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काथलिक और पूर्वी रीति की कलीसिया के संयुक्त ईशशस्त्रीय वार्ता को संत पापा संदेश

In Church on January 28, 2017 at 9:49 am

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 27 जनवरी 2017 (सेदोक) संत पापा फ्राँसिस ने शुक्रवार 27 जनवरी को काथलिक और पूर्वी रीति की कलीसिया की अन्तराष्ट्रीय संयुक्त ईश शस्त्रीय वार्ता के प्रति अपनी कृतज्ञता के प्रकट करते हुए उन्हें  अपना संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि विगत साल आपने संस्कार विशेष रुप से बपतिस्मा संस्कार की प्रकृति के संदर्भ में विचार मंथन किया था। वास्तव में बपतिस्मा संस्कार है जिससे द्वारा ख्रीस्तीय समुदाय के अंग बनते हैं। काथलिक और पूर्वी रीति दोनों कलीसिया के रुप में संत पौलुस के वचनों को दुहराते हैं “ हम सब–के-सब एक ही आत्मा का बपतिस्मा ग्रहण कर एक ही शरीर बन गये  हैं।” (1 कुरि. 12.13) इस सप्ताह आप ने यूख्ररीस्त के ऐतिहासिक, धार्मिक और आध्यात्मिक पहलुओं की चर्चा की है “जो कि ख्रीस्तीय जीवन का उद्गम और शीर्ष है” जो ईश्वर के लोगों को एकता के सूत्र में पिरो कर रखता है। संत पापा ने कहा मैं विश्वास में आप सभों को प्रोत्साहित करता हूँ कि आप के कार्य हमें जीवन यात्रा में सहायक हो जिससे हम ईश्वर के कृपादानों से परिपूर्ण स्वर्गीय ईश भोज के अंग बन सकें।

संत पापा ने कहा कि कलीसिया के अंग के रुप में आप को प्रतिदिन के जीवन में हिंसा और क्रूरता का साक्ष्य देना होता है। हम उन बातों से अवगत हैं कि ये सारी चीजों गरीबी, अन्याय और सामाजिक बहिष्कार के संदर्भ में पनपती हैं। हमारी पुरानी संस्कृति और आध्यात्मिकता से जुड़े मतभेद हमारे बीच घृणा और द्वेष के भाव उत्पन्न करने हेतु पर्याप्त हैं।  ऐसी परिस्थिति में हम कलीसिया के अंग स्वरूप आशा में बन रहते हुए दुःखियों और घायलों के प्रति अपनी सहानुभूति और विश्व में शांति बहाल हेतु बुलाये जाते हैं।

उन्होंने संत पौलुस के वचनों को उद्धत करते हुए कहा, “यदि एक अंग को पीड़ा होती है, तो उसके साथ सभी अंगों को पीडा होती है, (1कुरि.12,26) आप की पीड़ा हमारी पीड़ा  हैं अतः मैं आप से साथ मिलकर प्रार्थना करता हूँ जिससे लड़ाई का अंत हो और दुःख-दर्द में हम ईश्वर की निकटता का एहसास कर सकें विशेषकर बच्चे, बुजुर्ग और बीमारी जिन्हें अति कष्ट का सामना करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि मेरी सहानुभूति विशेष रूप से धर्माध्यक्षों, पुरोहितों और समार्पित भाई-बहनों और लोकधर्मियों के प्रति हैं जिनका अपहरण किया जाया और उन्हें दासता की जिन्दगी बितानी पड़ी।

हमारे ख्रस्तीय समुदाय लोहू गवाहों और संतों के उदाहरणों से प्रेरित हो जिन्होंने ख्रीस्त के लिए अपने साक्ष्य दिया है। वे हमारे विश्वासी हृदय के बारे में कहते हैं जो मेल-मिलाप और शांति के संदेश से नहीं वरन क्रूसित येसु ख्रीस्त में आधारित हैं जो मृतकों में से जी उठे हैं। वे हमारी शांति और मेल-मिलाप है।(एफि.2.14,2. कुरि.5.18) उनके शिष्यों के रुप में हम धैर्य के साथ उनकी प्रेम पूर्ण नम्रता का साक्ष्य देने हेतु बुलाये गये हैं जो लोगों के मध्य मेल-मिलाप के भाव उत्पन्न करती है।


(Dilip Sanjay Ekka)

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