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नये कार्डिनल करुणा के जीवित उदाहरण बनें, संत पापा

In Church on November 19, 2016 at 4:14 pm

 

वाटिकन सिटी, शनिवार, 19 नवम्बर 2106 (वीआर सेदोक): ″प्रिय नव नियुक्त कार्डिनल भाइयो, स्वर्ग की ओर यात्रा की शुरूआत मैदान से होती है, दैनिक जीवन के टूटने,  बांटे जाने, दूसरों के लिए खर्च किये जाने एवं साक्षा किये जाने के द्वारा होती है। हम जो हैं उसका चुपचाप प्रतिदिन दान किये जाने के द्वारा। पर्वत शिखर पर चढ़ने का अर्थ है प्रेम द्वारा, अपने लक्ष्य एवं आकांक्षाओं के साथ सामान्य जीवन में, ईश प्रजा की संगति में, क्षमाशीलता एवं मेल-मिलाप के योग्य बनना।″ यह बात संत पाप फ्राँसिस ने शनिवार को कार्डिनल मंडल हेतु नये कार्डिनलों की रचना के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर में ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए प्रवचन में कही।

प्रवचन में संत पापा ने संत लूकस रचित सुसमाचार पर चिंतन किया जहाँ येसु उपस्थित जनता को उपदेश देते हुए प्रेम पर की शिक्षा देते हैं। बारह प्रेरितों के चुनाव के बाद येसु अपने शिष्यों के साथ उस मैदान पर गये जहाँ विशाल जनसमूह उनका उपदेश सुनने एवं रोगों से चंगा किये जाने के लिए एकत्रित था।

प्रेरितों का बुलावा उस दृश्य से जुड़ा था जहां येसु असंख्य लोगों से मुलाकात करने एक मैदान पर गये, सुसमाचार कहता है कि वहाँ लोग परेशान स्थिति में उनका इंतजार कर रहे थे।

संत पापा ने कहा कि चेलों को पर्वत के ऊपर ले जाने के बदले, उनकी नियुक्ति मैदान पर उस भीड़ के हृदय में प्रवेश करने के लिए की गयी थी जो दैनिक जीवन से परेशान थी। प्रभु प्रेरितों और हमें भी दिखाते हैं कि मैदान या दैनिक जीवन के सामान्य कार्यों के द्वारा भी सच्ची ऊँचाई तक पहुँची जा सकती है जबकि मैदान हमें एकचित होने का स्मरण दिलाता है और सबसे बढ़कर यह एक बुलाहट है, ″अपने स्वर्गिक पिता जैसे दयालु बनो।″ (लू.6:36)

यह बुलाहट उन चार आज्ञाओं द्वारा पूर्ण होती है जिसको उन्होंने अपने शिष्यों के प्रशिक्षण हेतु प्रस्तुत किया। इन चार आज्ञाओं को आत्मसात करने के द्वारा ही वे येसु के शिष्य होने की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। संत पापा ने कहा कि येसु शिष्यों को प्रेम एवं भलाई करने, आशीर्वाद देने एवं प्रार्थना करने की आज्ञा देते हैं जिसको हम अपने मित्रों के साथ आसानी से कर सकते हैं किन्तु शत्रुओं के साथ नहीं। कठिनाई तब शुरू हो जाती है जब वे शत्रुओं से प्रेम करने, घृणा करने वालों की भलाई करने, अभिशाप देने वालों को आशीर्वाद देने एवं जो दुर्व्यवहार करते हैं उनके लिए प्रार्थना करने की आज्ञा देते हैं। (cf. vv. 27-28).

हम जिन्हें अपना शत्रु समझते हैं उनके लिए इन सारी चीजों को पूरा करना निश्चय ही आसान नहीं है क्योंकि स्वाभाविक रूप से हमारे मन में उनके प्रति तिरस्कार करने, उन्हें बदनाम या श्राप देने की भावना उठती है जबकि येसु हमें अपने दुशमनों के साथ उसके ठीक विपरीत आचरण अपनाने  की प्रेरणा देते हैं। हमें उन्हें प्रेम करना है, उनकी भलाई करनी है उन्हें आशीर्वाद देना है तथा उनके लिए प्रार्थना करना है।

संत पापा ने कहा कि ईश्वर के हृदय में कोई शत्रु नहीं है। सभी उनके पुत्र-पुत्रियाँ हैं। हम मनुष्य दीवार का निर्माण करते, घेरा बनाते और लोगों के ऊपर लेबल लगाते हैं। चूँकि सभी उनकी संतान हैं ईश्वर उनके प्रति प्रेम में पूर्ण रूप से निष्ठावान हैं। उनका प्रेम एक पिता का प्रेम है जो हमें कभी नहीं छोड़ते ऐसे क्षणों में भी जब हम उनसे दूर चले जाते हैं।

दुनिया को प्रेम करने के लिए वे हमारे भले इंसान बनने का इंतजार नहीं करते हैं और न ही बेहतर बनने का। वे हमें प्रेम करते हैं क्योंकि उन्होंने हमें प्रेम करने के लिए चुना है, उन्होंने हमें अपने पुत्र-पुत्रियाँ बनाया है। उन्होंने हमें उस स्थिति में भी प्यार किया है जब हम शत्रु थे। सभी लोगों के प्रति पिता के बेशर्त प्रेम ही हमारे हृदय परिवर्तन का कारण है। इस बात से अवगत होना कि ईश्वर प्रेम करना उन लोगों को भी जारी रखते हैं जो उनका बहिष्कार करते, हमारी प्रेरिताई के लिए दृढ़ता एवं प्रोत्साहन का स्रोत है।

संत पापा ने नव निर्मित कार्डिनलों को वर्तमान परिस्थिति से अवगत कराते हुए कहा कि हमारा यह युग गंभीर वैश्विक समस्याओं और मुद्दों का है। हम ऐसे काल में जी रहे हैं जहाँ ध्रुवीकरण तथा बहिष्कार तेजी से बढ़ रहे हैं तथा माना जाता है कि संघर्ष के समाधान हेतु यही एक मात्र रास्ता है। संत पापा ने कहा कि विस्थापितों एवं शरणार्थियों को शत्रु मानकर भय की दृष्टि से देखा जाता है। वे दुश्मन माने जाते हैं क्यों वे दूर देश एवं अलग रिवाजों से आये हैं, उनके रंग, भाषा एवं सामाजिक स्तर अलग हैं। वे दुश्मन के रूप में इस लिए भी देखे जाते हैं क्योंकि उनके विचार एवं आस्था भिन्न हैं। हमारी भिन्नताएँ विरोध, भय एवं हिंसा के चिन्ह बन जाते हैं। ध्रुवीकरण का जहर एवं दुश्मनी की भावना हमारी सोच, अनुभव एवं कार्यों में व्याप्त हो जाती है।

संत पापा ने कहा कि हम इनसे अछूते नहीं हैं और हमें ऐसी भावनाओं के प्रति सजग रहना चाहिए कि यह हमारे हृदय में जगह न ले ले, क्योंकि यह कलीसिया की समृद्धि एवं व्यापकता के विपरीत है जो कार्डिनलों की मंडली से स्पष्ट होता है। वे विभिन्न देशों, परम्पराओं, रंग, भाषा तथा सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं किन्तु ये सारी विविधताएँ उन्हें एक-दूसरे के दुश्मन नहीं बनाते बल्कि उन्हें समृद्धि करते हैं। संत पापा ने कार्डिनलों का आह्वान किया कि वे पिता के समान दयालु बनें।


(Usha Tirkey)

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