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चालीसा का दूसरा रविवार,

In Church, Sunday Reflection on March 3, 2012 at 12:08 pm
  • जस्टिन तिर्की, ये.स,

4 मार्च, 2012, ‘B’
उत्पति ग्रंथ 22, 1-2, 9-13, 15-18
रोमियों के नाम पत्र 8, 31-34
संत मारकुस 9, 2-10

मारकुस की कहानी
आज आपलोगों को एक कहानी बतलाता हूँ, एक बूढ़े के बारे में जिसका नाम था मारकुस। इस कहानी को आध्यात्मिक और प्रेरणादायक कहानी बतानेवाले फादर अंतोनी डेमेल्लो येसु समाजी लोगों का बतलाया करते थे। मारकुस जब 35 साल का एक छरहरा जवान था तो बह बहुत ही क्रांतिकारी था और भगवान से उसकी सिर्फ़ एक ही प्रार्थना होती थी। “हे प्रभु कृपा दे कि मैं दुनियां को बदल सकूँ।” यही प्रार्थना करते-करते उसके पचास साल हो गये पर दुनिया में कुछ ख़ास परिवर्त्तन नहीं हुआ। उसने ऐसा महसूस किया कि उसकी आधी ज़िदगी तो गुज़र गयी है और अबतक उसने किसी एक व्यक्ति को भी नहीं बदला है। तब उसने अपनी प्रार्थना ही बदल दी। उसने कहना आरंभ किया “हे प्रभु मुझे कृपा दे कि मैं अपने परिवार के सदस्यों और अपने मित्रों को बदल सकूँ।” समय बीतता गया पर उसे लगने लगा कि किसी के जीवन में कोई ख़ास बदलाव नहीं आये हैं। कुछ और साल बीते अब तो मारकुस बुढ़ापे की दहलीज़ पर था। उसने अपने आप से कहा ये तो गज़ब हो गया, न तो दुनिया बदली, न उसके परिवार वाले और न ही उसके मित्रगण। उसे यह भी आभास हो गया कि अब उसके दिन गिने हुए है। तब उसने अपनी प्रार्थना फिर से बदल डाली। उसने कहना आरंभ किया, “हे प्रभु मुझे कृपा दे कि मैं अपने आप को ही बदल सकूँ।” इस प्रार्थना के बाद मारकुस ने पाया कि उसकी उस प्रार्थना से उसका जीवन बदलने लगा और उसने यह भी अनुभव किया कि इससे न केवल उसका जीवन पर उसके आस-पास रहने वाले लोगों का जीवन भी बदलने लगा। आंतरिक बदलाव ही अर्थपूर्ण और प्रभावकारी होता है।

आज हम काथलिक पूजन विधि पंचाग के वर्ष ‘ब’ के चालीसा के दूसरे रविवार के लिये प्रस्तावित सुसमाचार पाठ के आधार मनन-चिन्तन कर रहे हैं। प्रभु चालीसे के इस दूसरे सप्ताह में हमसे चाहते हैं कि हम हमारा रूपान्तरण हो। हमारा आध्यात्मिक परिवर्तन हो, हम नया बनें और हमारे आचरण से दूसरों को ईश्वरीय प्रेम की अनुभूति हो। आइये हम प्रभु के दिव्य वचनों को पढ़ें जिसे संत मारकुस के 9वें अध्याय के 2 से 10वें पदों से लिया गया है।

सुसमाचार पाठ
येसु ने पेत्रुस, याकूब औऱ योहन को अपने साथ ले लिया और वह उन्हें एक ऊँचे पहाड़ पर एकान्त में ले चले। उनके सामने ही येसु का रूपान्तरण हो गया। उनके वस्त्र ऐसे चमकीले और उजले हो गये कि दुनिया का कोई धोबी उन्हें इतना उजला नहीं कर सकता। शिष्यों को एलियस और मूसा दिखाई दिये। वे येसु के साथ बातचीत कर रहे थे। उस समय पेत्रुस ने येसु से कहा “गुरुवर, यहाँ होना हमारे लिये कितना अच्छा है। हम तीन तम्बू खड़ा कर दें – एक आपके लिये, एक मूसा और एक एलियस के लिये।” उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे, क्योंकि वे सब बहुत ही डर गये थे। तब एक बादल आ कर उस पर छा गया और उस बादल में से यह वाणी सुनाई दी। “यह मेरा प्रिय पुत्र है इससे मैं अति प्रसन्न हूँ इसकी सुनो।” इसके तुरन्त बाद जब शिष्य अपने चारों ओर दृष्टि दौड़ाने लगे, तो उनहें येसु के सिवा और कोई नहीं दिखाई दिया। येसु ने पहा़ड़ पर से उतरते समय उन्हें आदेश दिया कि जब तक मानव पुत्र मृतकों में से न जी उठे, तब तक तुम लोगों ने जो देखा है उसकी चरचा किसी से भी नहीं करना। उन्होंने येसु की यह बात मान ली, परन्तु वे आपस में विचार-विमर्श करते थे कि “मृतकों में से जी उठने” का क्या अर्थ हो सकता है।

रूपांतरण
मेरा विश्वास है कि आपने प्रभु के वचनों को ग़ौर से पढ़ा है और दिव्य वचनों को अपने दिल से ग्रहण किया है। सुसमाचार में वर्णित घटना के अनुसार येसु का रूपांतरण हो गया। येसु का रूप बदल गया। क्या आपने ध्यान दिया कि जब येसु का रूप बदल गया उस समय केवल तीन शिष्य उसके साथ थे? कभी-कभी मेरे मन में सवाल उठता है कि आख़िर रूपान्तरण क्या था? यह क्यों हुआ, और क्यों उस समय सिर्फ़ तीन ही शिष्य थे? इतना ही नहीं मेरे मन में तो यह सवाल उठता है कि यह घटना क्यों घटी? बताया जाता कि यह घटना उत्तरी गलीली के हेरमोन पहाड़ में घटी जो कि कैसारिया फिलिप्पी के निकट है।

इस घटना को अगर चेलों की ओर से समझने का प्रयास करें तो हम पाते हैं कि यह चेलों के लिये एक ऐसा जवाब था जिसके द्वारा उनका विश्वास मजबूत हुआ। आपको याद होगा कि चेले आपस में बातचीत किया करते थे और सोचते थे कि एक दिन येसु राजा बनेंगे और दुनिया का उद्धार करेंगे। और फिर सभी शिष्य उनके राज्य में राजमंत्रियों के रूप में राज्य सुख उठाएँगे। चेले हरदम इस प्रयास में होते थे कि जाने कि आख़िर येसु कौन है? किस प्रकार के मसीहा है येसु। सच पूछा जाये तो इस घटना में उन्हें येसु का जो रूप दिखाई पड़ा वह अद्वितीय था। प्रभु ने इस घटना के द्वारा उन्हें यह बता दिया कि वे ईश्वर के पु्त्र हैं, वे मसीहा हैं पर उनके बचाने का तौर-तरीका अलग है। उन्हें दुनिया को बचाने के लिये राजा बनने की आवश्यकता नहीं है पर, हाँ उन्हें दुनिया को बचाने के लिये दुःख उठाने, मारे जाने और तीसरे दिन महिमा के साथ जी उठने की आवश्यकता है।

अगर आपने सुसमाचार के आरंभिक शब्दों पर ग़ौर किया होगा तो आपने पाया होगा कि इसमें लिखा है कि येसु एकांत में चले गये। जब भी येसु एकांत में जाते तो अपने स्वर्गीय पिता से एक हो जाते थे। वे उनसे बातें करते थे। और जब येसु पिता ईश्वर से बिल्कुल एक हो गये थे तब शिष्यों ने देखा कि येसु का रूप ही बदल गया है। उनका प्रभाव इतना तेज था कि चेले उन्हें देख भी नहीं पा रहे थे। वास्तव में चेलों ने येसु का जो स्वर्गिक रूप देखा उसे पहले कभी नहीं देखा था। फिर हम पाते हैं कि इस घटना से चेलों का विश्वास मजबूत हो गया। पीटर ने कहा कि ‘यहाँ रहना कितना अच्छा है क्या हम तीन तम्बु खड़ा कर दें’। वास्तव में यही येसु का वास्तविक रूप था। आपने आज के सुसमाचार पाठ में ईश्वरीय वाणी पर भी ग़ौर किया होगा जो कहता है, “तू मेरा प्रिय पुत्र है मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ।”

येसु को पहचानना
क्या आप येसु को पहचानना चाहते हैं? क्या आपके दिल में येसु के बारे में कोई सवाल हैं? क्या आपने यह नहीं कहा कि येसु आख़िर कौन हैं मेरे लिये? या कई बार आपने यह सवाल नहीं किया, कि आख़िर कहाँ हैं येसु? यदि आपने ऐसे सवाल किये हैं तो आप अपने को धन्य मानिये। येसु ने शिष्यों को जवाब दिया। वे आपको भी इसका जवाब देंगे। येसु ने शिष्यों को वो आँखें दी जिसके द्वारा उन्होंने येसु के वास्तविक रूप को देखा। येसु ने उनको वो कान दिये जिसके द्वारा उन्होंने ईश्वर की वाणी को सुना। जिसमें उन्हें वह जबाब मिला जो सरल पर इतना प्रभावपूर्ण था कि उसने चेलों के जीवन को ही बदल दिया। पिता ईश्वर ने कहा था येसु मेरा प्रिय पुत्र है और वे उनसे अति प्रसन्न हैं। यदि आपने येसु को यह सवाल नहीं किया है कि वे आपके लिये कौन हैं, आपने खुद को यह नहीं पूछा कि प्रभु आपके जीवन के लिये क्या हैं तो आज के दिन में आपको और सब ख्रीस्तीयों को यही सवाल पूछना चाहिये कि ‘प्रभु आप कौन हैं’? सच मानिये येसु आपके विश्वास से भरे सवाल का जवाब अवश्य देंगे। आप ईश्वर की आवाज़ अवश्य सुनेंगे। मेरा तो पूरा विश्वास है कि येसु हमें बदलना चाहते हैं। येसु हमें नया कर देना चाहते हैं। आज येसु का आमंत्रण है कि हम बदल जायें। हम इस बात पर विश्वास करें कि एक-दूसरे को क्षमा प्रदान कर सकते हैं। हम इस बात पर विश्वास करें कि हमारे साथ जीने वाला भी ईश्वर का प्रिय पुत्र और पुत्री है। हम यह विश्वास करें हर एक विपत्ति में ईश्वर की कृपा छिपी हुई है। हम यह मानने लगें की हमारा जीवन एक वरदान है।

हमें बदलने का वरदान जन्म लेने के तुरन्त बाद में मिला था जब हमने बपतिस्मा ग्रहण किया। इस समय हमारे माता-पिता ने हमारी ओर से ईश्वर की यह वाणी सुनी थी कि ‘यह मेरा प्रिय पुत्र है’। इतना ही नहीं जब कभी हम कोई तकलीफ़ उठाते हैं तो यह विश्वास मानिये यह हमारे लिये एक परिवर्त्तन का समय है ईश्वर चाहते हैं कि हर तकलीफ़ से कुछ नया पैदा हो जैसा कि येसु मसीह के जीवन में हुआ। उनका दुःख उठाना व्यर्थ नहीं गया।

खुद को बदलें जग बदलेगा

येसु आज अपने रूपान्तरण के द्वारा हमें इस बात लिये आमंत्रित कर रहे हैं कि हम दुनिया को बदलने के पहले अपने को बदलना आरंभ करें। बड़ी बातों में न हो पर छोटी ही बातों में ही सही। क्या हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि दूसरों को अच्छा बनाने के पहले खुद को अच्छा बनाने की आवश्यकता है? क्या हम इस बात को स्वीकार कर सकते हैं कि अच्छाई की शुरुआत हमें आज करना है? क्या हम इस बात को भी स्वीकार कर सकते हैं कि दुःखों और तकलीफों के पीछे ईश्वर के वरदान छिपे होते हैं?

इस चालीसा काल में अगर हम कोई बड़ा कार्य न भी करें पर अगर हमारे दिल में इस बात को स्वीकार कर लें कि प्रभु येसु ईश्वर के पुत्र है और वे चाहते हैं कि हम भी उनकी अच्छी संतान की तरह जीवन बितायें। हम उन चेलों की तरह इस बात को दिल से कह सकें कि येसु के साथ रहने में कितना आनन्द आता है तो मानिये आपका रूपान्तरण आरंभ हो गया है। अगर आपने यह भी सोच लिया कि दूसरे जन भी ईश्वर की संतान हैं तो मानिये आपका रूपान्तरण आरंभ हो गया है। और अगर हमने प्रभु के प्यार के लिये अपने-आप को बदलना सीख लिया है तो दुनिया का कोई भी दुःख हमें कमजोर नहीं करेगा हम येसु के समान चमकेंगे। हमारा जीवन उजले वस्त्र के समान चमकेगा जिससे हमारा जीवन तो सार्थक होगा ही दूसरे भी इस उजाले से प्रकाशित हो पायेंगे।

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