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‘तरुमित्र’ ने पेड़ काटने का विरोध किया

In Church on April 23, 2012 at 5:50 pm

जस्टिन तिर्की,ये.स.
पटना, 23 अप्रैल, 2012 (कैथन्यूज़) पेड़ों की रक्षा के लिये संस्थापित ‘तरुमित्र’ संगठन के करीब 200 विद्यार्थियों ने सरकार के उस निर्णय का विरोध किया है जिसमें सरकार ने पटना के एक पार्क के 2,000 पेड़ों को काटने का निर्णय किया ताकि हवाई जहाजों को ज़मीन पर उतरने में कोई बाधा न हो।

जेस्विट फादर रोबर्ट अथिक्कल के नेतृत्व में विद्यार्थियो ने मुख्यमंत्री नितीश कुमार से माँग की है कि वे इस पर कारवाई करें।

विद्यार्थियों ने पटना के बेली रोड में अवस्थित माउँट कार्मेल स्कूल के समक्ष शुक्रवार को अपना विरोध प्रकट किया।

विदित हो कि इस समय विशाखापट्टनम से कुछ विद्यार्थी दीघा में अवस्थित ‘तरुमित्र बायो रिजर्व’ को देखने आये हुए हैं।

स्मृति नामक एक छात्रा ने पेड़ों की संभवित कटाई पर खेद व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें इस बात पर दुःख होता है कि वृक्ष ही विकास के मार्ग में होने वाले बलिदान के प्रथम शिकार बनते हैँ।

उन्होंने कहा कि पटना के हज़ारों लोगों के लिये वृक्ष शुद्ध वायु प्रदान करते हैं उन्हें काट दिया जाना अन्याय है।

विदित हो कि गाँधी मैदान के ऊपर से उड़ने वाले हवाईजहाजों को पेड़ों की अपेक्षा सचिवालय की ऊँची इमारत से ज़्यादा ख़तरा है।

दिल्ली पब्लिक स्कूल के यूएन राजदूत वन्दरंगी सुदीक्षा ने आशा व्यक्त की है कि मुख्यमंत्री इस पर उचित निर्णय लेंगे जो जनहितकारी हो।

मीडिया सूत्रों ने ‘तरुमित्र’ के संयोजक फादर रोबर्ट को बतलाया कि विमान अधिकारियों ने पेड़ों की कटाई के बदले इसकी छटाई का मन बनाया है।

विरोधियों से रूस की कलीसिया को बचाने के लिये रैली

In Church on April 23, 2012 at 5:50 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.
मॉस्को, (एशियान्यूज़) कलीसिया के विश्वास को विरोधियों से बचाने के लिये हज़ारों लोगों ने मॉस्कों के पैट्रियार्क के आह्वान पर एक-दिवसीय रैली में भाग लिया।
एशियान्यूज़ के अनुसार करीब 40 हज़ार लोगों ने मॉस्को के कथीड्रल में आयोजित प्रार्थना सभा में हिस्सा लिया।
इस अवसर पर ‘पुस्सी रायट ग्रूप’ ने अपनी ‘पंक प्रार्थना’ की जिसमें उन्होंने पैट्रियार्क किरिल्ल और नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ब्लाडिमीर पुतिन के घनिष्ट संबंध की आलोचना की। दल की तीन लड़कियों को ‘उपद्रवबाज़ी’ के आरोप में गिरफ़्तार भी कर लिया गया था।
इस प्रकार की घटना से राजनीति में चर्च की भूमिका पर आम लोगों में बहस छिड़ गयी है। रूसी ऑर्थोडॉक्स कलीसिया के अध्यक्ष किरिल्ल ने कहा, “हम पर रूसी विरोधी ताकतों का आक्रमण हुआ है।”
कई लोगों का मानना है कि ‘पंक प्रार्थना’ और कुछ दूसरा नहीं वरन् ऑर्थोडॉक्स कलीसिया के विरुद्ध ‘गुन्डागर्दी की एक श्रृंखला’ थी।

नैतिक एवं ज़िम्मेदारीपूर्ण पर्यटन संस्कृति का प्रचार हो

In Church on April 23, 2012 at 5:49 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.
वाटिकन सिटी, 23 अप्रैल, 2012 (सेदोक, वीआर) पर्यटन संबंधी मेषपालीय देख-रेख के लिये मेक्सिको के कैनचुन में आयोजित सातवें विश्व काँग्रेस के लिये अपने संदेश देते हुए संत पापा ने कहा, “अन्य मानवीय यथार्थो की तरह ही पर्यटन को भी ईशवचन के आलोक में देखा जाना और इसके द्वारा परिवर्तित किया जाना चाहिये।”
उन्होंने कहा “पर्यटन निश्चय ही आज के युग की महत्वपूर्ण सच्चाई है जिसने एक ओर समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है और भविष्य में भी इसके विकास की प्रबल संभावना है।”
“कलीसिया एक ओर चाहती है कि इसके मूल्यों को बढ़ावा दे और दूसरी ओर इससे उत्पन्न होने वाले खतरों और भटकावों के प्रति लोगों को आगाह करे।
संत पापा ने कहा, “पर्यटन अवकाश का समय होने के साथ शारीरिक और आध्यात्मिक नवीनीकरण का एक ऐसा सुवासर है जब विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोग प्रकृति और एक दूसरे के निकट आते हैं। यह अवसर विभिन्नता के बीच एक-दूसरे के बारे में जानने, एक साथ चिन्तन करने, शांति और सहिष्णुणता तथा वार्ता और सद्भावना का पाठ सीखने का अवसर प्रदान करता है।”
पर्यटन के नाम पर दूसरी जगह जाना हमें इस बात की याद दिलाता है कि हम यात्री है जो ईश्वर की खोज कर रहे हैं। यह हमें आमंत्रित करता है कि हम यात्रा करते हुए एक दिन ईश्वर को पायें। यात्रा हमें इस बात के लिये भी आमंत्रित करता है कि हम प्रकृति की सुन्दरता की सराहना करते हुए प्रकृति के सृष्टिकर्त्ता को पहचाने।
पर्यटन की अच्छाइयों के साथ हम इस बात को नहीं भूल सकते हैं कि यौन पर्यटन के कारण ग़रीब, नबालिग और विकलांग इसके शिकार न हो जायें।
संत पापा ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे इस बात पर निगरानी रखें पर्यटन के नाम पर होने वाले यौन दुराचार, अंग व्यापार, बच्चों एवं युवतियों का शोषण न हो और ऐसे पतन से समाज को बचायें।
संत पापा ने कहा, कि वे चाहते हैं कि कलीसिया पर्यटकों का देखभाल करे और कलीसिया के सामाजिक शिक्षा के आधार पर नैतिक और ज़िम्मेदारीपूर्ण पर्यटन संस्कृति का प्रचार करे।

ईशवचन लेखन तक ही सीमित नहीं

In Church on April 23, 2012 at 5:48 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

वाटिकन सिटी, 23 अप्रैल, 2012 (वीईएस) संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें ने कहा, ” पवित्र धर्मग्रंथ की जो व्याख्या प्रेरणा का नज़रअंदाज़ करती या इसे भूल जाती है वह इसके प्रथम और विशेष अर्थ को ही भूल जाती है क्योंकि यह ईश्वर से आती है।”

संत पापा ने उक्त बातें उस समय कहीं जब उन्होंने पोन्तिफिकल बिबलीकल कमीशन की वार्षिक अधिवेशन की समाप्ति पर अपने संदेश भेजे। सभा की विषयवस्तु थी, “बाइबल में प्रेरणा और सत्य।”

परमधर्मपीठीय बाइबल आयोग की वार्षिक सभा के लिये संत पापा ने विश्वास और सिद्धांतों के लिये बनी परमधर्मपीठीय समिति के प्रीफेक्ट कार्डिनल विलयम जोसेफ लेवादा को अपने संदेश भेजे थे।

संत पापा ने कहा, “धर्मग्रंथ की सही व्याख्या के लिये इस वर्ष की विषयवस्तु महत्वपूर्ण है। यह प्रेरणा ही है, जो ईश्वर की ओर से आती और इस बात को सुनिश्चित करती है कि मानव द्वारा उच्चरित शब्द ईश्वर के शब्द बनें।”

संत पापा ने कहा, “आज हम प्रेरणा की विशेषताओं के लिये ईश्वर को धन्यवाद दें। वैसे पवित्र धर्मग्रंथ बाइबल हमें सीधे रूप से प्रभावित करते हैं फिर भी ईशवचन लिखी हुई बातों तक ही सीमित नहीं हैं क्योंकि जैसा हम जानते हैं कि यद्यपि प्रकाशना अंतिम प्रेरित की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गयी पर ईश्वर के जीवित वचन की घोषणा जारी है और इसे कलीसिया की जीवित परंपरा द्वारा व्याख्या किये जाने की आवश्यकता है।”

उन्होंने कहा, “इसलिये ऐसा नहीं है कि ईशवचन पवित्र धर्मग्रंथ के शब्दों में बँध गयी है और कलीसिया के दिल में एक निष्क्रय बात बन कर रह गयी है पर यह तो कलीसिया के विश्वास और उसकी जीवित शक्ति का सर्वोच्च नियम है। काथलिक कलीसिया की परंपरा ने इस बात को स्पष्ट कर दिखाया है कि ईशवचन प्रेरितों द्वारा पवित्र आत्मा की मदद से लोगों तक पहुँचती है, चिन्तन एवं अध्ययन और व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभवों तथा आचार्यों के प्रवचन द्वारा इसका विकास होता है।”

संत पापा ने कहा, “इसीलिये यह ज़रूरी है कि प्रेरणा और सत्य विषय पर और गहन चिन्तन तथा अध्ययन किया जाये क्योंकि कलीसिया के मिशन के लिये यह अति महत्वपूर्ण है।”

इस अवसर पर संत पापा ने परमधर्मपीठीय बाइबल आयोग की सराहना की और आशा व्यक्त की कि आयोग ईशवचन के ज्ञान और अध्ययन को बढ़ावा देगी ताकि लोग ईशवचन को स्वीकार कर सकें।

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