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संत पापा फ्राँसिस द्वारा विला नाजरेत की भेंट

In Church on June 20, 2016 at 3:51 pm


वाटिकन सिटी, सोमवार, 20 जून 2016 (सेदोक) संत पापा फ्रांसिस ने शनिवार अपराहृन को रोम शहर से बाहर पीनेता सक्कीती में, गरीब और अनाथ बच्चों को विद्यार्जन के सुअवसर देने हेतु सन् 1946 में स्थापित एक संस्थान विला नाजरेत का दौरा किया।

अपनी भेंट के दौरान उन्होंने संत लुकस रचित सुसमाचार पर आधारित भले सामरी के दृष्टान्त पर धर्मशिक्षा दी। उन्होंने कहा कि इस कहानी में बहुत सारे चरित्र हैं डाकू, गरीब राजगीर जो रास्ते में अधमरा छोड़ दिया गया, पुरोहित, नियमों के ज्ञात वकील, सराय का मालिक इत्यादि, लेकिन कौन उसका सच्चा पड़ोसी निकला। उनमें से किसी ने नहीं जाना कि उस परिस्थिति में क्या करना चाहिए। पुरोहित जल्दबाजी में था और निश्चय ही उन्होंने अपनी घड़ी देखी होगी क्योंकि उसे बलिदान चढ़ाना था या उसने गिरजाघर के द्वार खुले छोड़ रखे थे जिन्हें उन्हें बंद करना था। क़ानूनों का ज्ञाता एक व्यावहारिक व्यक्ति था जिसने अपने में कहा, “यदि मैं इस में हाथ डालूँ तो कल मुझे अदालत में जाकर गवाही देनी होगी और मेरे काम का दो-तीन दिन व्यर्थ चला जायेगा।

इसके बदले एक दूसरा व्यक्ति जो एक पापी और एक परदेशी था जो ठीक से बोलना भी नहीं जनता था, उसे दया आई, “वह करुणा से द्रवित हो उठा।” वह रुक गया। उनमें से तीनों को अच्छी तरह पता था कि उन्हें क्या करना है। उन्होंने अपना निर्णय लिया।

संत पापा ने कहा यद्पि यह उचित होगा कि हम इस स्थिति को सराय के मालिक की नज़रों से देखें जिसके बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं है। उसने सारी चीजों को गौर से देखा उसकी समझ में कुछ नहीं आती और वह अपने में कहता है, “लेकिन यह पागलपन है। एक सामरी, एक यहूदी की सेवा करे। यह पागलपन है, लेकिन वह अपने हाथों से उसकी मरहम पट्टी करता और सराय में मेरे पास ले आता है यह करते हुए, लेकिन आप उसकी सेवा-सुश्रूषा करें मैं जो कुछ और खर्च होगा उसे चुका दूँगा। मैंने ऐसा कभी नहीं देखा है यह सचमुच पागलपन है।”

संत पापा ने कहा कि उस व्यक्ति को ईश्वर की वाणी का साक्ष्य मिला। किसे? पुरोहित को नहीं क्योंकि उसने उस व्यक्ति की ओर नजरें भी नहीं फेरी। उसी प्रकार संहिता के ज्ञाता को नहीं, जबकि पापी व्यक्ति को उस पर दया आयी, उसकी गिनती ईश्वरीय समुदाय के लोगों में नहीं होती थी लेकिन उसमें करुणा थी। सेवा के सिवाय उसे और कुछ समझा में नहीं आया।

संत पापा ने कहा कि यह साक्ष्य को परिभाषित करता है। पापी व्यक्ति का यह साक्ष्य सराय मालिक के हृदय में बेचैनी के बीज बो देते हैं। उस सराय के मालिक को क्या हुआ सुसमाचार इसकी चर्चा नहीं करता है न ही उसके नाम का जिक्र करता है। लेकिन निश्चय ही उस व्यक्ति में उत्सुकता बढ़ी, बेचैनी उसके दिल में बढ़ी होगी।

संत पापा ने पूछा, “मैं आज क्यों इस व्यक्ति के व्यक्तित्व की चर्चा कर रहा हूँ? साक्ष्य को हमें इस तरह जीने की आवश्यकता है जिससे दूसरे तुम्हारे कामों को इस देख कर स्वर्गिक पिता की महिमा कर सकें।” कहने का अर्थ वे पिता से मिल सकें।

उन्होंने इस आशे के साथ अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की कि विला नाजरेत में काम करने वाले इसी तरह अपने कार्यों का निष्पादन करें न की पुरोहित की भाँति जो जल्दी बाजी में चला गया या चिकित्सकों के समान जो विश्वास को गणितीय कठोरता के समान प्रस्तुत करते हैं। हम सुसमाचार के ज्ञान “अपने हाथों को मैला करने से न हिचकिचाये।”


(Dilip Sanjay Ekka)

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