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Archive for April 6th, 2012|Daily archive page

Thousands of people accompany the pope in the Via Crucis

In Church on April 6, 2012 at 9:21 pm

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Married Italian couple writes meditations for Via Crucis presided over by the Pope

In Church on April 6, 2012 at 9:20 pm

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सेओलः उत्तर एवं दक्षिण कोरिया पास्का पर प्रार्थना और पुनर्मिलन के लिये एकसाथ

In Church on April 6, 2012 at 9:17 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

सेओल, 06 अप्रैल सन् 2012 (एशियान्यूज़): उत्तरी और दक्षिणी कोरिया के लोग पास्का महापर्व के उपलक्ष्य में प्रार्थना एवं पुनर्मिलन लिये एकजुट हुए।

कायेसोंग अन्तर-कोरियाई क्षेत्र में, पास्का महापर्व के उपलक्ष्य में, उत्तर तथा दक्षिण कोरिया के प्रतिनिधियों ने एक साथ मिलकर, कोरिया के एकीकरण के लिये प्रार्थना की। इस अवसर पर प्रतिनिधियों ने विचारों का आदान प्रदान किया तथा पुनर्मिलन एवं एकता की स्थापना का मनोरथ व्यक्त किया।

सन् 2008 में परमाणु अस्त्रों के उपयोग को लेकर उत्तर कोरिया को सब तरफ से लोकोपकारी सहायता मिलना बन्द हो गई थी। इस सहायता की पुनर्बहाली के उद्देश्य से प्योंगयांग की साम्यवादी सरकार ने उक्त प्रार्थना एवं बैठक की अनुमति प्रदान कर दी थी।

कोरिया की नेशनल क्रिस्टियन काऊन्सल ने रविवार ईस्टर के दिन गिरजाघरों में पढ़े जाने के लिये, एकसाथ मिलकर सम्पन्न, प्रार्थना के पाठ को प्रकाशित कर दिया है।

कायेसोंग अन्तर-कोरियाई क्षेत्र में सम्पन्न दोनों कोरिया के प्रतिनिधि मण्डलों ने कहा कि वे, “राजनैतिक निकायों एवं विचारधाराओं के परे, घृणा की जगह प्रेम तथा अविश्वास की जगह विश्वास को स्थापित करना चाहते हैं ताकि उत्तर तथा दक्षिण कोरिया एक राष्ट्र रूप में एकता एवं पुनर्मिलन के बन्धन में बंध जायें।”

ग़ौरतलब है कि कोरियाई प्रायद्वीप के विभाजन से पूर्व उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग “एशिया का जैरूसालेम” कहलाता था जहाँ 410 पुरोहित एवं 500 से अधिक ख्रीस्तीय मिशनरी सेवारत थे।

प्योंगयांग की कुल आबादी का तीस प्रतिशत काथलिक धर्मानुयायी है।

किम सूंग के शासन के अधीन विश्वासियों के विरुद्ध दमनचक्र शुरु हुआ था जिससे देश में सब प्रकार के धार्मिक विश्वासों का अन्त कर दिया गया था।

भूबनेश्वरः उड़ीसा के काथलिक बन्धकों की सुरक्षित रिहाई हेतु प्रार्थना कर रहे हैं, धर्माध्यक्ष बरवा

In Church on April 6, 2012 at 9:16 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

भूबनेश्वर, 06 अप्रैल सन् 2012 (एशियान्यूज़): उड़ीसा में कटक भूबनेश्वर के महाधर्माध्यक्ष जॉन बरवा ने एशिया समाचार से बातचीत में कहा कि उड़ीसा के काथलिक धर्मानुयायी, माओवादियों द्वारा अपहृत बन्धकों की सुरक्षित रिहाई हेतु, प्रार्थना कर रहे हैं।

महाधर्माध्यक्ष बरवा ने कहा, “उड़ीसा की कलीसिया, बन्धकों की सन्निकट रिहाई के समाचार पर हर्षित है। इन कठिन दिनों में हमारी प्रार्थना है कि सभी बन्धक सुरक्षित रिहा कर दिये जायें।”

ओडिशा में माओवादी गुरिल्लाओं द्वारा 14 मार्च को बन्धक बनाये गये दो इताली नागरिकों में से क्लाऊदियो कोलान्जलो को 25 मार्च को रिहा कर दिया गया था किन्तु पाओलो बुसोस्को अभी भी बन्धक हैं, उनके साथ साथ साथ बीजू जनता दल के राजनीतिज्ञ झीना हिकाका भी माओवादियों द्वारा बन्धक रखे जा रहे हैं।

बुधवार को उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने एक लिखित वकतव्य में कहा था कि उड़ीसा सरकार बन्धकों की रिहाई लिये “चासी मूलिया आदिवासी संघ” के 15 सदस्यों तथा आठ माओवादी गुरिल्लाओं को जेल से मुक्त करने हेतु कार्रवाई कर रही है।

इस बीच, समाचारों में बताया गया कि शुक्रवार को राजधानी भूबनेश्वर के सरकारी गेस्टहाऊस में सरकार के तीन तथा माओवादियो के दो प्रतिनिधियों के बीच पुनः बातचीत हुई।

इण्डोनेशियाः गुड फ्राइडे की पारम्परिक शोभा यात्रा के लिये हज़ारों एकत्र

In Church on April 6, 2012 at 9:15 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

इण्डोनेशिया, 06 अप्रैल सन् 2012 (ऊका): इण्डोनेशिया के नूज़ा तेंगारा प्रान्त के लारानतूका में हज़ारों तीर्थयात्री, प्रभु येसु मसीह के क्रूस मरण की याद में मनाये जानेवाले गुड फ्रायडे की पारम्परिक शोभायात्रा के लिये एकत्र हुए।

इनमें कुपांग प्रान्त के सैकड़ों तीर्थयात्री भी शामिल थे जिन्हें, राज्यपाल द्वारा, फ्लोर्स द्वीप तक 10 घण्टेवाली नाव यात्रा के लिये मुफ्त टिकट दिये गये थे।

शोभायात्रा के दौरान माँ मरियम तथा प्रभु येसु मसीह की प्रतिमाओं को लारानतूका स्थित रोज़री माला को समर्पित मरियम के महागिरजाघर तक ले जाया जाता है। गुड फ्रायडे की यह परम्परा 16 वीं शताब्दी में आरम्भ हुई थी जो आज भी सम्पूर्ण इण्डोनेशिया से काथलिक एवं ग़ैरकाथलिक भक्तों को आकर्षित करती है।

इस वर्ष की शोभायात्रा में, इण्डोनेशिया में सेवारत पुर्तगाल के राजदूत कारलोस मानुएल फ्रोता एवं उनकी धर्मपत्नी तथा इण्डोनेशिया की पर्यटन मंत्री मरिया एल्का पांगेस्तु विशेष अतिथि थे।

रोमः ईश्वर की इच्छा पूरी करना ही यथार्थ स्वतंत्रता है, बेनेडिक्ट

In Church on April 6, 2012 at 9:15 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

रोम, 06 अप्रैल सन् 2012 (सेदोक): ईश्वर की इच्छा के अनुकूल जीवन यापन में यथार्थ स्वतंत्रता निहित है।

रोम के सन्त जॉन लातेरान महागिरजाघर में, गुरुवार 05 अप्रैल की सन्ध्या, प्रभु येसु मसीह के अन्तिम भोज की स्मृति में, सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने ख्रीस्तयाग अर्पित किया तथा इस दौरान, येसु का अनुसरण करते हुए, 12 पुरोहितों के पैर धोये।

ख्रीस्तयाग प्रवचन में सन्त पापा ने कहा कि मनुष्य तब ही यथार्थ स्वतंत्रता का आनन्द उठाता है जब वह अपनी इच्छा नहीं बल्कि ईश्वर की इच्छा पूरी करता है। उन्होंने कहा कि ईश्वर का बहिष्कार करने से मनुष्य कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकेगा अपितु जब वह ईश्वर के नियमों के अनुकूल जीवन यापन करेगा तब ही मन की शांति प्राप्त कर सकेगा तथा सुखपूर्वक जीवन यापन कर पायेगा।

रविवार, आठ अप्रैल, को ख्रीस्तीय धर्मानुयायी प्रभु येसु मसीह के पुनःरुत्थान का पास्का मना रहे हैं। इससे पूर्व पड़नेवाले सप्ताह को पुण्य सप्ताह कहा जाता है। पुण्य गुरुवार को काथलिक कलीसिया, शिष्यों के साथ प्रभु येसु मसीह के अन्तिम भोजन का स्मृति समारोह मनाती है। गुरुवार सन्ध्या की धर्मविधि तथा ख्रीस्तयाग समारोह से ही पास्कात्रय आरम्भ होता है जो पास्का अर्थात् ईस्टर महापर्व पर अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचता है।

अपने प्रवचन में सन्त पापा ने स्मरण दिलाया कि पुण्य गुरुवार, “पवित्र यूखारिस्त की स्थापना के साथ साथ उस काली रात का भी स्मारक है जब येसु अपने शिष्यों के संग जैतून की पहाड़ी पर गये थे। उस रात का स्मारक जब प्रार्थना में लीन येसु ने मृत्यु के अन्धकार का साक्षात्कार किया था तथा स्वतः को अकेला पाया था; जब यूदस ने विश्वासघात कर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था; जब पेत्रुस ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया था; जब उन्हें महासभा के याजकों के समक्ष प्रस्तुत होना पड़ा था तथा पिलातुस के हाथों सौंप दिया गया था।”

सन्त पापा ने कहा, “येसु रात भर प्रार्थना करते रहे। रात का अर्थ है संचार का अभाव, ऐसी स्थिति जहाँ लोग एक दूसरे को देख नहीं सकते। रात, सच्चाई को छिपाने वाली दुर्बोधता का प्रतीक है। ऐसी जगह जहाँ बुराई व्याप्त रहती तथा प्रकाश से छिपकर विकसित हो सकती है।

येसु स्वतः ज्योति एवं सत्य हैं, वे ही संचार हैं, वे स्वयं पवित्रता, शुद्धता एवं भलाई हैं। वे रात के अन्धकार में प्रवेश करते हैं। रात, अन्ततः, मृत्यु का प्रतीक है, मृत्यु जो भ्रातृत्व एवं जीवन की सुनिश्चित्त क्षति है। येसु इसी रात में प्रवेश करते हैं ताकि इसपर विजयी हो सकें तथा मानवजाति के इतिहास में ईश्वर के नवदिवस का उदघाटन कर सकें।”

सन्त पापा ने सब से आग्रह किया कि वे उस प्रार्थना पर अपना ध्यान केन्द्रित करें जो उस रात जैतून की पहाड़ी पर प्रभु येसु मसीह ने पिता ईश्वर से की थी, “‘अब्बा! पिता! तेरे लिए सब कुछ सम्भव है। यह प्याला मुझ से हटा ले। फिर भी मेरी नहीं, बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो।”

सन्त पापा ने कहा येसु ने अपनी प्रार्थना द्वारा आदम के पाप को रूपान्तरित कर दिया तथा मानवजाति को चंगाई प्रदान की। आदम ने वह नहीं करना चाहा जिसकी आज्ञा ईश्वर ने उसे दी थी उसने अपने मन की इच्छा को पूरा करना चाहा, ख़ुद ईश्वर बनना चाहा और अपने घमण्ड के कारण स्वर्ग को खो दिया। अस्तु, सन्त पापा ने कहा, “घमण्ड ही पाप का कारण है।

हम सोचते हैं कि जब हम अपनी इच्छा को पूरा करते हैं तब हम वास्तव में स्वतंत्र होते हैं। हमें लगता है कि ईश्वर हमारी स्वतंत्रता के विरुद्ध हैं। यही वह मूलभूत विरोध जो इतिहास के अन्तराल में सदैव विद्यमान रहा है, वह मूलभूत झूठ जो जीवन को भ्रष्ट करता है।”

सन्त पापा ने कहा, “जब मानव प्राणी ख़ुद को ईश्वर के विरुद्ध खड़ा कर देता है तब वास्तव में वह अपने अस्तित्व के सत्य के विरुद्ध खड़ा हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप वह स्वतंत्र नहीं होता बल्कि ख़ुद अपने आप से दूर हो जाता है। वास्तव में, हम तब स्वतंत्र होते हैं जब हम अपने अस्तित्व के सत्य को तथा ईश्वर के सत्य को पहचानते तथा उसके अनुकूल जीवन यापन करते हैं।”

रोम के सन्त जॉन लातेरान महागिरजाघर में गुरुवार सन्ध्या एकत्र चन्दा सिरिया के शरणार्थियों की लोकोपकारी सहायता हेतु प्रेषित किया जायेगा।

काठमाण्डूः नेपाल पहली बार बिना भय के ईस्टर

In Church on April 6, 2012 at 9:14 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

काठमाण्डू, 04 अप्रैल सन् 2012 (एशियान्यूज़): नेपाल का ख्रीस्तीय समुदाय इस वर्ष पहली बार बिना भय के पवित्र सप्ताह एवं पास्का महापर्व की तैयारियाँ कर रहा है। विगत वर्षों में कई बार नेपाल के लघु ख्रीस्तीय समुदाय को हिन्दु चरमपंथियों की हिंसा का सामना करना पड़ा था।

नेपाली सरकार ने इस वर्ष पास्का महापर्व के अवसर पर काथलिक एवं प्रॉटेस्टेण्ट गिरजाघरों तथा आराधना स्थलों पर विशेष सुरक्षा उपाय किये हैं जैसा विगत वर्ष क्रिसमस के समय भी किया गया था।

काठमाण्डू के धर्मशिक्षक भीम राय ने एशिया समाचार को बताया कि सम्पूर्ण ख्रीस्तीय समुदाय पास्का महापर्व की तैयारियों में लगा है, विशेष रूप से, पास्का के अवसर पर रात्रि जागरण एवं ख्रीस्तयाग समारोह की तैयारियाँ की जा रहीं हैं जिसमें एक हज़ार से अधिक श्रद्धालुओं के उपस्थित होने का अनुमान है।

सन् 2006 में नेपाल के शाही शासन के अन्त के बाद से नेपाल में ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों को आराधना-अर्चना तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है। हिन्दू बहुल देश नेपाल में, ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों की संख्या लगभग बीस लाख है।

ईराकः पुण्य सप्ताह के दौरान मुस्लिम-ख्रीस्तीय वार्ता को धर्माध्यक्ष ने दिया प्रोत्साहन

In Church on April 6, 2012 at 9:13 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

ईराक, किरकूक 05 अप्रैल सन् 2012 (एशिया न्यूज़): ईराक में किरकूक के खलदेई काथलिक महाधर्माध्यक्ष लूईस साको ने पास्का महापर्व की पृष्टभूमि में बुधवार को मुसलमान एवं ख्रीस्तीय नेताओं के बीच वार्ताओं का आयोजन किया। इस वार्ता में धार्मिक एवं राजनैतिक जगत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

एशिया समाचार को महाधर्माध्यक्ष साको ने बताया कि उक्त वार्ता का उद्देश्य, पास्का महापर्व की पूर्व सन्ध्या, समाज के सभी वर्गों को विचारों के आदान प्रदान को मौका देना था ताकि इस पवित्र महापर्व पर किसी भी प्रकार की अनहोनी को रोका जा सके तथा मैत्री का वातावरण निर्मित किया जा सके।

उन्होंने कहा, “दुर्भाग्यवश देश के उत्तरी हिस्से में अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से ख्रीस्तीयों पर आक्रमणों का सिलसिला जारी है।” सोमवार को एक चालीस वर्षीय ख्रीस्तीय धर्मानुयायी का अपहरण कर लिया गया तथा मंगलवार को खत्तारा गाँव में एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी।

महाधर्माध्यक्ष साको की पहल पर आयोजित उक्त अन्तरधार्मिक वार्ता में कुर्दी, अरब तथा तुर्की राजनीतिज्ञों सहित नगर प्रशासन, पुलिस और सेना के अधिकारी तथा सुन्नी, शिया एवं ख्रीस्तीय प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

प्रतिनिधियों को सम्बोधित कर महाधर्माध्यक्ष ने कहा कि हिंसा, भय और अस्त्रों से ईराक में स्थायित्व एवं शांति स्थापित नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि आज देश के समक्ष प्रस्तुत चुनौतियों का सामना करने के लिये ईराकी लोगों को मानवीय एवं नैतिक मूल्यों के प्रति अभिमुख होना पड़ेगा।

अवज्ञा, कलीसिया के नवीनीकरण का मार्ग नहीं हो सकता,

In Church on April 6, 2012 at 9:13 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

वाटिकन सिटी, 05 अप्रैल सन् 2012 (सेदोक): वाटिकन स्थित सन्त पेत्रुस महागिरजाघर में गुरुवार को सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने करिश्माई ख्रीस्तयाग अर्पित कर पुण्य सप्ताह की त्रैदिवसीय धर्मविधियों का शुभारम्भ किया।

पुण्य बृहस्पतिवार से ही पुण्य सप्ताह की धर्मविधियाँ सघन हो जाती हैं जो पास्का महापर्व में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचती हैं।

गुरुवार प्रातः धर्माध्यक्षों द्वारा अर्पित ख्रीस्तयाग “क्रिज़म मास” या करिश्माई ख्रीस्तयाग कहा जाता है। अवसर पर पवित्र तेलों की आशीष विधि सम्पादित की जाती है।

करिश्माई ख्रीस्तयाग के अवसर पर प्रवचन करते हुए सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने कहा, “प्रभु येसु ख्रीस्त ही सत्य हैं तथा अभिषेक द्वारा समस्त धर्माध्यक्ष, ख्रीस्त के पौरोहित्य में भागीदार हैं।”

उन्होंने कहा, “धर्माध्यक्ष को चाहिये कि वह अपने अभिषेक को दैनिक जीवन तक विस्तृत होने दे तथा स्वतः से बारम्बार यह प्रश्न करे कि क्या वह ईश्वर के सेवक के सदृश आचरण कर रहा है? क्या ख्रीस्त का अनुसरण कर सांसारिक सुख वैभव और अपने अहं का परित्याग कर केवल ईश्वर में अपना ध्यान लगा रहा है?”

सन्त पापा ने कहा कि धर्माध्यक्षों से दो बातों की मांग की जाती है जो हैं, “प्रभु ख्रीस्त के साथ समनुरूपता एवं आन्तरिक सम्बन्ध तथा अपने अहं का परित्याग, आत्म-परितोष का त्याग। मैं अपने जीवन का स्वामी नहीं हूँ बल्कि मेरा जीवन अन्यों की सेवा के प्रति समर्पित है।”

सन्त पापा ने उदाहरण दिया कि हाल ही में, यूरोपीय देशों से, पुरोहितों के एक दल ने काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा की अवहेलना करते हुए अवज्ञा का एक समन जारी कर दिया था तथा यह भी बताया था कि उनकी अवज्ञा के क्या दुष्परिणाम हो सकते थे, उदाहरणार्थ महिलाओं का अभिषेक।

जिसके उत्तर में धन्य सन्त पापा जॉन पौल द्वितीय ने दृढ़तापूर्वक इस बात की पुष्टि की थी कि इस मुद्दे पर कलीसिया को प्रभु ख्रीस्त से कोई अधिकार नहीं मिला है।

सन्त पापा ने कहा कि पुरोहितों का उक्त दल कलीसिया में नवीनीकरण लाने की दलील देकर अपनी बात अवज्ञा द्वारा मनवाना चाहता था किन्तु अवज्ञा, कलीसिया के नवीनीकरण का, रास्ता नहीं हो सकती।

सन्त पापा ने कहा कि धर्मशिक्षा प्रदान करना धर्माध्यक्ष का प्रेरिताई का अभिन्न अंग है और इस प्रेरिताई को ऐसा होना चाहिये जिससे लोग धर्माध्यक्ष में प्रभु येसु मसीह के सेवक का साक्षात्कार कर सकें।

कुरिन्थियों को प्रेषित प्रथम पत्र के चौथे अध्याय के पहले और दूसरे पदों में सन्त पौल लिखते हैं: “लोग हमें मसीह के सेवक और ईश्वर के रहस्यों के कारिन्दा समझे और कारिन्दा से यह आशा की जाती है कि वह ईमानदार निकले।”

सन्त पापा ने कहा कि शिक्षण कार्य में भी इस बात का ध्यान रखा जाना अनिवार्य है कि हम अपने निजी विचारों एवं मतों का प्रचार न करें बल्कि ख्रीस्त के सेवक होने के नाते केवल कलीसिया के विश्वास का प्रचार प्रसार करें।

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