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Archive for April 1st, 2012|Daily archive page

Pope celebrates Palm Sunday in Saint Peter’s Square

In Church on April 1, 2012 at 6:52 pm

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Palm Sunday – Give Yourself to God

In Church on April 1, 2012 at 6:51 pm

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Pope Palm Sunday

In Church on April 1, 2012 at 6:49 pm

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साउदी अरेबिया के ग्रैड मुफ़्ती के निर्देश का विरोध

In Church on April 1, 2012 at 6:38 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

मुम्बई, 31 मार्च, 2012 (एशियान्यूज़) अखिल भारतीय ईसाई समिति (एआइसीसी) ने साउदी अरेबिया के ग्रैड मुफ़्ती शेख अब्दुल अज़ीज बिन अब्दुल्लाह के उस वक्तव्य का विरोध किया किया जिसमें मुफ़्ती ने कहा है “यह ज़रूरी है कि अरेबियन पेनिन्सुला के सभी गिरजाघरों को ध्वस्त किया जाये।”
एआइसीसी ने इस प्रकार के वक्तव्य को ‘धर्मान्ध और खतरनाक’ कहा है। समिति के अध्यक्ष जोसेफ डीसूज़ा के अनुसार मुफ़्ती की ऐसे विवादी अपील से अरेबियन पेनिनसुला में रहने वाली ख्रीस्तीय कलीसिया में डर समा गया है और इसका असर पूरी दुनिया में सभी अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ेगा।
एआइसीसी के महासचिव जोन दयाल ने कहा, “केन्द्र सरकार और अन्य सभ्य राष्ट्र अरेबियन पेनिनसुला मे दिये गये वह्हाबी इमाम के धर्मांधी वक्तव्य का विरोध करें और येमेन. कुवैत. बहरीन. कतार. ओमान और यूएई में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा निश्चित करें। साउदी अरेबिया में ईसाई धर्म को पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया है और वहाँ पर कोई भी गिरजाघर नहीं है।
स्थानीय समाचारपत्रों के अनुसार मुफ़्ती की विवादास्पद वक्तव्य के साथ ही कुवैत की प्रजातांत्रिक असेम्बली ने भी इस बात का प्रस्ताव किया है कि उनके देश में नये गिरजाघरों का निर्माण नहीं करने दिया जायेगा और शरिया कानून को सख़्ती से लागू किया जायेगा।
विदित हो कुवैत साउदी अरेबिया और खाड़ी देशों में भारत और फिलीपींस के करीब 3.5 मिलियन ईसाई कार्य करते हैं जिनमें से 8 लाख सिर्फ़ साउदी अरेबिया में कार्यरत हैं।
एआइसीसी ने कहा है कि ग्रैड मुफ़्ती के वक्तव्य संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के विरुद्ध हैं जिसमें चार्टर इस बात की घोषणा करती है कि वह धर्म या विश्वास के नाम पर होनेवाले कोई भी असहिष्णुता और भेदभाव के ख़िलाफ है।

क्रूसित होने को हम प्रोत्साहन नहीं देते

In Church on April 1, 2012 at 6:37 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

मनीला, 31 मार्च, 2012 (ऊकान) फिलीपीन्स धर्माध्यक्षीय समिति ने लोगों से अपील की है कि वे पवित्र सप्ताह में अपने को क्रूसित न करें।
फिलीपीन्स धर्माध्यक्षीय समिति (सीबीसीपी) के अध्यक्ष सिबु के महाधर्माध्यक्ष होसे पालमा ने कहा, “कलीसिया अपने शरीर में पीड़ा झेलने से अच्छा है अपने विश्वास को नवीकृत करें।”
महाधर्माध्यक्ष ने कहा,”एक ओर हम इस तरह की प्रथाओं को प्रोत्साहन नहीं देते पर उनके मनसूबों का निर्णय हम नहीं कर सकते विशेष करके यदि उन्होंने कोई प्रतिज्ञा की है।”
उन्होंने अपनी बातों को दुहराते हुए कहा, “विश्वासी अपने विश्वास के बाहरी प्रदर्शन के बदले जीवन के आध्यात्मिक पहलुओं पर अधिक ध्यान दें।”
महाधर्माध्यक्ष होसे पालमा ने कहा कि हम विश्वासियों की कार्यों की भर्तष्णा नहीं करते हैं पर इसे हम प्रोत्साहन नहीं देते।
जानकारी के अनुसार फिलीपींस के पम्पांगा प्रांत के 20 लोगों ने गुड फ्राइडे को लकड़ी पर क्रूसित होने के लिये तैयार होने का दावा किया है।
स्थानीय लोगों के द्वारा येसु के दुःखभोग और मरण की घटना के जीवन्त पुनर्भिनय को देखने के लिये हज़ारों की संख्या में स्थानीय और देश-विदेश के पर्यटक प्रत्येक वर्ष जमा होते हैं।

अस्थिकलश या राख न घर में रखें न बिखेरें

In Church on April 1, 2012 at 6:37 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

रोम, 31 मार्च, 2012(सीएनए) इटली की काथलिक कलीसिया ने दफ़न क्रिया की विधि के नये संस्करण में लोगों को निर्देश दिया है कि वे मृतकों के अंतिम संस्कार के बाद उसकी अस्थि कलश या अवशेष को न तो अपने घर में रखें, बिखेरें या बरबाद करें।
इताली धर्माध्यक्षीय समिति की ओर से जारी इस निर्देशिका में कहा गया है, “अंतिम संस्कार उस समय पूर्ण होता है जब अस्थि कलश को कब्रस्थान में जमा कर दिया जाता है।”
मृतकों के अवशेष या राख को कब्रस्थान में न रख कर दूसरी जगह रखना ख्रीस्तीय विश्वास के पूर्ण सामंजस्य के संबंध में कई प्रश्न खड़ा करता है, ख़ास करके जब वे इसे सर्वात्मवादी या प्राकृतिक धारणाओं से जोड़ते हैं।
विदित हो कि दफ़न क्रिया के संबंध में नयी किताब का प्रकाशन पिछले माह किया गया है जिसे अगले 2 नवम्बर से लागू किया जायेगा। यह भी ज्ञात हो कि इटली में करीब 10 प्रतिशत मृतकों की दहन क्रिया की जाती है। इताली सरकार ने सन् 2010 से लोगों को यह छूट दी थी कि वे मृतकों के अवशेष या राख को भूमि या समुद्र में डाल दें या उनकी अस्थिकलश को घरों में रखें।
इस सरकारी छूट के तहत् मीडिया में इस बात की चर्चा थी कि काथलिक कलीसिया भी सरकारी छूट को मान्यता देगी।
परंपरागत रूप से काथलिक कलीसिया ने मृतकों के दहन की अनुमति तब दी जाती जब किसी प्राकृतिक आपदा के समय मृत शरीर को जल्दी हटाये जाने की नौबत आयी हो।
मृतकों के दहन के संबंध में काथलिक कलीसिया का माननाथा कि ख्रीस्तीय दफ़न क्रिया का नकारा जाना ख्रीस्तीय विश्वास – पुनरुत्थान के दिन मृतकों का जी उठना और आत्मा के अमर होने को नकारना है।
विदित हो कि कई काथलिक विरोधी आन्दोलनों जैसे फ्रीमासोन्स ने दहन संस्कार की बात 18वीं सदी में ही कही थी।
इस संबंध में काथलिक कलीसिया ने सने 1963 ईस्वी में पवित्र धर्मविधि दस्तावेज़ ‘पियाम एत कोनस्तानतेम’ के तहत कहा है “दहन क्रिया आत्मा को प्रभावित नहीं करती न ही यह परमशक्तिशाली ईश्वर की उस शक्ति को रोकती है जिसके द्वारा वे शरीर को पुनर्जीवित कर सकते हैं, न तो ख्रीस्तीय सिद्धांत के विरुद्ध है।”
सन् 1992 की धर्मशिक्षा ने इस बात की पुष्टि की है और कहा है कि काथलिक कलीसिया इस बात की शिक्षा देती है कि लोगों को दहन क्रिया करने की अनुमति है बशर्ते कि ऐसा करना ‘विश्वास का त्याग’ या ‘मृतकों के पुनरुत्थान’ का खंडन न लगे।

यूनाइटेड किंगडम और वाटिकन परमधर्मपीठ के कूटनीतिक संबंध के 30 साल

In Church on April 1, 2012 at 6:36 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

वाटिकन सिटी, 31 मार्च, 2012 (सीएनए) वाटिकन के लिये यूनाइटेड किंगडम के राजदूत निजेल बेकर ने कहा है कि सन् 1982 ब्रिटेन और वाटिकन परमधर्मपीठ के बीच के संबंधों के इतिहास का एक अति महत्वपूर्ण साल रहा है।

वाटिकन में ब्रिटेन के राजदूत बेकर ने उक्त बातें उस समय कहीं जब उन्होंने ब्रिटेन और वाटिकन परमधर्मपीठ के कूटनीतिक रिश्तों को 30 वर्ष पूरे होने के अवसर पर रोम के इंगलिश कॉलेज में आयोजित एक सभा को संबोधित किया।

सभा की विषयवस्तु थी, “ब्रिटेन और वाटिकन परमधर्मपीठः सन् 1982 का एक समारहो और विस्तृत् रिश्ता।”

सभा की अध्यक्षता करते हुए वयोवृद्ध कार्डिनल कीथ पैट्रिक ऑ ब्राएन ने कहा कि वाटिकन और ब्रिटेन के संबंध 30 सालों में सुदृढ़ हुए हैं।

उन्होंने 30 वर्ष पहले की घटना की याद की कि जब धन्य जोन पौल द्वितीय ब्रिटेन में येसु के संदेश को दृढ़तापूर्वक प्रस्तुत किया था और युवाओं को चुनौती दी थी कि वे ख्रीस्त के मार्ग पर चलें।

उन्होंने इस बात की भी याद की कि 1 अप्रैल सन् 1982 ईस्वी में पहली बार ब्रिटेन ने सर मार्क हीथ को वाटिकन में अपने राजदूत रूप में भेजा जिन्होंने संतं पापा जोन पौल को अपना प्रत्यय पत्र प्रस्तुत किया।

और इसी के साथ ही दोनों राष्ट्रों के बीच कूटनीतिक संबंध की नींव डाली गयी थी। और 6 महीने के बाद संत पापा ने इंगलैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स की छःदिवसीय यात्रा की थी।

सभा को संबोधित करते हुए राजदूत बेकर ने कहा कि कूटनीतिक संबंध के स्थापित होते ही ब्रिटेन के काथलिकों को ऐसा गहरा आभास हुआ कि वे काथलिक कलीसिया के अभिन्न अंग हैं जिसे पहले उन्होंने कभी अनुभव नहीं किया था।

स्कॉटलैंड के ग्लासगाव के महाधर्माध्यक्ष मारियो कोन्ती ने कहा कि स्कॉटलैंट के काथलिक समुदाय के लिये संत पापा जोन पौल का दौरा अति महत्त्वपूर्ण था। इस समय स्कॉटलैंड के काथलिकों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।

उधर वेल्स के रेक्सहाम के धर्माध्यक्ष एडविन रेगन ने कहा कि तीस वर्ष पहले जब संत पापा जोन पौल द्वितीय वेल्स आये तो वहाँ के काथलिकों को यह अनुभव हुआ कि कलीसिया वेल्स जैसे छोटे राष्ट्र में रह रहे काथलिक समुदाय को महत्त्व देती है।

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