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यदि हमारा हृदय कठोर है तो हम नास्तिक काथलिक हैं, संत पापा

In Church on March 23, 2017 at 3:56 pm

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 23 मार्च 2017 (वीआर सेदेक): हृदय के कठोर हो जाने की जोखिम से बचने के लिए ईश वचन सुनें। यह बात संत पापा फ्राँसिस ने वाटिकन स्थित प्रेरितिक आवास संत मर्था के प्रार्थनालय में ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए प्रवचन में कही।

बृहस्पतिवार के ख्रीस्तयाग प्रवचन में संत पापा ने इस बात की ओर इशारा किया कि जब हम ईश्वर से दूर चले जाते तथा उनके वचन के प्रति बहरे हो जाते हैं तब हम अविश्वासी बन जाते हैं।

नबी येरेमियाह के ग्रंथ से लिए गये पाठ पर चिंतन करते हुए उन्होंने कहा, ″जब हम ईश्वर की वाणी को सुनने के लिए नहीं रुकते, तब हम उनसे दूर चले जाते हैं और जब हम प्रभु की वाणी को नहीं सुनते हैं तो दूसरों की वाणी को सुनते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि हम ईश्वर की वाणी नहीं सुनते हैं तो हम दुनिया के देवताओं को सुनते हैं। इस प्रकार, हम अपना कान बंद कर ईश्वर के वचन के प्रति बहरे हो जाते हैं।

संत पापा ने विश्वासियों को अपने अंदर झांकने की सलाह देते हुए कहा कि यदि हम सभी आज अगर अपने हृदय में झांककर देखेंगे तब हम पायेंगे कि कितनी बार हमने अपने कान बंद कर दिये और बहरे बन गये हैं। जब कोई व्यक्ति, समुदाय, पल्ली, धर्मप्रांत प्रभु के वचन से अपना कान बंद कर लेता तथा दूसरी आवाज की ओर आकर्षित होता है, वह अन्य स्वामियों की आवाज को सुनता और ईश्वर से मुख मोड़ लेता है।

संत पापा ने कहा कि जब हमारा हृदय कठोर हो जाता है हम अविश्वासी बन जाते हैं यहाँ तक कि नास्तिक भी बन जाते हैं। तब हम ऐसी दुनिया में जीने लगते हैं जो उसे सही रास्ते पर नहीं ले सकता और हम प्रतिदिन ईश्वर से अधिक दूर चले जाते हैं।

ईश वचन नहीं सुनना एवं हृदय कठोर हो जाना, दोनों एक-दूसरे के करीब हैं। इसके द्वारा निष्ठा की भावना समाप्त हो जाती है। संत पापा ने स्मरण दिलाया कि पहले पाठ में निष्ठा समाप्त हो जाने की बात कही गयी है। उन्होंने कहा कि हम काथलिक इसलिए हैं क्योंकि जीवन्त ईश्वर ने हमें प्रेम किया है। उनके प्रेम को अस्वीकार करते हुए हम अपना हृदय कठोर कर बेईमानी के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं। यह बेईमानी हमें इतना भर देता है कि हम संदेह में पड़ जाते हैं तथा हमें यह फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि कहाँ ईश्वर है और कहाँ शैतान, जैसा कि फरीसियों ने येसु के चमत्कार को देखकर उसे बेलजेबुल की सहायता से किया गया कार्य कहा।

संत पापा ने विश्वासियों को चिंतन का आह्वान करते हुए कहा कि क्या हम ईश्वर की वाणी को सुनते हैं अथवा अपने हृदय को कठोर कर लेते हैं।

उन्होंने प्रत्येक को परामर्श देते हुए कहा, ″हम ईश वचन सुनने के लिए रुकें, हाथ में बाईबिल लें तथा अपने आप से कहें मेरा हृदय कठोर हो गया है प्रभु से दूर चला गया है प्रभु के प्रति वफादारी को खो दिया है मैं बुराई के साथ जीता हूँ जो मुझे दुनियावी मोह प्रदान करता है मैंने प्रभु के साथ प्रथम मुलाकात के आनन्द को खो दिया है। आज प्रभु की वाणी को सुनने का दिन है।″ संत पापा ने सुनने एवं हृदय को कठोर नहीं करने की कृपा के लिए प्रार्थना की।


(Usha Tirkey)

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