Vatican Radio HIndi

येसु द्वारा संहिता की नई व्याख्या

In Church on February 13, 2017 at 4:24 pm

 

वाटिकन रेडियो, सोमवार, 13 फरवरी 2017 ( सेदोक) संत पापा फ्राँसिस ने 13 फरवरी को अपने  रविवारीय देवदूत प्रार्थना के पूर्व संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में जमा हुए हजारों विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को संबोधित करते हुए कहा,

प्रिय भाई एवं बहनो,

सुप्रभात,

आज का सुसमाचार हमारे लिए पर्वत प्रवचन के एक अन्य अध्याय को प्रस्तुत करता है जिसे हम संत मत्ती रचित सुसमाचार में पाते हैं। (मत्ती.5,17-35) इस अध्याय में येसु अपने वचन सुनने वालों को मूसा द्वारा दी गई संहिता की एक नई व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। पुराने विधान की संहिता में कही गई बातें अपने में सही थीं लेकिन यह पर्याप्त नहीं थीं। येसु संहिता के उन ईश्वरीय नियमों को पूरा करने हेतु आते हैं। येसु संहिता के नियमों की वास्तविकता को एक सच्चे अर्थ में व्यक्त करते और न केवल शिक्षा देते वरन अपनी शिक्षा को वे अपने क्रूस बलिदान के द्वारा पूर्ण करते हैं। संत पापा ने कहा कि वे हमें इस बात की शिक्षा देते हैं कि कैसे ईश्वर की इच्छा को हमें अपने दैनिक जीवन में पूरा करने की माँग की जाती है। प्रेम, सेवा और दया की भावना से प्रेरित होकर हम संहिता के सार को समझे जिससे हम इसके औपचारिक अनुपालन से बचे रहें।

संत पापा ने कहा कि सुसमाचार में येसु हमें तीन बातें, तीन नियमों हत्या, व्यभिचार और शपथ के बारे में कहते हैं।

“मनुष्य की हत्या न करना” इस नियम के बारे में अपना व्याख्यान देते हुए येसु कहते हैं कि यह न केवल मनुष्य के प्राण लेना है वरन ऐसा करने से हम व्यक्ति की सम्पूर्ण गरिमा को चोट पहुँचाते हैं न केवल अपने कृत्य बल्कि अपने व्यवहार और वचनों के द्वारा भी। हमारे द्वारा उच्चरित अपमान के शब्द लोगों की जान नहीं लेते लेकिन उसका प्रभाव उसी हद तक होता है क्योंकि हमारे मन-दिल में व्यक्ति के प्रति दुर्भावना व्यक्त होती है। येसु हमें अपनी गलतियों का हिसाब करने को नहीं बल्कि उनके द्वारा दूसरों पर होने वाले हानि के बारे में हमें सतर्क रहने को कहते हैं। वे हमें इसका उदाहरण देते हुए कहते हैं कि हम अपमान से वाकिफ हैं जो हमारे लिए “हलो” कहने-सा प्रतीत होता है। जो अपने भाई का अपमान करता है वह अपने हृदय में उसे मार डालता है। संत पापा ने कहा,“कृपया हम एक-दूसरे को अपमानित न करें इससे हमें कुछ फायदा नहीं होता है।”

दूसरी बात विवाह के संबंधों की चर्चा करता है जहाँ व्यभिचार मानवीय गरिमा को नष्ट कर देती  है। येसु उस बुराई की जड़ तक जाते हैं। वे कहते हैं जिस तरह हम अपमान के द्वारा किसी की हत्या करते हैं उसी तरह यह व्यभिचार के साथ भी है जहाँ हम दूसरों की स्त्रियों को अपना बनाने की चाह या सोच रखते हैं। व्यभिचार, चोरी, भ्रष्टाचार और अन्य पापों की तरह सर्वप्रथम हमारे हृदय की गहराई में जन्म लेती है। एक बार जब यह हमारे हृदय में घर कर जाती तो हम इसे अपने व्यवहार में मूर्त रूप देने का प्रयास करते हैं। इस तरह येसु कहते हैं, “जो अपनी स्त्री को छोड़ कर दूसरे की स्त्री से संबंध स्थापित करने की सोच रखता है वह अपने हृदय में व्यभिचार करता है।”

येसु अपने चेलों को शपथ नहीं खाने को कहते हैं क्योंकि यह हमारे संबंध में एक असुरक्षा और कपट का निशानी को व्यक्त करती है। यह ईश्वर के आधिपत्य का हनन करना है अतः हमें अपने दैनिक जीवन में, अपने परिवार और समुदाय में स्पष्टता और विश्वास को मजबूत करने की जरूरत है जिससे हम अपने जीवन में ईमानदारी की मिसाल पेश कर सकें। हमारे जीवन में अविश्वास और आपसी संदेह हमारे बीच व्याप्त शांति को भंग कर देती है।

माता मरियम जो अपनी नम्रता में खुशी पूर्वक सभी आज्ञाओं का पालन करती हैं हमें भी सुसमाचार के प्रति निष्ठावान बनाये रखें जिससे हम दिखावा हेतु नहीं वरन सच्चा ख्रीस्तीय जीवन जी सकें। यह पवित्र आत्मा में हमारे लिए संभव होता है जो प्रेम में सारी चीजों को करने हेतु हमें प्रेरित करते हैं जिसे ईश्वर की इच्छा पूरी हो सकें।

इतना कहने के बाद संत पापा ने विश्वासी समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया और फिर
सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए उन्हें रविवारीय मंगलकामनाएँ अर्पित की और अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।


(Dilip Sanjay Ekka)

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