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शांति एवं अहिंसा हेतु साथ मिलकर काम करने की वाटिकन ने की अपील

In Church on March 31, 2017 at 2:55 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 31 मार्च 2017 (सेदोक): वाटिकन स्थित अन्तरधार्मिक परिसम्वाद सम्बन्धी परमधर्मपीठीय परिषद ने तीर्थंकर वर्धमान् महावीर की 2615 वीं जयंती के उपलक्ष्य में, गुरुवार को, जैन धर्मानुयायियों के नाम एक सन्देश प्रकाशित कर परिवारों में शांति एवं अहिंसा के मूल्यों को बढ़ावा देने हेतु एकसाथ मिलकर काम करने की अपील की।

09 अप्रैल को जैन धर्मानुयायियों के आध्यात्मिक गुरु तीर्थंकर वर्धमान् महावीर की 2615 वीं जयंती मनाई जा रही है। जैन धर्मानुयायियों के प्रति मंगलकामनाएँ अर्पित करते हुए सन्देश में लिखा गया, “महावीर जन्म कल्याणक दिवस आपके हृदयों, परिवारों एवं समुदायों में सुख और शांति लाए।”

इस बात की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए कि वर्तमान युग में व्याप्त हिंसा की अनगिनत घटनाएँ महान चिन्ता का कारण है, वाटिकन के सन्देश में कहा गया कि जैन एवं ख्रीस्तीय धर्मों के लोगों को शांति एवं अहिंसा के प्रचार-प्रसार के लिये परिवारों को समर्थन प्रदान करना चाहिये।

सन्देश में कहा गया, “आज, समाज में बढ़ती हिंसा के सन्दर्भ में, यह आवश्यक है कि परिवार सभ्यता की प्रभावशाली पाठशालाएँ बनें और अहिंसा के मूल्य को पोषित करने का हर सम्भव प्रयास करें।”

इस तथ्य की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया गया कि प्रायः भय एवं अज्ञान के कारण हिंसा भड़कती है। सन्देश के शब्दों में, “दुर्भाग्यवश, भय, अज्ञानता, अविश्वास या अतिश्रेष्ठता की भावना के कारण, कुछ लोगों द्वारा, ‘अन्य’ को और, विशेष रूप से, ‘भिन्न अन्य’ को स्वीकार करने से इनकार ने, व्यापक असहिष्णुता और हिंसा का माहौल उत्पन्न किया है।”

हिंसा के माहौल को, परिवारों में प्रेम के प्रोत्साहन से, पराभूत करने का आह्वान कर परिषद ने कहा कि परिवार समाज की महत्वपूर्ण ईकाई है जहाँ बच्चों का पोषण और बहुमुँखी विकास होता है। परिषद ने स्मरण दिलाया, “परिवार वह प्रमुख स्थल है जहाँ शांति और अहिंसा की संस्कृति स्वस्थ एवं ठोस रूप से पनप सकती है। सन्त पापा फ्राँसिस के अनुसार, परिवार में माता-पिता एवं बुज़ुर्गों का उदाहरण पाकर बच्चे, “सम्वाद करना एवं एक दूसरे का ख़्याल रखना तथा मनमुटाव और यहाँ तक कि संघर्षों का निवारण भी बलप्रयोग द्वारा नहीं अपितु सम्वाद, सम्मान, अन्य की भलाई के प्रति उत्कंठा, दया और क्षमा द्वारा करना सीखते हैं” (दे. विश्व धर्माध्यक्षीय सभा के उपरान्त प्रकाशित प्रेरितिक उदबोधन, आमोरिस लेतित्सिया, 2016, अंक 90-130)।


(Juliet Genevive Christopher)

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