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विमान में संत पापा की पत्रकारों से बातचीत

In Church on October 3, 2016 at 3:25 pm


विमान, सोमवार, 3 अक्टूबर 2016 (वीआर सेदोक): जोर्जिया और अजरबैजान की तीन दिवसीय प्रेरितिक यात्रा समाप्त कर संत पापा फ्राँसिस रविवार 2 अक्तूबर को रोम वापस लौटे जहाँ विमान में यात्रा करते हुए उन्होंने पत्रकारों से मुलाकात की तथा ख्रीस्तीय एकता, विवाह, तलाक, समलैंगिकता तथा हर लिंग को पहचान दिये जाने पर आधारित, उनके कई सवालों का जवाब दिया।

जोर्जिया और अजरबैजान की प्रेरितिक यात्रा पर किन बातों ने उन्हें अधिक प्रभावित किया, जोर्जिया के सार्वजनिक प्रसारणकर्ता खेतेवान कारदावा के इस सवाल का जवाब देते हुए संत पापा ने कहा, ″जोर्जिया में दो बातों ने मुझे आश्चर्यचकित किया, पहला जोर्जिया की बहुसंस्कृतियाँ, लोगों का दृढ़ विश्वास तथा बहुत अधिक ख्रीस्तीयता की भावना जिनकी कल्पना मैंने नहीं की थी।…ये लोग विश्वासी हैं तथा प्राचीन ख्रीस्तीय संस्कृति से आते हैं। उनके कई शहीद हैं। मैंने उन बातों को जाना जिनका ज्ञान मुझे नहीं था। दूसरी विस्मयकारी बात थी, प्राधिधर्माध्यक्ष। वे ईश्वर के व्यक्ति हैं। उन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया है।″

संत पापा ने काथलिक एवं ऑर्थोडोक्स कलीसिया के बीच एकता पर बातें करते हुए धार्मिक सिद्धांतों की चर्चा करने से इन्कार करते हुए व्यवहारिक बातों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हम एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करें जो कि अधिक महत्वपूर्ण है तथा ग़रीबों के लिए एक साथ काम करें। यदि कोई समस्या हो तो मिलकर उसका समाधान करें, विस्थापन की समस्या के हल हेतु एक साथ उपाय निकालें। हम दूसरों की भलाई करें। हम यही कर सकते हैं क्योंकि यह ख्रीस्तीय एकता का रास्ता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक सिद्धांत का रास्ता बाद में आता है किन्तु हमें शुरू करने के लिए  पहले एक साथ चलना होगा। यह भली इच्छा के द्वारा इस पर सफल हो सकते हैं। हमें इसे जरूर अमल करना चाहिए।

अर्मिनिया और अजरबैजान के बीच स्थायी शांति स्थापित करने के लिए क्या करना चाहिए के जवाब में संत पापा ने कहा कि वार्ता तथा न्यायोचित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता ही इसके लिए आगे बढ़ने का एक मात्र रास्ता है। उन्होंने कहा, ″मैं विश्वास करता हूँ कि वार्ता ही एक रास्ता है, बिना किसी लेन देन के एक उदार वार्ता।″

संत पापा ने विमान में पत्रकारों से, शांति-निर्माण हेतु ख्रीस्तीयों के कर्तव्य पर प्रकाश डालते हुए कहा, ″ख्रीस्तीयों को शांति हेतु प्रार्थना करनी चाहिए क्योंकि वार्ता, समझौता अथवा अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के रास्ते पर चलते हुए इस तरह की समस्याओं पर निजात पाया जा सकता है।″


(Usha Tirkey)

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