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ईश्वर का नियम सच्चा है यह आत्मा को जीवन प्रदान करता हैं

In Church on February 16, 2016 at 4:42 pm

मेक्सिको सिटी, मंगलवार, 16 फरवरी 2016 (सेदोक), संत पापा फ्राँसिस ने मेक्सिको की अपनी प्रेरितिक यात्रा के तीसरे दिन नगरपालिका खेल केन्द्र सान ख्रीस्तोबल दे लास कासास में मिस्सा बलिदान के दौरान अपने प्रवचन में कहा,

ईश्वर का नियम सच्चा है यह आत्मा को जीवन प्रदान करता हैं। स्तोत्र लेखक, स्तोत्र की शुरूआत ऐसे करते हैं जिसे हमने अभी-अभी सुना है। वह परिश्रमपूर्वक उन सारी चीजों का वर्णन करते हैं जो ईश्वर ने नियम को सुनते और उनका पालनवालों को प्राप्त होता है। यह आत्मा को जीवन प्रदान करता है, यह साधारण लोगों को विवेक प्रदान करता, यह हृदय में आनन्द लेकर आता है और आँखो को रोशनी प्रदान करता है।

यह वही नियम हैं जिसे इस्रालियों ने मूसा के हाथों से पाया था, एक नियम जो ईश्वर की चुनी हुई प्रजा को स्वत्रंतता में रहने हेतु मदद करता है जिसके लिए वे बुलाये गये थे। एक नियम जो लोगों के जीवन यात्रा में प्रकाश बन कर चमकता और उन्हें आगे ले चलता है। लोग जो फराऊन की गुलामी और तानाशाह, जो इस हद तक दुःख और सतावट के शिकार थे कि ईश्वर को कहा पड़ा, “बस, बहुत हुआ।”  मैंने उनकी पीड़ा देखी है मैंने उनका रोना सुना है, मैं उनके कष्टों को जानता हूँ।” (नि.3.9) यहाँ पिता का चेहरा हमें दिखाई देता हैं जो अपने बच्चों के दुःख, अन्याय और दुर्वव्यावहार को देख दर्द का अनुभव करते हैं। इस तरह उनके शब्द, उनके नियम स्वत्रंतता, खुशी, ज्ञान और ज्योति की निशानी बनते हैं। यह एक अनुभव, एक सच्चाई है जो प्रार्थना के शब्द पोपल बुह में व्यक्त होता है। “सब जातियों के लिए एक नया सबेरा का उदय होता हैं। धरती का चेहरा सूर्य से शीघ्र ही चंगाई को प्राप्त करता है।” (33) सूर्य उन लोगों के लिए उदय होता है जो गुलामी के अति अंधकार समय से इतिहास में चले हैं।

इस अभिव्यक्ति में, मानव, स्वत्रंतता में जीने की चाह को सुनता है, जो उसमें एक तीव्र अभिलाषा उत्पन्न करती है जहाँ सतावट, दुर्वव्यावहार और अपमान वर्तमान परिवेश से दूर प्रतिज्ञात देश में जीने की बात सोचता है। मनुष्य के हृदय में और हम सब की यादों में धरती की एक चाह छप गई क्योंकि एक समय आयेगा जहाँ भ्रष्टचार भात्री भावना के द्वारा, अन्याय समुदायिकता के द्वारा और हिंसा शांति के द्वारा जीती जायेगी।

ईश्वर पिता इस चाहत को न केवल बाँटते हैं बल्कि खुद इसे प्रेरित करते हैं और येसु के द्वारा ऐसा करना जारी रखते हैं। येसु में हम पिता की एकता पाते हैं जो हमारे साथ चलते हैं। येसु में हम देखते हैं कि कैसे सच्चा नियम एक शरीर, मानव का चेहरा को धारण करता है जिससे वह हमारे साथ चल सके और हमें बचा सके। वे हमारे लिए मार्ग सत्य और जीवन बन जाते हैं जिससे उनके बेटे बेटियों के जीवन में अंधकार का वश नहीं लेकिन ज्योति का उदय बना हो।

इस अभिलाषा को कई तरीके से शांत और कम करने का प्रयास किया गया और विभिन्न प्रकार से हमारी आत्मा को असंवेदनशील करने की कोशिश की गई। कई तरह की कोशिशें की गई हैं, हमारे बच्चों को शांत और दबाने, जावनों को हतोत्साहित करने का प्रयत्न किया गया, यह सलाह देते हुए कि कुछ नहीं बदला जा सकता है, उनके स्वप्न कभी साकार नहीं हो सकते हैं। इन प्रयासो में घिरे सृष्टि स्वयं इनके विरोद्ध में एक आवाज उठाती है। “हमारी यह बहन चिल्लाती हैं क्योंकि हमने उसे मिले ईश्वर वरदानों का गैरजिम्मेदारी ढ़ग से उपयोग और दुरूपयोग कर उस पर जुल्म ढहाया है। हमने अपने को उसका मालिक और स्वामी मान मनमाना व्यावहार किया है। हमारे दिल की हिंसा जो पाप के कारण घायल है भूमि, पानी, वायु और जीवन में सभी प्रकार की बीमारियों के रूप में परिलक्षित होती है। पृथ्वी अवशिष्ट चीजों से भरी और परित्यक्त है जो पीड़ा से करहाती (रो. 8.22, लोदातो सी 14) और हमारे प्रतिउत्तर की माँग करती हैं। दुनिया के सबसे बड़े पर्यावरण मुसीबत के सामने हम चुपचाप नहीं रह सकते हैं।

इस संदर्भ में आप हमें बहुत बड़ी शिक्षा देते हैं। आप के लोग, जैसा कि लातीनी अमेरीका के धर्माध्यक्षों ने समझ है प्रकृति से सौहर्दपूर्ण व्यावहार करना जानते हैं जिसे आप आहार के स्रोत, एक सामान्य घर और मानवीय जरूरत की वस्तुओं के वितरण हेतु बेदी के रूप में सम्मान देते हैं।

फिर भी, अनेक अवसरों में आप लोग सुव्यवस्थित और संगठित तौर से नजरअंदाज और नसमझी का शिकार हुए। कुछेक ने आपके गुणों, संस्कृति और परम्पराओं को तुच्छ समझा है। दूसरी ताकत, पैसा और बाजार भाव के नशे में आप की जमीन को दूषित किया गया। यह कितने दुःख की बात है। यह कितना न्याय संगत होता यदि हम अपने अन्तःकरण की जाँच करते हुए क्षमा की याचना करना सीखते। आज की दुनिया जो फेंके जाने की संस्कृति से ग्रसित हैं, दुनिया को आज, आप की जरूरत हैं।

एक संस्कृति का दर्शन, दूसरे संस्कृतियों और उसकी विशेषताओं को अपने में ढ़क लेने की चाह रखता हैं। आज के युवाओं को अपने बुजुर्गों के ज्ञान से जुड़े हुए की जरूरत है।

वर्तमान दुनिया को अपनी सुविधा पर विजय प्राप्त करते हुए कृतज्ञता के गुणों को नये सिरे से सीखने की जरूरत हैं।

हम इस निश्चितता पर आनन्द मानते हैं कि सृजनहार ईश्वर हमें नहीं त्यागता है। वह अपनी प्यारी योजना को नहीं भूलता या न ही हमारी सृष्टि पर पश्चताप करता है। (लौदातो सी.13) हम खुशी मनाते हैं कि येसु सभी चीजों में पुनः मरते और जी उठते हैं जब हम छोटी चीज को अपने छोटे-भाई बहनों के लिए करते हैं। ईश्वर का नियम सच्चा हैं और वह आत्मा को सुख प्रदान करता है आइये हम इन शब्दों को अपने में धारण करें और येसु के दुःखभोग और पुरूत्थान के साक्षी बनें।


(Dilip Sanjay Ekka)

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