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भारतीय राज्य के जनजातीय विश्वविद्यालय घोषणा के पीछे ‘राजनीति’

In Church on January 31, 2017 at 3:09 pm

 

नई दिल्ली, मंगलवार, 31 जनवरी 2017 (ऊकान) :  एक समर्थक हिंदू राज्य सरकार द्वारा सिर्फ जनजातीय लोगों के लिए एक विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा के पीछे कलीसिया के नेताओं और कार्यकर्त्ताओं को राजनीतिक वजह होने का संदेह है।

पूर्वी भारत में आदिवासियों का गढ़ झारखंड राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि वे आदिवासियों की उँची शिक्षा हेतु विश्वविद्यालय स्थापित करने की योजना को संघीय सरकार की स्वीकृति का इंतजार कर रहे हैं। झारखंड राज्य में हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का शासन है।

संघीय सरकार से अनुमति मिल जाने पर यह आदिवासियों के लिए दूसरी विश्वविद्यालय होगी। मध्यप्रदेश में पहला जनजातीय विश्वविदयालय इंदिरा गाँधी विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है।

भारतीय धर्माध्यक्षीय सम्मेलन द्वारा गठित आदिवासियों के लिए बने कार्यालय के सचिव फादर स्तानिसलास तिर्की ने सरकार की घोषणा की सराहना की है, जो राज्य के वार्षिक बजट की प्रस्तुति के दौरान किया गया था।

येसु समाजी फादर तिर्की जो, स्वयं एक आदिवासी हैं, ने उका न्यूज से कहा,″ हम सरकार के इस पहल का सेवागत करते हैं। यह आदिवासियों की भूमि में आदिवासी बुद्धिजीवियों और आदिवासियों के सशक्तिकरण का प्रतीक हो सकता है।

उन्होंने कहा,″ हम आशा करते हैं कि राज्य सरकार अपना घोषणा को पूरा करें क्योंकि बहुधा इस तरह की घोषणाएँ सिर्फ राजनीतिक बयान के रूप में ही रह जाती हैं।”

जेवियर संस्थान प्रबंधन (एक्सएलआरआई) के प्रोफेसर अनाबेल बेंजामन बड़ा ने सरकार की घोषणा पर संदेह जाहिर करते हुए कहा, मुझे संदेह है कि यह सिर्फ राजनीतिक बयान मात्र न रह जाए। हमें देखना है कि सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है या नहीं।″

उन्हें हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के पिछले कार्यों की वजह से संदेह है जो एक सदी पुराने लैंड सीलिंग एक्ट में संशोधन जो सरकार को विकास के कार्यों के लिए जैसे स्कूल, रोड और पूल बनाने आदि के लिए आदिवासियों की जमीन का कब्जा करने के लिए अनुमति देता है।

उन्हें हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के पिछले कार्यों की वजह से संदेह है जो एक सदी पुराने लैंड सीलिंग एक्ट में संशोधन जो सरकार को विकास के कार्यों के लिए जैसे स्कूल, रोड और पूल बनाने आदि के लिए आदिवासियों की जमीन का कब्जा करने के लिए अनुमति देता है।

नई दिल्ली में प्रकाशित जनजातीय मामलों पर एक साप्ताहिक पत्रिका के संपादक मुक्ति प्रकाश तिर्की ने कहा कि झारखंड सरकार द्वारा आदिवासियों की उँची शिक्षा हेतु विश्वविद्यालय स्थापित करने की योजना की घोषणा सिर्फ आदिवासियों को शांत करने के लिए किया गया है जिन्होंने सरकार द्वारा अपनी जमीन लिए जाने के खिलाफ विवादास्पद कानून का विरोध किया है। यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है।

आदिवासी कार्यकर्त्ता ग्लैडसन डुँगडुँग ने कहा कि सरकार इस घोषणा से अपने लिए आदिवासी समर्थन को मजबूत करना चाहती है। यदि सरकार आदिवासियों के उत्थान हेतु गंभीर और ईमानदार है तो उसे प्राथमिक शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

उन्होंने कहा, “हम अभी भी ग्रामीण स्तर पर प्राथमिक स्कूल में बच्चों को लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अगर बच्चे प्राथमिक स्कूल और माध्यमिक शिक्षा को भी पूरा नहीं करते हैं तो वे कैसे विश्वविद्यालय में शामिल हो सकते हैं? ”

झारखंड राज्य में 3 करोड़ 30 लाख की आबादी में 26 प्रतिशत अर्थात 9 लाख आदिवासी हैं जिसमें 1 लाख 50 हजार आदिवासी ख्रीस्तीय हैं।


(Margaret Sumita Minj)

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