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सन्त पापा फ्राँसिस अन्तरराष्ट्रीय कार्लो मान्यो पुरस्कार से सम्मानित किये गये

In Church on May 7, 2016 at 1:34 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 7 मई 2016 (वीआर सेदोक): सन्त पापा फ्राँसिस शुक्रवार, 06 मई को अन्तरराष्ट्रीय कार्लो मान्यो पुरस्कार से सम्मानित किये गये। यह सम्मान उन्हें वाटिकन में आयोजित एक समारोह में जर्मनी के अकेन से जर्मन सिटी के महापौर मार्सेल फिलीप द्वारा प्रदान की गयी।

प्रतिष्ठित अन्तरराष्ट्रीय कार्लो मान्यो पुरस्कार हर साल एक ऐसे व्यक्ति अथवा संस्था को प्रदान की जाती है जो यूरोप में शांति एवं एकता स्थापित करने हेतु अपना विशेष योगदान देता है। पुरस्कार का नाम फ्राँसिसी सम्राट कार्लो मान्यो (चार्ल्स द ग्रेट) के नाम पर रखा गया है जिन्हें उनके युग के “यूरोप के पितामह” माना जाता है।

समारोह के दौरान अपने वक्तव्य में संत पापा ने कहा, ″यदि हम प्रतिष्ठित भविष्य की कामना करते हैं, हमारे समाज के शांतिमय भविष्य का चाह रखते हैं तो हम इसे तभी प्राप्त कर सकते हैं जब हम सच्चे समावेशी भाव से कार्य करेंगे।″

उन्होंने कहा, ″रचनात्मकता, प्रतिभा और पुनर्जन्म की क्षमता एवं नवीनीकरण यूरोप की विशिष्टता है। विगत शताब्दियों में यूरोप ने उस मानवता का साक्ष्य प्रस्तुत किया है जो यह मानती है कि नई शुरूआत अवश्य सम्भव है।″ उन्होंने कहा कि सालों के विनाशकारी हिंसा तथा युद्ध के पश्चात् ईश्वर की कृपा से एक बिलकुल नवीन मानव इतिहास उभरा। विनाश की राख ने प्रबल आशा और एकजुटता की खोज को समाप्त नहीं किया और जिसने यूरोप के संस्थापन को प्रेरित किया। उन्होंने शांति के गढ़ की स्थापना की, एक ऐसे भवन का निर्माण जो बल प्रयोग से नहीं किन्तु सार्वजनिक भलाई के लिए स्वैच्छिक समर्पण से निर्मित हुई है। यूरोप जो लम्बे समय तक विभाजित था उसने अपने सच्चे स्वरूप को पाया तथा अपने घर का निर्माण करना आरम्भ किया।

संत पापा ने सचेत करते हुए कहा कि कालांतर में इन अच्छाईयों में कमी दिखाई दिखाई दे रही है क्योंकि आम घर (पृथ्वी) में लोगों के बीच अपनत्व की भावना में कमी आ रही है। असुरक्षित महसूस किये जाने के कारण दीवार के निर्माण की ओर झुकाव बढ़ रहा है। फिर भी, बहिष्कार एवं थकान यूरोप की विशिष्टता नहीं है क्योंकि हमारी समस्याएँ भी हमारी एकता के मजबूत ताकत बन सकते हैं।

संत पापा ने यूरोप की एकता को बनाये रखने के लिए वार्ता को महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा, ″हम वार्ता की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए हरसम्भव प्रयास करने तथा समाज के पुनर्निर्माण हेतु बुलाये गये हैं। वार्ता की संस्कृति हमारी सच्ची शिक्षुता को बल देता है तथा वह अनुशासन प्रदान करता है जिसके द्वारा हम परदेशियों, आप्रवसियों तथा विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के प्रति सम्मान हेतु विपक्षी को वार्ता के लिए योग्य साझी मानते हैं।″

संत पापा ने कहा कि वार्ता ही एक ऐसा शस्त्र है जिसके द्वारा शांति को अधिक दिनों तक कायम रखा जा सकता है। अतः उन्होंने वार्ता तथा मुलाकात की संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रोत्साहन दिया।


(Usha Tirkey)

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