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आध्यात्मिक साधना समाप्त कर संत पापा वाटिकन लौटे

In Church on March 11, 2017 at 3:58 pm

रोम शनिवार, 11 मार्च 2017 (वीआर अंग्रेजी): आध्यात्मिक साधना के समापन पर संचालक फादर जुलियो मिकेलिनी को धन्यवाद देकर संत पापा फ्राँसिस शुक्रवार को आरिच्चा से वाटिकन लौटे।

वाटिकन लौटने के पूर्व संत पापा ने आध्यात्मिक साधना में भाग ले रहे सभी सदस्यों की ओर से फादर मिकेलिनी को उनके अच्छे मार्गदर्शन हेतु उनकी सराहना की और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।

उन्होंने कहा, ″जो भलाई आप हमारे लिए करना चाहते थे और जो कुछ हमारे लिए किया है उसके लिए हम आपको धन्यवाद देते हैं। सबसे बढ़कर इस बात के लिए धन्यवाद कि आपने अपने को उसी तरह प्रस्तुत किया जैसे आप हैं, स्वाभाविक रूप से अपने को प्रस्तुत करते हुए आपने चेहरे पर कोई पवित्रता का मास्क नहीं लगाया।″

संत पापा ने उन्हें आध्यात्मिक साधना के संचालन हेतु तैयारी में लगाये गये प्रयास के लिए भी धन्यवाद दिया।

उन्होंने कहा, ″मनन-चिंतन हेतु बहुत सारी चीजें हैं किन्तु संत इग्नासियुस कहते हैं कि जब कोई आध्यात्मिक साधना में ऐसी चीज को पाता हो जो उसे सांत्वना देता अथवा निराश करता है तो उसे वहीं रूक जाना चाहिए एवं आगे नहीं बढ़ना चाहिए। मैं विश्वास करता हूँ कि हम सभी ने ऐसा अनुभव किया है। बाकी कुछ भी बेकार नहीं है वह बना रहता है तथा दूसरे समय के लिए काम देता है।

संत पापा ने कहा कि कभी-कभी बिलकुल सामान्य चीजें और छोटी बातें भी हमें मन-परिवर्तन हेतु प्रभावित करती हैं।

अंततः संत पापा ने फा. मिकेलिनी को एक अच्छे पुरोहित बने रहने की शुभकामना अर्पित की।


(Usha Tirkey)

संवाद को प्रोत्साहन दिया जाना आवश्यक, संत पापा

In Church on March 11, 2017 at 3:57 pm

रोम, शनिवार, 11 मार्च 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार, 11 मार्च को वाटिकन स्थित क्लेमेंटीन सभागार में इटली के ‘टेलीफोन अमीको’ संगठन के 400 स्वयंसेवकों से मुलाकात की तथा उन्हें नवीकृत उत्साह के साथ समाज के लिए अपने बहुमूल्य सेवा को जारी रखने की सलाह दी।

संत पापा ने सभी प्रतिनिधियों को सम्बोधित कर कहा, ″आपका संगठन उन लोगों की मदद करता है जो एकाकीपन की स्थिति में हैं तथा जिन्हें सुने और समझे जाने एवं नैतिक समर्थन दिये जाने की आवश्यकता है। खासकर, आज के समाज के परिपेक्ष्य में, जो कई प्रकार की कठिनाईयों से होकर गुजर रहा है। ये कठिनाइयाँ अकसर अकेलेपन एवं वार्ता के अभाव के कारण उत्पन्न होते हैं।″ उन्होंने कहा कि बड़े शहर, अत्यधिक भीड़ के बावजूद सिमटे मानव जीवन के प्रतीक बन रहे हैं और जिसके कारण लोग व्यापक उदासीनता, संस्कृति के आधार और अस्तित्व पर टिके ठोस मूल्यों की कमी, के आदी बनते जा रहे हैं। इस आधार पर संवाद एवं सुने जाने की आवश्यकता को प्रोत्साहन दिया जाना अति आवश्यक है।

संत पापा ने वार्ता के महत्व को प्रस्तुत करते हुए कहा कि वार्तालाप एक-दूसरे की आवश्यकताओं को जानने एवं समझने में मदद देता है। यह लोगों के प्रति सम्मान उत्पन्न करता है क्योंकि यह वार्ताकार के सर्वोत्तम पहलुओं पर चिंतन करने हेतु उन्हें एक-दूसरे के लिए खोल देता है। साथ ही साथ, वार्ता उदारता की अभिव्यक्ति है क्योंकि इसके द्वारा लोग विभिन्नताओं की उपेक्षा नहीं करते हुए, एक-दूसरे को सार्वजनिक भलाई की खोज करने में मदद देते हैं। बातचीत के द्वारा हम दूसरों को एक भय के रूप में नहीं देखते बल्कि उन्हें ईश्वर का वरदान मानते हैं। यह हमें चुनौती देता और पहचान प्रदान करता है। संवाद लोगों के बीच मानवीय संबंध बनाने में सहायक है तथा ग़लतफ़हमी से बाहर निकालता है।

संत पापा ने कहा कि यदि परिवारों, कार्यस्थलों और राजनीतिक क्षेत्रों में सच्ची वार्ता हो, तो कई सवालों को सुलझाया जा सकता है।

वार्ता की शर्तों को रेखांकित करते हुए संत पापा ने कहा कि इसके लिए सुनने की क्षमता होनी चाहिए जो बहुतों में नहीं पाया जाता है। दूसरों को सुनने के लिए धीरज रखने एवं ध्यान देने की आवश्यकता पड़ती है। जिसे शांत रहकर ही किया जा सकता है। शांत रहने वाले ही सुनना जानते हैं, ईश्वर को सुनना, अपने भाई-बहनों को, जो आवश्यकता में पड़े हैं, अपने मित्रों एवं परिवार के सदस्यों को सुनना। ईश्वर स्वयं सुनने हेतु सर्वोत्तम उदाहरण हैं क्योंकि जब कभी हम प्रार्थना करते हैं वे बिना कुछ पूछे हमें सुनते हैं, वे हमारी आवश्यकताओं को सुनने के लिए पहले से तैयार रहते हैं। सुनने के मनोभाव के लिए ईश्वर ही हमारे आदर्श हैं जो हमें गलतफहमी के हर घेरे को तोड़ने की सलाह देते, संचार का निर्माण करने, एकाकी पन एवं आत्म केंद्रण की छोटी दुनिया से बाहर निकलने को कहते हैं।

संत पापा ने इटली के टेलीफोन अमीको संगठन के प्रतिनिधियों को सम्बोधित कर कहा कि वे वार्ता एवं श्रवण के द्वारा बेहतर विश्व का निर्माण कर सकते हैं। वे विश्व को सम्मान एवं स्वीकृति का स्थान बनायें जिससे कि इसके माध्यम से विभाजन एवं तनावों का सामना किया जा सकें। उन्होंने प्रोत्साहन दिया कि वे नवीकृत उत्साह के साथ समाज के लिए अपने बहुमूल्य सेवा को जारी रखें ताकि कोई भी अकेला न रहे, वार्ता के संबंध को न तोड़ें तथा सुनने से कभी न चूकें जो कि भाइयो के लिए उदारता का सबसे आसान साक्ष्य है।


(Usha Tirkey)

सितम्बर माह में संत पापा करेंगे कोलम्बिया की यात्रा

In Church on March 11, 2017 at 3:55 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 11 मार्च 2017 (वीआर सेदोक): वाटिकन ने शुक्रवार को कोलम्बिया में 6 से 11 सितम्बर तक संत पापा की आगामी प्रेरितिक यात्रा की जानकारी दी।

वाटिकन प्रेस कार्यालय ने इस बात की पुष्टि दी कि ″राष्ट्रपति तथा कोलम्बीयाई धर्माध्यक्षों के निमंत्रण को स्वीकार करते हुए संत पापा फ्राँसिस 6 से 11 सितम्बर 2017 को कोलम्बिया की प्रेरितिक यात्रा करेंगे जहाँ वे बोगोटा, विलाविचेंसिओ, मेडेलिन, और कार्टाजेना शहरों का दौरा करेंगे।″

प्रेरितिक यात्रा का आदर्श वाक्य है ″आइये हम पहला कदम लें″ जो प्रतीक चिन्ह में भी अंकित है।

प्रतीक चिन्ह में दर्शाया गया है कि 50 सालों से भी अधिक की हिंसा जिसने कोलम्बिया को विभाजित कर दिया है।

प्रेस वक्तव्य में कहा गया कि कोलम्बिया में संत पापा की यात्रा कृपा एवं आनन्द का समय होगा, देश में परिवर्तन की सम्भावना के उम्मीद का तथा पहला कदम लेते का क्योंकि संत पापा मन-परिवर्तन के मिशनरी हैं।″

‘लोगो’ के बारे कहा गया कि इसमें संत पापा को चलते हुए दिखलाया गया है जो संत पापा की यात्रा को दर्शाता है जो कार्य करने का चिन्ह है, निर्माण की शुरूआत करने और उम्मीद बाँधने का क्योंकि हर परिवर्तन की शुरूआत हृदय परिवर्तन से होती है तथा हर-परिवर्तन एक-दूसरे से मुलाकात करने की मांग करता है। यह हमारे इतिहास में राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान की खोज करने का समय है।″


(Usha Tirkey)

पूर्व सांसद ने कहा, झारखण्ड के आदिवासी विधायक धोखेबाज

In Church on March 11, 2017 at 3:52 pm

 

राँची, शनिवार, 11 मार्च 2017 (मैटर्स इंडिया): झारखंड के एक पूर्व सांसद ने आदिवासी विधायकों द्वारा भूमि काश्तकारी अधिनियम में संशोधन का समर्थन करने के लिए उन्हें धोखेबाज कहा।

झारखंड सेनगेल अभियान (झारखंड सशक्तिकरण अभियान) के प्रमुख सल्खान मुर्मू ने छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट में संशोधन करने के लिए राज्य सरकार के कदम का विरोध किया।

टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट अनुसार झारखण्ड विधानसभा ने पहले ही संशोधनों को पारित कर दिया है, जो अब राज्य के राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी का इंतजार कर रहा है।

9 मार्च को झारखंड के सिमडेगा जिला में आयोजित एक रैली में उन्होंने कहा, ″ये संशोधन बिल आदिवासी सलाहकार परिषद की सहमति के बिना राज्य विधानसभा में पारित कभी नहीं हो सकता था।″

उन्होंने अल्बर्ट एक्का स्टेडियम में लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा, ″राज्य के मुख्यमंत्री समेत परिषद में 20 सदस्य हैं जिनमें मुख्यमंत्री गैर-आदिवासी हैं किन्तु बाकी 19 आदिवासी। निश्चय ही, 19 सदस्यों में से 15 विधायक हैं। यदि वे संशोधन प्रस्तावों का ईमानदारी से विरोध किये होते, तो मुख्यमंत्री रघुबार दास कभी कुछ नहीं कर पाते।″

सरकार का दावा है कि संशोधनों में स्वामित्व के अधिकार को खोये बिना आदिवासियों की जमीन को गैर-कृषि उपयोग हेतु सक्षम बनाया जाएगा।

कलीसिया एवं आदिवासियों का मानना है कि संशोधन कंपनियों और व्यापार समूहों को झारखंड के खनिज समृद्ध आदिवासी भूमि का फायदा उठाने की अनुमति देगा।

सलखान मूर्मू ने अपील की कि चूंकि आदिवासी विधायक अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं, व्यक्तिगत हितों के ऊपर उनका कर्तव्य था, समुदाय के हितों की रक्षा करना।

उन्होंने कहा कि यदि रघुवरदास उन्हें मानने से इनकार कर रहे थे तो विधायकों को इस्तीफा दे देना चाहिए था जो स्वतः रघुबार दास सरकार के पतन का कारण बनता और संशोधन बिल विधानसभा द्वारा पारित नहीं किया जाता। वे वास्तविक धोखेबाज हैं। उन्हें एक सीख मिलनी चाहिए। केवल रघुबर दास को दोषी करार नहीं दिया जा सकता।

पूर्व सांसद ने कहा कि अगर सरकार उखाड़कर नहीं फेंकी गयी तो आदिवासी छः महीने के अंदर नष्ट हो जायेंगे।

उन्होंने कहा, ″हमें सरकार को गिराने के लिए हिंसा की आवश्यकता नहीं है किन्तु आदिवासी विधायकों को इस्तीफा दिलवाने हेतु मजबूर करना होगा।″ उनका दावा था कि रैली हेतु करीब 1 लाख लोग जमा थे। प्रशासन ने भी स्वीकार किया कि यह जिला में एक अत्यन्त विशाल रैली थी जिसमें लोग काफी उत्साहित थे।


(Usha Tirkey)

भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षों ने किया भूमि हथियाने को रोकने के प्रयास का समर्थन

In Church on March 11, 2017 at 3:50 pm

नई दिल्ली, शनिवार, 11 मार्च 2017 (ऊकान): पूर्वी भारतीय झारखंड राज्य के आदिवासी कानून में संशोधन को अस्वीकार करते हुए राज्यपाल द्वारा उसे रोके जाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस संशोधन द्वारा उनकी संस्कृति और अस्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

झारखंड सरकार द्वारा नवम्बर माह में भूमि काश्तकारी अधिनियम में संशोधन हेतु प्रस्ताव को लेकर यहाँ के लोगों में काफी आक्रोश की भावना है क्योंकि यह कानून उनकी खेती योग्य जमीन को व्यापार एवं उद्योग आदि प्रयोजन के लिए ले जायेगी। प्रस्तावित संशोधन को राज्यपाल द्रौपदी मूर्मू की मंजूरी का इंतजार है।

ऊका समाचार के अनुसार नई दिल्ली में संसद के निकट 6 मार्च को, करीब 3,000 लोगों ने अपनी मांगों को सामने रखते हुए रैली में भाग लिया।

नई दिल्ली में झारखंड संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष नोर्बर्ट एक्का ने ऊका समाचार से कहा, ″यह उपयुक्त समय है कि आदिवासी लोग एक साथ आएं और संघर्ष करें क्योंकि ये परिवर्तन हमारी पहचान और संस्कृति को चुनौती देगा।″

झारखंड संघर्ष मोर्चा के साथ झारखंड के सभी विपक्षी दलों ने मिलकर रैली का आयोजन किया था ताकि राष्ट्रीय स्तर पर, राज्य सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियों पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकें। दिल्ली महाधर्मप्रांत ने इसका खुलकर समर्थन किया तथा काथलिकों को इसमें भाग लेने हेतु प्रेरित किया।

दिल्ली महाधर्मप्रांत के प्रवक्ता फा. सावरीमुथू संकर ने कहा, ″महाधर्मप्रांत ने लोगों को प्रदर्शन में भाग लेने हेतु प्रोत्साहन दिया क्योंकि कलीसिया हमेशा ही दलितों, आदिवासियों एवं अन्य वंचित लोगों के अधिकारों की रक्षा हेतु अपना समर्थन देती है। इस मामले में कोई विकल्प नहीं है।″

उन्होंने कहा कि कलीसिया हमेशा उन लोगों के साथ खड़ी होगी जो अपने अधिकारों की रक्षा हेतु संघर्ष करते हैं।

राँची के महाधर्माध्य कार्डिनल तेलेस्फोर पी. टोप्पो की अगुवाई में धर्माध्यक्षों ने राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू से राँची में 4 मार्च को मुलाकात की थी।

झारखंड में 9 मिलियन आदिवासी लोग हैं जो राज्य के 33 मिलियन जनता का 26 प्रतिशत है। करीब 1.5 मीलियन लोग ख्रीस्तीय हैं और उनमें से लगभग आधे लोग काथलिक।

नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक जनजातीय शोधकर्ता फादर विंसेंट एकका ने कहा, ″इस कानून में संशोधन खनिज हेतु राज्य में खनन और अन्य उद्योगों के लिए सरकार को विशाल भूमि ले लेने में मदद करेगा, जिससे आदिवासी आवास घट जाएगी। इसके द्वारा विस्थापन को बल मिलेगा, फलस्वरूप, आदिवासी संस्कृति एवं अस्तित्व का विघटन होगा।″

उन्होंने कहा कि यद्यपि आदिवासियों की संख्या बहुत अधिक है किन्तु वे राजनीति को अपने ऊपर लेने में असफल हैं जो उन्हें शोषित होने हेतु कमजोर बना देता है।

उनका कहना था कि धर्म के नाम पर राजनीतिक नेता उन्हें विभाजित करने का प्रयास कर रहे हैं। वे ख्रीस्तीयों को गैर-ख्रीस्तीयों से अलग करने की चेष्टा कर रहे हैं ताकि उन्हें एकजुट होने से रोक सकें। वे विकास के झूठे वादे करते किन्तु उनका छिपा एजेंडा है आदिवासियों को लूटना तथा अधिक राजनीतिक एवं आर्थिक शक्ति हासिल करना।


(Usha Tirkey)

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