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चार सौ वर्षों से आशा एवं सांत्वना का स्रोत

In Church on March 29, 2012 at 5:49 am

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

सान्तियागो दे क्यूबा, 28 मार्च सन् 2012 (सेदोक): क्यूबा में एल कोब्रे का “वेरजन देला कारिदाद” मरियम तीर्थ विगत चार सौ वर्षों से तीर्थयात्रियों के लिये श्रद्धा और भक्ति का लक्ष्य बना हुआ है।

सन् 1612 ई. में क्यूबा में नाईप की खाड़ी में एक तूफान के बाद तीन मछियारों ने काठ की छोटी सी मरियम प्रतिमा को पाया था।

15 इंच लम्बी, बालक येसु को हाथ में लिये काठ की मरियम प्रतिमा उस तख्ते से जुड़ी थी जिसपर लिखा थाः “यो सोय ला वेरजन दे ला कारिदाद” अर्थात् मैं उदारता की कुँवारी हूँ। बताया जाता है कि जब मछियारों ने प्रतिमा को समुद्र में से बाहर निकाला तब चमत्कारी ढंग से न तो प्रतिमा और न ही इसके वस्त्र गीले थे।

एल कोब्रे उसी समय से क्यूबा में मरियम भक्ति के गढ़ रूप में प्रसिद्ध हो गया। पहले पहल एक छोटे से प्रार्थनालय में मरियम प्रतिमा को प्रतिष्ठापित किया गया किन्तु 18 वीं शताब्दी में मरियम के आदर में एक गिरजाघर का निर्माण करवा दिया गया। देश विदेश से यहाँ तीर्थ यात्री आने लगे जिसके चलते सन् 1927 में एक महागिरजाघर का निर्माण किया गया।

आठ सितम्बर को मरियम के जन्म दिवस पर इसका अनुष्ठान किया गया। आज भी मरियम की यह प्रतिमा महागिरजाघर में प्रधान वेदी के निकट सुरक्षित हैं।

स्पेन से मिली स्वतंत्रता को स्वतंत्रता संग्रामियों ने एल कोब्रे की रानी मरियम की मध्यस्थता से सम्पादित चमत्कार बताकर सन् 1916 ई. में, परमधर्मपीठ से अनुमोदन प्राप्त कर, एल कोब्रे स्थित उदारता की कुँवारी मरियम को क्यूबा की संरक्षिका घोषित कर दिया था।

सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें की क्यूबा यात्रा के लिये नागरिकों को तैयार करने के उद्देश्य से क्यूबा के काथलिक धर्माध्यक्षों ने उक्त प्रतिमा की एक प्रति बनाकर द्वीप के ओर छोर तक शोभायात्राओं का आयोजन किया था जिसमें कोमबीनादो देल एस्ते कारावास भी शामिल था।

कलीसियाई अधिकारियों का कहना है कि इतनी विशाल संख्या में शोभायात्राओं में शामिल क्यूबा के नागरिकों के धर्मोत्साह से वे आश्चर्यचकित रह गये थे। मरियम की इसी प्रति को सोमवार सन्ध्या सान्तियागो दे क्यूबा ले जाया गया था जहाँ सन्त पापा ने सोने का गुलाब अर्पित किया था।

एल कोब्रे में तीर्थयात्री रोगियों की चंगाई, परीक्षा, खेल या व्यापार में सफलता तथा प्राकृतिक प्रकोपों से सुरक्षा के लिये धन्यवाद अर्पित करने आते हैं किन्तु इसके साथ साथ अपनी चिन्ताओं, उत्कंठाओं, आशाओं एवं आकाँक्षाओं को भी वे मरियम के चरणों में रखते तथा बेहतर भविष्य के लिये उनसे मध्यस्थता की याचना करते हैं।

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