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समर्पण का अर्थ वफादारी

In Church on February 20, 2016 at 4:09 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 20 फरवरी 2016 (वीआर सेदोक): वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 20 फरवरी को, करुणा के जयन्ती वर्ष विशेष पर आयोजित साप्ताहिक आमदर्शन समारोह में ‘समर्पण’ विषय पर चिंतन किया।उन्होंने हज़ारों तीर्थयात्रियों को सम्बोधित कर कहा कि करुणा की जयन्ती, ईश्वर के प्रेम और अच्छाई के रहस्य पर चिंतन करने का एक सुनहरा अवसर है। चालीसा के इस समय में कलीसिया हमें निमंत्रण देती है कि हम प्रभु येसु को अधिक से अधिक जानें तथा विश्वास को अपने जीवन में इस तरह जीयें कि उसके द्वारा पिता की करुणा प्रकट हो। अतः यह उन लोगों के लिए एक समर्पण है जो ईश्वर के साक्षात् सामीप्य के चिन्ह को प्रकट करने के लिए बुलाये गये हैं।

संत पापा ने कहा, ″समर्पण क्या है? इसमें संलग्न होने का अर्थ क्या है? जब मैं अपने आपको समर्पित करता हूँ तो इसका अर्थ है कि मैं किसी व्यक्ति के प्रति एक जिम्मेदारी लेता हूँ।″ उन्होंने कहा कि इसका अर्थ निष्ठावान बनना है तथा जो हम काम करते हैं उस पर विशेष ध्यान देना है। प्रार्थना, कामों, अध्ययन तथा खेल एवं अन्य क्रिया कलापों के दैनिक कार्यों को अधिक अच्छी तरह सम्पन्न करने का प्रयास है ताकि हम सद् इच्छा में बढ़ सकें एवं अपने जीवन को उत्तम बना सकें।

संत पापा ने ईश्वर से समर्पण की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि ईश्वर भी हमारे लिए समर्पित हैं। उनका पहला काम था संसार की सृष्टि तथा मानव द्वारा उसे नष्ट करने की कोशिश के बावजूद उसे बनाये रखने के लिए समर्पित। ईश्वर का सबसे बड़ा समर्पण है अपने पुत्र का दान। संत पौलुस कहते हैं कि ईश्वर ने अपने पुत्र को भी नहीं छोड़ा किन्तु सब कुछ हमें प्रदान किया है। संत पापा ने कहा कि इसे साफ जाहिर होता है कि ईश्वर समर्पित हैं। येसु के माध्यम से ईश्वर गरीब, मानव प्रतिष्ठा से वंचित, विदेशी, बीमार, कैदी और पापियों को पूर्ण आशा प्रदान करना चाहते हैं। इन सभी लोगों के लिए येसु ने पिता की करुणा को साक्षात् रूप से प्रकट किया।

संत पापा ने विश्वासियों को समर्पण हेतु प्रोत्साहन देते हुए कहा, ″येसु का ईश्वर के करुणावान प्रेम के प्रति समर्पण से शिक्षा पाकर हम भी अपने समर्पण द्वारा उनके प्रेम का प्रत्युत्तर दें।″ इसके लिए हमें उन लोगों के बीच जाना है जो जरूरतमंद हैं तथा जिन्हें आशा की भूख है। जो लोग गंभीर रूप से बीमार हैं, समाज से बहिष्कृत तथा विकलांग हैं। इन सभी परिस्थितियों में हम समर्पित जीवन द्वारा ईश्वर की करुणा को उनके बीच लेकर जाएँ जो ख्रीस्त में हमारे विश्वास का साक्ष्य है। यह जयन्ती हम प्रत्येक के प्रति ईश्वर के समर्पण को समझने में मदद करे तथा इसके द्वारा हमारे जीवन में बदलाव आये ताकि हम सभी लोगों के प्रति करुणा के लिए समर्पित हो सकें।


(Usha Tirkey)

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