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सम्मेलन में चीन के ख्रीस्तीयों द्वारा सामना किये जा रहे चुनौतियों पर विचार

In Church on July 25, 2016 at 3:44 pm


वाटिकन सिटी, सोमवार, 25 जुलाई 2016 (वीआर अंग्रेजी): चीन में ‘ख्रीस्तीयों का भविष्य, ये था हॉनकॉग में चार दिवसीय सम्मेलन की मुख्य विषयवस्तु।

शनिवार को समाप्त हुए इस सम्मेलन का आयोजन ‘कलीसियाई अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान नेटवर्क’ ने किया था जिसमें विभिन्न ख्रीस्तीय समुदायों एवं विभिन्न देशों के राष्ट्रीय एवं जातिगत पृष्टभूमि के लोगों ने भाग लेकर उन बातों पर विचार-विमर्श किया कि आधुनिक चीन में विभिन्न ख्रीस्तीय कलीसिया एवं समुदायों को किन-किन चुनौतियों का सामना कर रहा है।

चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने अधिकारिक तौर पर पाँच धर्मों को मान्यता प्रदान की है जिनमें बौद्ध, ताओ,  इस्लाम, विभिन्न ख्रीस्तीय समुदाय एवं काथलिक आते हैं।

सम्मेलन में कहा गया कि प्रोटेसेटंट एवं काथलिक कलीसियाओं को सरकार द्वारा संचालित देशभक्ति चर्च संगठनों के साथ पृथक रूप से पंजीकृत किया जाना चाहिए तथा जिन काथलिकों ने संत पापा को मानने से इन्कार किया है उन्होंने अत्याचार एवं लम्बे समय तक जेल की सज़ा की जोखिम उठायी है। किन्तु आज चीन के वे शहर जो तीव्र गति से विकसित हो रहे हैं, लोगों के मनोभाव में परिवर्तन आ रहा है। फिर भी, अधिकार की रक्षा हेतु उत्तरदायी दल ने लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का रिपोर्ट प्रस्तुत किया है। सम्मेलन में भाग ले रहे एक अन्य सदस्य जेस्विट ईशशास्त्री ने कहा कि चीनी लोगों में धर्माध्यक्ष की नियुक्ति से संबंध में अब वाटिकन एवं बिजिंग के बीच तनाव को कम करने की भावना बढ़ रही है।

अन्य एशियाई विशेषज्ञ मानते हैं कि एक ऐसी समझौता की आपेक्षाएँ बढ़ रही हैं जिसके तहत संत पापा करुणा के जयन्ती वर्ष में एक मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करेंगे जिसमें वे वाटिकन के अनुमोदन के बिना ही 8 धर्माध्यक्षों को धर्माध्यक्षीय अभिषेक प्रदान करेंगे एवं बीजिंग और रोम दोनों के लिए स्वीकार्य नया नामांकन की एक प्रणाली की स्थापना की जायेगी।

सम्मेलन में पर्यावरणीय आपदा के मद्देनजर चीन के आर्थिक विकास का हल करने की दिशा में रास्ता दिखाने हेतु संत पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक पत्र ‘लाओदातो सी’ का सम्मोहक अध्ययन करने की बात की गयी। जैसा कि संत पापा ने फरवरी माह में चीनी नव वर्ष के अवसर पर दिये गये अपने एक साक्षात्कार में कहा था देश के भविष्य की महान समृद्धि उसके प्राचीन संस्कृति की याद में निहित है। उन्होंने 16वीं शताब्दी के जेस्विट मिशनरी मतेओ रिक्की का स्मरण दिला कर, चीन के साथ वार्ता पर बल देते हुए इसे ज्ञान और इतिहास का एक संग्रह कहा था।


(Usha Tirkey)

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