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In Church on April 25, 2012 at 7:03 pm

Vodpod videos no longer available.

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Vatican website launches ‘Widget’ in honor of Benedict XVI’s 7th anniversary as pope

In Church on April 25, 2012 at 6:49 pm

Vodpod videos no longer available.

श्रोताओं के पत्र

In Church, Letters on April 25, 2012 at 6:27 pm

मैं तथा मेरे आदर्श श्रीवास रेडियो श्रोता क्लब के सदस्य वाटिकन रेडियो की हिन्दी सेवा के सभी कार्यक्रमों को नियमित रूप से सुनते हैं। आपके द्वारा सभी कार्यक्रमों को बहुत ही रोचक और मनमोहक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। आपके सभी साप्ताहिक कार्यक्रमों में नयी दिशाएं, चेतना जागरण, संत पापा के संदेश, पवित्र धर्मग्रंथ बाइबिल एक परिचय, श्रोताओं के पत्र तथा सामयिक लोकोपकारी चर्चा कार्यक्रम आदि हमें बहुत अच्छे लगते हैं। नयी दिशाएं और चेतना जागरण कार्यक्रम जीवन पथ पर आगे बढ़ाने के लिए रामबाण औषधि के समान काम करते हैं। इन्हें सुनकर जीवन के खट्ठे मीठे अनुभवों के बारे में चेतना जगाने के लिए हमें सहायता मिलती है।
पारस राम श्रीवास आदर्श रेडियो लिस्नर्स क्लब के अध्यक्ष विलासपुर छत्तीसगढ़

वाटिकन रेडियो प्रसारण इस समय रेडियो के साथ साथ वेबसार्डट के माध्यम से भी अपनी आवाज को जन जन तक पहुंचा रहा है। यहाँ का वेबसाईट बहुत आकर्षक दिख रहा है। इसके छाया चित्र और इसमें अंकित जानकारी अति सुंदर है तथा यह जानकारी रेडियो प्रसारण से कम नहीं होती है। मेरा सुझाव है कि आप वेबसाईट पर क्विज प्रतियोगिता का आयोजन करें तो इसकी लोकप्रियता में और अधिक वृद्धि होगी।
अनिल ताम्रकार जिला श्रोता संघ के अध्यक्ष शिवाजी चौक कटनी मध्यप्रदेश

मैं तीन महीनों से आपके कार्यक्रम को सुनता आ रहा हूँ। कायर्क्रम इतने अच्छे होते हैं कि क्या कहूँ, इन्हें सुनकर मेरा दिल हर्ष से भर जाता है। मैंने अबतक मेरे ही गाँव के 21 श्रोताओं को वाटिकन रेडियो से जोडा है। हम सबने एक श्रोता क्लब बनाने का निर्णय लिया है जिसका विवरण, पता और सदस्यों के नाम मैं आपको भेज रहा हूँ। कृपया हमारे क्लब को श्रोता सूची में शामिल करें तथा पठन सामग्री भेजते रहें। मैं आपको वचन देता हूँ कि भविष्य में अपने कार्यों और विचारों से आपको अवगत कराता रहूँगा।
मुकुन्द कुमार पूज्य महात्मा गाँधी रेडियो लिस्नर्स क्लब के अध्यक्ष पिपराही शिवहर बिहार

आपके सभी कार्यक्रम स्पष्ट सुनाई दे रहे हैं। संत पापा का सुंदर फोटो, कैलेंडर और पाठ्य सामग्री मिला धन्यवाद। 22 मार्च को श्रोताओं के पत्र कार्यक्रम के अंतर्गत सुमित भगत, पारसराम श्रीवास, पारसनाथ कुशवाहा और मेरे पत्र को पढा गया। इसे सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। भक्तिगीत और समाचार जो विशेष रूप से 2008 में उड़ीसा के कंधमाल में हुई घटना के बारे में था बहुत समसामयिक लगा। आपको रोचक और सुंदर प्रसारण के लिए धन्यवाद।
सुनीता कंडुलना फुटकल टोली कसमार तोरपा खूँटी झारखंड

कलीसियाई दस्तावेज एक परिचय कार्यक्रम मुझे बहुत पसंद आया। इसमें प्रभु की सेवकाई कैसे करनी चाहिए इसके बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी गयी। चर्चा के अंत में सुनाया गया भक्तिगीत मुझे पसंद आया जिसके बोल थे- बदले से बदला नहीं जायेगा, बदला तो बर्बादी लायेगा। यह गीत सुनकर मेरा मन तरोताजा हो गया और आत्मिक शांति मिली। इतनी सुंदर ज्ञानवर्द्धक प्रस्तुति के लिए कोटिशः धन्यवाद।
राम विलास प्रसाद सियोन रेडियो लिस्नर्स क्लब के अध्यक्ष कृतपुर मठिया अरेराज पूर्वी चम्पारण बिहार

यूरोप में इस्लाम धर्मानुयायी भेदभाव के शिकार

In Church on April 25, 2012 at 5:24 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

पेरिस, 25 अप्रैल सन् 2012 (ए.पी.): मानवाधिकार संगठन अन्तरराष्ट्रीय क्षमादान आयोग “एमनेस्टी इंटरनेशनल” के अनुसार यूरोप के कई देशों में इस्लाम धर्मानुयायी भेदभाव का शिकार बनाये जाते हैं।

संगठन का कहना है कि दैनिक जीवन में अपने रीति रिवाज़ों का पालन करने के कारण मुसलमान लोग भेदभाव का शिकार बनते हैं। उदाहरणार्थ उनकी पारम्परिक वेशभूषा उन्हें शिक्षा, रोज़गार तथा व्यवसाय की दुनिया से वंचित करती है।

फ्राँस तथा बैलजियम का उदाहरण देते हुए संगठन ने कहा कि इन देशों के स्थानीय कानून बुर्का या हिजब पहनना वर्जित करते हैं जिसके कारण मुसलमान महिलाओं को कई प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। कई लड़कियों को उनके विरुद्ध भेदभाव के कारण नौकरी नहीं मिली तथा कई अन्यों को अपना स्कूल बदलना पड़ा।

एमनेस्टी इनटरनेशनल ने यूरोप की सरकारों का आह्वान किया कि वे मुसलमानों को केवल वोट बैंक की दृष्टि से नहीं देखें बल्कि उनके विरुद्ध व्याप्त पूर्वधारणाओं एवं भ्रामक विचारों को दूर करने का प्रयास करें।

एमनेस्टी इनटरनेशनल की रिपोर्ट में कहा गया कि “धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक या पोशाक पहनना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है और यह अधिकार सभी को मिलना चाहिये।

कलीसिया के पीछे हटने पर परमाणु विरोधी प्रदर्शनकारियों ने जताया रोष

In Church on April 25, 2012 at 5:23 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

तमिल नाड, 25 अप्रैल सन् 2012 (ऊका समाचार): तमिल नाड के कूडनकूलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विरोध में प्रदर्शन करनेवाले ग्राणीण लोगों ने कलीसिया पर उनके साथ छल का आरोप लगाया है।

प्रदर्शनकारियों के प्रवक्ता पीटर मिल्टन ने ऊका समाचार से कहा, “कलीसिया ने पहले हमें अभियान के लिये प्रोत्साहित किया किन्तु अब वह पीछे हट रही है क्योंकि कुछेक कलीसियाई नेता सरकार से डर रहे हैं तथा अपने आप का बचाव करना चाहते हैं।”

स्थानीय काथलिक कलीसिया और विशेष रूप से तूतीकोरिन धर्मप्रान्त ने पहले परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ जन आंदोलन के विरोध को समर्थन दिया था।

विगत कई माहों से संयंत्र का विरोध करने हेतु तमिल नाड के लगभग 20 गाँव के हज़ारों लोग इदिंथीकराय में डेरा डाले हुए हैं।

हालांकि, मंगलवार को तूतीकोरिन धर्मप्रान्त के प्रवक्ता फादर विलियम संथानम ने कहा कि कलीसिया चाहती है कि प्रदर्शनकारी अधिक बुद्धिमानी से काम लें, विशेष कर, इसलिये कि राज्य सरकार ने उक्त मुद्दे पर अपने रुख को बदल दिया है।

तमिलनाडु सरकार ने शुरू में रूसी प्रौद्योगिकी से बनाये जा रहे कूडनकूलम परियोजना का विरोध किया था। हालांकि, विगत माह राज्य सरकार ने कहा कि राज्य की गंभीर ऊर्जा संकट से निपटने के लिए उक्त परियोजना को अनुमति दी जा रही थी।

फादर संथानम ने कहा, “हम सरकार के खिलाफ नहीं जा सकते हैं इसलिये उम्मीद करते हैं कि परमाणु विरोधी आंदोलन को सावधानी से आगे बढ़ाया जायेगा।”

कलीसिया के विरोधियों का कहना है कि संघीय एजेन्सियों द्वारा दो धर्मप्रान्तों के बैंक आकाऊन्ट बन्द कर दिये जाने के बाद कलीसिया ने कथित तौर पर अपना रुख बदल दिया। संघीय एजेन्सियों ने विदेशों से मिलनेवाले अनुदान के दुरुपयोग का धर्मप्रान्तों पर आरोप लगाया था।

मिल्टन ने आरोप लगाया कि धर्मप्रान्त अब अपनी नकदी की रक्षा करना चाहता है, किन्तु “लोगों के बिना क्या कलीसिया का अस्तित्व है? यदि लोग न होंगे तो वे धन का क्या करेंगे?

साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध नये विधेयक की मांग

In Church on April 25, 2012 at 5:19 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

नई दिल्ली, 25 अप्रैल सन् 2012 (ऊका समाचार): नागर समाज के कार्यकर्त्ताओं ने भारतीय सरकार से मांग की है कि वह साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध नये विधेयक की प्रस्तावना करे तथा साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा की रोकथाम सम्बन्धी “त्रुटिपूर्ण” विधेयक को रद्द करे।

विधेयक पर शनिवार को दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय विचार विमर्श में नागर समाज के कार्यकर्त्ताओं ने मांग की कि नये कानून के तहत सरकारी कर्मचारियों को जवाबदेह बनाया जाये तथा सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को न्याय प्रदान किया जाये।

उन्होंने कहा, “न तो 2005 में विधेयक में किये गये 59 संशोधन और न ही सन् 2011 में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का “सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा विधेयक” कारगर सिद्ध हुआ है।” उन्होंने कहा कि विधेयक त्रुटिपूर्ण तथा पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

दिल्ली में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय विचार विमर्श में न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर, शबनम हाशमी अनहद, कानूनी विशेषज्ञ उषा रामनाथन तथा मानवाधिकार कार्यकर्त्ता वृंदा ग्रोवर और जॉन दयाल सहित राष्ट्रीय एकीकरण परिषद के कई सदस्यों ने भाग लिया।

कार्यकर्ताओं ने कहा कि नए बिल में प्राथमिक तौर पर सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये तथा अपने दायित्वों के निर्वाह में उनके द्वारा चूक के लिये उन्हें उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिये।

उन्होंने कहा कि पीड़ितों को “सुरक्षा और बचाव, राहत शिविरों, संपत्ति की सुरक्षा, मुआवजा और वापसी के अधिकार का आश्वासन दिया जाना चाहिये।”

इस बात के प्रति ध्यान आकर्षित कराते हुए कि साम्प्रदायिक हिंसा का सर्वाधिक दुष्प्रभाव बच्चों और महिलाओं पर पड़ता है, उन्होंने कहा कि उक्त कानून के निर्माण में उनकी सुरक्षा पर अत्यधिक ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिये।

सूडान एवं दक्षिणी सूडान युद्ध में न पड़ें

In Church on April 25, 2012 at 5:18 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

रोम, 25 अप्रैल सन् 2012 (ज़ेनित): काथलिक कलीसिया के अन्तररराष्ट्रीय लोकोपकारी और उदारता संगठन कारितास ने सूडान तथा दक्षिणी सूडान से आग्रह किया कि वे सैन्य आक्रमणों और युद्ध के प्रलोभन में न पड़ें।

विगत जुलाई माह में, एक जनमत संग्रह के बाद, दक्षिणी सूडान, सूडान से स्वतंत्र हुआ था। दशकों के गृहयुद्ध के बाद सन् 2005 में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये गये थे उसी के बाद जनमत संग्रह कर दक्षिणी सूडान स्वतंत्र हुआ था।

तथापि, कई क्षेत्रों में सीमा निर्धारण तथा कच्चे तेल के अधिकार को लेकर विवाद अभी भी बने हुए हैं।

23 अप्रैल को एक विज्ञप्ति जारी कर, कारितास संगठन ने इस बात पर गहन चिन्ता व्यक्त की कि “इन मुद्दों पर हाल के झगड़ों ने दोनों देशों को युद्ध की कगार पर ला दिया है।”

विज्ञप्ति में कहा गया, “सूडान में ख्रीस्तीयों पर आक्रमण, विशेष रूप से, शनिवार को खारतूम के एवेन्जेलिकल चर्च पर हुआ हमला घोर चिन्ता का विषय है।”

दक्षिणी सूडान की आबादी लगभग पाँच लाख है जो अधिकांश ख्रीस्तीय धर्मानुयायी हैं।

कारितास के महासचिव माईकिल रॉय ने कहा, “कारितस सूडान तथा दक्षिणी सूडान से भी अपील करता है कि वे सीमा पर सैन्य आक्रमणों को बन्द करें।

दोनों देशों की सरकारों के लिये अब भी देर नहीं हुई है, अभी भी युद्ध को रोका जा सकता है।” उन्होंने कहा, “केवल वार्ताओं के पुनर्राम्भ तथा शांति समझौते को पूर्णतः लागू कर ही शांति उपलब्ध की जा सकती है।”

कारितास के महासचिव ने कहा कि अन्तररराष्ट्रीय समुदाय को भी अपनी वचनबद्धता के अनुकूल शांति स्थापना हेतु सूडान एवं दक्षिणी सूडान की मदद करनी चाहिये।

उन्होंने कहा, “पिछले युद्ध में बीस लाख लोग मारे गये थे और अब यदि एक और युद्ध हुआ तो इससे सभी की क्षति होगी।” उन्होंने कहा, “हमारा विश्वास है कि सूडान तथा दक्षिणी सूडान के सभी लोग शांति चाहते हैं। उनकी सरकारों एवं अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने युद्ध को समाप्त कर महान उपलब्धि हासिल की थी जिसे गँवाया नहीं जाना चाहिये।”

बुधवारीय-आमदर्शन समारोह में

In Church on April 25, 2012 at 5:17 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

वाटिकन सिटी, 25 अप्रैल, 2012(सेदोक, वी.आर) बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें ने वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में एकत्रित हज़ारों तीर्थयात्रियों को विभिन्न भाषाओं में सम्बोधित किया।

उन्होंने अंग्रेजी भाषा में कहा – मेरे अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, आज की धर्मशिक्षामाला में हम ख्रीस्तीय प्रार्थना विषय पर अपना चिन्तन जारी रखते हुए उस घटना पर विचार करें जिसका वर्णन प्रेरित चरित के 6वें अध्याय के 1 से 4 पदों में किया गया है।

इसमें आरंभिक काथलिक कलीसिया ने 7 व्यक्तियों को चुन लिया ताकि वे रसद वितरण कर सकें।

ऐसा निर्णय करने के पूर्व प्रार्थना और चिन्तन किये गये ताकि ग़रीबों की ज़रूरतों को भी पूरा किया जा सके और प्रेरितों को पूर्णतः स्वतंत्र कर दिया गया ताकि वे ईशवचन के प्रति समर्पित हो सकें।

यहाँ पर ध्यान देने की बात है कि प्रेरितों ने इस बात को स्वीकार किया है कि प्रार्थना और सेवा कार्य दोनों महत्त्वपूर्ण है फिर भी उन्होंने प्रार्थना और सुसमाचार प्रचार के कार्य को प्राथमिकता दी।

प्राचीन काल से ही संतों ने प्रार्थना और कार्य की एकता पर बल दिया है। विश्वास द्वारा पोषित और ईशवचन द्वारा आलोकित प्रार्थना हमें इस बात के लिये मदद देता है कि हम दुनियाँ की वस्तुओं को नये तरीके से देखें और जीवन की हर घटनाओं का प्रत्युत्तर बुद्धिमानी और पवित्र आत्मा की शक्ति दें।

हमारे दैनिक जीवन और निर्णय लेते समय हम प्रार्थना और ईशवचन से आध्यात्मिक शक्ति पायें और जीवन की हर परिस्थिति में बुद्धिमानी, समझदारी और ईश्वर की इच्छा के प्रति वफ़ादार होकर जीवन जीयें।
इतना कहकर संत पापा ने अपनी धर्मशिक्षा समाप्त की।

इसके बाद इंगलैंड, फिनलैं स्वीडेन, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, भारत और अमेरिका के तीर्थयात्रियों, उपस्थित लोगों एवं उनके परिवार के सभी सदस्यों पर पुनर्जीवित प्रभु की कृपा तथा शांति की कामना करते हुए सबों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

बलात् धर्मातरण तथा विवाह के विरुद्ध उठी आवाज़

In Church on April 25, 2012 at 5:16 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

इस्लामाबाद, 24 अप्रैल सन् 2012 (एशियान्यूज़): एशियान्यूज़ को प्रेषित एक प्रेस विज्ञप्ति में पाकिस्तान के “नेशनल कमीशन ऑफॉर जसटिस एण्ड पीस” एन.सी.जे.पी. के काथलिक पुरोहित फादर इम्मानुएल युसुफ मसीह तथा पीटर जैकब ने पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत का आह्वान किया है कि वह बलात धर्मान्तरणों के रुकवाये, दुर्व्यवहार के शिकार लोगों को न्याय दिलवाये तथा देश में मानवाधिकारों के प्रति सम्मान को लागू करवाये।

विज्ञप्ति में काथलिक कलीसिया के न्याय एवं शांति आयोग के कार्यकर्त्ताओं ने सर्वोच्च अदालत से यह भी मांग की है कि वह तीन पीड़ित हिन्दु युवतियों के प्रकरण को फिर से खोले। ग़ौरतलब है कि हिन्दु युवती रिंकल कुमारी, आशा हालिमा तथा लता को बलपूर्वक मुसलमान बनाकर उनका ब्याह मुसलमान पुरुषों से कर दिया गया था।

एन.सी.जे.पी. के अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान का न्यायिक निकाय अन्याय का स्रोत बन गया है क्योंकि स्वेच्छा से दी गई स्वीकृति का सिद्धान्त केवल यदा कदा लागू किया जाता है तथा इसमें सामाजिक वास्तविकताओं का ध्यान नहीं रखा जाता।

विज्ञप्ति में आरोप लगाया गया कि केवल उक्त तीन युवतियों के प्रकरण में ही नहीं अपितु इससे पहले भी अल्पसंख्यक महिलाओं के बलात धर्मान्तरण के प्रकरणों को अदालत ने उम्र की दलील देकर नज़रअन्दाज़ कर दिया है।

विज्ञप्ति में कहा गया, “पुरुष प्रधान, हिंसक एवं धर्मान्ध वातावरण में कानून एवं अदालत इस पूर्वधारणा पर काम नहीं कर सकते कि सशस्त्र एवं निरस्त्र, अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक, पुरुष एवं स्त्रियाँ एक ही समान अपनी स्वतंत्र इच्छा का उपयोग कर सकते हैं।” कहा गया, “यही कारण है कि एन.सी.जे.पी. चाहती है कि अदालत उक्त प्रकरण का पुनरावलोकन करे।”

तुर्की की काथलिक कलीसिया द्वारा 200 सम्पत्तियों की वापसी की मांग

In Church on April 25, 2012 at 5:15 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

इस्तानबुल, 24 अप्रैल सन् 2012 (एशियान्यूज़): तुर्की की काथलिक कलीसिया अंकारा की सरकार से उन दो सौ अचल सम्पत्तियों की वापसी का प्रयास कर रही है जिन्हें तुर्की का सरकार ने सन् 1930 के दशक में जब्त कर लिया था।

विगत दिनों, तुर्की के काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के अध्यक्ष महाधर्माध्यक्ष रुज्जेरो फ्राँचेसकीनी सहित कुछेक धर्माध्यक्षों ने तुर्की संसद के पुनर्मिलन आयोग से मुलाकात की। यह आयोग अतातुर्क के शासनकाल के दौरान ग़ैरमुसलमानों से जब्त की गई सम्पत्तियों की वापसी पर अध्ययन कर रहा है। किन्तु काथलिकों को ग़ैरमुसलमानों की सूची में नहीं गिनाया गया है क्योंकि उस समय उनकी पहचान एक विदेशी समुदाय रूप में की गई थी।

तुर्की की काथलिक कलीसिया ने ऑटोमन साम्राज्य एवं फ्राँस के अधीन सन् 1913 ई. में निर्धारित की गई सम्पत्तियों की सूची सरकार के समक्ष प्रस्तुत की है।

सूत्रों के अनुसार, तुर्की में कलीसियाई सम्पत्ति की वापसी में आनेवाली सबसे बड़ी बाधा कलीसिया की वैध मान्यता को लेकर है। आज तक काथलिक कलीसिया सम्पत्ति की मालिक नहीं हो सकी है। कलीसियाई सम्पत्ति का मालिकाना हक या तो किसी संस्था के नाम पर है अथवा किसी निजी नागरिक के नाम पर है।

तुर्की में वाटिकन के प्रेरितिक राजदूत महाधर्माध्यक्ष अन्तोनियो लूचीबेल्लो ने एशिया समाचार से कहा, “विगत दशकों में कई बार सरकार ने कलीसिया को मान्यता देने विषय पर बातचीत की है।

सात जनवरी सन् 2010 को वाटिकन में तुर्की के राजदूत का प्रत्यय पत्र स्वीकार करते हुए सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने भी काथलिक कलीसिया को वैध मान्यता प्रदान करने का आग्रह किया था।

उन्होंने कहा, “यह मान्यता बहुत पहले मिल जानी चाहिये थी क्योंकि विगत साठ वर्षों से तुर्की तथा परमधर्मपीठ के बीच कूटनैतिक सम्बन्ध बने हुए हैं।”

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