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पोलैण्ड के 1050वीं वर्षगाँठ के अवसर पर चेस्तोकोवा के जसना गोरा में यूख्रारिस्त

In Church on July 28, 2016 at 3:41 pm


वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 28 जुलाई (सेदोक) सार्वभौमिक काथलीक कलीसिया के धर्म गुरु संत पापा फ्राँसिस ने पोलैण्ड की अपनी 5 दिवासीय प्रेरितिक यात्रा के दौरान पोलैण्ड के 1050वीं वर्षगाँठ के अवसर पर चेस्तोकोवा के जसना गोरा में यूख्रारिस्त बलिदान अर्पित किया।

उन्होंने मिस्सा बलिदान के दौरान धर्मविधि हेतु लिये गये पाठों के आधार पर अपना चिंतन प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्रस्तुत पाठों से धार्मिकता की एक धागा निकलती है जो मानव और मुक्ति इतिहास को अपने में पिरो कर रखती है।

उन्होंने कहा कि संत पौलुस हमें ईश्वरीय योजना के बारे में बतलाते हैं कि “समय पूरा होने पर ईश्वर ने अपने पुत्र को दुनिया में भेजा जो कुँवारी मरियम से जन्म लिये।” लेकिन इतिहास हमें बतलाती हैं कि समय पूरा होने पर जब मानव पुत्र दुनिया में आये, विशेष कर मानवता इसके लिए तैयार नहीं थी। यहाँ तक की उस समय शांति और व्यवस्था नहीं थी। यह एक सुनहरा समय नहीं था। दुनिया की परिस्थितियों ने ईश्वर के आने का लाभ नहीं उठाया, उनके अपनों ने उन्हें नहीं स्वीकारा। समय की परिपूर्णता इस तरह ईश्वर की कृपा थी। ईश्वर ने हमारे समय को अपनी करुणामय आशिष से भर दिया। यह उनके अतुल्य प्रेम का प्रमाण था।

ईश्वर का दुनिया में आना खास कर हमें आश्चर्यचकित करता है। वे एक नारी के द्वारा जन्म लिये। वे एक विजेता और विश्वव्यापी सर्वशक्तिमान ईश्वर की तरह दुनिया में नहीं आते हैं। उन्होंने अपने को दिव्यमान सूर्य की तरह प्रकट नहीं किया वरन् वे दुनिया में एक साधारण रुप में प्रवेश करते हैं, माँ के एक नन्हें बालक की तरह, जिसकी चर्चा करते हुए सुसमाचार कहता है, मानों वर्षा की एक बूंद पृथ्वी को छूती हो, एक सबसे छोटा बीज जो जन्म और बढ़ता हो। इस तरह हमारी इच्छाओं और अपेक्षाओं के विपरीत ईश्वर का राज्य हमारा ध्यान आकर्षित करने जैसा नहीं अपितु छोटे रुप में, नम्रता में आता है।

संत पापा ने कहा कि आज का सुसमाचार दिव्य धागे को सहेज कर इतिहास को आगे ले चलता है। समय की परिपूर्णता के बाद हम येसु के तीसरे दिन के प्रेरितिक कार्य की चर्चा सुनते हैं, (यो. 2.1) जहाँ वे मुक्ति के आगमन की घोषणा करते हैं। समय अल्प है और ईश्वर अपने को छोटे रुप में व्यक्त करते हैं। इस तरह हम गलेलिया के काना में येसु के पहले अचरज कार्य को देखते हैं।

वे जनसमूह के बीच कोई आश्चर्यचकित काम नहीं करते न ही कोई शब्द कहते जिसके द्वारा राजनीतिक गरम-गर्म बहस में विराम लगाया जा सकें। बल्कि एक छोटे से गाँव में, वे एक छोटा-सा चमत्कार करते जो विवाह भोज में सम्मिलित लोगों और पूर्णरूपेण एक अज्ञात परिवार हेतु आनन्द का कारण बनता है। यद्यपि पानी जो विवाह भोज में अंगुरी बन गया, एक बड़ी निशानी है क्योंकि यह हमें ईश्वर को एक दुल्हे के रूप में प्रस्तुत करता है ईश्वर को जो हमारे साथ मेज पर विराजते हैं जो हमारे साथ संयुक्त होने की तमन्ना  रखते हैं। यह हमें यही बतलाता है कि ईश्वर हम से दूर रहना नहीं चाहते हैं वरन् वे सचमुच हमारे निकट हैं। वे हमारे बीच में हैं और अपनी ताकत और शक्ति का प्रदर्शन किये बिना, हमारे निर्णयों में बाधा बने बिना, हमारी देख-रेख करते हैं। वे हमारी मनोभावनाओं से भिन्न हैं जहां हम सदैव बड़ी चीजों को अपने में धारण करने की चाह रखते हैं वे अपने को छोटी चीजों में ही सीमित रखना उचित समझते हैं। संत पापा ने कहा कि शक्ति, शान-शौकत और दिखावे में अपने को वशीभूत होने देना मानव के लिए कितना दुःख की बात है। यह एक प्रलोभन है जो अपने को सब जगह व्यवस्थित करने का प्रयास करता है। इसके विपरीत लेकिन जब हम अपनी दूरियों का हनन कर अपने को दूसरों के लिए देते, अपने दैनिक जीवन की छोटी सच्चाई में ही सीमित होकर जीते तो यह जीना उत्कृष्ट दैवीय कृपा बनती है।

ईश्वर अपने को छोटा, सच्चा और हमारे निकट रखते हुए हमें बचाते हैं। ईश्वर सबसे पहले अपने को नगण्य बनाते हैं। ईश्वर जो नम्र और हृदय से दीन-हीन हैं विशेष रुप से छोटे लोगों को प्रेम करते हैं जिनके लिए स्वर्ग का राज्य प्रकट किया गया है। (मति. 11.25) वे ईश्वर की नज़रों में महान हैं और ईश्वर उनकी ओर अपनी नजरें फेरते हैं। वे उन्हें विशेष रुप से प्रेम करते हैं क्योंकि वे दुनिया में अहम भरे जीवन द्वारा सताये जाते हैं। वे उन छोटे लोगों से बातें करते और उन्हें प्रेम दिखाते हैं जो उन्हें स्वतंत्र करता है। वे उनके दिलों में निवास करते और उन्हें अपने नाम के रहस्य और अपने हृदय के गुप्त विचारों को प्रकट करते हैं। हम आप के उन बेटे-बेटियाँ की याद करते हैं जो सुसमाचार की सेवा हेतु अपने को नम्र और दीन बनाते हुए शहीद कर दिया जैसे की संत पापा जोन पौल द्वितीय और संत फौस्तीना थी। प्रेम के इन माध्यमों द्वारा ईश्वर ने सारी कलीसिया और सारी मानवजाति को अपने अनमोल उपहारों से भर दिया है। यह कितना महत्वपूर्ण और संयोग है कि आप अपनी वर्षगाँठ करुणा की जयन्ती वर्ष में माना रहे हैं।

संत पापा ने कहा कि ईश्वर निकट हैं उनका राज्य निकट है। (मकु. 1.15) वे हमें ताकतवर और पृथक सम्राटों के समान भयभीत होने नहीं कहते हैं। वे अपने राज्य सिंहासन में नहीं रहते वरन् अपने प्रेम के कारण हमारे रोज दिन के जीवन में आकर रहना, हमारे साथ चलना पसंद करते हैं। वर्षगाँठ की याद करते हुए आप ईश्वर का धन्यवाद करें जिन्होंने आप के हाथों को पकड़ कर आप के साथ विभिन्न परिस्थितियों में यात्रा की हैं। कलीसिया हमें भी एक दूसरे के साथ वैसा ही वार्ता करने हेतु बुलाती है। हमें एक दूसरे को सुनने अपने पडोसियों के जीवन में सहभागी, एक दूसरे की खुशी और तकलीफों को साझा करने की जरूरत है जिससे हमारे पारदर्शी जीवन द्वारा सुसमाचार का प्रचार निरन्तर होता रहे।

और अंत मैं, संत पापा ने कहा कि ईश्वर सच्चे हैं। आज के पाठ हमें बतलाते हैं कि ईश्वर के कार्य सच्चे और मूर्त हैं। दैवीय प्रज्ञा “एक कुशल कार्यकर्ता” और “खेल” के समान है। (प्रव. 8.30) शब्द ने शरीर धारण किया और माता के गर्भ से संहिता के अनुसार जन्म लिया। वे अपने मित्रों के साथ रहते और उनके साथ एक समारोह में सहभागी होते हैं। संत पापा ने कहा कि अनंत का वर्णन अपने लोगों के साथ समय व्यतीत करने, उनका अपने लोगों के जीवन में सम्मिलित होना के रुप में किया गया है। आप का इतिहास जो सुसमाचार, क्रूस और कलीसिया के प्रति वफादारी में गढ़ा गया है परिवारों में एक दूसरे के बीच एक सच्ची संक्रामक विश्वास की शक्ति के रुप में प्रसारित हुई है। आज हमें इन सब के प्रति शुक्रगुजार होने की जरूरत है विशेष कर आप ने अपने हाथों से माता की सच्ची करुणामय सुरक्षा का स्पर्श किया है जिसकी आराधना करने हेतु मैं एक तीर्थयात्री की रुप में आप के यहाँ आया हूँ।

हम माता की ओर नजरे फेरें जिनकी आँचल तले हम जमा हुए हैं। हमारे सम्पूर्ण इतिहास को मरियम के प्रेमपूर्ण धागे ने पिरो कर रखा है। आज हमारे बीच यदि कोई महान कार्य जिसकी महिमा होती है तो यह माता मरियम की सहायता से पूरी हुई है। माता मरियम में येसु अपने को प्रकट करते हैं। वे हमारे लिए सीढ़ी स्वरूप हैं जिसे के द्वारा येसु हमारे पास आते और हम उनके पास पहुँचते हैं। वे समय की परिपूर्णता की सबसे बड़ी निशानी हैं।

संत पापा ने कहा कि माता मरियम के जीवन में हम उसी नम्रता को देखते हैं जो ईश्वर को प्यारी लगी। वे उनसे अति प्रसन्न थे अतः उन्होंने अपने को उनके द्वारा हमें प्रकट किया जिससे कुंवारी ईश्वर की माता बन सके। आप उनके सानिध्य में आते हैं वे सदा आप सभों को नम्रता में सुसमाचार के प्रति निष्ठावान बनाये रखे।

काना में जिस तरह माता मरियम ने हमें अपनी निकटता और सहायता एक एहसास दिलाया जिससे हम अपने जीवन की अवश्यक चीजों को पा सकें वैसे ही वे यासना गोरा में भी हमारी मदद करें। वे माता के रुप में सदैव हमारी सहायता करती हैं अतः वे अपनी उपस्थिति और सलाह के द्वारा हमें अपने समुदायों में शीघ्र न्याय और टीका-टिप्पणी से दूर रहने में मदद करी। एक माता स्वरूप वह हमें एक परिवार के रूप में एक दूसरे से संयुक्त रहने की कामना करती हैं। एकता के कारण ही आप लोगों ने अपने बीच कठिन परिस्थितियों का सहजता से सामना किया है। माता मरियम जो क्रूस के नीचे और पवित्र आत्मा की प्रतीक्षा हेतु प्रार्थना के द्वारा चेलों का साथ देती रहीं आप सब को अपने जीवन की दर्द भारी पुरानी यादों को भूलने में मदद करें।

काना के विवाह भोज में माता मरियम एक महान सच्चाई को दिखलाती हैं। वह एक माता है जो लोगों की समस्याओं को अपने हृदय में लेकर उनके निवारण हेतु कार्य करती है। वे हमारी तकलीफों को समझती और उनका निदान सावधानी, कुशलता और निर्णायक ढ़ग से करती हैं। वह न तो निरंकुश है और न ही दखल देती हैं लेकिन वह एक मां और एक सेविका हैं। हम उनसे कृपा की याचना करें कि हम उन्हें उनकी संवेदनशीलता और उनकी सृजनात्मकता के अनुरूप जरूरतमंदों की सेवा करते हुए यह अनुभव कर सकें कि निःस्वार्थ, बिना भेदभाव और पक्षपात से की गई दूसरों की सेवा हमें कितनी खुशी प्रदान करती है। माता मरियम जो खुशी का श्रोत हैं जो पापों के जंजाल और इतिहास के उथल-पुथल में हमें शांति प्रदान करती हैं हमारे लिए पवित्र आत्मा से कृपा की याचना करें जिससे हम निष्ठावान सेवक बने रहें। संत पापा ने अपने प्रवचन के अंत में कहा कि हम सभी चीजों को छोटे रुप में करते हुए खुले हृदय से दूसरों की सहायता कर सकें।


(Dilip Sanjay Ekka)

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