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क्रूसित येसु का अनुसरण करें निराधार ईश्वर की नहीं

In Church on March 2, 2017 at 3:17 pm

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 2 मार्च 2017 (वीआर सदोक): ख्रीस्तीयों के दिशा सूचक यंत्र को क्रूसित येसु का अनुसरण करना है उस ईश्वर का जिसने शरीर धारण किया तथा हमारे भाइयों के घावों को अपने ऊपर लिया। यह बात संत पापा फ्राँसिस ने बृहस्पितवार को वाटिकन स्थित प्रेरितिक आवास संत मर्था के प्रार्थनालय में ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए प्रवचन में कही।

उन्होंने कहा कि चालीसा काल हमें पश्चाताप करने हेतु निमंत्रण दे रहा है तथा यह धर्मविधि हमें तीन सच्चाईयों: मानव, ईश्वर तथा रास्ता के लिए आह्वान कर रही है। सच्चा मानव अच्छाई और बुराई के बीच चुनाव करता है। ईश्वर ने हमें स्वतंत्र बनाया अतः चुनाव हमें करना है किन्तु वे हमें अकेले नहीं छोड़ते। वे हमें आज्ञाओं द्वारा अच्छाई का रास्ता दिखलाते हैं।

दूसरी सच्चाई है ईश्वर। शिष्यों के लिए येसु के क्रूस के रास्ते को समझना कठिन था। ईश्वर ने पाप को छोड़ मानव की हर वास्तविकता को अपने ऊपर लिया, अतएव, ख्रीस्त के बिना कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। ख्रीस्त के बिना अर्थात् शरीरधारण के बिना कोई ईश्वर नहीं है।

सच्चे ईश्वर हमारे लिए ख्रीस्त बनें, हमारी मुक्ति के लिए। जब हम उस सच्चाई से दूर चले जाते हैं उनके क्रूस से भटक जाते हैं जो प्रभु के महान कष्ट की सच्चाई है तब हम उनके प्रेम एवं मुक्ति से भी दूर चले जाते हैं तथा विचारधाराओं के ईश्वर के रास्ते पर चलते हैं। संत पापा ने कहा कि वह सच्चा ईश्वर नहीं है। उन्होंने कहा कि ईश्वर जो हमारे बीच आये, हमें बचाने हमारे करीब रहे तथा हमारे लिए मर गये, वे ही सच्चे ईश्वर हैं।

संत पापा ने एक फ्राँसिसी लेखक द्वारा प्रस्तुत कलीसिया विरोधी तथा ख्रीस्तीय विश्वासी के बीच वार्ता का हवाला देते हुए कहा कि भली इच्छा रखने वाले कलीसिया विरोधी ने विश्वासी से प्रश्न किया कि ख्रीस्त कैसे ईश्वर हो सकते हैं मैं इसे नहीं समझता? तब विश्वासी ने कहा था कि इसे समझना मेरे लिए आसान है कठिन तब हुआ होता जब ईश्वर ख्रीस्त नहीं बने होते। यही ईश्वर की सच्चाई है वह ख्रीस्त बने, एक मानव का रूप लिया और यही करुणा के कार्य की आधारशीला है। भाइयों के घाव ख्रीस्त के घाव हैं क्योंकि ईश्वर मानव बने। संत पापा ने कहा कि इस सच्चाई के बिना हम चालीसा को नहीं जी सकते। हमें मन-परिवर्तन करना है उस निराधार ईश्वर के लिए नहीं बल्कि सच्चे ईश्वर के लिए जो ख्रीस्त बने।

तीसरी सच्चाई ‘मार्ग’ के संबंध में संत पापा ने कहा कि येसु कहते हैं यदि कोई मेरा अनुसरण करना चाहता है वह अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे हो ले।

उन्होंने कहा कि सच्चा मार्ग ख्रीस्त हैं। ख्रीस्त का अनुसरण करते हुए हम पिता की इच्छा पूरी करें। उन्होंने हमें आदेश दिया है अपना क्रूस उठाकर मेरा अनुसरण करो। जो उनका अनुसरण करने हेतु अपना जीवन खो देता है वह उसे पुनः प्राप्त करेगा। हम येसु के रास्ते का अनुसरण करें जिन्होंने हमेशा दूसरों की सेवा की।

संत पापा ने सलाह दी कि क्रूसित येसु का अनुसरण करने का एक मात्र सच्चा रास्ता है क्रूस की मूर्खता। मानव, ईश्वर तथा मार्ग की सच्चाई ख्रीस्तीयों के लिए दिशा सूचक यंत्र है ताकि वे गलत रास्ते पर आगे न बढ़ें।


(Usha Tirkey)

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चालीसा काल पुनः सांस लेने का समय है, संत पापा

In Church on March 2, 2017 at 3:13 pm

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 2 मार्च 2017 (वीआर सेदोक): पुरानी परम्परा को जारी रखते हुए संत पापा फ्राँसिस ने राखबुध के दिन 1 मार्च को, रोम के संत सबीना महागिरजाघर में ख्रीस्तयाग का अनुष्ठान किया।

चालीसे की शुरूआत करते हुए संत पापा ने ख्रीस्तयाग प्रवचन में नबी योएल के ग्रंथ से लिए गये पाठ पर चिंतन किया, जहां लिखा है, ″पूरे हृदय से मेरे पास लौट आओ… प्रभु के पास लौट जाओ।″ संत पापा ने कहा कि ये शब्द हम प्रत्येक पर लागू होता है। हम प्रत्येक पिता के करूणावान प्रेम की ओर लौटना चाहते हैं।″

उन्होंने कहा, ″चालीसा एक रास्ता है जो हमें करुणा के विजय की ओर ले चलता है, अन्यथा हम नष्ट कर दिये गये होते अथवा ईश्वर की संतान होने की हमारी प्रतिष्ठा कम कर दी गयी होती।″ ख्रीस्तयाग के दौरान माथे पर राख की जो निशानी ग्रहण की जाती है वह हमें अपने उद्गम का स्मरण दिलाती है कि हम मिट्टी हैं, साथ ही साथ हमें यह भी याद दिलाती है कि ईश्वर ने हम प्रत्येक पर अपनी प्राणवायु फूँक दी है। उन्होंने कहा, ″ईश्वर के जीवन की प्राणवायु हमें विश्वास में निरुत्साह हो जाने, उदारता में ठंढा पड़ने एवं आशा को दबाने के कारण, दम घुटने से बचाता है।

संत पापा ने चालीसा काल में आवश्यक बातों पर ध्यान देने की सलाह देते हुए कहा, ″चालीसा काल ‘नहीं’ कहने का उपयुक्त समय है: आध्यात्मिक निरुत्साह को जो उदासीनता से उत्पन्न होता है, खोखले एवं निरर्थक शब्दों के विषाक्त प्रदूषण को, उस प्रार्थना को जो हमारी अंतरात्मा को शिथिल कर देती है, दान जो हमें आत्म-संतुष्टि प्रदान करती, उपवास जो हमें अच्छा अनुभव दिलाती तथा हर प्रकार के बहिष्कार को, न कहने का समय है।

उन्होंने कहा किन्तु चालीसा काल चिंतन करने एवं अपने आपसे यह पूछने का भी समय है कि मुझ पर क्या बीतता यदि ईश्वर मेरे लिए अपने सभी दरवाज़ों को बंद कर देते। यह अवधि उस बात पर भी गौर करने का अवसर है कि क्या हम उन लोगों के बगैर अपनी यात्रा पर आगे चल सकते थे जिन्होंने इस यात्रा में हमारी मदद की है।

आखिर में संत पापा ने कहा कि चालीसा काल पुनः सांस लेने की शुरूआत करने का समय है, हमारे हृदयों को खोलने की, उस वायु को हमारे अंदर प्रवेश करने देने की जो मिट्टी को इंसान में बदल सकता है।


(Usha Tirkey)

मृत्यु दण्ड पर वाटिकन के विचार

In Church on March 2, 2017 at 3:11 pm

 

जेनेवा,बृहस्पतिवार, 2 मार्च 2017 (वीआर सेदोक): संयुक्त राष्ट्र के लिए वाटिकन के स्थायी पर्यवेक्षक महाधर्माध्यक्ष इवान जुरकोविक ने मानव अधिकार समिति की बैठक की 34 सत्र में ‘मृत्यु दण्ड’ पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने मृत्युदण्ड के प्रयोग को हटाये जाने के प्रयास की सराहना की।

वाटिकन प्रतिनिधि ने कहा, ″मैं इस बात पर बल देता हूँ कि जीवन पवित्र है, माता की कोख में आने से लेकर स्वाभाविक मृत्यु तक।″ उन्होंने संत पापा के शब्दों का स्मरण कर कहा कि यहाँ तक कि एक अपराधी भी जीवन के अधिकार का हकदार है।

उन्होंने कहा कि इस सम्बन्ध में, इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि मानवीय न्याय अविश्वसनीय है तथा मृत्यु दण्ड अपने आप में अचल। हमें यह भी हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि मौत की सज़ा के साथ निर्दोष के जीवन को समाप्त करने की संभवना बनी रहती है।

उन्होंने मृत्यु दण्ड को नाकामयाबी करार देते हुए कहा कि मृत्युदण्ड के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष को हाल में लिखे एक पत्र में संत पापा ने कहा था कि ″एक संवैधानिक राज्य के लिए मौत की सजा एक विफलता का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि यह राज्य को न्याय के नाम पर मारने के लिए बाध्य करता है जबकि एक इंसान की हत्या कर न्याय तक कभी नहीं पहुँचा जा सकता।”

महाधर्माध्यक्ष का मानना है कि अपराध का सामना करने के लिए मानवीय उपाय अपनाये गये हैं ताकि उसके शिकार लोगों को इंसाफ मिल सके तथा अपराधी को सुधार का अवसर दिया जा सके। इसके अलावा, सच्चा और निष्पक्ष समाज ही, मानव गरिमा के लिए पूर्ण सम्मान को बढ़ा सकता है।

अंततः वाटिकन प्रतिनिधि ने कहा कि वह मृत्यु दण्ड के प्रयोग पर रोक लगाने के हेतु पूर्ण प्रतिबद्ध है तथा अधिस्थगन 2014 के आम विधानसभा संकल्प द्वारा स्थापित एक अंतरिम उपाय के रूप में, इसका मजबूती से समर्थन करती है। उन्होंने देशों को प्रोत्साहन दिया कि वे आपराधिक स्थिति पर ध्यान दिये बिना प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिष्ठा सुनिश्चित करने हेतु क़ैदख़ानों की स्थिति में सुधार लायें तथा एक निष्पक्ष सुनवाई हेतु उचित प्रक्रिया अपनायें।


(Usha Tirkey)

शोषण के शिकार लोगों की आवाज को सुना जाना जारी रहे

In Church on March 2, 2017 at 3:07 pm

 

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 2 मार्च 2017 (वीआर अंग्रेजी): वाटिकन ने बुधवार को घोषित किया कि नाबालिकों की सुरक्षा हेतु गठित परमधर्मपीठीय आयोग की सदस्य, शोषण से बचने वाली आयरिश महिला मैरी कोलिन्स ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

वे 2014 से इस समिति की सदस्य थी जब समिति का गठन संत पापा फ्राँसिस द्वारा किया गया था। संत पापा को सौंपे अपने त्याग पत्र में उन्होंने रोमन कुरिया के अन्य कार्यालयों द्वारा समिति को सहयोग के अभाव के कारण निराशा की भावना व्यक्त की है।

नाबालिकों की सुरक्षा हेतु गठित परमधर्मपीठीय आयोग के अध्यक्ष बोस्टन के कार्डिनल जॉ ओ. माले ने कहा कि मैरी के मामले की सुनवाई एवं उसपर विचार, अगले माह होने वाली सभा में की जायेगी। उन्होंने कहा कि वे समिति के साथ, नये धर्माध्यक्षों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में तथा परमधर्मपीठ के अन्य अधिकारियों के साथ काम करना जारी रखेंगी।

मैरी कोलिन्स ने वाटिकन रेडियो की पत्रकार फिलिपा हेचेन से अपने निर्णय एवं समिति में कार्य करने की भावी आशा को लेकर कहा कि विगत दिनों में उन्हें संघर्षों का सामना करना पड़ा किन्तु आयोग ने उन कठिनाईयों से ऊपर उठने हेतु कार्य किया है। उन्होंने कहा कि हाल में वाटिकन के एक विभाग द्वारा, एक खास मामले में इनकार, उनके लिए अस्वीकार्य लगा। मैरी ने कहा कि यदि वाटिकन में, आयोग को सहयोग नहीं देने एवं उसके लिए कार्य नहीं करने की इच्छा रखने वाले अब भी मौजूद हैं, तब एक शोषण से बचने वाली के रूप में उन्हें आयोग को छोड़ देना ही बेहतर विकल्प लगा।

उन्होंने इस बात को भी प्रकट किया कि वह अपने उन सहकर्मियों को समर्थन देती रहेगीं जो बहुत वफादारी एवं कठिन परिश्रम के साथ काम कर रहे हैं जैसा कि संत पापा फ्राँसिस हमेशा आयोग को समर्थन देते रहते हैं।

किस कठिनाई ने उन्हें आयोग का त्याग करने हेतु प्रेरित किया के उत्तर में मैरी ने कहा, ″बचाव की नीति का विकास जिसे विश्व के धर्माध्यक्षीय सम्मेलन अपने स्वयं की नीति दस्तावेज को तैयार करने के लिए एक नमूना के रूप में प्रयोग करते हैं।″

उनका कहना था कि एक रास्ता ढूंढे जाने की आवश्यकता है जिसके माध्यम से विरोध कर रहे लोगों को यह दिखाया जा सके कि आयोग बाहर से बाधा डालने अथवा उनके कार्यों पर हावी होने के लिए गठित नहीं किया गया है। आयोग का उद्देश्य है एक साथ काम करना तथा बच्चों की सुरक्षा हेतु दोनों दलों के संसाधनों का उपयोग करते हुए आगे बढ़ना।

मैरी की उम्मीद है कि आयोग को इस में सफलता मिलेगी तथा जिन्होंने इसका विरोध किया है उनका दिमाग खुल जायेगा और उन्हें महसूस होगा कि हम सभी एक ही मामले के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आयोग में नये सदस्यों को जोड़ने या दूसरों को दल में बात करने के लिए निमंत्रण देने के द्वारा, शोषण से बचने वालों की आवाज को सुनना जारी रखना चाहिए।


(Usha Tirkey)

″ला चिविलता कथोलिका″ के अंग्रेजी संस्करण का प्रमोचन

In Church on March 2, 2017 at 3:04 pm

 

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 2 मार्च 2017 (वीआर अंग्रेजी): परमधर्मपीठ के लिए ब्रिटिश राजदूत सैली अक्सवार्दी ने प्रतिष्ठित जेसुइट पत्रिका ‘ला चिविलता कथोविका’ के अंग्रेजी संस्करण का प्रमोचन किया। प्रमोचन मंगलवार को किया गया।

पत्रिका की शुरूआत सन् 1850 में हुई थी जो इताली भाषा में थी। अब यह प्रति माह अंग्रेजी, फेंच, स्पानी तथा कोरियाई भाषाओं में प्रकाशित की जायेगी।

‘ला चिविलता कथोविका’ पत्रिका के लेखकों के साथ हाल में हुए मुलाकात में, संत पापा ने कहा था कि उनके लेख मात्र काथलिक विचारों की रक्षा करने के मकसद से नहीं बल्कि व्यग्रता, खुले अंत एवं वैचारिक भावना के साथ विश्व में ख्रीस्त का साक्ष्य देना होना चाहिए। उन्होंने समाज के हाशिये पर जीवन यापन करने वाले लोगों के बीच सेतु का निर्माण करने हेतु उनसे आग्रह करते हुए कहा था कि नई भाषाओं में संस्करण क्षितिज को विस्तृत करने में मदद करेगा तथा विश्व के विभिन्न लोगों के बीच वार्ता करने में सहायक होगा।

वाटिकन रेडियो की पत्रकार फिलिपा हेचेन से बातचीत में पत्रिका के संपादक जेस्विट फा. अंतोनियो स्पादारो ने कहा कि ‘ला चिविलता कथोलिका’ की शुरूआत सन् 1850 में इटली के एकीकरण के पूर्व अंतराष्ट्रीय पृष्ठभूमि पर की गयी थी किन्तु सन् 1861 ई. में यह इताली राष्ट्रीय पत्रिका बन गयी। अब हमने अपनी सामग्री को अन्य पृष्ठभूमियों में भी विस्तृत करने का विचार किया है क्योंकि संत पापा ने हमें सेतु बनने को कहा है।

उन्होंने कहा कि पत्रिका अब अलग-अलग भाषाओं में लेख प्राप्त करेगी जिन्हें अन्य भाषाओं में भी अनुवाद किया जाएगा। इस प्रकार, ‘ला चिविलता कथोलिका’ विभिन्न देशों, संस्कृतियों और भाषाओं के बीच एक असली आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पुल के रूप में रंगमंच का काम करेगी।


(Usha Tirkey)

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