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संत पापा का क्षमा की महत्ता पर संदेश

In Church on August 5, 2016 at 3:02 pm


वाटिकन रेडियो, शुक्रवार, 5 अगस्त 2016 (सेदोक) करुणा की जयन्ती वर्ष में फ्राँसिसकन धर्मसमाज की 800वीं वर्षगाँठ के अवसर पर संत पापा फ्राँसिस ने बृहस्पतिवार को इटली के शहर आसीसी की व्यक्तिगत तीर्थयात्रा की और क्षमा की महत्ता पर विश्वासियों को अपना संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि हम केवल क्षमाशीलता के मार्ग में चल कर ही कलीसिया और विश्व को नवीकृत कर सकते हैं। उन्होंने इस बात पर खेद जताते हुए कहा, “बहुत सारे लोग हैं जो क्रोध और घृणा से वशीभूत हैं क्योंकि वे क्षमा करने में अपने को असमर्थ पाते हैं। उन्होंने कहा, ऐसे लोग अपना जीवन तो बर्बाद करते ही हैं अपने इर्दगिर्द रहने वालों का जीवन भी दूभर बना देते हैं।”

संत पापा ने उक्त बातें आसीसी शहर के पोरसीऊकोला गिरजाघर में अपने मौन प्रार्थना के पूर्व दूतों की संत मरिया महागिरजाघर में विश्वासियों को अपने संबोधन के दौरान कही। विदित हो की इटली के संत फ्राँसिस ने तेरहवीं शताब्दी में फ्राँसिसकन धर्मसमाज की स्थापना की जो अपनी 800वीं वर्षगाँठ मना रहा है।

महागिरजाघर के अन्दर लोगों को अपने संबोधन के उपरान्त फ्रांसिसकन धर्मसमाज के अधिकारियों और पेरुजिया के इमाम से अपनी मुलाकात के पूर्व संत पापा ने करीब एक घण्टे का समय देते हुए 19 लोगों के पापस्वीकार सुने। इसके बाद उन्होंने रोगियों के निवास में जा कर धर्मसमाज के बीमारी लोगों से मुलाकात की और अंत में अन्य तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए पुनः क्षमादान के महत्व पर बल दिया।

संत पापा ने कहा कि प्रचीन रीति के अनुसार प्रिय भाई और बहनों मैं उस बात की याद करना चाहूँगा जब संत फ्रांसिस ने इसी स्थान पर शहर के लोगों और धर्माध्यक्षों की उपस्थिति में कहा था, “मैं आप सभों को स्वर्ग भेजना चाहता हूँ।” बेचारे आसीसी के संत फ्रांसिस, मुक्ति के उपहार, अनंत जीवन और अनंत खुशी से और अच्छी चीज क्या मांग सकते थे जिसे येसु ने हमारे लिए अपने मृत्यु और पुनरुत्थान द्वारा प्राप्त किया?

स्वर्ग का राज्य क्या है यदि हम प्रेम के रहस्य, जो हमें अनंत ईश्वर से संयुक्त करता है मनन न करें। कलीसिया ने सदैव इस विश्वास को अपने संतों के समुदाय में विश्वास करते हुए घोषित किया है। हम अपने विश्वास में अकेले नहीं हैं, इसे हम अपने प्रियजनों की एकता और संतों के साथ अपने संबंध में व्यक्त करते हैं जिन्होंने खुशी पूर्व अपने सरल जीवन के द्वारा विश्वास का साक्ष्य दिया है। यह हमारे बीच एक अदृश्य संबंध है जहाँ हम बप्तिस्मा के द्वारा एक शारीर और आत्मा के अंग बनते हैं। संत फ्राँसिस असीसी ने संत पापा अनेरियुस तृतीय से उनकी पोरसीऊकोला की यात्रा के दौरान दंड मोचन की मांग की जो हमारा ध्यान येसु ख्रीस्त के उन वचनों की ओर इंगित कराता है, “मेरे पिता के यहाँ बहुत से निवास स्थान हैं। यदि ऐसा नहीं होता, तो मैं तुम्हें बता देता, क्योंकि मैं तुम्हारे लिए स्थान का प्रबंध करने जा रहा हूँ। मैं वहाँ जा कर तुम्हारे लिए स्थान का प्रबंध करने के बाद फिर आऊँगा और तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा, जिससे जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम भी रहो।(यो.14.2-3)

संत पापा ने कहा कि क्षमा हमारे लिए सीधे तौर से स्वर्ग में स्थान निश्चित करता है। पोरसीऊकोला में यहाँ सभी चीजें क्षमा के बारे में कहती हैं। ईश्वर ने हमें क्षमा की शिक्षा देते हुए कितना सुन्दर उपहार दिया है और इस तरह हम ईश्वर पिता की दया का स्पर्श करते हैं। हमने येसु के दृष्टान्त को सुना जो हमें क्षमा की शिक्षा प्रदान करती है। संत पापा ने कहा कि हमें अपने अपराधी को क्यों क्षमा करनी चाहिए? क्योंकि हम पर पहले असीम दया की गई है। दृष्टान्त ठीक इसी बात की चर्चा करता है कि जिस तरह ईश्वर ने हमें क्षमा कर दिया है हमें भी एक दूसरे को उसी तरह क्षमा करना चाहिए जो हमारे विरुद्ध अपराध करते हैं। अपने “हे पिता” की प्रार्थना में भी येसु हमें यही कहते हैं, “हमारे अपराधों को क्षमा कर जैसे हम भी अपने अपराधियों को क्षमा करने हैं।” कर्ज ईश्वर की नज़रों में अपराध है जिसे वे माफ करते हैं अतः हमें भी अपने क़र्जदारों को अपनी ओर से क्षमा करने की जरूरत है।

हम में से प्रत्येक दृष्टान्त के सेवक समान कर्ज के भारी बोझ से दबे हुए हैं और जिसे हम कभी चुका नहीं सकते। जब हम पुरोहित के पास पापस्वीकार के दौरान घुटने टेकते हैं तो हम ठीक वैसा ही करते हैं जैसा कि सेवक ने अपने स्वामी के साथ किया। हम कहते हैं, “प्रभु हम पर रहम कीजिए।” हमें अपने बहुत सारी गलतियों का एहसास है और हम कई बार अपने पुराने पापों में गिर जाते हैं फिर भी येसु अपनी ओर से हमें क्षमा देने हेतु नहीं थकते जब हम उनसे क्षमा की याचना करते हैं। वे हमें पूरी तरह माफ कर देते हैं यद्यपि हम उन्हीं पापों में फिर गिर जाते हैं। वे दया के सागर हैं जो हमें प्रेम करना कभी बंद नहीं करते हैं। दृष्टान्त के स्वामी की तरह, ईश्वर करुणा से भर जाते हैं जिन में दया और प्रेम का समिश्रण है जिसकी चर्चा सुसमाचार हमारे लिए करता है। हम जब कभी पश्चाताप करते हैं पिता करुणा से भर जाते हैं और वे हमारे हृदयों को शुद्ध कर हमें शांति में घर भेजते हैं। वे हमसे कहते हैं कि सभी चीजें की भरपाई और माफी हो गई है। ईश्वरीय दया की कोई सीमा नहीं है। यह सभी चीजों से बृहद है जिसकी कल्पना हम नहीं कर सकते हैं और यह उन सबों के हृदय में आती है जो अपनी गलती का एहसास करते हुए उनके पास लौट आने की इच्छा रखते हैं। ईश्वर उस हृदय की ओर देखते जो क्षमा की याचना करता है।

हमारे लिए कठिनाई दुर्भाग्यवश उस समय होती है जब हमें अपने भाई बहनों को क्षमा करना होता  है जो हमारे विरूद्ध छोटी गलती करते हैं। दृष्टान्त की प्रतिक्रिया इसे उचित तरीके से व्यक्त करती है, “उसने उसे पकड़ लिया और उसका गला घोंट कर कहा, “अपना कर्ज चुका दो।” यहाँ हम अपने मानवीय जीवन के नाटकीय क्षणों से रूबरू होते हैं। जब हम दूसरे के कर्जदार हैं तो हम दया की आशा करते हैं लेकिन जब दूसरे हमारे कर्जदार हैं तो हम न्याय की माँग करते हैं। यह व्यवहार येसु के शिष्यों के अनुरूप नहीं है और न ही यह ख्रीस्तीय जीवन जीने का तरीका है। येसु हमें क्षमा करने और असीमित रूप में क्षमा करने की शिक्षा देते हैं। “मैं नहीं कहता कि सात बार तक लेकिन सत्तर गुण सात बार तक।” वे हमें न्याय नहीं अपितु पिता के प्रेम को प्रदान करते हैं। हम दृष्टान्त के अन्तिम कठोर वाक्य को न भूलें, “यदि तुम में से हर एक अपने भाई को पूरे हृदय से क्षमा नहीं करेगा, तो मेरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेगा।” (यो.18.35)

संत पापा ने कहा प्रिय भाईयो एवं बहनो जिस क्षमा का स्रोत संत फ्राँसिस ने अपने को यहाँ पोसीऊकोला हेतु बनाया आठ दशकों के बाद आज भी स्वर्ग को हमारे बीच लेकर आता है। करुणा के इस जयन्ती वर्ष में यह स्पष्ट रुप से झलकता है कि क्षमाशीलता सचमुच में कलीसिया और दुनिया को नया बना सकती है। दुनिया को क्षमा का साक्ष्य देने से हम अछूता न रहे। आज दुनिया को क्षमा की जरूरत है, बहुत सारे लोग हैं जो घृणा और क्रोध को अपने में वहन किये हुए हैं क्योंकि वे क्षमा करने में अपने को असमर्थ पाते हैं। वे अपना जीवन तो बर्बाद करते ही हैं अपने इर्दगिर्द रहने वालों का जीवन भी शांति और खुशी में भरने के बदले अशांत कर देते हैं। आइए हम संत फ्रांसिस से निवेदन करें की वे हमारे लिए विनय करें जिससे हम क्षमा और करुणा का दीन मध्य बन सकें।


(Dilip Sanjay Ekka)

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