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आप शांति के राजदूत बनें

In Church on June 26, 2016 at 2:23 pm


आरमेनिया, रविवार, 26 जून 2016 (सेदोक) संत पापा फ्राँसिस आरमेनिया की अपनी त्रिदिवसीय प्रेरितिक यात्रा के दौरान येरेभान में ख्रीस्तीय एकतावर्धक साक्षात्कार और शांति हेतु प्रार्थना सभा के दौरान लोगों को संबोधित करते हुए कहा,

प्रिय भाइयो एवं बहनो,

ईश्वर की आशीष और शांति सदा आप के साथ हो।

मेरी कितनी तमन्ना थी कि मैं आपकी धरती,  आपके  प्रिय देश का दौरा करुँ जिसने ख्रीस्तीय विश्वास को सर्वप्रथम अंगीकृत किया। यह मेरा सौभाग्य है कि मैं करारात पर्वत की इस ऊँचाई में जहाँ शांति मानो बहुत सी बातें कह रही हो, आप सभों से साथ हूँ। यहाँ के कहातचाकर, पत्थर के क्रूस जो विश्वास की बात और इतिहास में सुसमाचार के साक्ष्य हेतु घोर यातनाओं की बातें बयाँ करती हैं आप सब इसके उत्तदाधिकारी हैं। मैं रोम से एक तीर्थयात्री के रुप में आप के बीच आया हूँ जिससे मैं अपना स्नेह आप सबों के साथ साझा कर सकूँ।

बीते वर्षों में कलीसियों के बीच संगोष्ठी और वार्ता हम सबों से लिए हमेशा मित्रतापूर्ण, एक यादगारी रही है। ईश्वर को धन्यवाद। ईश्वर ने चाहा कि हम येसु के प्रेरितों की याद करते हुए एक दूसरे से पुनः मिले जिससे हम अपने बीच प्रेरितिक एकता को सुदृढ़ बना सकें। मैं ईश्वर के प्रति उनकी “सच्ची और गहन एकता”  हेतु अति कृतज्ञ हूँ जो कलीसियों के बीच व्याप्त है और मैं सुसमाचार के प्रति आप की साहसिक निष्ठा हेतु आप सबका धन्यवाद करता हूँ जो सभी ख्रीस्तीयों के लिए एक कीमती उपहार है। हम सबों की यह उपस्थिति विचारों का नहीं लेकिन वरदानों का आदान प्रदान है। हम ईश्वर की आत्मा के वरदानों को संग्रहित करने हेतु आते हैं जिसे उन्होंने हम प्रत्येक में बोया है। हम आनन्द में एक दूसरे के साथ यात्रा करते और विश्वास के साथ उस दिन की प्रतीक्षा करते हैं जहाँ ईश्वर की आशीष और सहायता से हम येसु की बलि वेदी के चारो ओर ख्रीस्तीय एकता की परिपूर्णता में एकत्रित होंगे। उस लक्ष्य तक पहुँचने की कोशिश में हम सभी एक सामान्य तीर्थयात्रा में सम्मिलित होते जहां हम एक दूसरे से ईमानदारी पूर्वक विश्वास में अपने संदेह और अविश्वासपूर्ण बातों को दरकिनार करते हुए वार्ता करते हैं।

अपनी इस यात्रा में हमने विभिन्न चीजों का साक्ष्य देते हुए आगे बढ़ा है विशेषकर वे शहीद जिन्होंने येसु में हमारे विश्वास को अपने रक्त की मुहर से अंकित किया है। वे स्वर्ग में हमारे आदर्श हैं जो हमारे लिए चमकते और एकता की राह में हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं। उन महान पूर्वजों में से एक संत कैथोलिकोस नर्सेस शनोरहाली का मैं जिक्र करना चाहूँगा। उन्होंने लोगों और उनके रिवाजों हेतु एक अद्भुत प्रेम दिखाया साथ ही उन्होंने दूसरी कलीसियों हेतु भी विशेष चिंता की। एकता हेतु उन्होंने अथक प्रयास किये और ईश्वर की योजना को पूरा करने की चाह रखी “जो विश्वास करते हैं वे सब एक हो जायें।” (यो.17.21) एकता व्यक्तिगत स्वार्थ में पूरी नहीं होती वरन् यह वह है जिसे येसु हम से चाहते हैं जिसे हम स्वेच्छा से लोगों की भलाई हेतु करने का प्रयास करते हैं, जिसके लिए निरन्तर अध्यवसाय और साक्ष्य की जरूरत है जिसके द्वारा सुसमाचार का प्रचार दुनिया में होता है।

इस आवश्यक एकता को अनुभव करने हेतु संत नर्सेस हमें कहते हैं कि कलीसिया में अधिक लोगों को कार्य करने की जरुरत है, सबों के प्रार्थना की आवश्यकता है। यह कितना अच्छा है कि हम यहाँ एक दूसरे के लिए और एक दूसरे के साथ प्रार्थना करने हेतु जमा हुए हैं। मैं अपनी ओर से आप सबों को अपनी प्रार्थनाओं का आश्वासन देता हूँ विशेषकर जब मैं रोटी और दाखरस को येसु की बलि वेदी में अर्पित करुंगा। मैं येसु के समक्ष अरमेनिया की कलीसिया और आप सब प्रियजनों को याद करने नहीं भूलूँगा, और मैं इसी प्रार्थनामय उपहार की याचना आप सभों से भी करता हूँ।

संत नर्सेस आपसी प्रेम में बढ़ने की बात कहते हैं क्योंकि केवल प्रेम हमारी यादों और घावों को चंगा कर सकता है। यादें हमारी पूर्वधारणा को मिटती और दूसरे भाई-बहनों के प्रति हमारी सोच को परिष्कृत करती है। एकता की यात्रा में हमें येसु के प्रेम को धारण करने की जरूरत है जो यद्यपि धनी थे लेकिन नम्रता को धारण किये। येसु के उदाहरण में चलते हुए हम उनके नम्र प्रेम में अपने कठोर विचारों और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठते हैं जो हम सब ख्रीस्तीयों हेतु एक पवित्र आध्यात्मिक तेल के समान है जो हमें चंगाई, मजबूती और पवित्रता प्रदान करती है। संत नर्सेस ने लिखा, “आइये हम सद्भावना और प्रेम में अपने खामियों की पूर्ति करें।” वे हमें सुझाव देते हुए कहते हैं कि प्रेम की नम्रता से ख्रीस्तीयों के कठोर हृदय को सुकोमल बनाया जा सकता है क्योंकि वे बहुधा अपने में और केवल अपनी ही भलाई तक सीमित होकर रह जाते हैं। नम्र और उदारतापूर्ण प्रेम ईश्वर की करुणा को आकर्षित करती है जहाँ हम येसु और पवित्र आत्मा की आशीष से अपने को सराबोर पाते हैं। नम्रता और पवित्र आत्मा में हम एक दूसरे हेतु प्रार्थना करते और उन्हें प्रेम करते हुए अपने को ईश्वरीय एकता की कृपा हेतु तैयार करते हैं। आइए हम द्ढ़ संकल्प हो कर इस सच्ची एकता हेतु कार्य करें।

“मैं तुम्हारे लिए शांति छोड़ जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति जैसी नहीं है।” (यो.14.27) हमने सुसमाचार के इन वचनों को कई बार सुना है जो हमें ईश्वर से शांति हेतु प्रार्थना करने का आहृवान करती है इस शांति को दुनिया हमें नहीं दे सकती है। शांति के इस मार्ग में आज हमें कितनी कठिनाइयों और मुसिबतों का समान करना पड़ता है। मैं उन लोगों के बारे में सोचता हूँ जिन्हें सभी चीजों को छोड़ने हेतु विवश होना पड़ता है विशेषकर मध्य पूर्व के लोग जहाँ हमारे भाई-बहनों को घृणा और आपसी युद्दों के कारण हिंसा और प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। यह संघर्ष हथियारों के व्यापार और उनकी बढ़ोतरी के कारण होता है जिसका खामियाजा गरीबों और कमजोर लोगों को भुगतना पड़ता है जो एक सम्मानजनक जिन्दगी की तलाश करते हैं।

मैं आपके देश के लोगों को कैसे भूल सकता हूँ जिन्हें इस तरह के अनुभवों से होकर गुजरना पड़ा है। आपके देश को महा विपत्ति से हो कर गुजरना पड़ा है। “यह बृहद और बेतुका संहार” जिसे आपके देशवासियों को झेलना पड़ा हमारे जेहन में छप-सा गया है जो अब भी हमारे हृदयों को दुःख देता है। मैं यहां कहना चाहूँगा कि आपके दुःख हमारे दुःख हैं, “वे येसु के रहस्यात्मक शरीर के अंगों के कष्ट हैं।” उन्हें याद करना न केवल सही है वरन् यह हमारा कर्तव्य है। यह हमारे लिए निरन्तर चेतावनी बने जिससे दुनिया में ऐसी भयावह घटनाएँ फिर न हो।

मैं अरमेनिया के ऐसे ऐतिहासिक क्षणों में सम्मान के साथ ख्रीस्तीय विश्वास की भी याद करता हूँ जहाँ आप का पुनर्जन्म कष्टों के बावजूद हुआ। यह आप की सच्ची शक्ति है जो आपको लिए पास्का के रहस्यात्मक मुक्ति का मार्ग खोलती है। विचारहीन घृणा में किया गये हमारे घाव अब तक नहीं भरे हैं, क्या हम इसे पुनर्जीवित येसु के घावों की तरह देख सकते हैं उन घावों की निशानी अब तक उनके शरीर में है। उन्होंने अपने उन घावों को पुनरुत्थान के बाद अपने शिष्यों को दिखलाया। वे भयंकर और अत्यन्त दर्द भरे घाव जो उन्हें क्रूस में सहना पड़ा प्रेम में परिणत हो जाते और हमारे लिए क्षमा और शांति के स्रोत बनते हैं। अरमेनियावासियों ने उसी तीक्ष्ण दर्द का साक्ष्य दिया है जो भविष्य में शांति का एक बीज बन सकता है।

यादों को जब हम स्नेह भाव से देखते हैं तो हमें एक नई राह मिलती है, जहाँ घृणा मेल-मिलाप में बदली और हम आशा में सबों के लिए शांति के वाहक बनते हैं। शांति का हमारा प्रयास हमें भविष्य में एक नई नींव तैयार करने हेतु मदद करेगा जिसके द्वारा हम बदले की भावना से बाहर निकल पायेंगे। हमें शांति हेतु निरन्तर कार्य करने हैं जिससे लोगों को सम्मान जनक रोजगार मिले तथा अति जरूरतमंद लोगों कि सहायता हो और भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाया जा सके।

अंत में, इस संदर्भ में मैं शांति के प्रवर्तक और स्थापक संत ग्रेगोरी नारेक की चर्चा करना चाहूँगा जिसे मैंने “कलीसिया का आचार्य” घोषित किया है जिन्हें हम “शांति के आचार्य” भी कह सकते हैं। उन्होंने अपनी अनोखी पुस्तक में लिखी है जिसे मैं “अरमेनिया के लोगों हेतु आध्यात्मिक नियामावली” मानता हूँ, “प्रभु तू उन लोगों की याद कर जो हमारे शत्रु हैं उनके सामंजस्य हेतु उन्हें दया और क्षमा प्रदान कर… तू उनका विनाश न कर जो मुझे सताते हैं लेकिन उन्हें सुव्यवस्थित कर, दुनिया की बुराइयों को जड़ से मिटा दे, मुझ में और उनमें अच्छाई भर दे।” उन्होंने ने गरीबों के साथ अपने को संयुक्त किया और सभी पापियों हेतु प्रार्थना की, अतः “वे सारी दुनिया हेतु मध्यस्थ बन गये।” यह ख्रीस्तीयों के द्वारा एक महान शांति का संदेश है, जो हृदय से प्रवाहित होता है। अरमेनिया के लोग दुनिया के कई देशों में फैले हुए हैं मैं उन सभों को भ्रातृत्व स्नेह प्रदान करता हूँ। संत पापा ने कहा कि मैं आप सब को प्रोत्साहित करता हूँ कि आप “शांति के राजदूत बनें।”


(Dilip Sanjay Ekka)

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