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पास्का का तीसरा रविवार

In Church on April 17, 2012 at 6:35 pm

22 अप्रैल, 2012
प्रेरित चरित 3, 13-15, 17-19
संत योहन का पहला पत्र 2, 1-5
संत लूकस 24, 35-48

जस्टिन तिर्की, ये.स.

दो कैदियों की कहानी
आज आप लोगों को दो व्यक्तियों के बारे में बताता हूँ जो एक जेल में बंद थे। जेल का कमरा छोटा-सा था। दोनों को उनके अपराध के लिये 20 साल की जेल की सजा मिली थी। जेल में कुछ दिनों के बाद उनका जीवन बिल्कुल नीरस हो गया था। जेल का रूटिन रोज दिन ही एक समान ही हुआ करता था। रोज उठना, काम करना, नास्ता करना, कुछ व्यायाम करना और खाना पीना और सो जाना। दोनों की आपस की बातें भी प्रायः समाप्त-सी हो गयी थी। जीवन में कोई नयापन नहीं था। रात होने पर दोनों कैदी बाहर की ओर झाँका करते थे। दिन को जेल के बाहर शहर की गलियों में लोगों की भीड़ और रात बिजली का प्रकाश। कई बार दोनों दोस्त खिड़की से बाहर की ओर झाँकते थे, अपने बीते जीवन की याद किया करते और उन बातों को एक-दूसरे का बताते थे। एक शाम की बात है दोनों दोस्त खिड़की के पास बैठे बाहर झाँक रहे थे। पुर्णिमा की रात थी। दोनों दोस्त बैठे-बैठे कुछ विचार कर रहे थे। पहले ने कहा कि देखो मित्र पुर्णिमा की इस रात्रि में इस शहर की गंदगी कितनी स्पष्ट दिखाई दे रही है । चारों ओर गंदगी-ही-गंदगी। न केवल हमारा जीवन बुरा है बल्कि यहाँ रहने वाले हर व्यक्ति का ही जीवन नारकीय है। पर दूसरे ने कहा मुझे तो इस चाँदनी रात में इतना अच्छा लग रहा है कि मानों में जेल से ही बाहर हो गया हूँ। मैं तो सोच रहा हूँ कि आखिर 20 साल बीत जायेंगे और फिर मैं एक नया जीवन शुरु करूँगा। मैं जब भी चंद्रमा को देखता हूँ तो मुझे एक नयी आशा मिलती है एक नयी उर्जा मिलती है और मुझे लगता है कि एक नयी सुबह आने वाली है। Read the rest of this entry »

‘नैशनल हीरो’ और समर्पित काथलिक का निधन

In Church on April 17, 2012 at 6:32 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

लाहौर,16 अप्रैल, 2012 (अजेन्शिया फिदेस) ईशनिन्दा कानून के कट्टर विरोधी मानवाधिकार कार्यकर्ता और एक समर्पित काथलिक पाकिस्तान के ‘नैशनल हीरो’ सेसिल चौधरी निधन शनिवार, 14 अप्रैल को हो गया। वे 72 साल के थे। वे कैंसर की बीमारी से पीड़ित थे।

मानवाधिकार और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देनवाले चौधरी पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के पूर्व मंत्री ‘शहीद’ शाहबाज़ भट्टी के शिक्षक चौधरी के निधन से पाकिस्तान के ईसाइयों ने एक जुझारु और सक्रिय काथलिक को खो दिया है।

‘एजेन्शिया फीदेस’ के अनुसार लाहौर के अपोस्तोलिक अडमिनिस्ट्रेटर मोन्सिन्योर सेबास्ति शो, पाकिस्तान धर्माध्यक्षीय समिति के अध्यक्ष कराची के महाधर्माध्यक्ष मोन्सिन्योर जोसेफ कूट्स, न्याय एवं शांति के लिये बनी आयोग के निदेशक फादर यूसफ एम्मानुएल और राष्ट्रीय सद्भावना केन्द्रीय मंत्री पौल भट्टी मुत्यु के पूर्व उनसे मिलने गय थे।

चौधरी ने भारत और पाकिस्तान के दो युद्धों सन् 1965 और 1971 ईस्वी में पाकिस्तान वायुसेना के पायलट रूप में देश की सेवा की और अपनी बहादूरी का परिचय दिया।

अपनी वीरता के लिये उन्हें कई बार पुरस्कृत भी किया गया। सेना में वीरता दिखलाने बाद उन्होंने शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिये। उन्हें लाहौर स्थित संत अंतोनी कॉलेज का प्रथम डीन भी बनने का श्रेय प्राप्त है।

पाकिस्तान के लोग उन्हें एक निदेशक, शिक्षक और मैनेजर के रूप में तो सराहते रहे विश्वास, संस्कृति और उनके खुले विचारों के लिये भी उनका सम्मान करते थे।

चौधरी ने खुलकर ईशनिन्दा कानून का विरोध किया था। न्याय और शांति के बनी समिति के अध्यक्ष फादर योसफ एम्मानुएल ने कहा कि चौधरी देश के लिये एक महान् व्यक्ति और कलीसिया के लिये आदर्श थे।

कराची के महाधर्माध्यक्ष जोसेफ कूट्स ने चौधरी की मृत्यु पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, “सेसिल चौधरी की मृत्यु देश के लिये एक अपूर्णीय क्षति है। पूरा राष्ट्र उनका सम्मान करता था और देश और कलीसिया के प्रति उनकी निष्ठा अनुकरणीय है।”

परोपकारी क्रियाकलापों पर संशय भरी निगाह

In Church on April 17, 2012 at 6:30 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

नई दिल्ली, 16 अप्रैल, 2012 (कैथन्यूज़) परहितमय कार्यों के लिये बनी परमधर्मपीठीय समिति ‘कोर ऊनुम’ के अध्यक्ष कार्डिनल रोबर्ट साराह ने भारत में मिशनरी कार्यों पर ‘धर्मपरिवर्तन’ का आरोप लगाये जाने पर चिन्ता व्यक्त की है।

शुक्रवार 13 अप्रैल को अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि भारत के कुछ क्षेत्र “अति संवेदनशील” हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय धर्माध्यक्षों की शिकायत है कि देश में किसी भी मिशनरी क्रियाकलाप को धर्मपरिवर्तन की नज़र से देखा जाता है जिससे खुलकर कार्य करना कठिन हो जाता है।

धर्माध्यक्षों ने बतलाया कि कुछ राज्यों ने धर्मपरिवर्तन निषेध कानुन भी पास करा लिये हैं जिससे कोई भी ऐसा मिशनरी कार्य ऐसा नहीं रह गया है जिसे वे संदेह की दृष्टि से न देखते हों।

कार्डिनल साराह ने कहा कि उन्हें इस बात पर आश्चर्य है कि कैसे धन्य मदर तेरेसा ने इनके बावजूद भी अपना कार्य पूरा किया ?

‘कारितास इंटरनैशनालिस’ के महासचिव मिखाएल रोय ने कहा कि भारत में विभिन्न स्तर के सत्ताधारी लोग ईसाई मूल्यों को स्वीकार नहीं पाते हैं।

उन्होंने कहा, “जाति प्रथा में लिप्त भारतीय समाज को ख्रीस्तीय परोपकारी कार्य बराबरी का दर्ज़ा देते हैं विशेष करके स्थानीय स्तर पर और जब निम्न वर्ग को लोग जागने लगते हैं तो इसे स्वीकारा नहीं जाता है।”
उन्होंने बतलाया कि उत्तरी-पूर्वी भारत की सामाजिक स्थिति भिन्न होने के कारण काथलिक कलीसिया का विस्तार संभव हो पाया।

विदित हो कि कार्डिनल साराह और कारितातिस इंटरनैशनालिस के महासचिव मिखाएल रोय ने ‘कोर ऊनुम’ द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक के विमोचन के पूर्व संयुक्त रूप से एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया।

संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कार्डिनल साराह ने कहा कि उनकी इच्छा है कि उनका संगठन परोपकारीकार्य करने वाले काथलिक के लिये एक कार्यशाला का आयोजन करे ताकि यह उनकी पहचान और आध्यात्मिकता को नयी उर्जा प्रदान करे।

विदित हो ‘कोर ऊनुम’ ने हाल के वर्षों में एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीकी देशों के लिये कई सेमिनारों का सफल आयोजन किया है

‘स्वर्ग की रानी आनन्द मना’ प्रार्थना से पूर्व सन्त पापा का सन्देश

In Church on April 17, 2012 at 6:29 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफर

वाटिकन सिटी, 16 अप्रैल सन् 2012 (सेदोक): वाटिकन स्थित सन्त पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में, देश विदेश से एकत्र तीर्थयात्रियों को, रविवार 15 अप्रैल को, सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने इस प्रकार सम्बोधित कियाः

“अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, प्रति वर्ष पास्का मनाते समय हम येसु के आरम्भिक शिष्यों का अनुभव पाते हैं, पुनर्जीवित प्रभु के साक्षात्कार का अनुभवः सन्त योहन रचित सुसमाचार बताते हैं कि उन्होंने, पुनःरुत्थान की सन्ध्या, अन्तिम भोजन कक्ष में उनके दर्शन किये, सप्ताह के प्रथम दिन, और फिर “आठ दिन बाद” (दे. योहन 20,19:26)। वह दिन जो बाद में “प्रभु का दिन” कहा गया, सहमिलन का दिन है, ख्रीस्तीय समुदाय के सहमिलन का दिन जो भक्तिभाव के साथ “यूखारिस्त” में सबको एकता के सूत्र में बाँधता है, इसी दिन से नई तथा प्राचीन व्यवस्थान के विश्राम दिवस से अलग भक्ति आरम्भ हो जाती है।

वास्तव में, प्रभु के दिन का समारोह ख्रीस्त के पुनःरुत्थान का एक शक्तिशाली प्रमाण है क्योंकि केवल एक असाधारण एवं अद्वितीय घटना ही आरम्भिक ख्रीस्तीयों को यहूदियों के विश्राम दिवस की आराधना-अर्चना से भिन्न भक्ति के लिये प्रेरित कर सकती थी।

सन्त पापा ने कहाः “अस्तु, प्रचलित ख्रीस्तीयों के धर्मविधिक समारोह अतीत की घटनाओं की स्मृति में मनाये जानेवाले समारोह ही नहीं हैं, ये कोई रहस्यात्मक या आन्तरिक अनुभव मात्र नहीं हैं अपितु तत्त्वतः, पुनर्जीवित प्रभु ख्रीस्त के साथ साक्षात्कार है, जिसका ईश्वरीय पहलू समय एवं इतिहास के अन्तराल के परे है, क्योंकि, प्रभु, समुदाय के बीच सचमुच में उपस्थित रहते, धर्मग्रन्थ के माध्यम से हमसे बातचीत करते तथा हमारे लिये अनन्त जीवन की रोटी को तोड़ते हैं। इन चिन्हों के द्वारा हम आरम्भिक शिष्यों के अनुभव का एहसास पाते हैं अर्थात् येसु को देखते हुए भी हम उन्हें पहचान नहीं पाते हैं; उनके शरीर का स्पर्श करते, धरती के बन्धन से मुक्त, यथार्थ शरीर का।”

उन्होंने कहा, “सन्त योहन रचित सुसमाचार जो हमें बताते हैं वह एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है और वह यह कि अन्तिम भोजन कक्ष में अपने दो दर्शनों के अवसर पर प्रभु येसु ने कई बार वही वाक्य दुहरायाः “तुम्हें शांति मिले” (दे.योहन 20,19: 21.26)। शालोम यानि शांति की मंगलकामना करनेवाले पारम्परिक प्रणाम ने, अब एक नया अर्थ ले लिया थाः वह अब शांति का वह वरदान बन गया था जो केवल ख्रीस्त दे सकते हैं क्योंकि वह, बुराई पर, उनकी विजय का फल है।

जो “शांति” प्रभु येसु अपने मित्रों को अर्पित करते हैं वह ईश प्रेम का फल है जिसके कारण येसु ने क्रूस पर अपने प्राणों की आहुति दे दी थी, जिसके कारण “कृपा एवं सत्य से परिपूर्ण” प्रभु ने विनम्र और दीन मेमने के सदृश अपना रक्त बहा दिया था (योहन 1,14)। यही कारण है कि धन्य सन्त पापा जॉन पौल द्वितीय ने पास्का रविवार के बाद आनेवाले रविवार को ईश्वरीय करुणा को समर्पित रखना चाहा, उस प्रतिमा के साथ, जिसमें हम, प्रेरित योहन के साक्ष्य के अनुसार, प्रभु की बगल से रक्त और पानी को बहता देखते हैं (दे. योहन 19,34-37)। परन्तु अब तक येसु जी उठ चुके हैं, और उन जीवित प्रभु से बपतिस्मा एवं यूखारिस्तीय पास्काई संस्कार प्रस्फुटित होते हैं: जो भी विश्वासपूर्वक उन्हें पुकारता है वह अनन्त जीवन प्राप्त करता है।

अन्त में सन्त पापा ने कहा, “प्रिय भाइयो एवं बहनो, पुनर्जीवित प्रभु येसु द्वारा अर्पित शांति के वरदान को हम ग्रहण करें, उनकी करुणा से हम अपने हृदयों को भरने दें।

इस प्रकार, ख्रीस्त को मृतकों में से जिलाने वाले पवित्रआत्मा की शक्ति से हम भी पास्काई वरदानों को अन्यों तक ले जा सकें। पवित्रतम कुँवारी मरियम की मध्यस्तथा से हम अपने इस कार्य में सफल होवें।”

इतना कहकर सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने सबके प्रति मंगलकामनाएँ अर्पित कीं तथा सभी पर ईश्वर की कृपा एवं शांति का आह्वान कर, सबको अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।

तदोपरान्त सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने देश विदेश से आये तीर्थयात्रियों को विभिन्न भाषाओं में सम्बोधित किया, अँग्रेज़ी भाषा में उन्होंने कहा, “आज के सुसमाचार में, येसु शिष्यों को दिखाई देते हैं तथा थॉमस की शंकाओं को दूर करते हैं। उनकी दैवीय करुणा द्वारा, हम सदैव विश्वास करें कि येसु ही ख्रीस्त हैं, तथा विश्वास करने के कारण हम उनके नाम में जीवन प्राप्त करें। प्रभु

ईश्वर की विपुल आशीष आप सबपर बनी रहे।”

संत पापा के लिये ‘द मिस्टरी ऑफ द स्मॉल पोन्ड’

In Church on April 17, 2012 at 6:28 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

वाटिकन सिटी, 16 अपैल, 2012 (सीएनए) 21वीं सदी के मिखाएल अंजेलो रूप में विख्यात नतालिया सरकोवा ने संत पापा के 85वें जन्म दिवस के अवसर पर बच्चों को समर्पित एक किताब भेंट की है जिसमें उन्होंने संत पापा को एक आदर्श ख्रीस्तीय रूप में दिखलाया है।

‘द मिस्टरी ऑफ ए स्मॉल पॉन्ड’ नामक इस किताब की एक प्रति नतालिया ने संत पापा को उस समय भेंट की जब कास्तेल गंदोल्फो के ग्रीष्मकालीन प्रासाद में उन्होंने पोप से व्यक्तिगत मुलाक़ात की।

इस किताब में दो मुख्य पात्र हैं संत पापा और लाल रंग की एक मछली। काथलिक न्यूज़ एजेंसी (सीएनए) को दिये एक साक्षात्कार में सरकोवा ने कहा कि उन्हें इस किताब की प्रेरणा उस समय प्राप्त हुई जब वे कास्तेल गंदोल्फो की बाग में टहल रहीं थीं।

उन्होंने बतलाया कि उनके दिल में एक अन्तर्प्रेरणा हुई कि वह संत पापा के 85वें जन्मदिन के लिये एक किताब भेंट करे।

ज्ञात हो कि रूस में जन्मी सरकोवा ‘मॉस्को अकाडिमी ऑफ आर्टस’ की वे एक बहुत ही सफल छात्रा रही हैं और उन्होंने कई विख्यात लोगों की तस्वीरें बनायी हैं।

रूसी ऑर्थोडॉक्स ईसाई सरकोवा का जीवन उस समय बदल गया जब सन् 2000 ईस्वी में उन्होंने संत पापा जोन पौल द्वितीय के 80वें जन्मदिवस के अवसर पर उनकी एक तस्वीर बनायी।

अपनी किताब के बारे में बोलते हुए उन्होंन कहा कि ‘द मिस्टरी ऑफ ए स्माल पॉन्ड’ को लिखने में उन्हें दो वर्ष लगे। इसमें उन्होंने संत पापा बेनेदिक्त को एक प्रकृति प्रेमी रूप में दिखलाया है।

कहानी में एक लाल मछली कास्तेल गंदोल्फो के एक तालाब में तैरती है और वह संत पापा को पसंद करने लगती है जो रोज़दिन तालाब के निकट आते हैं और प्रार्थना करते हैं। किताब में कई सुन्दर तस्वीरें हैं और इसकी छपाई मध्यकालीन सुलेख शैली में की गयी है।

वाटिकन प्रकाशक ‘लिबेरिया एडित्रिचे वाटिकाना’ ने इस किताब का अनुवाद स्पानी, अंग्रेजी, जर्मन, रूसी और इतालवी भाषा में भी प्रकाशित करने की योजना बनायी है।

सराकोवा ने बतलाया कि किताब बहुत ही विशिष्ट है क्योंकि यह प्रेम और विश्वास का प्रचार करती है और बच्चों के ह्रदयों को छूने में सक्षम है।

संत पापा को जन्म दिन की बधाइयाँ

In Church on April 17, 2012 at 6:27 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

वाटिकन सिटी. 16 अप्रैल, 2012(न्यूजवा) संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें के जन्म दिवस के अवसर विश्व के अनेक नेताओं सहित पूजन विधि और संस्कारों के शिक्षा के लिये बनी परमधर्मपीठीय समिति के पूर्वाध्यक्ष कार्डिनल अरिंजे ने बधाई एवं शुभकामनायें दीं है।

कार्डिलन फ्रांसिस अरिंजे ने कहा, “हम संत पापा को उनके जन्मपर्व की शुभककामनायें देते हैं; ईश्वर उन्हें सुस्वास्थ्य और शांति प्रदान करे और वह विश्वास दे जिसके लिये उन्होंने अपने जीवन का बलिदान कर दिया।”

उन्होंने कहा, “हम संत पापा के लिये यह प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर उन्हें इस बात आभास दे सभी धर्मसमाजी, धर्मबहनें और पूरी कलीसिया के लिये उनके साथ जुड़ी हुई है।

संत पापा हुए 85 साल के

In Church on April 17, 2012 at 6:25 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

वाटिकन सिटी, 16 अप्रैल, 2012 (एपी) संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें ने अपने 85वें जन्मदिन के अवसर पर लोगों से अपील की वे प्रार्थना करें ताकि ईश्वर उन्हें कलीसिया द्वारा सौंपे गये दायित्व को पूरा करने की शक्ति प्रदान करें।

संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें रविवार को संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में एकत्रित हज़ारों तीर्थयात्रियों और विश्वासी भक्तों को संबोधित कर रहे थे।

विदित हो कि 16 अप्रैल सोमवार को संत पापा 85 वर्ष के हो गये और अगले गुरुवार 19 अप्रैल को उनके पोप काल का सातवाँ साल पूरा हो जायेगा।

ग़ौरतलब है कि अपने उम्र के हिसाब से संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें का स्वास्थ्य सराहनीय है। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से अभी तक अपने पूर्वनिर्धारित कोई भी कार्य को स्थगित नहीं किया है।

हाल में मेक्सिको और क्यूबा की 6 दिवसीय यात्रा के समय उन्होंने पहली बार चलने के लिये एक बेंत का सहारा लिया। यद्यपि मेक्सिको की लम्बी यात्रा और पवित्र सप्ताह की धर्मविधि पूरा करते हुए वे थके नज़र आये पर उनका स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है।

संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें अब धन्य संत पापा जोन पौल से उम्र में बड़े हो गये हैं। 2 अप्रैल सन् 2005 ईस्वी को धन्य जोन पौल द्वितीय की जिस आयु में उनकी मृत्यु हुई उस उम्र को संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें ने पार कर लिया है।
ध्यान रहे 300 साल के इतिहास में सिर्फ 6 संत पापाओं ने 85 साल से अधिक आयु तक संत पापा रूप में कार्य किया है।

उनमें संत पापा इन्नोसेंट और संत पापा पीयुस नवें 85 वर्ष, क्लेमेंट दसवें 86, संत पापा क्लेमेंट सातवें 87 और संत पापा लेओ अष्टम् ने 93 वर्षों तक पोप रूप में अपनी सेवायें दीं।

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