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भारत में अधिकतर आदिवासियों द्वारा ईसाई धर्म का चयन

In Church on April 22, 2016 at 2:57 pm

नई दिल्ली, शुक्रवार 22 अप्रैल 2016 (ऊकान) : अप्रैल माह में जारी नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार कहा गया है कि भारत के आदिवासियों में ईसाई या इस्लाम धर्म को गले लगाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ईसाई आदिवासियों की संख्या में 63 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है जो सन् 2001 में 6 करोड़ 3 लाख से बढ़कर सन् 2011 में 10 करोड़ 3 लाख हो गई है। इस्लाम आदिवासियों की संख्या में 51 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो इस अवधि के दौरान 1 करोड़ 2 लाख से बढ़कर 1करोड़ 8 लाख  हो गई है।

जबकि हिंदू आदिवासियों की संख्या बहुत बड़ी है उनके प्रतिशत विकास दर में अपेक्षाकृत 39 प्रतिशत कमी हुई है। हिंदू आदिवासियों की संख्या सन् 2001 में 60 करोड. थी जो बढ़कर सन् 2011 में 84 करोड़ हो गई है।

इसके विपरीत, कुल आदिवासी जनसंख्या में वृद्धि केवल 23 प्रतिशत याने सन् 2001 में 84 करोड़ से बढ़कर सन् 2011 में 104 करोड़ हो गई। परंपरावादी धर्म मानने वाले आदिवासी लोग या किसी भी धर्म से ताल्लुक नहीं रखने वाले आदिवासियों की संख्या 16 करोड़ 4 लाख से घटकर 7 करोड़ 8 लाख हो गई है।
नई दिल्ली के भारतीय सामाजिक संस्थान में आदिवासी अध्ययन विभाग के प्रमुख फादर रंजीत तिग्गा ने कहा, “यदि आंकड़ों की व्याख्या आदिवासियों के ईसाई धर्म में परिवर्तन को दिखाने के लिए की गई है तो कुछ भी गलत नहीं है।” भारतीय संविधान सभी नागरिकों को अपनी पसंद के अनुसार धर्म को मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है।

आदिवासी मामलों के लिए राष्ट्रीय धर्माध्यक्षीय कार्यालय के संयोजक तथा सिमडेगा के धर्माध्यक्ष विंसेंट बरवा ने कहा, “यदि आंकड़ों पर यकीन किया जाए, तो यह सकारात्मक है। इससे हमारे मनोबल को बढ़ावा मिलेगा कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं।”

फादर तिग्गा ने कहा कि कई राज्यों में चुनाव चल रहा है और इस समय जनगणना के आंकड़ों को प्रकाशित करना गुटों में बाँटने के रूप में देखा जा सकता है।

भारतीय राजनीति में धर्मांतरण कई दशक तक एक संवेदनशील मुद्दा रहा है लेकिन हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने दो साल पहले सत्ता में आने के बाद धर्मांतरण का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इससे राष्ट्र और हिंदू संस्कृति में अस्थिरता आती है।

मुस्लिम नेता आरिफ खान ने कहा कि वह सरकार के उस आँकड़े पर विश्वास नहीं करता, जिसके पीछे एक राजनीतिक कार्यक्रम हो। यह भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

(Margaret Sumita Minj)

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