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खजूर रविवार, दुःखभोग रविवार

In Sunday Reflection on March 28, 2012 at 9:26 pm

1 अप्रैल, 2012

इसायस 50: 4-7

फिलिप्पियों के नाम पत्र  2: 6-11 

संत मारकुस: 1-10; 14: 1-15:47

जस्टिन तिर्की, ये.स.

कोयला श्रमिक की कहानी

आज के रविवार को खजूर रविवार या दुःखभोग के रविवार के रूप में जाना जाता है। आज मैं आपलोगों को एक घटना के बारे में बताता हूँ। एक बार ऐसा हुआ कि एक कोयले के खदान के धँस जाने से कुछ लोग उसमें फँस गये थे। कंपनी वालों के प्रयास से बहुतों को तो सुरक्षित निकाल लिया गया। पर अंत में पाया गया कि तीन लोग फँसे रह गये। लोगों को यह भी जानकारी दी गयी कि जहाँ वे तीनों काम कर रहे थे उस क्षेत्र में विषैली गैस की संभावना प्रबल थी। तीनों परिवार के लोगों ने कंपनी से गुहार लगाया कि उनके परिवार के लोगों को बचाने का उपाय किया जाये। जो खानों में बचाने के अनुभवी लोग थे उन्हें भी भय होने लगा कि बचाने के सिलसिले में कहीं उनकी ही जान न चली जाये। जब इसकी बात चल ही रही थी कि एक बचाव दल के एक नौजवान ने कहा कि वह खदान के अंदर जायेगा और उन तीन लोगों को बचाने का प्रयास करेगा। सब कुछ तैयार हो गया। वह व्यक्ति खदान के अंदर जाने की पूरी तैयारी कर ली। अपने हेलमेट पहन लिये और ऑक्सीजन का सेलिन्डर अपने अपनी पीठ पर बाँध लिया। इसी समय समाचार पत्र वालों ने उस व्यक्ति को घेर लिया और कहा, “भाई साहब आप खदान के अंदर जा रहे हैं?” उस युवक ने कहा ‘हाँ’ । “क्या आप सोचते हैं कि वे जीवित होंगे उसका जवाब था ‘हाँ’।” उनका अगला सवाल था, “क्या आपको मालूम है कि अंदर जहरीली गैस है?” उसका जवाब था ‘हाँ’। “आप फिर भी जा रहे हैं? उसका जवाब था ‘हाँ’। और उनके देखते-देखते उस युवक ने उस सीढ़ी की ओर अपना कदम रखा जहाँ से उतर कर लोग कोयले की खदान की गहराई में उतरते हैं।

कर्त्तव्य का पालन

मित्रो, कर्त्तव्य का पालन वफ़ादारी से करने वाले ही ईश्वर की इच्छा का भी पालन करते हैं और ऐसे लोग महान् होते हैं। ऐसे लोग इसीलिये जीते और मरते हैं ताकि दूसरों का कल्याण हो।

रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अन्तर्गत पूजन विधि पंचांग के वर्ष ‘ब’ खजूर रविवार के लिये प्रस्तावित सुसमाचार पाठों के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहे हैं। प्रभु हमें आज बताना चाहते हैं कि उन्होंने सदा ही जीवन में अपने पिता की इच्छा पूरी की। उन्होंने ने सदा ही ईश्वर की इच्छा पूरी करने को अपने जीवन में प्रथम स्थान दिया। ईश्वर की इच्छा के सामने दुःख या तकलीफ़  को नगण्य समझा, बस इसलिये कि लोगों का कल्याण हो। आइये, आज हम प्रभु के वचनों को सुनें जिसे संत मारकुस के 10वें अध्याय के  1 से 10 पदों से लिया गया है।

सुसमाचार पाठ

पास्का पर्व के कुछ दिन पहले येसु और उसके शिष्य येरुसालेम के निकट पहुँचे। जब वे जैतून पहाड़ के समीप बेथफ़गे और बेथानिया आ गये थे। तो येसु ने अपने दो शिष्यों को यह कह कर भेजा, “सामने के गाँव में जाओ। वहाँ पहुँचते ही तुम्हें बँधा हुए एक बछेड़ा मिलेगा, जिस पर अब तक कोई सवार नहीं हुआ है। उसे खोल कर ले आओ। यदि कोई तुम से कहा यह क्या कर रहे हो, तो कह देना, प्रभु को इसकी ज़रूरत है, वह उसे शीघ्र ही बापस भेज देंगे।” शिष्य चले गये और बछेड़े को बाहर सड़क के किनारे एक फाटक पर बँधा हुआ पाकर, उन्होंने उसे खोल दिया। वहाँ खड़े लोगों में से कुछ कहने लगे, ” यह क्या कर रहे हो। ” बछेड़ा क्यो खोलते हो।” येसु ने जैसा बताया, शिष्यों ने बैसा ही कहा और लोगों ने उन्हें जाने दिया। उन्होंने, बछेड़ा येसु के पास ले आकर, उस पर अपने कपड़े बिछा दिये और येसु सवार हो गये। बहुत-से लोगों ने कपड़े रास्ते में बिछा दिये, कुछ लोगों ने खेतों में हरी-हरी डालियाँ तोड़ कर फैला दीं। येसु के आगे-आगे जाते हुए और पीछे-पीछे जाते हुए लोग यह नारा लगा रहे थे, “होसन्ना। धन्य हैं वह जो प्रभु के नाम पर आते हैं। धन्य हैं हमारे पिता दाउद का आने वाला राज्य। सर्वोंच्च में होसन्ना।”

मदद चाहिये प्रभु को

आपने आज के प्रभु के वचनों को अवश्य ही गौ़र से पढ़ा है।  आपने अवश्य ही इस बात पर गौ़र किया होगा कि प्रभु को मदद की आवश्यकता है। प्रभु चाहते हैं कि कोई उसकी मदद करे। प्रभु को आज एक सवारी की आवश्यकता है। प्रभु येरूसालेम में  प्रवेश करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि वे एक गदहे की सवारी करें। उन्होंने अपने शिष्यों से गदहा लाने की अपील की। शिष्यों ने प्रभु के बताये अनुसार गदहे को लाने चल दिये। क्या आपने ध्यान दिया कि जब शिष्य गदहे को खोलने लगे तो कुछ लोगों ने उससे पूछा कि वे क्या कर रहे हैं तब उन्होंने कहा कि प्रभु को इसकी ज़रूरत है और फिर उन्होंने कुछ सवाल नहीं किया। उन्होंने शिष्यों को गदहे को ले जाने दिया। सच पूछें तो आज की घटना में अनेक बड़ी बातें हुई है जैसा कि हम येसु के पूरे जीवन काल में कभी नहीं पाते हैं। येसु पहली बार एक सुनियोजित जुलूस के साथ येरूसालेम में प्रवेश किया। लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी, लोगों ने येसु के स्वागत में डालियाँ बिछायी, कुछ लोगों ने कपड़े बिछाये और आकाश में एक ही स्वर गूँज उठा होसन्ना। होसन्ना।

छोटा निःस्वार्थ दान

इन सब घटनाओं को बार-बार पढ़ने और मनन करने के बाद भी मुझे जिस बात ने बहुत प्रभावित किया वह है कि गदहे के मालिक ने बिना सवाल किये ही अपने गदहे को येसु को दे दिया। उसके लिये गदहे को उपलब्ध कर दिया ताकि वे उस पर सवारी करके ईश्वरीय योजना को पूरा कर सकें।

अगर आपने सुसमाचार की बातों पर ग़ौर किया होगा तो पाया होगा कि उस गदहे पर किसी ने सवारी नहीं की थी। वह बिल्कुल नया था। सच पूछा जाये तो येसु के ज़माने में यह एक नयी कार के समान थी जिस पर कोई सवार नहीं हुआ था। उस समय में गदहे का मालिक होना अर्थात् एक सम्मानित व्यक्ति होना था। उस व्यक्ति ने जिसने प्रभु के लिये गदहे को ले जाने की अनुमति दी उसके नाम की चर्चा भी सुसमाचार में नहीं की गयी है। उस दानी व्यक्ति ने गदहे को बड़े ही निःस्वार्थ रूप से प्रभु के लिये उपलब्ध करा दिया ताकि प्रभु इसका उपयोग कर सकें। जैसे ही चेलों न कहा कि प्रभु को गदहे की ज़रूरत है उसने गदहे खोलने में कोई आपत्ति नहीं की ताकि वे उसे ले जा सकें।

दुःखभोग यात्रा – देने की यात्रा

आज दुःखभोग के रविवार के दिन प्रभु भी अपने आप को पूर्ण रूप से देने की यात्रा करने जा रहे हैं। उन्होंने इस यात्रा की शुरुआत पूरे उत्साह और उदारता पूर्वक किया, यह जानते हुए भी कि आने वाले पल उसने लिये दुःखों से भरे थे। क्रूस के रास्ते को गले लगाते हुए प्रभु हमसे यह भी बताना चाहते हैं कि ईश्वर की योजना के तहत् ‘अपने आपको देने की यात्रा’ अब तक समाप्त नहीं हुई है। येसु चाहते है कि उन्होंने जिस भले कार्य को करने का बीड़ा उठाया है हम मनुष्यों के द्वारा जारी रहे। वे चाहते हैं कि हम इस दुनिया को सुन्दर बनाने के लिये देना जारी रखें। वे चाहते हैं कि हम उनके अच्छे मिशन को आगे बढ़ायें।

क्या है हमारे पास ?

कई बार जब देने की बारी आती है तो हम सोचने लगते हैं कि हमारे पास क्या है देने के लिये। कई बार यह भी सोचते हैं कि प्रभु के मिशन को पूरा करने के लिये हमें तो कोई विशेष प्रशिक्षण भी नहीं मिला है। हम कहते हैं कि न मुझे बाइबल का पूर्ण ज्ञान है, न ही प्रभु के जीवन के बारे में मैं पूर्ण रूप से जानता हूँ तो फिर मैं क्या कर सकता हूँ। जब भी मैं प्रभु के लिये कुछ करने की बात सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि मेरे पास वो योग्यतायें नहीं हैं जिसके द्वारा प्रभु की मैं मदद कर सकता हूँ। कई बार तो मैं सोचता हूँ कि मेरे पास न धन संपति है, न समय है न ही कोई विशेष गुण जिसके द्वारा मैं ईश्वर के मिशन को आगे बढ़ा सकता हूँ।

मैं भी ऐसा ही सोचा करता था तब तक जब तक कि मैंने बाईबल को ठीक से नहीं पढ़ा। जब मैंने मूसा के बारे में पढ़ा तो पाया कि ईश्वर ने उससे उसकी छड़ी माँगी। येसु के प्रथम शिष्यों से येसु ने उनका काम माँगा। एक विधवा ने प्रभु के लिये दो पैसे दिये। दूसरी विधवा ने नबी एलिजा के लिये अपने तेल और रोटी दी। एक युवक ने दो रोटी और पाँच मछलियाँ दीं। आरंभिक कलीसिया के सदस्यों ने अपना जो कुछ था उसे एक-दूसरे के लिये बाँट दिया। बाइबल में इन बातों को पढ़ने के बाद  मुझे समझ में आया कि येसु हमसे बहुत बडा बलिदान नहीं चाहते हैं।  वे चाहते हैं कि हम जो भी दें हम प्रभु को पूरे मन-दिल से दें तो अवश्य ही यह इतना बढ़ जायेगा कि इससे प्रभु तो प्रसन्न होंगे ही खुद को भी चैन मिलेगा और प्रभु का मिशन भी पूरा होता जायेगा।

आज प्रभु हमें आमंत्रित कर रहे हैं और कर रहे हैं कि मुझे एक गदहे कि आवश्यकता है। क्या नाम है हमारे ‘गदहे’ का? क्या देने के लिये हम तैयार हैं? क्या यह हमारी उदारता है, क्या यह हमारी क्षमाशीलता है, क्या यह हमारी मुस्कान है, क्या यह हमारी सेवा भावना है, क्या यह हमारी आशा है, क्या यह हमारा समय है? क्या हम प्रभु को अपना प्यार दिखाने के लिये तैयार हैं?क्या हम चाहते हैं कि प्रभु का काम जारी रहे? क्या हम चाहते हैं कि प्रभु के लिये हम कुछ करें? जरा हम चिन्तन करें।

देने में पाना सीखें

येसु का दुःखभोग और मरण हमारे लिये तब ही अर्थपूर्ण होगा जब प्रभु के लिये पाना नहीं बल्कि खोना सीखें। अपनी इच्छा के बदले प्रभु की इच्छा के लिये जीना सीखें, अपनी ओर से थोड़ा ही दान करें पर लगातार करते रहें और तब हमारे हमारे बहुत सारे छोटे दानों को येसु बटोर कर इतना बड़ा बना देंगे कि इससे हमें तो सुखद आश्चर्य तो होगा ही मेरा तो विश्वास है कि इससे आंतरिक सुख के लिये दुःख उठाने की एक ऐसी परंपरा आगे बढ़ेगी जैसा कि गदहे के उस मालिक ने और खदान में फँसे लोगों को बचाने के लिये खदान के अंदर जाने वाले श्रमिक ने दिखाया था। और ऐसा हुआ तो पूरी दुनिया का रूप ही बदल जायेगा जिसे हम धरा में ही स्वर्ग कह पायेंगे।

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