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हम में येसु को देखने की चाह कितनी है

In Church on January 6, 2017 at 4:28 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 06 जनवरी 2017 (सेदोक) संत पापा फ्रांसिस ने संत पेत्रुस के महागिरजाघर में प्रभु प्रकाश के महोत्सव पर पवित्र मिस्सा बलिदान अर्पित किया और अपने प्रवचन में कहा कि ज्ञानी हमारा ध्यान विश्वासियों की ओर करते हैं जो अपने जीवन में येसु को देखने की चाह रखते हैं।

“यहुदियों के नवजात राजा का जन्म कहाँ हुआ है? हमने उनका तारा उदित होते देखा। हम उन्हें दण्डवत् करने आये हैं।” इन शब्दों के द्वारा ज्ञानी दूर देश से यात्रा करते हुए नवजात राजा की आराधना करने आते हैं। वे उन्हें देखने और उनकी पूजा करने आते हैं। ये दो कार्य सुसमाचार में मुख्य रुप से उभर कर आते हैं। हमने उनका तारा उदित होते देखा और हम उसकी आराधना करना चाहते हैं।

ज्ञानियों ने तारा को देखा जो उन्हें राजा की खोज हेतु प्रेरित करता है। उन्हें आकाश में कुछ असाधारण चमकते घटनाओं की एक पूर्ण श्रृंखला देखी। तारा उनके लिए ही केवल नहीं चमका और न ही उन्हें कोई विशेष गुण मिला था जिसके कि वे उसे देख सकें। कलीसिया का आचार्य जोन क्रिसोस्तम करते हैं ज्ञानियों ने तारा को देखा और उसके बाद निकले, ऐसी बात नहीं है वरन वे निकल पड़े थे और इसी कारण उन्होंने तारा को देखा। उनका हृदय खुला था और अतः उन्होंने आकाश में तारे को देखा जो उनके हृदय में एक हलचल उत्पन्न करती और जिसके द्वारा वे दिशा निर्देशित किये जाते हैं। वे कुछ नई बातों के लिए खुले हुए थे।

संत पापा ने कहा कि ज्ञानी उन विश्वासियों के बारे में हमें कहते हैं जो ईश्वर को अपने जीवन में पाने हेतु लालायित रहते हैं जो अपने स्वर्गीय घर में प्रवेश करने की चाह रखते हैं। ईश्वर को पाने की यह पवित्र चाह विश्वासियों के हृदय की गहराई में उत्पन्न होती है क्योंकि वे जानते हैं कि सुसमाचार कोई बीती हुए घटना नहीं अपितु वर्तमान की बात है। ईश्वर को पाने की चाह हमें सदैव सचेत और सजग रखती है। ईश्वर को पाने की चाह हमारे विश्वास की यादगारी है जो विश्वासियों के समुदाय को जीवित रखती है जो ईश्वर से यह प्रार्थना करते है, “आइए, प्रभु येसु।”

ईश्वर को पाने की इसी तीव्र अभिलाषा ने बुजुर्ग सिमियोन को रोज दिन मन्दिर में लाया जहाँ उन्होंने इस बात पर विश्वास किया कि वह मुक्तिदाता के दर्शन किये बिना ईश्वर के निवास में प्रवेश नहीं करेगा। इसी चाह ने उड़ाव पुत्र को अपने पुराने जीवन का परित्याग करते हुए पिता को पुनः आलिंगन करने हेतु प्रेरित किया। इस अभिलाषा में एक चरवाहा अपनी निन्यानवे भेड़ों को छोड़ कर एक भटकी हुई भेड़ की खोजने हेतु निकलता है। मरिया मगदलेना में ईश्वर को पाने की यही तमन्ना थी जिसके कारण वह मुहँ अंधेरे अपनी स्वामी से मिलने हेतु दौड़ कर कब्र के पास जाती  है।

 संत पापा ने कहा कि ईश्वर से मिलने की हमारी तमन्ना हमें अपनी जीवन के कठिनतम परिस्थितियों से भी निकाल लाती है जो हमें इस बात की अनुभूति दिलाती है कि हमें कोई रोक नहीं सकता। यह हमें रोज़मर्रे के दिनचर्या से ऊपर उठते हुए अपने जीवन की चाह की प्राप्ति हेतु प्रेरित करता है। ईश्वर को पाने की चाह हमें भविष्य की ओर देखने हेतु प्रेरित करता है। विश्वासियों के दिल में ईश्वर से मिलने की चाह उनके विश्वास का फल है जैसा कि ज्ञानियों ने अनुभव किया कि ईश्वर उनका इंतजार कर रहें हैं।

इसके विपरीत राजा हेरोद के महल में एक अलग तरह का मनोभाव है। वे बेतलेहेम से कुछ ही दूरी पर हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि बेतलेहेम में क्या हो रहा है। ज्ञानियों की यात्रा के दौरान सारा येरुसलेम सो रहा होता है। राजा हेरोद भी अपनी ही दुनिया में सोया हुआ है। ज्ञानियों का उनके पास आना और नवजात की खोज पड़ताल करना उसे अश्चर्य, घबराहट और भय से भर देता है। संत पापा ने कहा कि यह घबराहट उनके दिलों में होती है जो सारी जनता और सारी चीजों को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश करते हैं, जो धन और शक्ति के कारण दूसरों को देख पाने में असमर्थ होते हैं। यह आश्चर्य और घबराहट इसलिए होता है क्योंकि वे अपने जीवन में किसी भी कीमत पर जीत हासिल करने की चाह रखते हैं। यह घबराहट हमें अपने जीवन में चुनौती देती और हमें अपनी निश्चितताओं और सुरक्षा की बातों पर जिन में हम अपने को आधारित पाते चिंतन करने का निमंत्रण देती है। राजा हेरोद डर के कारण बच्चों के कत्ल की आज्ञा देता है क्योंकि उसके दिल में भय समाया हुआ है।

संत पापा ने कहा कि ज्ञानी पूर्व से राजा की खोज करते हुए महल में आये क्योंकि साधारणतः एक राजा का जन्म महल में ही होता है। महल शक्ति, सफलता और जीवन में पूर्णतः का बोध करती है।

ज्ञानियों को महल से निकल कर पुनः राजा की खोज हेतु अपनी यात्रा पूरी करनी पड़ी क्योंकि जहाँ वे बालक को खोजने आये, वे दुनिया के राजा का जन्म स्थल नहीं था। यह हमें इस बात की अनुभूति दिलाती है कि ईश्वर उन स्थान में जन्म लेते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं करते हैं, जिसका हम सदैव परित्याग करते हैं। यह हमें बतलाती है कि ईश्वर की नज़रों में घायलों, व्यथित लोगों, दुर्व्यवहार के शिकार और परित्यक्त जनों हेतु एक खास जगह है। उसकी शक्ति और सामर्थ्य करुणा कहलाती है।

हेरोद बालक येसु की आराधना करने में अपने को असमर्थ पाता है क्योंकि जीवन को देखने के उसके नज़रिये नहीं बदलते हैं। वह स्वयं अपनी सेवा पूजा कराने से बाज नहीं आता है। वह सारी चीजों को अपने में हासिल करने और सभी लोगों के द्वारा स्वयं अपनी सेवा पूजा की चाह रखता है। यहां तक कि उसके महल के ज्योतिषी भी बालक येसु की आराधना करने में असमर्थ होते हैं क्योंकि अपने ज्ञान के बावजूद वे अपने जीवन को परिवर्तित करने की चाह नहीं करते हैं।

ज्ञानियों में एक तीव्र अभिलाषा थी जिसके कारण वे साहस के साथ निकलते और यहूदियों के नवजात राजा को पाने पर घुटनों के बल नम्रता पूर्वक झुक कर उनका दंडवत करते हैं क्योंकि एक छोटे गरीब अति संवेदनशील बालक में वे अपनी ईश्वर की महिमा को पाते हैं।


(Dilip Sanjay Ekka)

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