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ग्वादालूपे के महागिरजाघर में संत पापा का प्रवचन

In Church on February 14, 2016 at 3:41 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 13 फरवरी 2016 (सेदोक) संत पापा फ्राँसिस ने मेक्सिको की अपनी प्रेरितिक यात्रा के दौरान ग्वादालूपे की माता मरियम के महागिरजाघर में मिस्सा बलिदान अर्पित करते हुए अपने प्रवचन में कहा,

हमने अभी-अभी सुना कि कैसे माता मरियम अपनी कुटुम्बिनी एलीजबेद से मिलने हेतु जाती है। वह शीघ्रतापूर्वक अपने रिस्तेदार से मिलने हेतु निकल पड़ती है जो अपने गर्भ के अंतिम महीनों में है।

स्वर्गदूत से माता मरियम की मुलाकात उनको नहीं रोक पाती क्योंकि वह अपने को सौभाग्यवान नहीं मानती या उन्हें चीजों को छोड़ने में हिटकिचाहट नहीं होती जिन से वे घिरी हुई हैं। इसके विपरीत वह नये जोश और उत्साह से भरी है जैसा वह हमेशा से जानी जाती है, वह उन नारियों में है जो “हाँ” कहती है एक “हाँ” जो ईश्वर को समर्पित है, एक “हाँ” जो अपने भाइयो और बहनो हेतु समर्पित है। यह उनका “हाँ” है जो उन्हें त्परता से अपना सर्वोतम दूसरों की सेवा हेतु देने के लिए तैयार करता है।

सुसमाचार के इस अंश को इस स्थान पर सुनना एक विशेष महत्व रखता है। मरिया, एक नारी जो हाँ कहती है अमरीका वासियों की भूमि में संत जोआन डियोगो के रूप में आना चाही, जैसा कि वह यूदा और गलिलिया के रास्तों पर चली उसी तरह वह तपेयाक की राह, अदिवासियों के वस्त्र और उनकी भाषा धारण कर चलती है जिससे वह इस महान देश की सेवा कर सके।

जिस तरह उन्होंने एलिजबेद के गर्भावस्था में उनकी सहायता की, वह इस धन्य मेक्सिको के विकास में सहायता करे। जिस तरह उन्हें अपने को छोटे जुआन में प्रस्तुत किया उसी तरह वह हम सभों में भी अपने को व्यक्त करना जारी रखें विशेषकर जो अयोग्यता का अनुभव करते हैं। (निकान माफूआ,55)। यह विशिष्ट चुनाव, जिसे हम उत्तम चुनाव कह सकते हैं किसी के विरूद्ध नहीं था वरन् सभों के हित में था। छोटा जुआन जिसने अपने को चमड़े का पट्टा, एक पूंछ, एक पार्श्व कहा, जो दूसरों के अत्याचार से दबा था जो दूसरों के लिए अति विश्वास का पात्र रहा, एक शांति दूत बना ।

दिसम्बर 1531 का वह दिन जब पहला चमत्कार हुआ जो इस तीर्थस्थल की सुरक्षा हेतु जीवित यादगारी बन गई। उस सुबह, उस मिलन के दौरान ईश्वर ने अपने सुपुत्र जुआन की आशा के साथ अपने लोगों की आशा को जागृति किया। उस सुबह को ईश्वर ने दबे, दुःख से पीड़ितों, तिरस्कृत या तुच्छ लोगों की आशाओं को जागृत किया, जिन्हें यह अनुभव होता था कि उनके लिए इस धरती पर उचित साथ नहीं है। उस सुबह ईश्वर उनके निकट आये। वे सदैव उन कोमल माता-पिताओं और नाना-ननियों के हृदय के निकट आते जो पीड़ित हैं, जो अपने बच्चों को अपने से दूर, खोते और अपराधी बनते देखा हैं।

उस सुबह जुआन ने अपने जीवन में आशा का अनुभव किया। उन्होंने ईश्वर की करूणा का एहसास किया। वे दुनिया के लिए चुने गये जिससे वे सेवा कर सकें इस तीर्थयात्रा की सुरक्षा और इसका प्रचार कर सकें। बहुत से अवसरों में उन्होंने माता मरियम से कहा कि वे योग्य व्यक्ति नहीं हैं अतः यदि वे अपने कामों को आगे बढ़ने की इच्छा रखती है तो किसी दूसरे का चुनाव करे क्योंकि वह शिक्षित नहीं है और वह उन लोगों के समुदाय से संबंध नहीं रखता जो इसे सच्चाई में परिणत कर सके। मरियम ने उनसे कहा कि वह उनका शांतिदूत बनेगा।

इस तरह मरियम ने इन बातों को उनमें जागृरित किया जो वह नहीं जानता था जैसे, कैसे वह अपने को व्यक्त करे, लोगों में प्यार और न्याय, तीर्थयात्रा के निमार्ण में कोई भी न छूटे, जीवन की तीर्थयात्रा, समुदायों का तीर्थ, समाजों और संस्कृतियों का तीर्थ इत्यादि। हमसब एक दूसरे के लिए आवश्यक हैं विशेषकर वे जिन्हें यह एहसास होता है की वे किसी भी काम को करने के योग्य नहीं हैं, उनके पास जरूरत के रूपये नहीं हैं जिससे वे इन सारी चीजों का निमार्ण कर सकें। ईश्वर का तीर्थ उनके बच्चों का जीवन है, हम जो किसी भी परिस्थिति में हैं विशेषकर युवा जिनका भविष्य अनिश्चित हैं जो असंख्य पीड़ा और खतरे में पड़े हैं और बुजूर्ग जिन्हें पहचान नहीं मिलती जो आँखों से ओझल कर दिये जाते हैं। ईश्वर का तीर्थ हमारे परिवार हैं जिन्हें विकास और समृद्धि हेतु जरूरी चीजों की आवश्कयकता है। ईश्वर के तीर्थ लोगों के चेहरे हैं जिन्हें हमें रोज देखते हैं।

इन तीर्थो की यात्रा करते हुए जुआन डियेगो को जो हुआ हमें में भी हो सकता है। हम अपने दुःख की घड़ी माता मरियम की ओर देखें, हम अपने डर, असहायपन, उदासी में उनसे कहें, “मैं क्या दे सकता हूँ मैं तो अविवेकी हूँ?” हम हमारी माता की ओर उन आँखों से देखें जो हमारी सोच और विचारों को व्यक्त करता, कि बहुत सारी स्थितियाँ हैं जो हमें शक्तिहीन बना देती हैं, जो हमें यह अनुभव करती हैं कि आशा, परिवर्तन और बदलाव की कोई गुंजाईश नहीं है।

उनकी ओर देखते हुए हम नये सिरे से चीजों को सुनेंगे जो वह हमारे लिए पुनः कहती है, “मेरे अति मूल्यवान तुम्हारे हृदय को कौन-सा चीज दुःखी करता है? क्या मैं यहाँ तुम्हारे साथ नहीं हूँ तुम्हारी माता होने का सम्मान किसे मिल सकता है?

माता मरियम हमें यह बतलाती है कि उन्हें हमारी माता होना का सम्मान मिलता है वह हमें आश्वासन देती है कि दुःख में रोने वालों के आँसू व्यर्थ नहीं जाते। ये शांतिमय प्रार्थना सीधे स्वर्ग की ओर जाते हैं जिन्हें मरियम के आँचल में स्थान मिलता है। उनमें और उनके साथ ईश्वर हमारे भाई और मित्र बनते हैं और हमारे साथ चलते हैं। वह हमारे क्रूस को हमारे साथ ढ़ोते जिससे हम दुःखों में न दबे रहें।

क्या मैं तुम्हारी माँ नहीं? क्या मैं यहाँ नहीं हूँ? वे हम से कहती है दुःख और तकलीफ तुम्हें  मुर्छित न करे। आज जब वह हमें नया बनकर भेजती है वह हमारे पास पुनः आती और कहती है, तुम मेरे शांति के दूत बनो, मैं तुम्हें नये तीर्थ बनाने हेतु भेजता हूँ। अन्यों का साथ दो, दूसरों के आँसू पोंछो। तुम अपने पड़ोसियों के साथ चलते हुए, समुदायों और पल्ली के लिए शांति का दूत बनों। हम अपनी खुशी को एक साथ बाँटते हुए तीर्थो का निर्माण कर सकते हैं क्योंकि माता मरियम हमारे साथ चलती हैं। वह हम से कहती है भूखों को खिलाते हुए, प्यासों की प्यास बुझाते, जरूरमंदो की मदद करते, नंगों को कपड़े और बीमारों से मिलते हुए हम उनकी शांति के दूत बने। अपनों पड़ोसियों की सेवा करो, उन्हें क्षमा करो जो तुम्हारी बुराई करते हैं, दुखियों को दिलासा दो, दूसरों के प्रति धैर्यवान बनो और उसके भी बढ़कर प्रार्थना करते हुए ईश्वर की खोज करो।

मरियम पुनः हम से कहती हैं, क्या मैं तुम्हरी माँ नहीं हूँ? क्या मैं यहाँ तूम्हारे साथ नहीं हूँ? तुम जा कर मेरे लिए तीर्थ बनाओं, मेरे बेटे बेटियों के जीवन, अपने भाई- बहनों के जीवन को ऊपर उठाने में मेरी मदद करो।


(Dilip Sanjay Ekka)

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