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गरीबों के प्रति उदासीनता भ्रष्टाचार, संत पापा

In Church on March 16, 2017 at 3:47 pm

 

संत मर्था में ख्रीस्तयाग अर्पित करते संत पापा

16/03/2017 16:20

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 17 मार्च 2017 (वीआर सेदोक): हम पाप के उस रास्ते पर नहीं चलने के लिए सजग रहें जो भ्रष्टाचार की ओर ले जाता है। यह चेतावनी संत पापा ने वाटिकन स्थित प्रेरितिक आवास संत मर्था के प्रार्थनालय में बृहस्पतिवार को ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए प्रवचन में दी।

संत पापा ने प्रवचन में संत लूकस रचित सुसमाचार पाठ पर चिंतन किया जहाँ येसु धनी आदमी एवं गरीब लाजरूस का दृष्टांत सुनाते है।

अपने शहरों एवं आसपास के गरीबों तथा आवासहीनों की उपेक्षा करने से बचने हेतु संत पापा ने ईश्वर से प्रार्थना की, ″हे प्रभु तू मेरे हृदय की थाह ले तथा मुझ पर दृष्टि डाल ताकि मैं बुराई के पथ पर न चलूँ, मुझे अनन्त जीवन के मार्ग पर ले चल।″

उन्होंने बाईबिल के प्रथम भजन पर ध्यान आकृष्ट करते हुए स्मरण दिलाया कि जो व्यक्ति,  भौतिक चीजों, मानवीय ताकतों और अपनी शक्ति पर भरोसा रखता है, घमंड, अभिमान एवं धन पर विश्वास करता है वह ईश्वर से दूर चला जाता है। उन्होंने कहा कि जो प्रभु पर भरोसा रखता है वह हरे-भरे खेल की तरह है जबकि अपनी शक्ति और धन पर भरोसा रखने वाला जोखिम के रास्ते पर आगे बढ़ता है।

संत पापा ने कहा, ″जब एक व्यक्ति अपने बंद परिवेश में जीता है, अपनी संम्पति की गंध को ही सांस लेता है, अपने घमंड से संतुष्ट रहता है, अपने आप में भी भरोसा और सुरक्षा महसूस करता है तब वह अपनी दिशा खो चुका है वह नहीं जानता है कि सीमाएँ कहाँ हैं। यही सुसमाचार पाठ के दृष्टांत में निहित धनी व्यक्ति के साथ हुआ। उसने भोजों में समय व्यतीत किया किन्तु अपने द्वार पर पड़े गरीब की कोई परवाह नहीं की।

संत पापा ने कहा कि वह उस गरीब को पहचानता था किन्तु उसकी कोई परवाह नहीं की, अतः वह एक पापी आदमी था। उन्होंने कहा किन्तु पापी भी वापस सही रास्ते पर आ सकता है जिसके लिए उसे प्रभु से क्षमा मांगना होगा। यहाँ धनी व्यक्ति मृत्यु तक पश्चाताप नहीं किया, फल यह हुआ कि वह वहाँ से कभी वापस नहीं लौट सका। संत पापा ने कहा कि एक विराम है, एक सीमा है जिसको पार करने के बाद व्यक्ति को वापस लौटने में कठिनाई होती है और वह सीमा है भ्रष्टाचार। वह धनी व्यक्ति पापी नहीं किन्तु भ्रष्टाचारी था क्योंकि उसने लाजरूस की अत्यन्त दयनीय दशा देखकर भी खुश था और उस पर जरा भी रहम नहीं किया।

हम क्या अनुभव करते हैं जब रास्ते पर एक बेघर व्यक्ति को देखते हैं? बच्चों को भीख मांगते पाते हैं? उन्होंने कहा कि वे बेघर, गरीब, उपेक्षित हैं क्योंकि उनके पास घर का किराया चुकाने के लिए पैसे नहीं हैं, वे बेरोजगार हैं? किन्तु वे भी शहर के ही निवासी हैं। संत पापा ने कहा कि यदि हम उन्हें देखकर यूँ ही पार हो जाते हैं तो हम अच्छे रास्ते पर नहीं चल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हमें सजग रहना चाहिए ताकि हम पाप से भ्रष्टाचार के रास्ते पर न फिसल जाएँ। जब अस्पताल में बम गिराया जाता है और कई लोग मर जाते एवं घायल होते हैं तो हम उनके लिए छोटी प्रार्थना करते हुए, फिर बाद में सामान्य व्यवहार करने लगते हैं मानो की कुछ भी नहीं हुआ है तब हमारा हृदय उसी धनी व्यक्ति के समान हो जाता है जिसने लाजरूस को देखकर उसकी मदद नहीं की।

संत पापा ने विश्वासियों को प्रार्थना करने की सलाह दी ताकि हम अपने हृदय पर निगरानी रख सकें एवं गलत रास्ते पर आगे बढ़ने से बचें।


(Usha Tirkey)

संत पापा ने लेबनान के राष्ट्रपति से मुलाकात की

In Church on March 16, 2017 at 3:45 pm

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 16 मार्च 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने बृहस्पतिवार 16 मार्च को वाटिकन के प्रेरितिक प्रसाद में लेबनान के राष्ट्रपति माईकेल आवोन एवं उनकी पत्नी नादिया से मुलाकात की।

वाटिकन प्रेस वक्तव्य में बतलाया गया संत पापा एवं लेबनान के राष्ट्रपति के बीच मुलाकात सौहार्दपूर्ण रही।

वक्तव्य में कहा गया कि दोनों पक्षों ने परमधर्मपीठ एवं लेबनान के बीच द्विपक्षीय अच्छे संबंधों पर प्रकाश डाला तथा देश के जीवन हेतु कलीसिया की भूमिका को रेखांकित किया गया। साथ ही साथ सभी राजनैतिक दलों द्वारा राष्ट्रपति की रिक्ति को खत्म करने के प्रयासों के लिए संतोष व्यक्त किया गया तथा गौर किया गया कि विभिन्न जातीय और धार्मिक समुदायों के सदस्यों के बीच सार्वजनिक हित एवं राष्ट्र के विकास हेतु सहयोग की भावना में वृद्धि हुई है।

कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर आज की स्थिति को देखते हुए संत पापा ने सीरियाई शरणार्थियों का स्वागत करने हेतु राष्ट्रपति को धन्यवाद दिया। उसके बाद सीरिया के मुद्दे पर बातें हुईं, जिसमें विशेष ध्यान संघर्ष का राजनीतिक समाधान हेतु अंतरराष्ट्रीय प्रयास पर दिया गया। इस बात की भी सराहना की गयी कि लेबनान ने कई शरणार्थियों का स्वागत किया है।

अंततः मुलाकात में कुछ स्थानीय मुद्दों तथा मध्यपूर्व में ईसाईयों की स्थिति एवं जारी संघर्ष पर विचार किया गया।

संत पापा से मुलाकात के पश्चात् लेबनान के राष्ट्रपति ने वाटिकन राज्य सचिव कार्डिनल पीयेत्रो परोलिन एवं वाटिकन के विदेश सचिव पौल रिचर्ड गल्लाघेर से भी मुलाकात की।


(Usha Tirkey)

संघर्ष का अंत एवं मानव तस्करी पर रोक लगाना आवश्यक, परमधर्मपीठ

In Church on March 16, 2017 at 3:44 pm

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 17 मार्च 2017 (वीआर सेदोक): परमधर्मपीठ ने सुरक्षा परिषद से अपील की है कि वह मानव तस्करी के संकट के खिलाफ संघर्ष में अपनी बड़ी भूमिका निभाये।

अमरीका में वाटिकन के स्थायी पर्यवेक्षक महाधर्माध्यक्ष बेर्नादितो औज़ा, न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में सुरक्षा परिषद के खुले वाद- विवाद में अपना वक्तव्य पेश कर रहे थे जिसकी विषयवस्तु थी, ″संघर्षपूर्ण स्थितियों में व्यक्तियों की तस्करी- बंधुआ मजदूरी, गुलामी और अन्य कुप्रथाएँ।″

संयुक्त राष्ट्र के नौंवे महासचिव अंतोनियो गुटेरेस ने विवाद का शुभारंभ किया तथा मानव तस्करी को एक वैश्विक और बड़े पैमाने का मुद्दा कहा।

उन्होंने कहा, ″तस्करी वैश्विक स्तर पर फैल चुका है″ तथा बतलाया कि इसके शिकार विश्व के 106 देशों में पाये जाते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट अनुसार विश्व के 21 मीलियन लोग बंधुआ मजदूरी के शिकार हैं तथा बुरी तरह से शोषण के पंजे में हैं।

गुटेरेस ने कहा कि इन आँकड़ों के अलावा मानव के रास्ते पर जीवन को संकीर्ण किया जाता है, परिवार एवं समाज विभाजित होकर बिखर रहे हैं। मानव अधिकार एवं अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पूरी तरह से उल्लंघन किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि महिलाएँ एवं बालिकाएँ खास रूप से इसकी शिकार हो रही हैं। मानव तस्करी के अनेक रूप मजबूर वेश्यावृत्ति, मजबूर विवाह और यौन गुलामी जैसे घिनौने यौन शोषण को हम देख सकते हैं।

महाधर्माध्यक्ष बेर्नादीतो औज़ा ने 15 मार्च को विवाद में कहा कि सुरक्षा परिषद को मानव तस्करी दूर करने हेतु मुख्य भूमिका निभानी चाहिए, विशेषकर, तस्करी एवं सशस्त्र संघर्षों की कठोरता के बीच गहरे संबंध को पहचानते हुए।

औज़ा ने कहा, ″व्यक्तियों की तस्करी की चुनौती ने विकराल रूप ले लिया है और एक उचित प्रतिक्रिया की मांग कर रहा है जबकि चुनौती के अनुपात में प्रत्युत्तर आज भी बहुत दूर है।″ उन्होंने कहा कि इसके लिए लोगों में जागृति तथा प्रभाव बढ़ाने हेतु सरकारों, न्यायपालिका, कानून प्रवर्तन अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा लाखों बच्चों, महिलाओं और पुरुषों को बचाने के प्रयासों का एक बेहतर समन्वय, जो अभी भी स्वतंत्रता से वंचित हैं और दास जैसी स्थितियों में रहने के लिए मजबूर हैं, बहुत कुछ किया जाना बाकी है।


(Usha Tirkey)

कश्मीरी काथलिकों द्वारा ख्रीस्तीय विरोधी हिंसा के अंत हेतु प्रार्थना

In Church on March 16, 2017 at 3:39 pm

श्रीनगर, बृहस्पतिवार, 16 मार्च 2017 (ऊकान): काथलिकों ने भारत के तनाव ग्रस्त राज्य जम्मू एवं काश्मीर में विश्वास हेतु अत्याचार के शिकार ख्रीस्तीयों के लिए एवं विश्व में हिंसा के अंत हेतु प्रार्थना सभा का आयोजन किया।

प्रार्थना सभा, मार्च महीने में संत पापा द्वारा मासिक प्रार्थना मनोरथ में किये गये उस आह्वान से प्रेरित होकर आयोजित की गयी थी जिसमें वे प्रार्थना द्वारा अत्याचार के शिकार ख्रीस्तीयों के समर्थन की अपील करते हैं।

ऊका समाचार के अनुसार राज्य के 129 वर्षों पुरानी काथलिक कलीसिया के कुल 300 सदस्यों ने श्रीनगर में 12 मार्च को शांति हेतु प्रार्थना की।

मार्च महीने की मासिक प्रार्थना मनोरथ में संत पापा ने कहा है, ″प्रताड़ना के शिकार बने ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों को सम्पूर्ण कलीसिया की प्रार्थना एवं भौतिक सहायता द्वारा समर्थन और शक्ति प्राप्त हो।″

प्रेम कुमार नामक एक स्थानीय काथलिक ने कहा, ″हम पढ़ते हैं कि सोमालिया, अफगानिस्तान तथा उत्तरी कोरिया में ख्रीस्तीय धर्मानुयायी किस तरह सताये जा रहे हैं। हमने देखा है कि कितने लोगों के सिर धड़ से अलग कर दिये जाते एवं उनके घर ध्वस्त कर दिये जाते हैं। किसी भी तरह से अतिवाद खतरनाक है।″

गैर-लाभ मंत्रालय खुले द्वार हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि वर्ष 2016 में विश्व भर में करीब 90,000 ख्रीस्तीय अपने विश्वास के कारण मार डाले गये हैं जबकि 200,000 से अधिक लोगों ने धार्मिक रूप से प्रेरित हिंसा या उत्पीड़न का अनुभव किया है।

लेखक मास्सिमो इंट्राविग्ने ने ईसाइयों को “दुनिया में सबसे अधिक सताए हुए धार्मिक समूह” कहा है।

श्रीनगर की प्रार्थना सभा में भाग लेने वाली लीला रिचार्ड ने कहा कि कश्मीर के ख्रीस्तीय हमेशा असहिष्णुता के बढ़ने के बारे में चिंतित रहते हैं। हमने देखा है कि ख्रीस्तीय और मुसलमान दोनों ही अपने विश्वासों को लेकर सताये जाते हैं। हमने इस तबाही के समाप्त होने के लिए प्रार्थना की है।

हॉली फैमिली गिरजाघर के पल्ली पुरोहित रोय मैंथ्यू ने ऊका समाचार से कहा कि उन्होंने न केवल ख्रीस्तीयों के लिए बल्कि सभी धर्मों के लोगों के लिए प्रार्थना की है जो अपने विश्वास के कारण निशाना बनाये जाते हैं।

उन्होंने कहा कि यह देखना बेहद दुखद है कि निर्दोष, मौत के घाट उतारे जाते, सताये जाते तथा अपने धर्म के कारण बलत्कार के शिकार होते हैं।

जम्मू तथा काश्मीर में विगत 30 सालों में बहुत अधिक हिंसा हुई है जिसमें लगभग 100,000 लोगों की मौत हुई है। विभिन्न दलों द्वारा भारतीय शासन से स्वतंत्रता के लिए एक सशस्त्र संघर्ष में अनेक आम नागरिकों, आतंकवादियों और सेनाओं की मृत्यु हुई है।

राज्य के कुल 12.5 मिलियन लोगों में 60 प्रतिशत मुसलमानों की है जबकि 30 हिन्दुओं की, ख्रीस्तीयों की संख्या लगभग 35,000 है जिसमें से आधे काथलिक हैं।

 


(Usha Tirkey)

पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचयः स्तोत्र ग्रन्थ 81 (भाग-2)

In Church on March 16, 2017 at 3:38 pm

 

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें। ………


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“हमारे शक्तिशाली ईश्वर के लिये आनन्द का गीत गाओ। याकूब के ईश्वर का जयजयकार करो। गीत गाओ डफली बजाओ, सुरीली वीणा और तानपूरा सुनाओ। पूर्णिमा के दिन, हमारे उत्सव के दिन, नये मास की तुरही बजाओ। यही इस्राएल का विधान है, याकूब के ईश्वर का आदेश है।”

श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 81 वें भजन के प्रथम पाँच पद। इन पदों के पाठ से ही विगत सप्ताह हमने पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम समाप्त किया था। वस्तुतः, स्तोत्र ग्रन्थ का 17 पदों वाला 81 वाँ भजन शिविर पर्व यानि तम्बुओं के पर्व पर गाया जानेवाला आसाफ़ द्वारा रचित गीत है। शिविर पर्व मनाने के कई कारण थे। सर्वप्रथम तो यह नई फसल के कटने पर मनाया जाता था, द्वितीय, यह मिस्र की दासता से मिली मुक्ति हेतु ईश्वर के प्रति धन्यवाद का पर्व है और फिर इस्राएली लोग ग्रीष्म ऋतु के समापन एवं वर्षा के आरम्भ होने के उपलक्ष्य में इस पर्व को मनाया करते थे। शिविर पर्व भक्त समुदाय के लिये ईश्वर से विशिष्ट अनुग्रह की याचना का भी पर्व है। इस अवसर पर वे वर्षा के आने के लिये तो प्रार्थना करते थे क्योंकि वर्षा के बिना उनका जीना असम्भव था और इसी प्रार्थना में वे प्रभु से यह भी याचना करते थे कि वे उनपर अपने आत्मा को प्रवाहित करें।

श्रोताओ, कोई भी पर्व हो उसका समारोह किसी महत्वपूर्ण या विशेष घटना के स्मरणार्थ मनाया जाता है। पर्वों पर गायन, वादन और खुशियाँ मनाना स्वाभाविक है। इस्राएलियों के शिविर पर्व में भी यही होता था, साथ ही इस्राएली लोग शिविर पर्व के मनाये जाने को ईश इच्छा मानते थे। ग़ौर करें कि 81 वें भजन के शब्द, “आनन्द का गीत गाओ”, “ईश्वर का जयजयकार करो” आदि सभी बहुवचन में किये गये आह्वान हैं। यहाँ सम्पूर्ण समुदाय को पर्व मनाने के लिये आमंत्रित किया गया है। सभी को ईश्वर की स्तुति करने के लिये निमंत्रण दिया गया है। पर्व चाहे कोई भी हो, किसी भी धर्म के लोगों का हो, पर्व एक सामुदायिक घटना है, वह एकल व्यक्तियों की घटना नहीं है। वह सदैव एकसाथ मिलकर मनाया जाता है और ऐसा ही प्राचीन व्यवस्थान के युग में भी था। 15 दिनों तक जारी रहनेवाला उत्सव मनाना नये चाँद के साथ डफली, वीणा और तानपूरा बजाकर शुरु होता था तथा पूर्णिमा के दिन नये मास की तुरही से उसका समापन होता था क्योंकि “यही इस्राएल का विधान है, यही याकूब के ईश्वर का आदेश है”। श्रोताओ, “यही याकूब के ईश्वर का आदेश है” शब्दों से भजनकार भक्त समुदाय के समक्ष यह स्पष्ट कर देता है कि शिविर पर्व मनाना ईश्वर का आदेश है, यह ईश इच्छा के अनुकूल है। भजनकार का कहना है कि पर्व मनाना इसलिये आवश्यक है ताकि मानव यह अनवरत ध्यान में रखे कि प्रभु ईश्वर ही उसके सृष्टिकर्त्ता, उसके पालनहार और उसके उद्धारकर्त्ता हैं तथा उनकी स्तुति एवं आराधना कर ही मनुष्य ईशकृपा का भागी बनता है।

आगे, 81 वें भजन के छठवें, सातवें एवं आठवें पदों में भजनकार ने यह सन्देश देना चाहा है कि हालांकि ईश्वर हमारी परीक्षा लेते हैं और हमारी प्रार्थना देर से सुनी जाती है तथापि, जब-जब मनुष्य ने ईश्वर को पुकारा तब-तब उन्होंने उसकी पुकार सुनी तथा उसे उसके संकटों से मुक्ति दिलाई। ये पद इस प्रकार हैं: “जब वह मिस्र के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ, तो उसने युसुफ़ के लिये यह नियम बनाया। उसने एक अपरिचित वाणी को यह कहते सुना, मैंने उनके कन्धों पर से भार उतारा और उनके हाथ टोकरों से मुक्त हो गये। तुमने संकट में मेरी दुहाई दी और मैंने तुमको छुड़ाया। मैंने अदृश्य रहकर तुमको मेघ के गर्जन में से उत्तर दिया। मैंने मरीबा के जलाशय के पास तुम्हारी परीक्षा ली।”

श्रोताओ, सतही दृष्टि से यदि देखा जाये तो 81 वें भजन के रचयिता ने प्राचीन व्यवस्थान के निर्गमन ग्रन्थ में निहित इस्राएली जाति की दासता और मुक्ति की कहानी को पढ़ा था और उसी के आधार पर उसने यह गीत रचा। ऐसा प्रतीत होना स्वाभाविक है तथापि, कोई भी व्यक्ति भले ही वह कितना भी पढ़ा-लिखा और ज्ञानी क्यों न हो प्रभु की स्तुति के लिये तब तक प्रेरित नहीं हो सकता जब तक उसके हृदय में ये भाव प्रस्फुटित न हों। मिस्र की गुलामी से मुक्ति की घटना को पढ़ लेने के बाद भजनकार के हृदय में यह प्रेरणा जागृत हुई कि वह ईश्वर की स्तुति करे तथा सम्पूर्ण इस्राएली समुदाय को ऐसा करने के लिये आमंत्रित करे। उनके मन में यह चेतना जागृत हुई कि वह इस्राएली लोगों को याद दिलाये कि प्रभु ईश्वर ने उनके कन्धों पर से भार उठाया था। उन्हें यह स्मरण दिलाये कि इस्राएली लोग ईश्वर के विरुद्ध बड़बड़ा रहे थे तब मेघ गर्जन के बीच से प्रभु बोले थे जिससे उन्हें मार्गदर्शन मिला था। भजनकार याद दिलाता है कि हालांकि, मरीबा के जलाशय के पास प्रभु ने उनकी परीक्षा ली थी तथापि, सिनई पर्वत को चीरकर निकली ज्वाला के बीच से प्रभु की वाणी सुनाई पड़ी थी ताकि ईश प्रजा भटक न जाये अपितु अपने गन्तव्य स्थान तक सुरक्षित पहुँच जाये।

81 वें भजन के अग्रिम तीन पदों में यानि 9 से लेकर 11 तक के पदों में भजनकार ईश्वर द्वारा दी गई चेतावनी का स्मरण दिलाता है। वह उन्हें उस क्षण की याद दिलाता है जब ईश्वर ने उनके समक्ष अपने दस नियम प्रस्तावित किये थे। श्रोताओ, इन पदों की व्याख्या हम अपने अगले प्रसारण में करेंगे, आज का प्रसारण हम इनके पाठ से ही समाप्त कर रहे हैं। 81 वें भजन के ये तीन पद इस प्रकार हैं, “मेरी प्रजा! मेरी चेतावनी पर ध्यान दो! इस्राएल मेरी बात सुनो। तुम्हारे बीच कोई पराया देवता नहीं रहेगा, तुम किसी अन्य देवता की आराधना नहीं करोगे। मैं ही तुम्हारा प्रभु ईश्वर हूँ।”


(Juliet Genevive Christopher)

लेखक एवं अन्वेषक हमारे लिए महत्वपूर्ण: राष्ट्रपति मुखर्जी

In Church on March 16, 2017 at 3:36 pm

नई दिल्ली, बृहस्पतिवार, 16 मार्च 2017 (आईएएनएस): भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि लेखक तथा नई खोज करने वाले विद्वान विशिष्ट हैं क्योंकि उनमें नये अन्वेषण परक, संवेदनशील और कल्पनाशील दिमाग है जो समय, स्थान और वातावरण के घेरे के पार जाता है। उन्होंने कहा कि उनकी कृतियों का असर अनन्त है।

दस अन्वेषक विद्वान, दो लेखक और दो कलाकार जो राष्ट्रपति भवन के आंतरिक कार्यक्रम (इन-रेसिडेंस कार्यक्रम) के हिस्से थे, उन्होंने बुधवार को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति मुखर्जी से मुलाकात की।

इस अवसर पर उन से बातें करते हुए मुखर्जी ने खुशी जाहिर की कि उनके कार्यकाल में यह कार्यक्रम अपने प्रतिभागियों की रचनात्मकता को प्रज्वलित करने का अवसर प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि इन-रेसिडेंस कार्यक्रम के कल्पनाशील और संवेदनशील प्रतिभागियों ने भारत की आत्मा को बरकरार रखने में अपना योगदान दिया है।

उन्होंने आशा व्यक्त की कि जब प्रतिभागी अपने क्षेत्रों में वापस जायेंगे तो वे जिस तरह से अपने देश भारत को देखते हैं और जिस तरीके से उसके कल्याण और समृद्धि हेतु उनका योगदान हो सकता है उसके अनुसार एक नये आयाम का विकास करेंगे।

लेखक एवं कलाकार जो राष्ट्रपति भवन में इन रेसीडेन्स कार्यक्रम के हिस्से थे उनमें गुजराती कवि, आलोचक, अनुवादक तथा संपादक अशोक कुमार पी. चावड़ा, प्रबल कुमार बासू जो एक कवि एवं बंगाली लेखक हैं उन्होंने 17 संस्करणों की एक कविता किताब, कई नाटक, निबंध संग्रह तथा कहानी संग्रह की रचना की है तथा कलाकार राहूल शैलेंद्र कोकास्ते उपस्थित थे।

इन रेसीडेन्स कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने अपने विचारों को प्रकट किया तथा उन्होंने दो सप्ताह के इस कार्यक्रम में भाग लेने के अवसर हेतु राष्ट्रपति के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम के आरम्भ से ही उनकी भावनाओं एवं क्षमताओं को प्रोत्साहन मिला है।


(Usha Tirkey)

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