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आध्यात्मिक साधना में संत पापा ने पुरोहितों से कहा

In Church on June 2, 2016 at 3:10 pm

रोम, बृहस्पतिवार, 2 जून 2016 (वीआ सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने बृहस्पतिवार को जयन्ती में भाग लेने हेतु रोम आये पुरोहितों के लिए एक आध्यात्मिक साधना का संचालन किया। पुरोहितों की जयन्ती 1 से 3 जून तक रोम में आयोजित की गयी है।

रोम स्थित संत जोन लातेरन महागिरजाघर में चल रहे इस आध्यात्मिक साधना में संत पापा ने अपने प्रथम प्रवचन में उड़ाव पुत्र के दृष्टांत पर चिंतन किया।

उन्होंने कहा, ″करुणा शब्द को यदि एक स्त्रीलिंग शब्द के रूप में देखा जाए तो यह एक माता का ममतामय स्नेह है जो अपने नवजात शिशु की नाजुक स्थिति में उसका स्पर्श करती है। वह बच्चे को अपनी बाहों में लेती तथा उसे वह सब कुछ प्रदान करती है जो एक शिशु को जीने और बढ़ने हेतु आवश्यक है। यदि दया को पुलिंग के रूप में देखा जाए तो यह पिता की दृढ़ निष्ठा है जो बच्चे को बढ़ने हेतु हमेशा समर्थन देता, क्षमा करता एवं प्रोत्साहन देता है। करुणा व्यवस्थान का परिणाम है यही कारण है कि ईश्वर करूणा के अपने व्यवस्थान का सदा स्मरण रखते हैं। यह दयालुता और भलाई का बिलकुल मुफ्त कार्य है जो हमारे अंतःस्थल से उठता तथा हमारे उदार कार्यों द्वारा प्रकट होता है।

संत पापा ने दयालु बनने का अर्थ बतलाते हुए कहा कि इसका अर्थ है दुःख सह रहे लोगों के प्रति सहानुभूति रखना, जरूरतमंद लोगों के प्रति संवेदनशील होना, अन्याय के प्रति आवाज उठाना तथा स्नेह पूर्ण सम्मान से प्रत्युत्तर देने हेतु चीजों को सही ढंग से पूरा करना। येसु ने ईश्वर को करुणा के रूप में प्रकट किया।

संत पापा ने करुणा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि करुणा से बढ़कर कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो हमें ईश्वर के करीब लाता है। करुणा के कारण ही प्रभु हमारे पापों को क्षमा प्रदान करते हैं तथा उन्हीं के नाम पर दूसरों के प्रति दया भाव रखने की कृपा प्रदान करते हैं। दया से बढ़कर कोई भी वस्तु हमारे विश्वास को सुदृढ़ नहीं कर सकती।

संत पापा ने पुरोहितों को तीन परमर्श दिये, पहला संत इग्नासियुस के अनुसार, जिसमें वे कहते हैं कि कोई बड़ा ज्ञान नहीं बल्कि ईश्वर की आंतरिक बातों का एहसास एवं उनका रसास्वादन कर पाने की क्षमता ही, आत्मा को पूर्ण एवं संतुष्ट बना सकता है। संत पापा ने इसे प्राप्त करने के लिए शांति पूर्वक प्रार्थना करने का परामर्श दिया।

संत पापा ने दूसरी सलाह के रूप में करुणा के बारे बोलने का तरीका बतलाया। हमें दया इसलिए दिखाना चाहिए ताकि हम भी दया प्राप्त कर सकें। करुणा मानवीय आवश्यकता के साथ ईश्वर के हृदय से जुड़ा है जो तत्काल ठोस रूप में व्यक्त होता है। हम करुणा पर तब तक चिंतन नहीं कर सकते जब तक कि यह कार्य में परिणत न हो। मात्र प्रार्थना द्वारा इसे वास्तविकता में परिणत नहीं किया जा सकता। करुणा में हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व समाहित है।

तीसरी सलाह के रूप में संत पापा ने पुरोहितों से कहा कि हम करुणा पर इसलिए ध्यान केंद्रित करते हैं क्योंकि यह महत्वपूर्ण और निश्चित है। हम हमारे मानवीय स्थिति में पाप और कमज़ोरियों के कारण गहराई तक गिर सकते हैं अथवा दिव्य पूर्णता तक ऊपर उठ सकते हैं किन्तु हमेशा उच्चतर करुणा को प्राप्त करने हेतु। संत पापा ने इसके लिए हमारे संस्थाओं की मानसिकता में परिवर्तन की आवश्यकता बतलायी। जब तक हमारे तंत्र ईश्वर की करुणा और लोगों के प्रति करुणा के लिए खुले नहीं हैं यह किसी अनोखी एवं अनुत्पादक की स्थिति को प्राप्त कर सकता।

संत पापा ने ऐसी करूणा को जो बढ़ता और फैलता है, अच्छा से अधिक अच्छा बनता है तथा कम से अधिक में परिणत होता है। उसे येसु पिता की छवि के रूप में प्रकट करते हैं जो सदा महान हैं तथा उनकी दया सदा बहती है। उनकी दया का न तो कोई छत है और नहीं की दीवार क्योंकि यह उनकी स्वतंत्रता से उत्पन्न हुई है।


(Usha Tirkey)

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