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अस्तित्व के प्रलोभन में हम कृपाओं को भूल जाते हैं

In Church on February 3, 2017 at 3:49 pm

 

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 03 फरवरी 2017 (सेदोक) संत पापा फ्रांसिस ने येसु के मंदिर समर्पण पर्व के अवसर पर संत पेत्रुस के महागिरजाघर में समर्पित लोगों के लिए पवित्र बलिदान चढ़ाया।

उन्होंने मिस्सा बलिदान के दौरान अपने प्रवचन में कहा कि येसु के माता-पिता संहिता के नियमानुसार येसु को येरुसलेम मंदिर में समर्पित करने हेतु लाये। पवित्र आत्मा से प्रेरित सिमेयोन ने बालक येसु को अपनी बाहों में लिया और धन्यवाद के भजन गाते हुए कहा, “मेरी आंखों ने मुक्ति को देखा है, जिसे तूने सब राष्ट्रों के लिए प्रस्तुत किया है। यह गैर-यहूदियों के प्रबोधन के लिए ज्योति है और तेरी प्रजा इस्रारएल का गौरव।” (लूका.2.30-32) सिमेयोन ने न केवल येसु को देखा वरन् उस बहु-प्रतीक्षित आशा को अपनी बाहों में उठाते हुए ईश्वर की महिमा की। उसका हृदय आनंद से सराबोर हो गया क्योंकि ईश्वर मनुष्यों के बीच निवास करने आते और सिमेयोन ने उनका साक्षात दर्शन किया।

आज की धर्मविधि के अनुसार हमें इस बात का पता चलता है कि जन्म के चालीस दिनों बाद येसु मूसा के द्वारा निर्धारित नियमों को पूरा करते हैं लेकिन सही अर्थ में देखा जाये तो वे अपने विश्वासियों भक्तों से मिलते आते हैं। ईश्वर का अपने लोगों से यह मिलन हमें खुशी और नयी आशा से भर देता है।

सिमेयोन का भजन संत पापा ने कहा कि सच्चा है जहाँ ईश्वर अपने लोगों को कभी निराश नहीं करते हैं।(रोमि,5.5) ईश्वर हमें कभी धोखा नहीं देते हैं। सिमेयोन और अन्ना अपने बुढ़ापे की अवस्था में इस भजन का साक्ष्य देते हैं। आशा में जीवन जीना हमें कितना सुकून प्रदान करती है क्योंकि ईश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करते हैं। येसु अपनी इस प्रतिज्ञा को नाजरेथ के प्रार्थनालय में घोषित करते हैं जहाँ वे बीमारों, बंदियों, परित्यक्त, ग़रीबों, बुजुर्गों और पापियों को निमंत्रण देते हैं कि वे आशा के इस भजन में जीवन व्यतीत करें क्योंकि वे उनके साथ हैं।(लूका.4.18-19)

इस भजन को हमने अपने पुरखों से पाया है। वे हमें इसका अंग बनाते हैं। हमारे लिए यह भजन उनके चेहरे में झलकता है क्योंकि वे अपने प्रतिदिन के जीवन में त्याग करते हैं। हम अपने पुरखों के स्वप्नों के उत्तराधिकारी हैं उनकी आशा के उत्तराधिकारी जो हमारे माता-पिता और हमारे भाई बहनों को निराश नहीं करती है। हम उनकी आशाओं के अधिकारी हैं जिन्होंने स्वप्न देखने का साहस किया और हम से पहले गुजर गये है। उनकी तरह हम भी यह भजन गाना चाहते हैं, “ईश्वर कभी निराश नहीं करते उनपर हमारी आशा हमें हतोत्साहित नहीं करती है।” ईश्वर अपने लोगों से मिलने आते हैं। हम नबी जोवेल के वचनों को अपने जीवन का अंग बनाते हुए गाते हैं, “इसके बाद मैं सब शरीरधारियों पर अपना आत्मा उतारूँगा। तुम्हारे पुत्र और पुत्रियाँ भविष्यवाणी करेंगे, तुम्हारे बड़े-बूढ़े स्वप्न देखेंगे और तुम्हारे नवयुवकों को दिव्य दर्शन होंगे।” (योए.3.1)

हम अपने पुरखों के स्वप्न को, उनकी भविष्यवाणी को जीने में कागर सिद्ध होंगे। ये मनोभाव हमें फलप्रद बनाते हैं। यह हमें परीक्षाओं से बचाता जो हमारे समर्पित जीवन को सूखा बना देता है। एक बुराई हमारे जेहन में प्रवेश करती और हमारे समुदायों का अंग बनती है यह “अस्तित्व का प्रलोभन” है। जीवन में अस्तित्व की चाह हमें भयभीत, प्रतिरोधी, धीमा और हमें अन्दर से बंद कर देती है जहाँ हम अपने ही सोच-विचार में कैद हो जाते हैं। यह हमारे जीवन में हमारे महिमामय दिनों की याद दिलाती है जिसके द्वारा हम वर्तमान समय की चुनौतियों का समाना करने के बदले उनसे दूर भागने की कोशिश करते हैं। अस्तित्व की एक मनोभावना हम से चमत्कारी कार्य करने की शक्ति को छीन लेती है। यह हमें नये पहल करने के बदले एक सुरक्षित स्थल, चहारदीवारी के अन्दर बंद कर देती है। अस्तित्व के प्रलोभन में हम कृपाओं को भूल जाते हैं और प्रेरितिक साक्ष्य देने के अपने बुलावे को दरकिनार कर देते हैं। अस्तित्व के प्रलोभन का वातावरण हमारे बुज़ुर्गों के हृदय को सूखा बना देता है क्योंकि उनमें स्वप्न देखने की क्षमता बंद हो जाती है। इस तरह यह हम नवयुवकों के जीवन में कार्य करने की क्षमता को कुष्ठित कर देती है। अस्तित्व की कामना येसु के शब्दों में प्रेरितिक कार्य की चुनौती और अवसर से हमें दूर ले जाती है।

संत पापा ने कहा कि आइए हम आज के सुसमाचार के दृश्य पर थोड़ा मनन करें। निश्चय ही सिमेयोन और अन्ना का भजन अपने आप में सीमित रहने का परिणाम नहीं था। वे अपने में खोये हुए नहीं थे कि उन्हें क्या होगा। उनके भजन की उत्पत्ति आशा में होती है जो उन्हें अपने वृद्धावस्था में भी संजीव रहने को प्रेरित करती है। अपनी आशा में वे येसु से मिलते और अपनी खुशी के गीत गाते हैं। येसु का अपने लोगों के बीच में आना उन्हें आनंद और खुशी से भर देता है और यही खुशी और आशा हमें अपने अस्तित्व में पड़े रहने के मनोभाव से बचाती है। लोगों के बीच येसु को ले जाना ही हमारे जीवन को फलप्रद तथा हमारे हृदयों को सजीव बनाये रखता है। हम अपने जीवन में बहुमुखी संस्कृति परिवर्तन से वाकिफ हैं अतः दुनिया की इन बड़ी चुनौतियों के मध्य एक समर्पित व्यक्ति के रुप में हमारे लिए यह और भी महत्वपूर्ण है कि हम येसु के साथ एक हो। हमारा प्रेरिताई कार्य हम से ख़मीर बनने की माँग करता है। शायद दूसरे और भी अच्छे आटे हो सकते हैं लेकिन येसु हमें वर्तमान समय की चुनौतियों के बीच ख़मीर बनने हेतु निमंत्रण देते हैं। हमें भयभीत या अपने को सुरक्षित रखने के बदले हल को पकड़ते हुए गेहूँ उपजाने हेतु आगे बढ़ना है यद्यपि हमारे जीवन में बहुत सारे खार पतवार बोये जायेंगे। येसु को लोगों के बीच रखने का अर्थ हमारे लिए एक मनन-चिंतन हृदय वाला व्यक्ति बनने की मांग करता है जो ईश्वर की योजना को जान सके कि कैसे येसु शहर की गलियों में चलते और हमारे पड़ोस में रहते हैं। येसु को लोगों के बीच लाने का अर्थ अपने भाई-बहनों के क्रूस को ढोना है। यह येसु के घावों को दुनिया के घावों में स्पर्श करना है जो रोते हुए चंगाई की आशा करते हैं। यह हमें धर्म के कार्यकर्ता बने को नहीं वरन लोगों के बीच सांत्वना और क्षमा के साथ हमारी उपस्थिति की माँग करता है।

येसु को लोगों के बीच लाने हेतु हमें एक दूसरे से मिलना और उन्हें गले लगाते हुए उनकी सहायता करनी है जिसके द्वारा हम सच्चे साहचर्य और भाई-चारे में एकता की भावना को व्यक्त करते हैं। यदि हम अपने जीवन में ऐसा कर पायेंगे तो यह हमारे लिए अति सुकून दायक आशा से परिपूर्ण कार्य होगा। अपने से बाहर निकलना और दूसरों के साथ मिलना यह हमारे जीवन को आशा और एक नये संगीत से भरता है। यह तब संभव होगा जब हम अपने बुजुर्गों के स्वप्नों और भविष्यवाणी को अपने जीवन का अंग बनायेंगे।

संत पापा ने कहा कि आइए हम येसु का अनुसरण करें जो अपने लोगों के साथ मिलने हेतु जाते हैं। हम बिना शिकायत या विचलित हुए बिना शांति में महिमा के गीत गाते हुए उनके साथ चले जिन्होंने अपने पुरखों के स्वप्नों को भूला दिया है। हम अपने धैर्य में ईश्वर की आत्मा के साथ चले क्योंकि वे स्वप्न देखते और भविष्य वाणी करते हैं। इस तरह हम अपने संगीत को दूसरों के साथ साझा कर पायेंगे जो आशा में जन्म लेती है।


(Dilip Sanjay Ekka)

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