्पति ग्रंथ 22, 1-2, 9-13, 15-18
रोमियों के नाम पत्र 8, 31-34
संत मारकुस 9, 2-10

मारकुस की कहानी
आज आपलोगों को एक कहानी बतलाता हूँ, एक बूढ़े के बारे में जिसका नाम था मारकुस। इस कहानी को आध्यात्मिक और प्रेरणादायक कहानी बतानेवाले फादर अंतोनी डेमेल्लो येसु समाजी लोगों का बतलाया करते थे। मारकुस जब 35 साल का एक छरहरा जवान था तो बह बहुत ही क्रांतिकारी था और भगवान से उसकी सिर्फ़ एक ही प्रार्थना होती थी। “हे प्रभु कृपा दे कि मैं दुनियां को बदल सकूँ।” यही प्रार्थना करते-करते उसके पचास साल हो गये पर दुनिया में कुछ ख़ास परिवर्त्तन नहीं हुआ। उसने ऐसा महसूस किया कि उसकी आधी ज़िदगी तो गुज़र गयी है और अबतक उसने किसी एक व्यक्ति को भी नहीं बदला है। तब उसने अपनी प्रार्थना ही बदल दी। उसने कहना आरंभ किया “हे प्रभु मुझे कृपा दे कि मैं अपने परिवार के सदस्यों और अपने मित्रों को बदल सकूँ।” समय बीतता गया पर उसे लगने लगा कि किसी के जीवन में कोई ख़ास बदलाव नहीं आये हैं। कुछ और साल बीते अब तो मारकुस बुढ़ापे की दहलीज़ पर था। उसने अपने आप से कहा ये तो गज़ब हो गया, न तो दुनिया बदली, न उसके परिवार वाले और न ही उसके मित्रगण। उसे यह भी आभास हो गया कि अब उसके दिन गिने हुए है। तब उसने अपनी प्रार्थना फिर से बदल डाली। उसने कहना आरंभ किया, “हे प्रभु मुझे कृपा दे कि मैं अपने आप को ही बदल सकूँ।” इस प्रार्थना के बाद मारकुस ने पाया कि उसकी उस प्रार्थना से उसका जीवन बदलने लगा और उसने यह भी अनुभव किया कि इससे न केवल उसका जीवन पर उसके आस-पास रहने वाले लोगों का जीवन भी बदलने लगा। आंतरिक बदलाव ही अर्थपूर्ण और प्रभावकारी होता है। Read the rest of this entry »

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