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पास्का का दूसरा रविवार

In Church on April 13, 2012 at 11:31 am

प्रेरित चरित 4, 32-35
संत योहन का पहला पत्र 5, 1-6
संत योहन 20, 19-31

फोटोग्राफर की कहानी
आज मैं आपको एक फोटोग्राफर की कहानी बताता हूँ। एक चाइनीज फोटोग्राफर था उसे प्राकृतिक सुन्दरता का फोटो खीचने का बहुत शौक था । कभई वह पहाड़ों का फोटो खींचता कभी उगते हुए सूर्य का तो कभी डूबते हुए सूर्य का। कभी नदी का तो कभी झरनों का। कभी हरियाली का तो कभी बारिस की फुहारों का तो कभी बर्फ से ढँके पहाड़ का।एक बार की बात है उसने ने एक फोटो लिया।यह फोटो किसी व्यक्ति की नहीं थी पर पिघलते हुए बर्फ़ की तस्वीर थी। जहाँ पर बर्फ़ पिघल रही थी वहाँ पर कुछ काली जमीन भी थी। जब उस चाइनीज़ फोटोग्राफर उसकी तस्वीर छापी तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उस फोटोग्राफ़र न दे देखा कि वह बर्फ और काली ज़मीन का हिस्सा येसु के चेहरे से बिल्कुल मिलता जुलता है। और जितनी बार उस तस्वीर को देखता उतनी ही बार उसे यह लगने लगा कि वह येसु के चेहरे को देख रहा है। तब उसने निर्णय किया कि प्रभु उसे किसी विशेष मतलब से बुला रहें हैं और वह ईसाई बन गया। इसके बाद तो उसने कई लोगों को वह तस्वीर दिखलायी और कई लोगों ने कहा कि वे उस तस्वीर में येसु को देख रहे हैं। तस्वीर देखने वालों में कई ने शुरु में कहा कि वे कुछ नहीं देख रहे हैं सिर्फ काला और सफे़द है पर बार-बार देखते रहने के बाद उन्होंने पाया कि वे सचमुच में एक चेहरा देख रहे हैं और वह चेहरा किसी और का नहीं है पर येसु मसीह का है । उन्होंने इस पर पक्का विश्वास किया कि वह चित्र येसु मसीह का है। उन्होंने सिर्फ़ विश्ववास नहीं किया पर उन्होंने इसका प्रचार भी किया।

रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अन्तर्गत पूजन विधि पंचांग के पास्का पर्व के दूसरे रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहे हैं । पुनर्जीवित येसु चाहते हैं कि हम उन्हें पहचाने उन्हें पहचानें और उस प्रभु की उस शांति का प्रचारक बनें जो आत्मबलिदान से मिलती है। आइये हम संत योहन रचित सुसमाचार के 20वें अध्याय के 19 से 31 पदों को सुनें जिसके द्वारा प्रभु हमें अपनी शांति देना चाहते हैं।

सुसमाचार पाठ

उसी दिन, अर्थात् सप्ताह के प्रथम दिन, संध्या समय, जब शिष्य यहूदियों के भय से द्वार बन्द किये एकत्र थे, येसु उनके बीच में आकर खड़े हो गये । उन्होंने शिष्यों से कहा, ” तुम्हें शांति मिले।” और उसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को धेख कर शिष्य आनन्दित हो उठे। येसु ने उन से फिर कहा, तुम्हें शांति मिले। पिता ने जैसे मुझे भेजा है, मैं वैसे ही तुम्हें भेजता हूँ।” यह कहने के बाद येसु ने उन पर फूँक कर कहा, ” पवित्र आत्मा को ग्रहण करो। तुम जिन लोगों के पाप क्षमा करोगे, वे अपने पापों से मुक्त हो जायेंगे, और जिनके पाप नहीं क्षमा करोगे, वे अपने पापों से बँधे रहेंगे। ” येसु के आने के समय बारह में से एक, थोमस, जो यमल कहलाता था, उनके साथ नहीं था । दुसरे शिष्यों ने उससे कहा, ” हमने प्रभु को देखा है।” उसने उत्तर दिया, ” मैं जब तक उनके हाथों में कीलों का निशान न देखूँ, कीलों की जगह पर अपनी उँगली न रख दूँ और उनकी बगल में अपना हाथ न डाल दूँ मैं तब तक विश्वास नहीं करूँगा।”

आठ दिन के बाद उनके शिष्य फिर घर के भीतर थे और थोमस उनके साथ था। द्वार बन्द होने पर भी येसु उनके बीच आकर खड़े हो गये और बोले, ” तुम्हें शांति मिले।” तब उन्होंने थोमस से कहा, ” अपनी उँगली यहाँ रखो। देखो, ये मेरे हाथ हैं। अपना हाथ बढ़ा कर मेरी बगल में डालो और अविश्वासी नहीं, बल्कि विश्वासी बनो।” थोमस ने उत्तर दिया, ” मेरे प्रभुवर, मेरे ईश्वर।” येसु ने उससे कहा, क्या तुमने इसलिये विश्वास किया कि तुमने मुझे देखा है। धन्य हैं वे जो बिना देखे विश्वास करते हैं।” येसु ने अपने शिष्यों के सामने और बहुत-से चमत्कार दिखाये, जिनका विवरण इस पुस्तक में नहीं दिया गया है । इनका ही विवरण दिया गया है, जिससे तुम विश्वास करो कि येसु ही मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं और विश्वास करने से उनके नाम द्वारा जीवन प्राप्त करो।

शांति
मेरा विश्वास है कि आपने आज के सुसमाचार को ध्यान से पढ़ा है और प्रभु की बातों से प्रभावित हुआ है। आपने ध्यान दिया होगा कि प्रभु जब चेलों के पास आते हैं तो उनके मुख से जो प्रथम वाक्य निकलता है वह है शांति का। याद की कीजिये प्रभु को जब बैरियों ने पकड़ लिया था और उस क्रूस पर चढ़ाने के लिये ले जा रहे थे तो किसने येसु का साथ दिया था । सब शिष्य डर के मारे या तो भाग गये थे या छिप गये थे या फिर संत पेत्रुस के समान येसु को अस्वीकार कर दिया था। येसु को कितना दुःख हुआ था होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। पर जब येसु विजयी होकर आये तो उनके मुख से न कोई गाली निकली न कोई गिला या शिकवा शब्द कि तुमने मुझे अकेले छोड़ दिया था। येसु तो शांति के प्रचारक थे शांति प्रेम और क्षमा का प्रचार करते-करते ही वे अपने आप का बलिदान कर दिया।

आज के सुसमाचार में मुझे जिस बात ने अत्यधिक प्रभावित किया वह है येसु का अपने शिष्यों के लिये उच्चरित शब्द तुम्हें शांति मिले। येसु जाते-जाते हमें शांति दे गये और मृत्यु के मार्ग में उन्होंने सब लोगों को शांति का ही संदेश दिया और जब वे जी उठकर अपने शिष्यों के पास आये तो भी उन्हें शांति का संदेश ही दिया। श्रोताओ यही है प्रभु का असल रूप यही है प्रभु का असल परिचय। वे चाहते है कि शांति का प्रचार हो। लोगों के जीवन में शांति मिले और वे भी शांति के लिये कार्य करते रहें।

क्या आपने कभी विचार किया है कि शांति का मार्ग कितना कठिन हो सकता है । कई बार हम सोचते हैं कि हम शांति के प्रचारक बनेंगे कई बार हम समझते हैं कि शांति के लिये कार्य करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिये पर मेरा तो व्यक्तिगत अऩुभव रहा है कि जब-जब समस्यायें या चुनौतियाँ आऩे लगतीं हैं तो हम अपने जीवन से समझौता करने लगते हैं और कहते हैं कि क्यों मैं ही अकेले शांति के लिये कार्य करुँ। कई बार हम कहने लगते हैं कि अगर दूसरे लोग बेईमानी से जीवन जीते हैं तो मैं क्यों अकेले भला कार्य करुँ। हमने लोगों को यह भी कहते सुना है कि हम कितनी बार लोगों को समझने का प्रयास करें कितनी बार लोगों को क्षमा दें कितनी बार हम नम्रता से पेश आयें। अगर प्रभु चाहते तो वे भी अपने शिष्यों को ऐसा ही कह सकते थे और उनके पास आते ही उन्हें डाँटना शुरु कर सकते थे । पर प्रभु ने ऐसा नहीं किया उन्होंने अपने शिष्यों को शांति ही प्रदान की। और इसीलिये धीरे-धीरे शिष्यों की आँखें खुल गयी। श्रोताओ यह भी सत्य है कि सत्य भला और अच्छा को दुःख उठाना ही पड़ता है और जब सत्य अपनी सच्चाई में स्थिर रहता है तो उसका विजयी होना स्वभाविक है।

येसु को पहचानना

दूसरी बात जिसने मुझे प्रभावित किया वह है संत थोमस का येसु को पहचानना। कई बार इन दिनों हम यही सोच बैठते हैं कि संत थोमस अविश्वासी था। बचपन से आजतक मैंने भी यही सोच के रखा था कि संत थोमस कैसा व्यक्ति था। अंतिम समय तक अविश्वासी ही रहा । उन्होंने येसु से चिह्न माँगा और तब ही विश्वास किया। कभी-कभी तो मैं संत थोमस को गुस्सा भी किया करता था ये सोचकर कि उसे येसु को पहचानने में इतना समय लगा। पर श्रोताओ अगर हम अपने जीवन पर गौ़र करें तो हम पायेंगे कि वास्तविक ख्रीस्तीय जीवन यही है कि येसु को धीरे-धीरे ही पहचानते हैं। विश्वास का जीवन यही है ।अगर हमने आज तक येसु के लिये कोई विशेष कार्य नहीं किया है या हमने किसी तरह इस कार्य में असफलताएँ पायीं हैं तो हम परेशान न हों। अगर हमने यह भी कहा की हम ईश्वर पर विश्वास करते हैं पर अपने जीवन से कोई साक्ष्य न भी दिया हो तो आप परेशान न हों। येसु को पाने और पहचानने का वरदान मानव को धीरे से ही मिलता है। थोमस को ही देखिये थोमस ने येसु के साथ जीया था येसु के कार्यों को देखा था येसु तौर तरीकों का करीबी से अनुभव किया था पर जब शिष्यों ने बताया कि येसु जी उठे हैं उन्होंने उन्हें देखा है तो उन्होंने इस पर विश्वास नहीं किया। या ऐसा भी समझा जा सकता है कि संत थोमस के लिये यह इतनी बड़ी खुशी थी कि स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था।

पूर्ण विश्वास के लिये ‘अविश्वास’
थोमस के बारे में एक और बात मुझे अच्छी लगती है वह यह है कि वह अविश्वास करता है, वह प्रमाण चाहता है वह देखना चाहता है वह व्यक्तिगत अनुभव करना चाहता है और इसीलिये उसका अविश्वास एक गुण बन जाता है। वह अविश्वास करता है ताकि वह येसु के जी उठने को अच्छी तरह से समझ सके। श्रोताओ यही अन्तर हमारे हमारे अविश्वास और थोमस के अविश्वास में थोमस अविश्वासी दिखाई देता है पर वह विश्वासी है क्योंकि उसका अविश्वास उसे प्रभु के और अधिक करीब ले आता है। प्रभु से दूर नहीं करता है। थोमस येसु को धीरे-धीरे पहचानता गया संदेह भी किया पर पहचानने के बाद उन्होंने उसे जिन शब्दों से येसु पर अपने विश्वास की अभिव्यक्ति की उसकी आज भी हमारे लिये एक नमूना है। संत थोमस ने कहा ‘ मेरे प्रभु मेरे ईश्वर ‘ अर्थात् प्रभु आप मेरे मालिक है और आप ही मेरे सब कुछ हैं। इस छोटे से अर्धवाक्य में संत थोमस का पूर्ण समर्पण है। उसके विश्वास की चरमसीमा है।

प्रभु के वचन सुनना गिरजाघरों में जाना प्रवचन सुनना और भजन कीर्तन करना यदि हमें ईश्वर को पूर्ण रूप से पहचानने में मदद नहीं देते तो हमारा जीवन अधुरा है और हम शांति प्रेम क्षमा दया के प्रचारक नहीं बन सकते हैं। प्रभु का आमंत्रण है कि हम उसकी शांति ग्रहण करें उसकी आत्मा को धारण करें उस चाइनीडज फोटोग्राफर के समान कह सकें कि हमने प्रभु के चेहरे का पहचाना है और संत थोमस के समान पूरे समर्पण के साथ कह सकें मेरे प्रभु मेरे ईश्वर।

कार्डिनल लूईस मारतीनेस के निधन पर सन्त पापा ने व्यक्त किया शोक

In Church on April 13, 2012 at 11:31 am

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

वाटिकन सिटी, 12 अप्रैल सन् 2012 (सेदोक): पोर्तो रिको के कार्डिनल लूईस मारतीनेस के निधन पर गहन शोक व्यक्त करते हुए सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने दिवंगत आत्मा के प्रति भावभीनी श्रद्धान्जलि अर्पित की है।

पोर्तो रिको के सेवानिवृत्त कार्डिनल लूईस मारतीनेस का दस अप्रैल को एक लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया था। वे 89 वर्ष के थे। 57 वर्ष तक कार्डिनल मारतीनेस सान हुवान पोर्तो रिको के धर्माध्यक्ष रहे थे।

बुधवार को सान हुवान पोर्तो रिको के वर्तमान महाधर्माध्यक्ष रोबेर्तो ओक्तावियो गोनज़ालेस नीवेस के नाम एक तार सन्देश प्रेषित कर सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने दिवंगत कार्डिनल के निधन पर शोक व्यक्त किया तथा सम्पूर्ण महाधर्मप्रान्त के प्रति अपने प्रार्थनामय सामीप्य का आश्वासन दिया।

सन्त पापा ने कहा, “काथलिक कलीसिया को अर्पित कार्डिनल लूईस मारतीनेस की दीर्घकालीन प्रेरिताई के लिये हम प्रभु ईश्वर को धन्यवाद देते हैं।”

उन्होंने स्मरण दिलाया कि कार्डिनल लूईस मारतीनेस ने द्वितीय वाटिकन महासभा में भाग लिया था तथा महासभा के सुझावों को पोर्तो रिको में लागू कर स्थानीय कलीसिया के नवीकरण में अनुपम योगदान दिया था।
दिवंगत आत्मा की चिर शांति हेतु प्रभु ईश्वर से प्रार्थना करते हुए सन्त पापा ने कहा, “कार्डिनल लूईस मारतीनेस ने अपने कार्यों में ईश्वर एवं कलीसिया के प्रति प्रेम का साक्ष्य प्रदान किया तथा सुसमाचर के सन्देश को जन जन में फैलाने के लिये सदैव समर्पित रहे।”

सात अप्रैल को कार्डिनल मूसा दाऊद तथा दस अप्रैल को पोर्तो रिको के एकमात्र कार्डिनल लूईस मारतीनेस के निधन के बाद कलीसिया के कार्डिनलमण्डल में 210 कार्डिनल रह गये हैं जिनमें 87 अस्सी वर्ष की आयु पार कर गये हैं। 123 कार्डिनल अस्सी वर्ष की आयु से कम हैं तथा भावी सन्त पापा के चुनाव में मतदान के योग्य हैं।

जिनिवाः विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मनोभ्रंश मामलों में वृद्धि

In Church on April 13, 2012 at 11:30 am

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

जिनिवा, 12 अप्रैल सन् 2012 (विभिन्न सूत्र): विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में, डिमेनशिया, मनोभ्रंश अथवा पागलपन की बीमारी से ग्रस्त लोगों की संख्या में नित्य वृद्धि हो रही है।
संगठन के आँकड़ों के अनुसार विश्व भर में लगभग साढ़े तीन करोड़ व्यक्ति डिमेनशिया या पागलपन से ग्रस्त हैं।

यह संख्या 2030 तक दुगुनी तथा सन् 2050 तक तिगुनी होने का अनुमान है। बताया गया कि डिमेनशिया सभी देशों के लोगों को प्रभावित करता है किन्तु 58 प्रतिशत डिमेनशिया ग्रस्त लोग निर्धन देशों में जीवन यापन करते हैं।

डिमेनशिया रोग पर विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा अल्जाइमर रोग इंटरनेशनल द्वारा हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि स्थिति में सुधार लाने के लिये रोग की शीघ्र पहचान हेतु उपयुक्त कार्यक्रम बनाये जायें।

साथ ही इस बीमारी के बारे में जनता में जगरुकता बढ़ाने के प्रयास किये जायें ताकि लोग इसे कलंक मानकर छिपाने का प्रयास न करें अपितु डिमेनशिया ग्रस्त लोगों को आरम्भिक चरणों में ही उपयुक्त चिकित्सा मुहैया कराने का प्रयास करें।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के डॉ. शेखर सक्सेना ने वाटिकन रेडियो से बातचीत में कहा, “हम मानते हैं कि डिमेनशिया या पागलपन के लिए अब तक कोई इलाज नहीं है, लेकिन प्रबन्धन, चिकित्सा एवं रोगियों की बेहतर देखभाल कर इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है।”

डिमेनशिया वह बीमारी है जिसमें मस्तिष्क की कमज़ोरी के कारण आम तौर पर याददाश्त के साथ साथ व्यक्ति की सोच, उसका व्यवहार तथा रोज़मर्रा की गतिविधियों के सम्पादन की क्षमता प्रभावित होती है।

भूबनेश्वरः इताली नागरिक पाउलो बोसुस्को रिहा

In Church on April 13, 2012 at 11:30 am

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

भुबनेश्वर, 12 अप्रैल सन् 2012 (रायटर): भारतीय मीडियाई सूत्रों ने गुरुवार को प्रकाशित किया कि माओवादियों द्वारा बन्धक बनाये गये इताली नागरिक पाउलो बोसुस्को रिहा कर दिये गये हैं।

माओवादियों ने 14 मार्च को कंधमाल जिले से दो इताली नागरिकों का अपहरण कर लिया था।

इनमें से क्लाउडियो कोलोंजेलो पहले ही रिहा कर दिये गये थे किन्तु पाउलो बोसुस्को माओवादियों की गिरफ्त में थे।

माओवादियों ने पाओलो को रिहा करने के लिये शर्त रखी थी कि सरकार गिरफ्तार माओवादियों में से कुछ को रिहा करे। इनमें माओवादी गुरिल्ला दल के सचिव साब्यसाँची पांडा की पत्नी सुभाश्री भी शामिल थीं जिन्हें 10 अप्रैल को एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सबूतों के अभाव में रिहा कर दिया था।

माओवादी पांडा ने बोसुस्को को रिहा करने के लिये अपनी पत्नी सहित सात अन्य लोगों को रिहा करने की मांग की थी।

माओवादी गुरिल्लाओं द्वारा बंधक बनाए गए बीजेडी विधायक झिना हिकाका अभी भी माओवादियों के कब्जे में हैं।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय तथा वाटिकन की लाइब्रेरी अब ऑन लाईन

In Church on April 13, 2012 at 11:29 am

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

वाटिकन सिटी, 12 अप्रैल सन् 2012 (सेदोक): ऑक्सफ्रोर्ड विश्वविद्यालय की लाइब्रेरीयाँ तथा वाटिकन की लाइब्रेरी की सामग्री अब पाठकों को ऑन लाईन उपलब्ध हो सकेगी।

विश्वविद्यालय के बोडलायन ग्रन्थागारों तथा वाटिकन के प्रेरितिक ग्रन्थागार ने घोषणा की है कि वे 15 लाख प्राचीन मूलपाठों को डिजिटाईज़ कर, निशुल्क, इनटरनेट पर उपलभ्य बनायेंगे।

ग्रन्थागारों द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार तीन विषयों पर मूलपाठ ऑनलाईन उपलब्ध हो सकेंगेः ग्रीक हस्तलिपियाँ, 15 वीं शताब्दी में मुद्रित किताबें तथा इब्रानी भाषा में प्रकाशित पुस्तकें।

विज्ञप्ति में कहा गया कि इन ग्रन्थों के सघन संग्रह तथा इनमें व्याप्त विद्वता के महत्व को ध्यान में रखकर इनका चयन किया गया है।

वाटिकन लाइब्रेरी के परमधर्मपीठीय पुस्त-पाल, कार्डिनल राफायल फरीना ने कहा, “अपने सांस्कृतिक कोष को सुरक्षित रखकर तथा उसे लोगों के लिये उपलभ्य बनाकर वाटिकन लाईब्रेरी ने, विगत छः शताब्दियों के अन्तराल में, मानव जाति को जो सेवा प्रदान की है उसके लिये अब एक नया द्वार खुला है।”

उन्होंने कहा कि मीडिया के नये उपकरणों का प्रयोग वाटिकन लाइब्रेरी के विश्वव्यापी एवं सार्वभौमिक मिशन को विस्तृत एवं परिपुष्ट करता है।

रोमन पोलान्स्की न्यास द्वारा अर्पित तीस लाख यूरो के अनुदान से यह पहल सम्भव हो सकी है।

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