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हम प्रकृति के लिए नहीं अपितु प्रकृति के साथ प्रार्थना करें

In Church on September 2, 2016 at 3:39 pm

वाटिकन रेडियो, 02 सितम्बर, 2016 (वी आर) संत प्रेत्रुस महागिरजाघर में प्रकृति हेतु विश्व प्रार्थना सभा के दौरान पुरोहित रानीयेरो कान्तलामेस्सा ने अपने प्रवचन में कहा कि मानव का प्रकृति के प्रति मुख्य उत्तरदायित्व कान देना है।

अपने संदेश में उन्होंने कहा कि असीसी के संत फ्रांसिस ने प्रकृति हेतु प्रार्थना नहीं की वरन् उन्होंने प्रकृति के साथ प्रार्थना किया। उन्होंने कहा कि मानव की महानता ब्रह्माण्ड और इसके जीव जन्तुओं पर विजय पाने में निहित नहीं वरन् कमजोर, ग़रीबों और शक्तिहीनों के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वाहन में है।

अपने प्रवचन के प्रारम्भ में उन्होंने प्रश्न करते हुए कहा कि क्यों मानव अपने में व्यर्थ है फिर भी ईश्वर की नज़रों में मूल्यवान है? हम क्यों अपने को अमर्यादित करते हैं जबकि ईश्वर हमें इतना सम्मान देते हैं? हम यह पूछने के बजाय कि ईश्वर ने हमारी सृष्टि क्यों की, ईश्वर से हम यह क्यों पुछते हैं कि उसने हमारी सृष्टि कैसे की?

ईश्वर ने हमें अपने रुप में बनाया है और इस तरह पृथ्वी में हम सदैव एक दूसरे के जुड़े हुए हैं। हम सब ईश्वर के प्रति रुप हैं और हमारा यह ईश्वरीय रुप तब साक्षात होता है जब हम एक दूसरे के साथ प्रेम का संबंध स्थापित करते हैं कहने का अर्थ जब हम मानव अपने स्वार्थ से ऊपर उठ कर दूसरों के साथ अपना जीवन साझा करते तो हम सच्ची अर्थ में ईश्वर के रुप को धारण करते हैं।

न केवल बाईबल वरन दूसरे धर्मों के धर्मग्रन्थों में भी ईश्वर हमें यह बतलाते हैं कि वे ग़रीबों और कमज़ोरों की रक्षा करते हैं। येसु का शारीर धारण यही दिखलाता है कि वे ग़रीबों, दीन-हीन और शक्तिहीनों के साथ हैं। संत पापा फ्रांसिस अपने विश्व पत्र “लौओदातो सी” में गरीबों के साथ हमारे अंतरंग संबंध और पृथ्वी की कमजोरी की बात कहते हुए इसी तथ्य की चर्चा करते हैं।

लेकिन हमारे जीवन की कठिन परिस्थितियाँ जैसे 23 अगस्त को इटली में आये भयावह भूकंप और उसमें हुई तबाही जैसे दौर में हम यह सवाल करने लगते हैं कि ईश्वर कहाँ हैं, “ईश्वर ऐसे क्षणों में भी हमारे साथ रहते हैं वे उनके लिए स्वर्ग के द्वार खोलते हैं जो उनके द्वार को खटखटाते हैं।” उन्होंने कहा कि मानव के रुप में ईश्वर ने हमें पृथ्वी की देख-रेख करने की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है इसके द्वार हम उनके रुप को देख उनकी महिमा गाते हैं क्योंकि यह सृजनहार का निवास स्थल है। हम विश्वासियों को न केवल सृष्टि के अन्य प्रणियों की आवाज बननी है वरन् उनकी भी जिन्होंने विश्वास के इस कृपा को नहीं पाया है। अपने प्रवचन के अंत में उन्होंने कहा कि आइए हम असीसी के संत फाँसिस की तरह ईश्वर प्रदत्त सृष्टि सभी प्राणियों के साथ मिल कर अपने जीवन दाता की महिमा और स्तुति करें।


(Dilip Sanjay Ekka)

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