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हवाना के होसे मारती हवाई अडडे में संत पापा का विदाई संदेश

In Church on March 30, 2012 at 10:47 pm

जोसेफ कमल बाड़ा

हवाना क्यूबा 28 मार्च 2012 (सेदोक) संत पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने 28 मार्च को क्यूबा की यात्रा के समापन पर रोम प्रस्थान करने से पूर्व हवाना के होसे मारती हवाई अड्डा में आयोजित विदाई समारोह में क्यूबा के राष्ट्रपति राऊल कास्त्रो के संबोधन के बाद उपस्थित विशिष्ट सरकारी और कलीसियाई अधिकारियों, गणमान्य व्यक्तियों और देशवासियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वे ईश्वर को धन्यवाद देते हैं जिन्होंने उन्हें इस सुंदर द्वीप को देखने का अवसर प्रदान किया जिसने उनके पूर्वाधिकारी संत पापा जोन पौल द्वितीय के दिल में गहन छाप छोड़ी थी जब वे यहाँ सत्य और आशा का संदेश सुनाने के लिए आये थे।

संत पापा ने कहा कि वे भी उदारता के तीर्थयात्री रूप में आना चाहते थे ताकि कुँवारी माता मरिया को उनकी उपस्थिति के लिए धन्यवाद दे सकें जो अल कोब्रे के तीर्थालय में वंदनीय प्रतिमा के रूप में हैं तथा चार सदियों से इस देश में कलीसिया तथा सब क्यूबावासियों को प्रोत्साहन देती है ताकि वे मानव दिल की गहनतम इच्छाओं और आकांक्षाओं के सच्चे अर्थ की खोज कर सकें एवं समावेशी भ्रातृत्वमय समाज का निर्माण करने के लिए जरूरी शक्ति पा सकें।

संत पापा ने कहा कि मृतकों में से पुर्नजीवित हुए येसु ख्रीस्त इस संसार में चमकते हैं और उन स्थलों में और अधिक आलोकित होते हैं जहाँ सबकुछ आशाविहीन है। उन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त की है, वे जीवित हैं, और उनमें विश्वास करना, एक छोटे बत्ती के समान, जो अंधकार और चुनौतियों को दूर करते हैं।

संत पापा ने इस यात्रा की तैयारी के लिए राष्ट्रपति महोदय और सब अधिकरियों को उनकी रूचि और उदार सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।

उन्होंने क्यूबा के काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के सदस्यों को उनकी त्याग और प्रयास के लिए धन्यवाद तथा उन सबलोगों को भी धन्यवाद जिन्होंने विभिन्न रूपों में विशेष रूप से प्रार्थना द्वारा इस यात्रा के लिए मदद किया।

संत पापा ने कहा कि वे सब क्यूबावासियों को उनकी प्रार्थना, स्नेह, हार्दिक आतिथ्य सत्कार एवं साझा वैध आकांक्षाओं के कारण अपने दिल के समीप रखते हैं।

संत पापा ने कहा कि वे यहाँ येसु के साक्षी रूप में इस दृढ़ विश्वास के साथ आये कि येसु जहाँ उपस्थित हैं वहाँ आशा उत्पन्न होती है, भलाई अनिश्चितता को दूर करती है और एक शक्तिशाली ताकत हितकारी तथा अनापेक्षित संभावनाओं के लिए क्षितिज को खोलती है।

ख्रीस्त के नाम में तथा संत पेत्रुस के उत्तराधिकारी के रूप में वे चाहते थे कि मुक्ति के संदेश की उदघोषणा करें और क्यूबा के धर्माध्यक्षों, पुरोहितों, धर्मसमाजियों, पुरोहितीय अथवा धर्मसमाजी जीवन की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों एवं लोकधर्मी विश्वासियों के उत्साह को मजबूत करें।

उनकी यह यात्रा सुसमाचार प्रचार काम में संलग्न लोगों, विशेष रूप से लोकधर्मी विश्वासियों के धैर्य और आत्म बलिदान को नया संवेग प्रदान करे और वे अपने घर और कार्यस्थल में ईश्वर के प्रति अपने समर्पण को नवीकृत कर देश के कल्याण और समग्र विकास के लिए जिम्मेदारपूर्ण योगदान दें।

संत पापा ने कहा कि ख्रीस्त का प्रकाश सबलोगों को सामाजिक सौहार्द को बढाने के लिए मदद करे तथा क्यूबा की भूमि पर सदगुणों को (Noble Values) को विकसित होने की अनुमति प्रदान करे जो नवीकृत तथा मेलमिलाप से पूर्ण व्यापक दर्शन पर आधारित समाज के निर्माण के लिए आधार हो।

संत पापा ने कहा कि अपनी तीर्थयात्रा को समाप्त करते हुए वे क्यूबा और इसके निवासियों के विकास के लिए सतत प्रार्थना करेंगे जहाँ शांतिमय भाईचारा के वातातरण में न्याय और स्वतंत्रता का सहअस्तित्व हो।

आदर और स्वतंत्रता का प्रसार हर व्यक्ति के दिल में मौजूद है ताकि वह अपनी मर्यादा के अनुकूल बुनियादी माँग का यथोचित जवाब दे सके तथा इस प्रकार ऐसे समाज के निर्माण में मदद करे जहाँ सबलोग अपने जीवन, परिवार और देश के भविष्य में सक्रिय भूमिका अदा करते हैं।

धैयपूर्ण और ईमानदार संवाद तथा सबलोगों को जोड़नेंवाले अथक प्रयासों से कठिनाईयों और विवादों को दूर किया जा सकेगा। एक दूसरे को सुनने की इच्छा और लक्ष्य को स्वीकार करना जो नयी आशा लाये।

क्यूबा के लोगो अपने पूर्वजों के विश्वास को देखें तथा अपने दिल को सुसमाचार के लिए खोलें ताकि अपने निजी और सामाजिक जीवन को स्वतःस्फूर्त नवीकृत होने दें।

संत पापा ने कहा कि क्यूबा से विदा लेते हुए वे अल कोब्रे की माता मरिया से सब क्यूबावासियों के लिए प्रार्थना करते हैं कि प्रलोभन और परीक्षा के मध्य धैर्य बनाये रखने के लिए ईश्वरीय कृपा पायें।

क्यूबा ऐसी भूमि है जो अल कोब्रे की माता मरियम की मातृत्वमय उपस्थिति के द्वारा सुंदर बन गयी है। ईश्वर इसके भविष्य को आशीष दें।

हवाना के क्रांति प्रांगण में संत पापा का प्रवचन

In Church on March 30, 2012 at 10:46 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

हवाना, 29 मार्च, 2012 (सेदोक, वीआर) मेरे अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, धन्य है प्रभु ईश्वर और धन्य है उसका पावन महिमामय नाम (दानियेल, 3: 52) यह गीत जो दानियेल की किताब से लिया गया है पूरी पूजनविधि में प्रतिध्वनित हो रहा है और हमें आमंत्रित कर रहा है कि हम ईश्वर का धन्यवाद दें और उसके नाम की महिमा गायें।

हम आज यहाँ हैं ताकि हमें निरंतर ईश्वर की महिमा गायें। हम आज यहाँ जमा हुए हैं ताकि हम ईश्वर को धन्यवाद दें और उँचे स्वर से अपने हर्ष को व्यक्त करें जो ईश्वर तक पहुँचने की हमारी विश्वास यात्रा को प्रेम और सत्य से सुदृढ़ करे।

ईश्वर धन्य है जिसने हमें इस ऐतिहासिक प्राँगण जमा किया है ताकि हम गहराई से अपने उसके जीवन में प्रवेश कर सकें। ‘आवर लेडी ऑफ चैरिटी ऑफ एल कोबरे’ की जुबिली को समर्पित यह यूखरिस्तीय बलिदान चढ़ाते हुए मुझे अपार खुशी का अनुभव हो रहा है।

सस्नेह. मैं हवाना के महाधर्माध्यक्ष कार्डिनल हइमे ओरतेगा वाय अलामिनो उनके नेक शब्दों के लिये धन्यवाद देता हूँ। इसके साथ ही मैं अन्य कार्डिनलों और क्यूबा तथा निकटवर्ती देशों से आये धर्माध्यक्ष बन्धुओं को अभिवादन करता हूँ हमारे साथ इस समारोही ख्रीस्तयाग के लिये उपस्थित हैं।

मैं पुरोहितों, धर्मबंधुओं, धर्मसमाजी भाई-बहनों, स्थानीय नागरिक अधिकारियों तथा तमाम लोकधर्मियों का स्वागत करते हूँ।

आज के पहले पाठ में हम तीन युवाओं की प्रताड़ना के बारे में सुनते हैं जिन्होंने अपने विश्वास और अंतःकरण के साथ विश्वासघात करने के बदले बबिलोनिया के राजा की आज्ञानुसार आग में झोंका जाना पसन्द किया । उन्होंने अनुभव किया कि विश्व के प्रभु ईश्वर उन्हें मृत्यु तथा विनाश से बचायेंगे, उनका धन्यवाद किया और उनकी महिमा गयीं।

यह सत्य है, कि ईश्वर अपनी संतान को कदापि नहीं छोड़ते, न ही उन्हें भूलते हैं। वे शक्तिशाली हैं और सदा हमारी रक्षा करते हैं। इसके साथ ही वे अपने लोगों के साथ हैं और अपने पुत्र येसु मसीह के द्वारा उन्होंने हमारे बीच निवास किया है।

यदि हम उनके वचनों को सुनते हैं तो हम उनके सच्चे शिष्य हैं और हम सत्य को जानेंगे और सत्य हमें मुक्त कर देगा (योहन, 8, 31) ऐसा कहते हुए येसु हमें अपने आपको ईश्वर के पुत्र और एक ऐसे मसीहा रूप में प्रस्तुत किया है जो एकमात्र सत्य हैं और हमें मुक्ति प्रदान कर सकते हैं।

उनकी शिक्षा का लोगों ने विरोध किया फिर भी उन्होंने उन्हें विश्वास करने के लिये प्रेरित किया, ईशवचन के अनुसार चलने का आमंत्रण दिया ताकि वे सत्य को जानें, जो उन्हें सम्मान और मुक्ति प्रदान करेगा।

प्रिय भाइयो एवं बहनो, सत्य मानव की स्वभाविक इच्छा है जिसकी चाह करना अर्थात सच्ची मुक्ति की तलाश करना। फिर भी कई ऐसा नहीं करते और इस कार्य से बच जाना चाहते हैं। कई लोग पोंतुस पिलातुस के समान यह पूछ बैठते हैं कि क्या सत्य को जानना संभव है? (योहन 18,38)।

उनका सोचना है कि मानव सत्य को जानने को सक्षम नहीं है या हम कहें कोई ऐसा सत्य नहीं है जो सबों के लिये उपयुक्त हो। यह एक ऐसा मनोभाव है जिसे हम सापेक्षवाद या संशयवाद कहते हैं जो ह्रदय को कुंठित और कमजोर करता और व्यक्ति को दूसरों से दूर या बन्द कर देता है। ऐसे लोग रोमी राज्यपाल के समान अपना हाथ धो डालते हैं और अपने जीवन को अर्थहीन कर देते हैं।

दूसरी ओर हम पाते हैं कि कुछ लोग जो सत्य की खोज का सही अर्थ नहीं लगाते और इस तरह से तर्कशून्यता और कट्टरता में वे खुद को “अपने सत्य” में बन्द कर देते हैं और इसी को दूसरों पर लादने का प्रयास भी करते हैं। वे ठीक वैसे सदूकियों के समान हैं जो मार और खून से लथपथ येसु को देखकर चिल्लाते हैं “उसे क्रूस दीजिये!” (योहन19,6)। जो भी तर्कशून्यता में कार्य करता है वह येसु का शिष्य कदापि नहीं हो सकता।

सत्य की खोज करने के लिये विश्वास और विवेक आवश्यक औरये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। ईश्वर ने जिस मानव की सृष्टि की है उसका जन्मजात स्वभाव या बुलाहट रही है – सत्य की खोज करना। इसीलिये ईश्वर ने उसे विवेक प्रदान किया है। ख्रीस्तीय विश्वास निश्चय ही इसी सत्य की खोज को बढ़ावा देता है – तर्कशून्यता की नहीं।

प्रत्येक मानव को सत्य की खोज करनी है और इसका तब भी आलिंगन करना है जब उसे अपना बलिदान तक करने की ज़रूरत पड़े।

इसके साथ जो सत्य मानवता के ऊपर है वह स्वतंत्रता के प्राप्ति के लिये एक अपरिहार्य शर्त बन जाता है। ऐसा इसलिये क्योंकि हम इसमें एक ऐसी नैतिकता की नींव पाते हैं जिधर सब कुछ का केन्द्रित होता है और जो जीवन और मृत्यु, कर्त्तव्य और अधिकार, विवाह, परिवार और समाज के बारे में स्पष्ट और यथार्थ संकेत देता है।

संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि यह मानव के प्रति पवित्र गरिमा के प्रति इंगित करता है। यह नैतिक विरासत विभिन्न संस्कृतियों, लोगों, धर्मों, अधिकारियों, नागरिकों, तथा विश्वासियों और अविश्वासियों – सबों को एक साथ एकत्र करता है।

वे सभी मूल्य जिन्हें नैतिकता पोषित करती है, ख्रीस्तीयता ख्रीस्त का आमंत्रण का प्रस्ताव डालती है न कि किसी पर बस थोप देती है। यह एक आमंत्रण है सत्य को जानने का जो हमें मुक्त करता है।

एक विश्वासी की बुलाहट है कि वह सत्य को हर दूसरे व्यक्ति कि सत्य को बाँटे जैसे कि येसु ने उस समय किया जब उसे अपमानजनक क्रूस ढोना था।

जिस व्यक्ति के पास सत्य है उसके साथ व्यक्तिगत मुलाक़ात करने के बाद हम उस सत्य को दूसरों को बतलाने के लिये बाध्य हो जाते हैं, विशेषकरके अपने साक्ष्य के द्वारा।

प्रिय मित्रो, आप येसु का अनुसरण करने से न हिचकिचाइये। उन्हीं में हम ईश्वर का मानवजीवन की सच्चाई की पूर्णता को पाते हैं। वे हमें इस बात के लिये मदद देते हैं कि हम स्वार्थ पर विजय प्राप्त करें, अपनी आकांक्षाओं से ऊपर उठें और उन्हें जीतें जो हमें दबाते हैं।

जो बुराई करता है वह पाप करता है और पाप का गुलाम बनता और कभी भी मुक्ति प्राप्त नहीं करता है (योहन 8,34) घृणा का त्याग कर ही हमारे कठोर ह्रदय और बंद आखें मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं और हमें नया जीवन प्राप्त हो सकता है।

येसु ही मानव की सही माप है और उसको जानकर ही हम वह शक्ति प्राप्त कर सकते हैं जो हमें चुनौतियों के समय शक्ति प्रदान करेंगी, ताकि हम खुलकर यह घोषित कर पायेंगे कि येसु मसीह ही मार्ग सत्य और जीवन हैं। उन्हीं प्रभु येसु में हमें पूर्ण मुक्ति मिलेगी वह प्रकाश मिलेगा जिससे हम सत्य को पहचानें कर अपने को नया कर सकेंगे।

कलीसिया चाहती है कि हम दूसरों के साथ उस सत्य को बाँटे जो और कोई दूसरा नहीं – प्रभु येसु ख्रीस्त ही हैं।(कोल1,27) इस कार्य को पूरा करने के लिये वह चाहती है कि लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता मिले जो इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति अपने विश्वास को सार्वजनिक रूप से घोषित करे और येसु द्वारा लाये गये प्रेम, मेल-मिलाप और शांति के संदेश को दुनिया को बतलाये।

आज यह कहा जा सकता है कि क्यूबा में कई ऐसे कदम उठाये जा चुके हैं जिसके द्वारा कलीसिया को अपने मिशन को स्वतंत्रतापूर्वक सार्वजनिक रूप से दूसरों को बतलाया जा सके। फिर भी आज ज़रूरत है कि इसे जारी रखा जाये। आज मैं देश के नेताओं और अधिकारियों को प्रोत्साहन देता हूँ कि वे इस दिशा में आगे बढ़ें और क्यूबा और समाज की सच्ची सेवा के लिये आगे आयें।

धार्मिक स्वतंत्रता दोनों निजी और सार्वजनिक दोनों अर्थों में मानव की एकता को प्रकट करता है जो एक नागरिक और विश्वासी दोनों है। यह न्यायसंगत है कि एक विश्वासी समाज निर्माण के क्षेत्र में अपना योगदान देता है।

धार्मिक स्वतंत्रता सामाजिक संबंधों को मजबूत करता बेहत्तर दुनिया की आशा को पोषित करता, शांति और सामंजस्यपूर्ण विकास की स्थितियों को अनुकूल तो बनाता ही है भविष्य में आने वाली पीढ़ी के अधिकारों की नींव को मजबूत करता है।

जब कलीसिया मानव अधिकारों को बढ़ावा देती है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कोई विशेष सुविधाओं का दावा कर रही है। यह बस यही चाहती है कि वह अपने दिव्य संस्थापक के प्रति वफ़ादार रहे और इस बात के प्रति जागरुक रहे कि जहाँ येसु उपस्थित है वहाँ मावनजाति मानवीय होता और इसको स्थिरता मिलती है।

इसीलिये कलीसिया चाहती है कि वह अपनी शिक्षा और प्रवचन में इसी बात का साक्ष्य दे। इसीलिये इस बात की आशा की जानी चाहिये कि ऐसा समय आयेगा जब कलीसिया उस बात को दुनिया को बता पायेगी जिसे येसु ने कलीसिया को सौंपा है। इस कार्य की उपेक्षा कलीसिया कदापि नहीं कर सकती है।

इसका सबसे उत्तम उदाहरण हैं इसी शहर हवाना के शिक्षाविद और पुरोहित फादर फेलिक्स वारेला जिन्होंने इस देश में लोगों को चिन्तन करना सिखाया। फादर वारेला ने जो रास्ता दिखलाया वह रास्ता था सच्चे सामाजिक परिवर्तन का – गुणसंपन्न मानवता के निर्माण का जो योग्य और मुक्त राष्ट्र का निर्माण करें।

यह परिवर्तन मानव के आध्यात्मिक जीवन पर निर्भर करता है। जैसा कि एलपीदियो के पत्र में लिखा है, “गुणों के बिना सच्चे राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती।”

क्यूबा और दुनिया बदलाव चाहती है लेकिन यह तब ही संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति इस स्थिति में हो कि वह सत्य को खोजे, प्रेम के मार्ग को चुने और दुनिया में भ्रातृत्व और मेल-मिलाप का बीज बोया जा सके।

माता मरिया की ममतामयी सुरक्षा की याचना करते हुए आइये हम प्रार्थना करें कि जब भी हम यूखरिस्तीय समारोह में हिस्सा लें हम उस प्रेम का साक्ष्य दें जो बुराई का उत्तर भलाई से दे। (रोमि. 12, 51) और अपने आप को जीवित बलिदान के रूप उन्हें चढ़ा दें जिन्होंने हमारे लिये अपना बलिदान किया।

आइये हम प्रभु के प्रकाश में चलना सीखें जो अंधकार की बुराई का विनाश कर सकता है और उनसे निवेदन करें कि हम संतों के साहस और सहायता से निर्भयता और उदारतापूर्वक अनवरत ईश्वर की ओर आगे बढ़ सकें।

हवानाः सन्त पापा ने फीदेल कास्त्रो से की मुलाकात

In Church on March 30, 2012 at 10:45 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

हवाना, 29 मार्च सन् 2012 (सेदोक): क्यूबा की राजधानी हवाना स्थित परमधर्मपीठीय प्रेरितिक राजदूतावास में बुधवार को, क्यूबा से विदा लेने से पूर्व, सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने पूर्व राष्ट्रपति फीदेल कास्त्रो से मुलाकात की।

ग़ौरतलब है कि अस्वस्थ रहने के कारण, सन् 1959 ई. से क्यूबा के राष्ट्रपति रहे फीदेल कास्त्रो ने चार वर्ष पूर्व राष्ट्रपति पद का त्याग कर अपने भाई राऊल कास्त्रो को क्यूबा का राष्ट्रपति नियुक्त कर दिया था।

सेवानिवृत्त क्यूबा के नेता फादेल कास्त्रो तथा सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें के बीच 30 मिनट तक बातचीत चली जिसके दौरान 85 वर्षीय फादेल कास्त्रो ने सन्त पापा से कलीसिया में आये परिवर्तनों के बारे में पूछा। दोनों नेताओं ने अपनी ढलती उम्र पर भी विनोदपूर्ण सम्वाद किया।

अप्रैल माह में 85 वर्ष पूरे करने वाले सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने कहा कि यह सच है कि वे बूढ़े हो चले हैं किन्तु अब भी वे अपने सारे काम करने में समर्थ हैं।

वाटिकन के प्रवक्ता फादर फेदरीको लोमबारदी ने बाद में पत्रकारों को बताया कि, किशोरावस्था में येसु धर्माजियों से शिक्षा प्राप्त करनेवाले, क्यूबा के फीदेल कास्त्रो ने सन्त पापा से ढेर सारे सवाल कर डाले। उन्होंने कलीसिया की शिक्षा में आये परिवर्तनों के बारे में पूछा।

साथ ही यह भी प्रश्न किया कि सन्त पापा का क्या काम है? उनकी दिनचर्या कैसी होती है? आज विश्व को कौनसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

मुलाकात के बाद जारी एक विडियो में 85 वर्षीय कास्त्रो को, काले वस्त्र धारण किये, परमधर्मपीठीय प्रेरितिक राजदूतावास आते हुए दर्शाया गया।

जर्जर आयु में भी कास्त्रो सन्त पापा से मिलने के लिये उत्सुक दिखाई दिये। फादर लोमबारदी ने बताया कि सन्त पापा से मिलते ही कास्त्रो बड़बड़ाये, “मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।”

उन्होंने अपनी जीवन संगिनी डालिया सोतो देल वाले तथा दो सन्तानों का भी परिचय कराया तथा सन्त पापा से निवेदन किया कि वे उन्हें कुछ किताबें प्रेषित करें।

फादर लोमबारदी ने बताया कि सन्त पापा तथा फीदेल कास्त्रो के बीच हुई मुलाकात मैत्री और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुई।

परमधर्मपीठीय प्रेरितिक दूतावास से विदा होने से पूर्व फीदेल कास्त्रो तथा उनके परिवार सदस्यों ने सन्त पापा के साथ तस्वीरें खिंचवाई तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

मेक्सिको और क्यूबा की यात्रा कर सन्त पापा ने रोम लौटे

In Church on March 30, 2012 at 10:45 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

हवाना, 29 मार्च सन् 2012 (सेदोक): काथलिक कलीसिया के परमधर्मगुरु सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें, मेक्सिको तथा क्यूबा में अपनी छः दिवसीय प्रेरितिक यात्रा समाप्त कर गुरुवार, 29 मार्च को पुनः रोम लौट आये हैं। इन दोनों ही देशों में सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें की यह पहली तथा इटली से बाहर 23 वीं विदेश यात्रा थी।

करीबियाई देश क्यूबा की, अपनी तीन दिवसीय प्रेरितिक यात्रा के अन्तिम दिन, बुधवार को सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने, साम्यवादी पार्टी द्वारा प्रशासित क्यूबा में, काथलिक कलीसिया के लिये और अधिक स्वतंत्रता की मांग की। क्यूबा में अमरीका द्वारा लगाये गये 50 वर्षीय आर्थिक प्रतिबन्धों के अन्त का भी उन्होंने आह्वान किया।

बुधवार को ही सन्त पापा ने राजधानी हवाना स्थित विख्यात क्राँति चौक में ख्रीस्तयाग अर्पित किया जिसमें तीन लाख श्रद्धालु उपस्थित हुए। क्यूबा से विदा लेने के पूर्व उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति फीदेल कास्त्रो से भी मुलाकात की।

सत्य और पुनर्मिलन के चयन का अनुरोध करते हुए सन्त पापा ने कहा, “क्यूबा तथा विश्व में परिवर्तन की आवश्यकता है किन्तु यह तब ही हो सकता है जब दोनों पक्ष सत्य और प्रेम की खोज हेतु तैयार होकर पुनर्मिलन एवं भ्रातृत्व के बीज बोयेँ।” सन्त पापा के इस अनुरोध ने 14 वर्षों पूर्व स्व. सन्त पापा जॉन पौल द्वितीय द्वारा की गई अपील की याद दिला दी जिन्होंने क्यूबा में अपनी प्रेरितिक यात्रा के दौरान कहा था, “क्यूबा को विश्व के प्रति उदार होना चाहिये और विश्व क्यूबा के प्रति उदार हो।”

हवाना के क्रान्ति चौक में क्रान्तिकारी अभिनायक एरनेस्तो चेगेवारा की विशाल तस्वीर के आगे निर्मित वेदी से, पहली पंक्ति में बैठे राष्ट्रपति राऊल कास्त्रो तथा क्यूबा के वरिष्ठ प्रशासनाधिकारियों की उपस्थिति में, सन्त पापा ने कहा कि सभी लोग “यथार्थ स्वतंत्रता” की कामना करते हैं जिसके बिना उस सत्य की प्राप्ति नहीं हो सकती जिसका प्रचार ख्रीस्तीय धर्म करता है।

उन लोगों को भी सन्त पापा ने फटकार बताई जो सत्य की मिथ्या व्याख्या करते तथा अपने आप के कथित सत्य को अन्यों पर थोपने का प्रयास करते हैं। सम्पूर्ण क्रान्ति चौक में श्रद्धालु छोटे बड़े बैनर लिये खड़े थे तथा “वीवा क्यूबा, वीवा एल पापा” के नारे लगा रहे थे। अपने परिवार के साथ ख्रीस्तयाग समारोह में शरीक पर्यटन कार्यकर्त्ता कारलोस हेरेर्रा ने कहा, “हम सन्त पापा के शब्दों को सुनने आये हैं, क्यूबा के लिये उनके विवेकपूर्ण शब्दों को सुनने। ये शब्द हमारी मदद करते हैं, हमें शांति प्रदान करते हैं, एकता के लिये प्रोत्साहन देते हैं।”
ख्रीस्तयाग के अवसर पर सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने भले ही क्यूबा की सरकार की प्रत्यक्ष आलोचना नहीं की तथापि उनके द्वारा उच्चरित शब्दों ने क्यूबा में व्याप्त वास्तविकता की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित कराया। सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें के पूर्व छात्र एवं शिष्य काथलिक पुरोहित फादर जोसफ फेस्सियो ने कहा कि सन्त पापा सत्य एवं स्वतंत्रता पर बल दे रहे थे जिसकी क्यूबा को सख़्त ज़रूरत है।
करीबियाई देश क्यूबा में काथलिक कलीसिया की भूमिका को मज़बूत करना तथा पचास वर्षों से साम्यवादी शासन के अधीन रहने वाले काथलिक धर्मानुयायियों के विश्वास को सुदृढ़ करना सन्त पापा की क्यूबा यात्रा का प्रमुख उद्देश्य था। अपने प्रवचन में इसीलिये उन्होंने प्रशासनाधिकारियों से निवेदन किया कि वे कलीसिया को और अधिक उदारता एवं स्वतंत्रता के साथ अपने सन्देश का प्रसार करने दें ताकि कलीसिया स्कूलों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में युवाओं को नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा प्रदान कर सके।

ग़ौरतलब है कि सन् 1959 ई. में फीदेल कास्त्रो के सत्ता में आ जाने के बाद से क्यूबा में स्कूलों में धर्मशिक्षा या नीति शास्त्र का अध्ययन रद्द कर दिया गया था। इस दिशा में नब्बे के दशक के बाद से हुए प्रयासों के लिये सन्त पापा ने क्यूबा सरकार की सराहना की किन्तु कहा कि न्याय, समानता एवं शांति पर आधारित समाज के निर्माण के लिये अभी बहुत कुछ करना बाकी है।

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