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सामाजिक संप्रेषण दिवस विषय पर संचार के सचिवालय से वक्तव्य

In Church on September 29, 2016 at 3:32 pm


वाटिकन, सिटी, बृहस्पतिवार, 29 सितम्बर 2016 (वीआर सेदोक): सामाजिक सम्प्रेषण हेतु बनी परमधर्मपीठीय समिति ने बृहस्पतिवार 29 सितम्बर को, 2017 के लिए विश्व संप्रेषण दिवस की विषयवस्तु की घोषणा की।

विश्व संप्रेषण दिवस हेतु आगामी विषयवस्तु होगी, ″डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ। (इसा.43:5) हमारे समय में आशा एवं विश्वास का प्रचार।″

सामाजिक संप्रेषण दिवस पर दिये गये वक्तव्य में वाटिकन संचार के सचिवालय ने कहा, ″विवेक की शून्यता अथवा मायूसी को अपने बीच स्थान देना, ये दो संभावनाएँ हैं जिनके द्वारा आज संचार प्रणाली रोगग्रस्त हो सकती हैं। जैसा कि संत पापा कहते हैं यह सम्भव है कि पेशे की भावना, नेता उन्मुख विचार एवं शहरी केंद्रित हो जाने के कारण हमारा अंतःकरण शून्य हो सकता है, गरीब एवं आवश्यकता में पड़े लोगों से हमारा ध्यान हट सकता है और लोगों के द्वारा झेली जा रही जटिलताओं को नजरंदाज करने के कारण हम उनसे दूर चले जा सकते हैं।कहा गया कि मायूसी तब भी आ सकती है जब संचार पर बहुत ध्यान दिया जाए तथा यह लोगों के लिए कौतूहल का कारण बन जाय।

वक्तव्य में कहा गया है कि इस कोलाहल के बीच भी एक दबी आवाज सुनाई देती है, ″डरो मत मैं तुम्हारे साथ हूँ। (इसा.43:5) अपने पुत्र द्वारा ईश्वर प्रत्येक मानव परिस्थिति में अपनी एकात्मता व्यक्त करते हैं तथा यह प्रकट करते हैं कि हम अकेले नहीं हैं क्योंकि हमारे एक पिता हैं जो अपने पुत्र-पुत्रियों को कभी नहीं भूलते। जो लोग ख्रीस्त के साथ संयुक्त होकर जीते हैं वे अंधकार एवं मृत्यु के बीच भी प्रकाश एवं जीवन के लिए स्थान प्राप्त करते हैं। हर घटना में वे यह देखने का प्रयास करते हैं कि ईश्वर और मानवता के बीच क्या हो रहा है, यह समझने के लिए की किस तरह, इस दुनिया की नाटकीय परिदृश्य के द्वारा वे मुक्ति का इतिहास लिख रहे हैं। ख्रीस्तीयों के पास लोगों को बतलाने के लिए सुसमाचार है क्योंकि हम ईश राज्य की आशा पर सच्चाई से चिंतन करते हैं।″

वक्तव्य में बतलाया गया है कि, ″आगामी विश्व संप्रेषण दिवस की विषयवस्तु एक निमंत्रण है यह बतलाने के लिए कि विश्व का इतिहास तथा स्त्री एवं पुरुषों का इतिहास सुसमाचार के तर्क के अनुरूप है जो स्मरण दिलाता है कि ईश्वर का पितृत्व का गुण किसी परिस्थिति एवं व्यक्ति के लिए कभी समाप्त नहीं होता अतः आइये, हम इतिहास के प्रति निष्ठा एवं आशा का प्रचार करना सीख़ें।″

 


(Usha Tirkey)

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