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युवा पीढ़ी स्वस्थ समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़े

In Church on December 1, 2016 at 3:00 pm

 


वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 1 दिसम्बर 2016 (वीआर सेदोक): ″प्रिय युवाओ, संत पापा जॉन पौल द्वितीय ने आपको ‘प्रातः प्रहरी’ की संज्ञा दी है, मैं आपको प्रोत्साहन देता हूँ कि आप प्रत्येक दिन अपनी नजर ख्रीस्त एवं इतिहास पर रखें ताकि आप येसु की मुक्ति की घोषणा करने तथा दुनिया में उनके प्रकाश को फैलाने के लिए सक्षम हो सकें जो बहुधा उदासीनता, स्वार्थ और युद्ध के अंधकार से धुंधला हो गया है।″ यह बात संत पापा फ्राँसिस ने बृहस्पतिवार 1 दिसम्बर को अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की प्रेरितिक देखभाल हेतु चौथे वर्ल्ड कांग्रेस के प्रतिभागियों से वाटिकन के क्लेमेंटीन सभागार में मुलाकात करते हुए कही।

अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की प्रेरितिक देखभाल हेतु चौथे वर्ल्ड कांग्रेस का आयोजन अप्रवासियों एवं घुमंतू लोगों की प्रेरितिक देखभाल हेतु बनी परमधर्मपीठीय समिति के तत्वधान में की गयी है। जिसकी विषयवस्तु, स्वस्थ समाज के मद्देनजर अंतरराष्ट्रीय छात्रों के बीच नैतिक चुनौतियों से संबंधित है।

संत पापा ने कहा, ″इस उद्देश्य को ध्यान में रखना है कि एक स्वस्थ समाज का निर्माण करना है। यह महत्वपूर्ण है कि युवा पीढ़ी इस दिशा में आगे बढ़े, जिस वास्तविकता में वह जी रहा है उसके प्रति उत्तरदायी हो तथा भविष्य का निर्माण करे।″

संत पापा ने आधुनिक युग की नैतिक चुनौतियों को सामने रखते हुए कहा कि आज कई चुनौतियाँ हैं और सच्चाई एवं मूल्यों को अभिपुष्ट करते हुए, विशेषकर, जब हम एक युवा हैं तो उसका सामना करना बहुधा आसान नहीं होता है। किन्तु ईश्वर की कृपा से तथा उसे पूरा करने के अपने उदार भावनाओं द्वारा सभी बाधाओं को दूर किया जा सकता है।

संत पापा ने विद्यार्थियों से मुलाकात कर प्रसन्नता व्यक्त की कि वे अधिक मानवीय विश्व के निर्माण में सहयोग देने हेतु सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। उन्होंने प्रोत्साहन दिया कि वे इस कार्य में कभी न रूकें, कभी हतोत्साहित न हों क्योंकि यदि वे ख्रीस्त की आत्मा की आवाज सुनेंगे तो वह उनका संचालन करेगा।

संत पापा ने स्वस्थ समाज के निर्माण में बौद्धिक ज्ञान को महत्वपूर्ण बतलाया क्योंकि इसके द्वारा वे कई चीजों का अध्ययन कर सकते हैं तथा उसके द्वारा भले समाज के निर्माण को सहयोग मिलता है। उन्होंने कहा, ″ज्ञान समाज के समग्र विकास हेतु एक सरल रास्ता है।″ ज्ञान प्राप्त करने के द्वारा वे न केवल अपने देश की किन्तु बाहर की संस्कृति, भाषा एवं परम्पराओं को भी सीखते हैं। इस प्रकार उनके विचारों में बदलाव आता है एवं वे अपने भय से ऊपर उठते हैं। जो उन्हें अधिक सहिष्णु एवं स्वीकार्य मनोभाव प्रदान करता है।

संत पापा ने शिक्षकों एवं शिक्षण की प्रेरितिक से जुड़े लोगों से अपील की कि वे युवाओं में सुसमाचार के प्रति प्रेम जगायें ताकि वे उसे ठोस रूप में जी सकें तथा उसका प्रचार दूसरों के बीच कर सकें। इस प्रकार युवा जो सच्चाई की खोज में हैं उन्हें प्रशिक्षित करने के द्वारा मूल्यों की रक्षा के लिए उन्हें तत्पर किया जा सकें तथा स्वस्थ समाज में मुख्य स्तम्भ करुणा एवं उदारता की भावना को जीने हेतु प्रोत्साहन दिया जा सके।

संत पापा ने युवाओं को इस बात की भी जानकारी दी कि आसानी से श्रम की दुनिया में प्रवेश करने हेतु व्यक्तिगत एवं सांस्कृतिक समृद्धि मददगार है। इसके द्वारा समाज में जगह बनती है तथा वे उसके अभिन्न अंग बन जाते हैं।

संत पापा ने सभी विद्यार्थियों को प्रोत्साहन दिया कि वे ख्रीस्त एवं इतिहास पर निगाह रखें ताकि वे येसु की मुक्त की घोषणा एवं उदासीनता एवं स्वार्थ भरे विश्व में उनके प्रकाश को फैला सकें।


(Usha Tirkey)

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