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संत पापा, येसु को पाने हेतु हमें उठकर चलना है

In Church on June 10, 2016 at 3:12 pm


वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 10 जून 2016 (सेदोक) संत पापा फ्राँसिस ने वाटिकन के संत मार्था प्रार्थनालय में अपने प्रातःकालीन मिस्सा के दौरान प्रवचन में कहा कि ख्रीस्तीय जीवन को तीन तरह के आचरणों में समाहित किया जा सकता है: ईश्वर की प्रतीक्षा में “खड़ा रहना ”, धैर्य पूर्वक“शांत” रह कर उनकी वाणी को सुनना और सुनी गई वाणी को “घोषित” करना।

ईश्वर से मिलने हेतु हमें अपने मूल स्थान में जाने की आवश्यकता है जहाँ सृष्टि में वे हमें अपने अनुरूप बनाते और हमें सृष्टि की देखभाल करने की जिम्मेदारी सौंपते हैं। वे हमें रोपने, कोड़ने, बढाने और विस्तार करने का कार्य सौंपते हैं। वे हमें निकल कर पर्वत की ऊँचाई में अपनी उपस्थिति में जाने और खड़ा होने को कहते हैं। एलियाह पर्वत पर ईश्वर की उपस्थिति में खड़ा था।

संत पापा ने कहा कि हम ईश्वर से किस तरह मिल सकते हैं, कैसे जान सकते हैं कि वे वहाँ उपस्थित है? राजाओं के ग्रंथ में हम सुनते है कि एलियाह को दूत ने बाहर निकलने का निमंत्रण दिया जहाँ वह होरेब पर्वत की गुफा से निकलकर वायु की मंद-मंद प्रवाह में ईश्वर की उपस्थिति का एहसास किया। ईश्वर से मुलाकात करने हेतु हमें अपने आप में प्रवेश करने की जरूरत है जहाँ हम अभूतपूर्व शांति का अनुभव करते हैं और उस शांति में ईश्वर हम से बातें करते हैं।

दूत एलियाह से आग्रह करते हैं कि वे बाहर निकले जिससे वे ईश्वर द्वारा दिये गये कामों को पूरा कर सकें। संत पापा ने कहा कि वे हमें अपने से बाहर निकलने, अपने स्वार्थ और आराम को छोड़, साहसपूर्वक ईश्वर के वचनों को दूसरों तक लेने का आह्वान करते हैं।

हमें सदैव ईश्वर को खोजने की जरूरत हैं। हम जानते हैं कि हमारे जीवन की मुश्किल घड़ी कैसी होती है, हम कैसे विश्वास विहीन, हताश और निराश होकर अंधकार में चले जाते हैं जहाँ हमें क्षितिज दिखाई नहीं देती और हम ऊपर नहीं उठ पाते हैं। लेकिन हम जानते हैं कि येसु हमारे बीच आते हमें रोटी दे कर शक्ति और नवजीवन का संचार करते हैं। वे हमें कहते हैं, “उठो, चलो और आगे बढ़ो।” ईश्वर से मिलने हेतु हमें उठ कर चलना हैं। हमें उनका इंतजार और उनसे खुले दिल से बातें करना हैं, और वे हम से कहेंगे, “यह मैं हूँ।” इस तरह हम अपने विश्वास में मजबूत होते हैं। विश्वास को हमें अपने में नहीं रखना हैं, वरन् दूसरों को प्रेरिताई द्वारा देना है।


(Dilip Sanjay Ekka)

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