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एक पापी के प्रति ईश्वर का मनोभाव

In Church on March 14, 2016 at 3:42 pm

वाटिकन सिटी, सोमवार 14 मार्च 2016 (वीआर सेदोक): वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 13 मार्च को, संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया, देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

चालीसा के पाँचवें रविवार का सुसमाचार पाठ (यो.8:1-11) अति सुन्दर है, मैं इसे पढ़ना सचमुच पसंद करता हूँ। यह एक व्यभिचारिणी स्त्री की कहानी को प्रस्तुत करता है जिसमें ईश्वर की करुणा को विशिष्टता से दर्शाता गया है कि वे पापी की मृत्यु नहीं बल्कि मन-परिवर्तन एवं जीवन की कामना करते हैं।

संत पापा ने कहा कि यह दृश्य एक मंदिर का है। हम उस दृश्य की कल्पना यहीं संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में कर सकते हैं। सारी जनता येसु के पास इकट्ठी हो गयी थी और वे बैठकर लोगों को शिक्षा दे रहे थे। उस समय शास्त्री और फरीसी व्यभिचार में पकड़ी गयी एक स्त्री को ले आये और उसे बीच में खड़ा कर उन्होंने ईसा से कहा, ″गुरूवर यह स्त्री व्यभिचार में पकड़ी गयी है। संहिता में मूसा ने ऐसी स्त्रियों को पत्थर से मार डालने का आदेश दिया है। आप इसके विषय में क्या कहते हैं?″ स्त्री भीड़ और येसु, हिंसा और ईश्वर की करुणा के बीच खड़ी रही। संत पापा ने कहा, ″वास्तव में वे गुरू की राय लेने नहीं बल्कि उन्हें अपने जाल में फंसाने आये थे।″ यदि येसु संहिता का पालन कड़ाई से करते तो स्त्री पर पत्थरवाह हेतु सहमत होते और अपनी नम्रता और दया के भाव को खो देते जिसके लिए जनता उन पर बड़ी श्रद्धा रखती थी। दूसरी ओर, यदि वे दयालुता दिखाते, तो वे संहिता के उलंघन करने वाले माने जाते, जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था वे नष्ट करना नहीं किन्तु निर्माण करना चाहते हैं। (मती.5:17) और येसु ऐसी विकट परिस्थिति में डाले गये थे।

येसु पर डाले गये सवाल में उन लोगों की बुरी भावना परिलक्षित होती है, ″आप इसके विषय में क्या कहते हैं?″ (पद.5) येसु ने उन्हें कुछ भी उत्तर नहीं दिया किन्तु एक रहस्यात्मक संकेत दिया। वे झुककर कर उँगली से कुछ लिखते रहे।(7) शायद वे कोई चित्र खींच रहे थे, कोई कहता है कि वे फरीसियों के पापों को लिख रहे थे। जो भी हो इसके द्वारा उन्होंने सभी को शांत कर दिया था। उन्हें आवेशित होकर कार्य नहीं करने किन्तु ईश्वर के न्याय की खोज करने हेतु प्रेरित किया था। उन बुरे लोगों ने अपने सवाल का उत्तर पाने हेतु येसु पर दबाव डाला मानो कि वे खून के प्यासे हों। तब येसु ने सिर उठाकर उनसे कहा, ″तुम में जो निष्पाप हो वह इसे सबसे पहले पत्थर मारे। (7) इस उत्तर ने अभियोक्ताओं को वहाँ से हटने के लिए मजबूर कर दिया। अर्थात् उन्हें निहत्था कर दिया। स्त्री को मारने हेतु हाथ में लिया पत्थर सभी ने नीचे फेंक दिया। इस बीच येसु भूमि पर लिखते रहे उन्होंने किसी को भी नहीं देखा और लोग उन्हें छोड़कर चले गये। यह कोई नहीं जानता कि कौन पहले गया और कौन बाद में किन्तु निश्चय ही सभी ने अपने आप को पापी महसूस किया। यह हमें शिक्षा देता है कि जब हम दूसरों के बारे बातें करते हैं तो हम भी खुद के पापी होने का एहसास करें और साहस बटोर कर जिस पत्थर द्वारा दूसरों पर प्रहार करना चाहते थे उसे नीचे फेंक दें।

अब वहाँ सिर्फ येसु और स्त्री रह गये थे। कष्ट और दया एक-दूसरे के आमने-सामने थे। जब हम मेल-मिलाप संस्कार में भाग लेते हैं तो बहुधा हमारे साथ भी यही होता है। हम अपने पापों के लिए लज्जा महसूस करते तथा क्षमा की याचना करते हैं। येसु ने कहा ″नारी वे लोग कहाँ हैं?″ (10) तब येसु की आँखें दया और प्रेम से परिपूर्ण थी जिसके कारण शायद पहली बार उस महिला को अपनी प्रतिष्ठा का एहसास हुआ। संत पापा ने कहा कि उसके पापों के लिए दण्ड ने नहीं किन्तु मानव प्रतिष्ठा ने उसका जीवन बदल दिया और उसे बंधनों से मुक्त कर नये रास्ते पर चलने का साहस प्रदान किया।

संत पापा ने उपस्थित विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, ″प्रिय भाइयो एवं बहनो, यह स्त्री हम सभी का प्रतिनिधित्व करती है कि हम सभी पापी हैं ईश्वर के सामने व्यभिचारी हैं हमने उनकी सत्य प्रतिज्ञता के विरूद्ध बेईमानी की है। येसु ईश्वर की इच्छा अनुसार हम सभी की मुक्ति चाहते हैं हमें कृपा प्रदान करते तथा हमें पाप और मृत्यु से बचाते हैं। येसु झुककर भूमि पर लिखते हैं, उसी धूल पर जिससे हम बनाये गये हैं।(उत्पति 2:7) ईश्वर का न्याय, नहीं चाहता कि हम मर जायें बल्कि चाहता है कि हम जीवित रहें। ईश्वर हमारे पापों के लिए हमें क्रूसित नहीं करते और न हीं हमारी गलतियों को सामने लाते हैं। हम सभी का एक नाम है और उस नाम को वे हमारे पापों से नहीं जोड़ते। वे हमें मुक्त करना चाहते हैं ताकि हम उनके आनन्द के सहभागी हो सकें। वे चाहते हैं कि हमारी स्वतंत्रता बुराई से अच्छाई में बदल जाए और यह संभव है उनकी कृपा द्वारा हम ऐसा करने में समर्थ हो सकते हैं।

धन्य कुँवारी मरियम ईश्वर की करुणा में पूर्ण विश्वास करने एवं नयी सृष्टि बनने हेतु हमारी सहायता करे।

इतना कहने के बाद संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

देवदूत प्रार्थना समाप्त करने के पश्चात् संत पापा ने देश-विदेश से एकत्र सभी तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों का अभिवादन किया।

उन्होंने कहा, ″मैं आप सभी का अभिवादन करता हूँ जो रोम, इटली तथा अन्य देशों से यहाँ आयें हैं विशेषकर, जर्मनी एवं कनाडा के तीर्थयात्री।

इसके बाद संत पापा ने सुसमाचार की एक प्रति भेंट करते हुए कहा, ″अभी मैं आप लोगों को सुसमाचार की एक प्रति भेंट कर, देने की भावना को व्यक्त करना चाहता हूँ। यह संत लूकस रचित सुसमाचार की किताब है जिसे हम इस वर्ष की पूजन पद्धति अनुसार रविवार को पढ़ सकते हैं। पुस्तिका का शीर्षक है ″संत लूकस द्वारा करुणा का सुसमाचार″। वास्तव में सुसमचार लेखक ने इसमें येसु के वचनों को प्रस्तुत किया है, ″पिता के समान दयालु बनों।″ (6.36) जिससे जयन्ती वर्ष की विषयवस्तु प्रेरित है।

यह वाटिकन के स्वयंसेवकों तथा रोम के बुजूर्गों द्वारा मुफ्त में बांटा जाएगा। संत पापा ने कहा कि वे दादा-दादी कितने गुणी हैं जो अपना विश्वास अपने नाती-पोतों को प्रदान करते हैं। मैं आपको निमंत्रण देता हूँ कि आप इसे ले जाकर पढ़ें। एक पद हर रोज पढ़ें और ईश्वर की दया आपके हृदयों में निवास करेगी तथा उसे आप उन सभी लोगों के लिए बांटे जो आपसे मुलाकात करेंगे। उन्होंने कहा कि किताब की पृष्ट स. 123 में करुणा के 7 शारीरिक और 7 आध्यात्मिक कार्यों के बारे बतलाया गया है। संत पापा ने उन्हें याद करने की सलाह दी ताकि उनका अभ्यास किया जा सके। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि इस सुसमाचार की प्रति को स्वीकार करें ताकि पिता की करुणा आप में क्रियाशील हो सके। संत पापा ने स्वयंसेवकों को आदेश किया कि वे पीयत्सा पीयो 12 में एकत्र लोगों के साथ साथ उन्हें भी बाटें जो अंदर प्रवेश नहीं कर सके।

अंत में संत पापा ने सभी को शुभ रविवार की मंगलकामनाएँ अर्पित की।


(Usha Tirkey)

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