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निराशा के क्षण येसु हमारे साथ होते हैं, संत पापा

In Church on April 29, 2017 at 3:54 pm

मिस्र, शनिवार, 29 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने मिस्र की प्रेरितिक यात्रा के दूसरे दिन 29 अप्रैल को मिस्र की राजधानी काहिरा स्थित ‘सैन्य स्टेडियम’ में ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

उन्होंने प्रवचन में कहा, ″आपको शांति मिले।″ पास्का के तीसरे रविवार का सुसमाचार पाठ, आज हमें एमाउस की यात्रा पर दो शिष्यों को प्रस्तुत करता है जो येरूसालेम से वापस जा रहे थे। संक्षेप में, इसे तीन शब्दों में प्रकट किया जा सकता है, मृत्यु, पुनरुत्थान और जीवन।

मृत्यु- दो शिष्य निराशा एवं मायूसी की हालत में सामान्य जीवन की ओर लौट रहे थे। प्रभु मर चुके हैं अतः उन्हें आशा का कोई निशान नहीं दिखाई पड़ा। वे निराश और आशाहीन महसूस कर रहे थे। वे वापस लौटने की यात्रा पर थे जो येसु के क्रूस पर ठोंके जाने की दर्दनाक पीड़ा से दूर होने का प्रयास था।

क्रूस की पीड़ा ″ठोकर″ एवं ″मूर्खता″ के समान थी (1 Cor 1,18; 2,2), ऐसा प्रतीत हुआ कि उनकी हर आशा दफना दी गयी है। उन्होंने जिसके ऊपर अपने जीवन का निर्माण किया था वह मर चुका है तथा अपनी पराजय के साथ उनकी सभी आकांक्षाओं को कब्र पर बंद कर लिया है।

इस प्रकार वे विश्वास करने में असमर्थ थे कि प्रभु और मुक्तिदाता जिन्होंने मुर्दों को जिलाया, बीमारों को चंगा किया, क्या उनकी मृत्यु इतनी अपमानजनक तरीके से हो सकती है। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने क्यों उन्हें इस अपमान से नहीं बचाया।

ख्रीस्त का क्रूस ईश्वर के प्रति लोगों के अपने विचार का क्रूस था तथा ख्रीस्त की मृत्यु वैसा ही था जैसा वे ईश्वर के बारे सोचते थे, किन्तु वास्तव में वे मर गये, दफनाये गये तथा कब्र में बंद हो गये जिनकी समझ सीमित थी।

संत पापा ने कहा कि कितनी बार हम अपने को अपाहिज बना देते हैं जब हम ईश्वर के प्रति अपने सोच से परे जाना नहीं चाहते और ईश्वर के स्वरूप की कल्पना मनुष्य की कल्पना के अनुसार करते हैं। हम कितनी बार यह विश्वास नहीं कर पाने के कारण निराश हो जाते हैं कि ईश्वर सत्ता और अधिकार का ईश्वर नहीं किन्तु प्रेम, क्षमा एवं जीवन के ईश्वर हैं।

शिष्यों ने येसु को रोटी तोड़ते समय, यूखरिस्त में पहचान लिया। संत पापा ने कहा कि जब तक हम हमारी दृष्टि को धूमिल कर देने वाले पर्दे को नहीं हटाएँगे तथा हमारे हृदय की कठोरता एवं हमारे पूर्वाग्रहों को नहीं तोड़ेंगे, तब तक हम ईश्वर के चेहरे को नहीं पहचान पायेंगे।

पुनरूत्थान- उदासी की घोर अंधेरी रात में, उनकी सबसे बड़ी निराशा के क्षण में, येसु अपने दो चेलों के पास पहुँचते हैं तथा उनके साथ चलते हैं। यह दिखलाने के लिए कि वे स्वयं मार्ग, सत्य और जीवन हैं। (यो.14:6). येसु उनकी निराशा को जीवन में बदल देते हैं क्योंकि जब मानवीय आशा समाप्त हो जाती है तभी वहाँ ईश्वर की आशा चमकने लगती है। ″जो मनुष्यों के लिए असम्भव है वह ईश्वर के लिए सम्भव है। (लूक 18:27; cf. 1:37).  जब हम असफलता एवं निस्सहाय होने के गर्त पर पहुँच जाते हैं, जब हम खुद को सर्वोत्तम एवं पूर्ण समझने के संदेह से ऊपर उठ जाते हैं तथा अपनी दुनिया में केंद्रित नहीं होते तब ईश्वर हमारे पास आते हैं तथा हमारी रात को प्रातः में बदल देते हैं, हमारी परेशानियों को आनन्द तथा हमारी मृत्यु को पुनरुत्थान में परिवर्तित कर देते हैं। वे हमारे कदमों को येरूसालेम की ओर ले चलते हैं जीवन की ओर तथा क्रूस की विजय की ओर। (इब्रा. 11:34).

पुनर्जीवित ख्रीस्त के साथ मुलाकात के बाद, शिष्य आनन्द, साहस तथा उत्साह से भर कर वापस लौटे। वे अब साक्ष्य देने के लिए तैयार थे। पुनर्जीवित ख्रीस्त ने अविश्वास एवं दुःख के उनके कब्र से उन्हें बाहर निकाला। क्रूसित एवं पुनर्जीवित ख्रीस्त से मुलाकात करने के बाद उन्होंने सम्पूर्ण सुसमाचार, संहिता एवं नबियों की भविष्यवाणी के अर्थ और परिपूर्णता को समझ लिया था।

संत पापा ने कहा कि जो लोग क्रूस के अनुभव एवं पुनरुत्थान की सच्चाई से होकर नहीं गुजरते हैं वे निराशा की स्थिति में अपने को कोसते हैं क्योंकि हम तब तक येसु से नहीं मिल सके जब तक कि ईश्वर के प्रति हमारे संकीर्ण विचार को क्रूसित नहीं कर देते जो उन्हें शक्तिशाली और सत्ताधारी के रूप में प्रकट करता है।

जीवन- पुनर्जीवित येसु के साथ मुलाकात ने उन दोनों शिष्यों का जीवन बदल दिया क्योंकि पुनर्जीवित ख्रीस्त से मुलाकात प्रत्येक का जीवन बदल देता तथा बांझ को फलप्रद बना देता है। पुनरुत्थान पर विश्वास कलीसिया की उपज नहीं है किन्तु खुद कलीसिया का जन्म पुनरुत्थान पर विश्वास से हुआ है जैसा कि संत पौलुस कहते हैं, ″यदि ख्रीस्त नहीं जी उठे हैं तब हमारी शिक्षा व्यर्थ है तथा आपका विश्वास भी व्यर्थ है।” (1 को. 15:14).

पुनर्जीवित प्रभु शिष्यों की नजरों से ओझल हो जाते हैं यह बतलाने के लिए कि हम येसु को पकड़ कर नहीं रख सकते जैसा कि वे इतिहास में प्रकट हुए। धन्य हैं वे जो बिना देखे विश्वास करते हैं। (यो. 21:29; cf. 20:17).  कलीसिया को जानने एवं विश्वास करने की आवश्यकता है कि उसमें येसु उपस्थित हैं तथा उन्होंने यूखरिस्त, सुसमाचार एवं संस्कारों के माध्यम से उसके लिए अपना जीवन अर्पित किया है। एमाउस के रास्ते पर शिष्यों ने इसका एहसास किया तथा वे येरूसालेम लौटे ताकि वे अपना अनुभव दूसरों को बांट सकें। ″हमने जी उठे येसु को देखा है … जी हाँ वे सचमुच जी उठे हैं। (cf. Lk 24:32).

एमाउस के रास्ते पर शिष्यों का अनुभव हमें सिखलाता है कि यदि हमारा हृदय ईश्वर एवं उनकी उपस्थिति के भय से भरा है तो पूजा स्थलों पर उपस्थित होना व्यर्थ है। प्रार्थना करना भी व्यर्थ है यदि हमारी प्रार्थना भाई-बहनों के प्रेम में परिवर्तित नहीं होती। हमारी सारी धार्मिकता ही व्यर्थ है यदि यह गहरी आस्था एवं उदारता से प्रेरित न हो। हमारे प्रतिरूप के बारे सोचना भी बेकार ही है जब ईश्वर हमारी आत्मा और हृदय देखते हैं। (cf. 1 सामु. 16:7) ईश्वर दिखावा पसंद नहीं करते। उनके  लिए बुरे अथवा दिखावे के विश्वासी बनने की अपेक्षा अविश्वासी रहना अच्छा है।

सच्चा विश्वास हमें अधिक उदार, अधिक दयालु, अधिक ईमानदार एवं अधिक मानवीय बनाता है। यह हमारे हृदय को बिना भेदभाव सभी से प्रेम करने हेतु प्रेरित करता है। यह दूसरों को दुश्मन के रूप नहीं देखने किन्तु प्यार के योग्य भाई-बहन के रूप में देखने तथा उनकी सेवा एवं मदद करने हेतु प्राणित करती है। यह मुलाकात, वार्ता, सम्मान एवं भाईचारा की संस्कृति को फैलाने, उसकी रक्षा करने एवं जीने हेतु प्रेरित करती है। यह हमें उन लोगों को क्षमा देने हेतु साहस प्रदान करती है जिन्होंने हमारी बुराई की है। उन लोगों की ओर हाथ बढ़ाने जो गिरे हैं, नंगे को पहनाने, भूखे को खिलाने तथा कैदियों से मुलाकात करने, अनाथों की सहायता करने और प्यासों को पानी पिलाने हेतु प्रेरित करती है। बुजूर्गों एवं जरूरतमंदों की सहायता हेतु आगे ले जाती है। (cf. मती. 25). सच्चा विश्वास हमें दूसरों के अधिकारों की रक्षा हेतु उसी उत्साह एवं उमंग के साथ प्रोत्साहन देता है जिस उत्साह से हम खुद की रक्षा करते हैं। निश्चय ही, हम जितना अधिक विश्वास एवं ज्ञान में बढ़ते हैं उतना ही अधिक विनम्रता में भी बढ़ते तथा अपने छोटे होने का एहसास कर पाते हैं।

संत पापा ने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, ″ईश्वर उसी विश्वास से प्रसन्न होते हैं जो जीवन द्वारा घोषित किया जाता है क्योंकि एक प्रकार का कट्टरपंथ स्वीकार्य हो सकता है जो चैरिटी का पथ अपनाये, अन्य कोई कट्टरपंथ ईश्वर से नहीं आता और न ही उन्हें प्रसन्न करता है।

अतः एमाउस के चेलों की तरह हम, आनन्द, साहस और विश्वास से भरकर हमारे अपने येरूसालेम की ओर लौटें अर्थात् अपने दैनिक जीवन की ओर, अपने परिवार, अपने कार्यों तथा अपने प्यारे देश की ओर। जी उठे ख्रीस्त के प्रकाश के लिए अपना हृदय खोलने से न डरें तथा उन्हें हमारी अनिश्चतताओं को हमारे तथा दूसरों के लिए सकारात्मक शक्ति में बदलने दें। मित्रों एवं शत्रुओं सभी से प्रेम करने से न डरें क्योंकि एक विश्वासी का बल एवं खजाना, प्रेम भरे जीवन में निहित होता है।

संत पापा ने प्रार्थना की कि हमारी माता मरियम एवं पवित्र परिवार, जिन्होंने इस सम्मानित भूमि पर विचरण किया है, हमारे हृदय को आलोकित करें तथा मिस्र की इस प्यारी धरती को आशीष प्रदान करें जिसने ख्रीस्तीयता के उदय के समय संत मारकुस द्वारा सुसमाचार प्रचार का स्वागत किया तथा समस्त इतिहास में कई शहीदों एवं अनगिनत संतों को प्रदान किया है। ख्रीस्त जी उठे हैं वे सचमुच जी उठे हैं।


(Usha Tirkey)

संत पापा का कॉप्टिक ऑरथोडोक्स कलीसिया के धर्मगुरु को संबोधन

In Church on April 29, 2017 at 3:52 pm

काहिरा, शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017 (सेदोक): काथलिकों के सार्वभौमिक धर्मगुरू संत पापा फ्रांसिस ने अपनी मिस्र की दो दिवसीय प्रेरितिक यात्रा के दौरान शुक्रवार 28 अप्रैल को काहिरा के कॉप्टिक ऑरथोडोक्स महागिरजाघर में कॉप्टिक ऑरथोडोक्स कलीसिया के धर्मगुरु तावाद्रोस द्वितीय से मुलाकात की और अपने संबोधन के दौरान हिंसा के रोकथाम पर जोर देते हुए विश्व को ख्रीस्त के प्रेम का साक्ष्य देने पर बल दिया।

इस मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा कि हमने फिलहाल ही प्रभु के पुनरुत्थान का महोत्सव मनाया है जो ख्रीस्तीय जीवन का केन्द्र बिन्दु है। हम पुनरुत्थान के संदेश को घोषित करते और प्रथम शिष्यों की अनुभूति को यह उच्चरित करते हुए अपने जीवन में जीने की कोशिश करते हैं, “वे येसु को देख कर आनंदित हुए।” (यो.20.20) पास्का की यह खुशी हमारा प्रेममय मधुर आलिंगन शांति की एक निशानी है। एक तीर्थयात्री के रुप में मैं सहृदय अपनी कृतज्ञता अर्पित करता हूँ क्योंकि मेरा यहाँ आना निश्चय ही एक भाई के रुप में मुझे बहुप्रतीक्षित कृपाओं से भर देगा। मुझे इस प्रेममय मिलन की प्रतीक्षा थी क्योंकि मैं प्रत्यक्ष रुप से आपके धर्मगुरु की रोम यात्रा की याद करता हूँ जिसे उन्होंने 10 मई 2013 को अपने निर्वाचन के उपरान्त किया था। वह दिन कॉप्टिक और ख्रीस्तीय कलीसिया की मित्रतापूर्ण मिलन की वर्षगाँठ को याद करने का एक अवसर बना।

संत पापा ने कहा कि जब हम अन्तरकलीसियाई यात्रा में खुशी पूर्वक आगे बढ़ रहे हैं तो मैं संत  पेत्रुस और संत मारकुस, इन दोनों धर्मपीठों के संबंधों की केन्द्र-बिन्दु को याद करता हूँ जिसकी घोषणा करते हुए हमारे पूर्वाधिकारी ने एक सामान्य घोषणा पर 10 मई सन् 1973 को हस्ताक्षर किया था। सदियों के “कठिन इतिहास” जहाँ ईश शास्त्र में भिन्नता और कई गैर-धार्मिक कारकों का विकास उनका प्रसार और उनकी बढ़ोतरी ने हमारे बीच अविश्वास को जन्म दिया लेकिन उस दिन ईश्वर की कृपा से हमने इस बात में आपसी सहमति जताई कि “येसु ख्रीस्त अपनी दिव्यता में सम्पूर्ण ईश्वर और अपनी मानवता में पूर्ण मानव हैं।” (Common Declaration of Pope Paul VI and Pope Shenouda III, 10 May 1973).

इस घोषणा के तुरन्त बाद के महत्वपूर्ण शब्द जहाँ हम येसु को “हमारे प्रभु, ईश्वर, मुक्तिदाता और राजा की संज्ञा” देते हैं। इन शब्दों के माध्यम से संत मारकुस और संत पेत्रुस के धर्मपीठ येसु के प्रभुत्व को घोषित करते हैं। इसके साथ ही हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि हम येसु के हैं वे हमारे सब कुछ हैं।

उन्होंने कहा कि इससे भी बढ़कर हम इस बात का अनुभव करते हैं कि हमारा संबंध उनके साथ है अतः उनके शिष्यों के रुप में हम अलग-अगल मार्ग में नहीं चल सकते क्योंकि यह उनकी शिक्षा को खंडित करता है, “हम एक हों जिससे विश्व हम पर विश्वास करे।” (यो.17.21) ईश्वर अपनी नजरों में हमें पूर्ण एकता में बने रहने का आहृवान करते हैं। संत पापा जोन पौल द्वितीय इस बात पर बल देते हुए कहते हैं, “हमें इसे खोने हेतु समय नहीं है। येसु ख्रीस्त में हमारी एकजुटता, पवित्र आत्मा और एक बपतिस्मा हमारे लिए एक मूलभूत सच्चाई की ओर इंगित करता है।” (अन्तर कलीसियाई संगोष्टी, 25 फरवरी 2000) इसके परिणाम स्वरूप हमारे विश्वास के कारण हमारे बीच एक प्रभावकारी एकता स्थापित होती है जिसकी नींव स्वयं येसु हैं और हम उनमें एक नई सृष्टि बनते हैं। “एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए हम लोग बुलाये गये हैं।” (एफे.4.5)

यह एक प्रेरणात्मक यात्रा है जहाँ हम अपने में अकेले नहीं हैं वरन् येसु ख्रीस्त हमारे साथ चलते और हमारी सुरक्षा करते हैं। इस यात्रा में हम अपने महान संतों और लोहू गवाहों का सानिध्य प्राप्त हैं जो ईश्वरीय एकता में निवास करते हुए हमें अपने जीवन में एक सजीव “नवीन येरुसालेम” बनने को प्रेरित करते हैं। उन संतों के बीच हम पेत्रुस और मारकुस को अपने प्रतिदिन के जीवन में पाते हैं। वे एक-दूसरे के साथ एक विशेष एकता में संलग्न थे। संत मारकुस अपने सुसमाचार के केन्द्र बिन्दु में संत पेत्रुस के विश्वास उद्घोषणा की चर्चा करते हैं, “आप मसीह हैं।” यह उत्तर येसु के एक अति आवश्यक प्रश्न का है, “और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँॽ (मार.8.29) आज बहुत से लोग इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकते हैं लेकिन हम जो इसका जवाब देने को सक्षम हैं उन्हें येसु को जाने की एक विशेष खुशी होती है। हमें उन्हें एक साथ जानने की एक अत्यन्त खुशी की अनुभूति होती है।

संत पापा ने कहा कि हम सब एक साथ मिलकर अपने विश्वास को विश्व के सामने व्यक्त करते हुए उनका साक्ष्य देने हेतु बुलाये गये हैं, विशेषकर, अपने जीवन के द्वारा जिससे हम अपने आचार-विचार और व्यवहार के माध्यम से व्यक्त करते और उनकी उपस्थिति का एक ठोस प्रेम पूर्ण संवाद प्रस्तुत करते हैं। काप्टिक ऑरथोडक्स और काथलिक कलीसिया के रुप में हम एक साथ मिलकर इस प्रेम की भाषा को अपने भाई-बहनों के बीच अपने कार्यों के द्वारा कर सकते हैं जो येसु पर विश्वास करते हैं। इस तरह हम अपने जीवन के द्वारा एकता की एक मजबूत मिसाल पेश कर सकते हैं जहाँ पवित्र आत्मा, निश्चय ही, हमारे लिए आशातीत मार्गों का खुलासा करेंगे।

संत पापा ने संत पेत्रुस और संत मारकुस के बीच प्रेमपूर्ण संबंध को जिक्र करते हुए कहा कि पेत्रुस मारकुस को “मेरा पुत्र” कह कर संबोधित करते हैं। (1पेत्रु.5.13) सुसमाचार रचयिता संत मारकुस का संत पौलुस के साथ भ्रातृत्वपूर्ण संबंध रहा जिसका जिक्र हमारे लिए संत पौलुस के प्रेरितिक पत्रों में मिलता है। वे उन्हें प्रेरिताई हेतु उपयोगी, भ्रातृत्व प्रेम और प्रेरिताई में संलग्न व्यक्तित्व की संज्ञा देते हैं। (1तिम.4.11, फिलो. 24, कलो. 4.10) धर्मग्रंथ का ये संदेश हमें एक-दूसरे के साथ प्रेम पूर्ण संबंध में संयुक्त करते हैं।

हमारी अन्तरकलीसियाई यात्रा जो रहस्यात्मक और अपने में महत्वपूर्ण है अन्तरकलीसियाई शहीदों से प्रभावित और स्थापित है। संत योहन इसकी चर्चा करते हुए कहते हैं, “येसु ख्रीस्त जल और रक्त” द्वारा आते हैं (1यो.5.6) “जो उन पर विश्वास करता है उसे संसार पर विजयी प्राप्त होती है।” (1यो.5.5) जल और लोहू हमें अपने बपतिस्मा की याद दिलाती है जो हमारे लिए प्रेम की निशानी है। मिस्र की इस पवित्र भूमि में कितने ही ख्रीस्तीयों ने अपने विश्वास के कारण एक साहसिक अगुवे के रुप में अपने प्राणों की आहूति दी और बुराइयों पर विजय प्राप्त की है। कॉप्टिक कलीसिया की शहादत पूर्ण इतिहास इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। आज भी कितने ही निर्दोष सुरक्षा विहीन ख्रीस्तीयों का बहता रक्त हमें एकता में पिरोकर रखता है। संत पापा ने कहा कि जिस तरह स्वर्गीय येरुसालेम एक है उसी तरह हमारी शहादत भी एक है। आप के दुःख-दर्द हमारे दुःख-दर्द हैं। इस साक्ष्य को अपने में मजबूत करते हुए हमें हिंसा को रोकने हेतु अपने में संवाद, अच्छाई और एकता के बीज बोने की जरूरत है जिससे भविष्य में शांति बहाल हो सकें।

इस प्रभावकारी पवित्र भूमि का इतिहास केवल शहीदों के द्वारा प्रतिष्ठित नहीं होता है। प्राचीन समय में हुए सतावट का अंत होने पर ईश्वर में एक नये आत्मत्यागी जीवन की शुरुआत हुई जहाँ लोगों ने मरुभूमि में एक मठवासी जीवन की शुरूआत की। इस तरह ईश्वर के द्वारा मिस्र और लाल सागर में किये गये चमत्कारिक कार्य नये जीवन, पवित्रता के रुप में मरुभूमि में प्रस्फुटित हुई। मैं इस पवित्र भूमि में एक तीर्थयात्री के रुप में आया जिसे ईश्वर ने अपने प्रेम में चुना है। वे यहाँ सिनाई पर्वत पर आये (निर्ग.24.16) और अपनी नम्रता में उन्होंने एक छोटे बालक के रुप में यहाँ पनाह ली।(मती.2.14)

अपने संबोधन के अंत में संत पापा ने कहा कि ईश्वर हमें आपसी एकता में अपनी शांति का संदेशवाहक बनाये। हमारी इस तीर्थयात्रा में माता मरियम हमारे हाथों को पकड़ कर हमारी अगुवाई करे, जिन्होंने येसु को यहाँ लाया, जिसे मिस्र के महान ईश शास्त्रियों ने “थियोटोक्स” ईश्वर की माता की संज्ञा दी। इस संज्ञा में मानवता और ईश्वरता का समिश्रण है क्योंकि ईश्वर की माता द्वारा ईश पुत्र सदा के लिए मानव बना। कुंवारी माता जो सदैव हमें येसु के पास ले चलती, जो ईश्वर और मानव के मिलन को मधुर संगीत का रुप देती है हमें इस धरा को पुनः एक बार स्वर्ग में परिणत करने में सहायता करे।

सन्त पापा फ्राँसिस एवं कॉप्टिक पोप तावाद्रोस की संयुक्त घोषणा

In Church on April 29, 2017 at 3:50 pm

 

काहिरा, शनिवार, 29 अप्रैल सन् 2017 (सेदोक): काहिरा में, शुक्रवार 28 अप्रैल को, कॉप्टिक ख्रीस्तीय कलीसिया की प्राधिधर्माध्यक्षीय पीठ में सन्त पापा फ्राँसिस एवं कॉप्टिक ख्रीस्तीय कलीसिया के धर्मगुरु पोप तावाद्रोस द्वितीय ने एक संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किये। उन्होंने प्रभु येसु ख्रीस्त द्वारा सिखाई गई “हे पिता हमारे” प्रार्थना के समान अनुवाद एवं येसु के पुनःरुत्थान महापर्व को दोनों कलीसियाओं द्वारा एक ही दिन मनाने का आह्वान किया।

सार्वभौमिक काथलिक कलीसिया के परमधर्मगुरु सन्त पापा फ्राँसिस तथा कॉप्टिक ख्रीस्तीय कलीसिया के धर्मगुरु पोप तावाद्रोस द्वितीय के बीच संयुक्त घोषणा चालीस वर्ष पूर्व सन्त पापा पौल षष्टम एवं भूतपूर्व कॉप्टिक धर्मगुरु पोप शिनोडा तृतीय के बीच सन् 1973 में सम्पन्न मुलाकात के बाद की गई। तत्कालीन मुलाकात सदियों से अलग हुई काथलिक एवं कॉप्टिक कलीसियाओं के बीच सम्बन्धों के सुधार हेतु मील का पत्थर सिद्ध हुई थी जिसके बाद पूर्वी ऑरथोडोक्स कलीसियाओं के साथ धर्मतत्ववैज्ञानिक वार्ताओं का सूत्रपात हो सका था। शुक्रवार को तावाद्रोस ने उस समय से अब तक हुए विकास का स्मरण दिलाया तथा सामान्य प्रार्थनाओं द्वारा प्रभु येसु ख्रीस्त में अपने विश्वास को सुदृढ़ करने का आह्वान किया।

संयुक्त घोषणा में कहा गया कि काथलिक एवं कॉप्टिक ख्रीस्तीय मानव जीवन, विवाह और परिवार की पवित्रता, सृष्टि के प्रति सम्मान आदि मूल्यों का साक्ष्य एक साथ मिलकर दे सकते हैं। घोषणा में समस्त विश्व के उन ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों के लिये प्रार्थनाओं को सघन किये जाने का आह्वान किया गया जो ख्रीस्तीय धर्म और विश्वास के कारण हत्या एवं उत्पीड़न के शिकार बनाये जाते हैं, विशेष रूप से, मिस्र एवं मध्य पूर्व के अन्य देशों में।

घोषणा का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य कॉप्टिक एवं काथलिक कलीसियाओं में बपतिस्मा संस्कार को लेकर बने तनाव को दूर करना रहा। शुक्रवार को काथलिक कलीसिया के परमाध्यक्ष सन्त पापा फ्राँसिस एवं कॉप्टिक कलीसिया के धर्मगुरु तावाद्रोस ने घोषणा की कि वे बपतिस्मा संस्कार को दुहरायेंगे नहीं। उन्होंने कहा, “यदि कोई विश्वासी एक कलीसिया से दूसरी कलीसिया में जाना चाहे तो काथलिक एवं कॉप्टिक कलीसियाओं में सम्पादित बपतिस्मा मान्य होगा, इसे दुहराया नहीं जायेगा।”

मिस्र में अपनी यात्रा के दूसरे एवं आखिरी दिन सन्त पापा फ्राँसिस ने मिस्र के काथलिक विश्वासियों के लिये काहिरा स्थित सैन्य स्टेडियम में ख्रीस्तयाग अर्पित किया। इस समारोह में लगभग 30,000 विश्वासियों के शामिल होने का अनुमान है।

मिस्र से विदा लेने से पूर्व सन्त पापा फ्राँसिस ने काथलिक धर्मसमाजियों, धर्मसंघियों एवं धर्मबहनों के साथ सान्ध्य वन्दना का नेतृत्व किया तथा उन्हें अपना सन्देश दिया। श्रोताओ, इसी के साथ मिस्र में सन्त पापा की प्रेरितिक यात्रा पर हमारी संक्षिप्त रिपोर्ट समाप्त होती है। मिस्र में सन्त पापा फ्राँसिस की यह पहली तथा इटली से बाहर 18 वीं विदेश यात्रा थी। हमारी आशा है कि इस्लामी चरमपंथियों एवं आतंकवादियों के अनवरत हमलों से पीड़ित मिस्र के समस्त नागरिक और, विशेष रूप से, यहाँ के ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों के लिये सन्त पापा फ्राँसिस की राष्ट्र में उपस्थिति आशा की एक किरण सिद्ध हो।


(Juliet Genevive Christopher)

सहिष्णुता के प्रचार का सन्त पापा फ्राँसिस ने किया आह्वान

In Church on April 29, 2017 at 3:49 pm

काहिरा, शनिवार, 29 अप्रैल सन् 2017 (सेदोक): मिस्र के  प्रधान मौलवियों से सन्त पापा फ्राँसिस ने अपील की कि वे अपने शागिर्दों को ईश्वर के नाम पर हिंसा का बहिष्कार करना सिखायें तथा उनके समक्ष शांति एवं सहिष्णुता का प्रचार करें। शुक्रवार 28 अप्रैल को, कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सन्त पापा फ्राँसिस मिस्र की राजधानी काहिरा पधारे थे।

शुक्रवार के दिन उनका प्रमुख कार्यक्रम काहिरा में 1000 वर्ष प्राचीन, सुन्नी मुस्लिम ज्ञान पीठ, अल-अज़हर विश्वविद्यालय की भेंट तथा वहाँ शांति सम्मेलन को सम्बोधन रहा। इस स्थल पर प्रधान मौलवी ईमाम शेख अहमद एल- तैयाब ने सन्त पापा फ्राँसिस का भव्य स्वागत किया तथा सन्त पापा ने शांति सम्मेलन में भाग लेनेवाले समस्त विश्व के मौलवियों एवं विद्धानों को सम्बोधित किया।

यह स्मरण दिलाते हुए कि मिस्र की प्राचीन सभ्यताओं ने ज्ञान और उदार मन की शिक्षा की खोज को महत्व दिया है सन्त पापा फ्रांसिस ने कहा कि आज भी युवाओं के बीच धार्मिक उग्रवाद की “बेरहमी” का सामना करने के लिए इसी तरह की प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “हिंसा एवं घृणा को उकसानेवालों को करारा जवाब देने के लिये हमें युवाओं के संग-संग चलना होगा तथा परिपक्वता के साथ धैयर्पूर्वक भलाई के विकास हेतु काम कर हिंसा की आग भड़काने वालों के तर्क का प्रत्युत्तर देना होगा।”

शुक्रवार को शांति सम्मेलन में सन्त पापा ने ज़ोर देकर कहा, “धार्मिक नेता होने के नाते हमारा आह्वान किया जाता है कि हम उस हिंसा को समाप्त करें जिसपर प्रायः कथित पवित्रता का पर्दा पड़ा होता है। एक बार फिर दृढ़तापूर्वक एवं स्पष्ट ढंग से हम धर्म अथवा ईश्वर के नाम पर ढाई जानेवाली हर प्रकार की हिंसा, प्रतिशोध एवं घृणा का बहिष्कार करें।”

ग़ौरतलब है कि अल अज़हर जैसी मुस्लिम संस्थाओं ने इस्लामिक उग्रवाद का दृढ़तापूर्वक खण्डन किया है तथापि, मिस्र की मीडिया एवं मानवाधिकार संगठनों ने सरकार पर इस्लाम धर्म में सुधार जैसे दकियानूसी ख़्यालों से मुक्त होने तथा ग़ैरमुसलमानों के विरुद्ध घृणा को समाप्त करने हेतु पर्याप्त न करने का आरोप लगाया है।

मिस्र में अपनी दो दिवसीय प्रेरितिक यात्रा सन्त पापा फ्राँसिस ने मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह एल-सीसी के साथ वैयक्तिक मुलाकात तथा नागर समाज एवं विश्व के लगभग 800 कूटनीतिज्ञों से मुलाकात कर आरम्भ की। इस अवसर पर उन्होंने उग्रवादियों की हिंसा को समाप्त करने हेतु मिस्र सरकार द्वारा उठाये गये कदमों को समर्थन देते हुए कहा, “मिस्र एवं मध्यपूर्व में शांति की बहाली तथा हिंसा एवं आतंकवाद को समाप्त करने में मिस्र को बेज़ोड़ भूमिका निभानी है।”

मिस्र की ओर से काथलिक कलीसिया के शीर्ष का अपने यहाँ हार्दिक स्वागत करते हुए मिस्र के राष्ट्रपति एल-सीसी ने कहा कि जो लोग आतंकवादी कृत्यों में लिप्त रहते हैं वे मुसलमान होने का दावा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “सच्चा इस्लाम धर्म निर्दोष लोगों की हत्या का आदेश नहीं देता है।”


(Juliet Genevive Christopher)

संत पापा फ्राँसिस ने राष्ट्रपति और कूटनीतिज्ञों से मुलाकात की

In Church on April 29, 2017 at 3:47 pm

 

काहिरा, शनिवार, 29 अप्रैल 2017(वीआर सेदोक) : संत पापा फ्राँसिस ने मिस्र की प्रेरितिक यात्रा के दौरान 28 अप्रैल की शाम को राष्ट्रपति, संसद के सदस्यों, राजदूतों और राजनायकों को संबोधित किया।

संत पापा ने शांति का अभिवादन कर राष्ट्रपति अब्देल फतह एल. सीसी को अपने देश में आमंत्रित करने हेतु आभार प्रकट किया।  संत पापा ने कहा कि वे नवम्बर 2014 में राष्ट्रपति की रोम यात्रा, सन् 2013 में परमाध्यक्ष तावाद्रोस द्वितीय के साथ सौहार्दपूर्ण मुलाकात और बीते वर्ष अल् अज़हर विश्वविदयालय के ग्रांड इमाम डॉक्टर अहमद अल-ताईब के साथ हुए मुलाकात को भली भाँति याद करते हैं।

संत पापा ने प्राचीन और महान सभ्यता के देश मिस्र आने की खुशी जाहिर करते हुए कहा,″ इतने वर्षों के बाद भी इन अवशेषों में आज भी राजसी वैभव की झलक देखती है। यह भूमि न केवल अतीत के प्रतिष्ठित राजाओं, कोप्टों और मुस्लिमों के कारण मानवता के इतिहास और कलीसिया की परंपराओं का लिए महत्वपूर्ण है बल्कि इस देश में बहुत से प्राधिधर्माध्यक्षों ने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया है। दरअसल, मिस्र अक्सर पवित्र शास्त्रों में वर्णित है इस देश में, परमेश्वर ने “मूसा को अपना नाम प्रकट किया था” और सिनाई पर्वत पर उन्होंने अपने लोगों और पूरी मानव जाति को अपनी आज्ञाओं को सौंपा था। मिस्र की धरती पर पवित्र परिवार येसु मरियम और जोसेफ ने शरण और आतिथ्य पाया था।

दो हजार पहले के आतिथ्य को आज भी पूरी मानवता याद करती है और यह पूरी मानवता के लिए प्रचुर मात्रा में आशीर्वाद का श्रोत है। अतः मिस्र एक ऐसी भूमि है कुछ अर्थों में हम सभी यहाँ अपनत्व महसूस करते हैं! जैसा आप कहते हैं कि “मिस्र दुनिया की मां है।”आज भी, यह देश सूडान, इरिट्रिया, सीरिया और इराक सहित विभिन्न देशों से लाखों शरणार्थियों का स्वागत करता है जिन्हें आप मिस्र के समाज में एकीकृत करने हेतु प्रशंसनीय प्रयास करते आ रहे हैं। लोगों का भाग्य और मिस्र की भूमिका लोगों को मिस्र आने के लिए प्रेरित करती है जहाँ भोजन, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की कमी नहीं है।

संत पापा ने कहा कि मिस्र का एक विशेष कार्य है और वह है समेकित क्षेत्रीय शांति को मजबूत करना, हालंकि इस धरती धरती पर भी हिंसा के कृत्यों द्वारा हमला किया गया है जिसमें यहाँ उपस्थित आप में से कुछ अपने प्रियजनों के लिए शोकित होंगे।

संत पापा ने नागर समाज और धार्मिक नेताओं के प्रति आभार प्रकट किया जिन्होंने दुःख की घड़ी में लोगों की मदद की, विशेष रुप से गत दिसम्बर और हाल में तान्ता और अलेकजेंड्रिया के कोप्टिक गिरजाघर में हुए विस्फोटों में मरे लोगों के परिजनों और सभी मिस्र वासियों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना प्रकट की।

संत पापा ने देश के अंदर शांति बहाल करने हेतु बनाई योजनाओं की सफलता के लिए राष्ट्रपति और सभी विशिष्ट अधिकारियों को प्रोत्साहित किया।

विकास, समृद्धि और शांति बलिदान के बदौलत हासिल की जाती है जो कड़ी मेहनत, विश्वास और प्रतिबद्धता, पर्याप्त नियोजन और सब से ऊपर अतुलनीय मानवाधिकारों के लिए बिना शर्त सम्मान जैसे सभी नागरिकों में समानता, बिना किसी भेद भाव के धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग करती है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में महिलाओं, युवाओं, गरीब और बीमार लोगों की भूमिका पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। सही विकास मनुष्यों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा हेतु उनके प्रयोजन से मापा जाता है। किसी भी राष्ट्र की महानता समाज के सबसे कमजोर सदस्यों जैसे महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों, विकलांगों और अल्पसंख्यकों की देखभाल से पता चला है।

संत पापा ने राष्ट्रपति की बातों को स्वीकार करते हुए कहा कि आज की नाजुक और जटिल दुनिया में ” विश्व युद्ध अलग अलग करके लड़ी जा रही है,” इसे स्पस्ट रुप से जाहिर करने की आवश्यकता है कि बुराई के हर विचारधारा को अस्वीकार करते हुए, दूसरों को दबाने के लिए हिंसा और उग्रवाद के प्रयोग तथा ईश्वर के नाम पर विविधता को स्वीकार करके ही कोई सभ्य समाज बनाया जा सकता है।

हम सभी का फर्ज बनता हैं कि हम आने वाली पीढ़ी को शिक्षा दे कि स्वर्ग और पृथ्वी के बनाने वाले ईश्वर को मनुष्यों द्वारा सुरक्षा की कोई जरुरत नहीं है। वास्तव में, वे ही सभी मनुष्यों की सुरक्षा करते हैं। वे अपने बच्चों की मृत्यु नहीं लेकिन जीवन और खुशी की कामना करते हैं। वे न ही हिंसा की मांग करते और न ही इसे औचित्य साबित कर सकते हैं। वास्तव में, वे हिंसा से नफरत करते हैं। ( ईश्वर… वह अत्याचारी से घृणा करता है। स्तोत्र 11:5) सच्चे ईश्वर हमें निःस्वार्थ प्रेम, क्षमा, दया, हर जीवन के लिए पूर्ण सम्मान, और अपने बच्चों के बीच भाईचारा, विश्वासियों और गैर विश्वासियों के बीच समानता का भाव रखने को कहते हैं।

यह बताना हम सभी का कर्तव्य है कि इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करता जो न्याय का प्रचार करते पर अन्याय करते हैं, जो समानता का प्रचार करते पर स्वयं रंग-विभेद करते हैं। उन लोगों को बेनकाब करना हमारा कर्तव्य है जो पुनर्जन्म के बारे में भ्रम पैदा करते तथा लोगों के बीच घृणा का बीच बोते हैं, जो दूसरों के चयन करने की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी से विश्वास करने की क्षमता का शोषण करते हैं। घातक अतिवादी विचारों और विचारधाराओं को नष्ट करना हमारा कर्तव्य है

इतिहास उन शांति प्रिय पुरुषों और महिलाओं को सम्मानित करता है जो साहस और अहिंसात्मक तरीके से एक बेहतर दुनिया बनाने का प्रयास करते हैं। ″धन्य हैं वे जो मेल कराते हैं स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।″ (मत्ती,5:9)

जोसेफ के दिनों में मिस्र ने लोगों को अकाल से बचाया था, ( उत्पत्ति 47:57) आज इसे भाईचारे और प्रेम के अकाल से लोगों को बचाना है। हिंसा और आतंकवाद की निंदा करना और उसपर जीत हासिल करना है।

आज सबों के दिलों में शांति रुपी अनाज को डालने की जरुरत है जिससे कि शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, गरिमामय रोजगार और मानवीय शिक्षा की भूख मिटाई जा सके। मिस्र ने शांति के निर्माण और आतंकवाद का मुकाबला करने हेतु 23 जुलाई सन् 1952 के क्रांति के आदर्श वाक्य ″धर्म ईश्वर का और देश सभों का है।″ को लिया है। मिस्र को यह प्रदर्शित करना हैं कि सभी धर्मों के लोगों को साथ मिलकर और एक दूसरे का सम्मान करते हुए तथा भौतिक मानवीय मूल्यों को साझा करते हुए सद्भावना के साथ जीवन बिताना संभव है। तीन बड़े धर्मों का उद्गम स्थल मिस्र को शांति के मार्ग पर चलने के लिए न्याय और भाईचारे के सर्वोच मूल्यों के प्रसार की विशेष भूमिका निभानी है।

संत पापा ने कहा कि यह वर्ष परमधर्मपीठ और अरब गणराज्य मिस्र के बीच राजनयिक संबंधों की सत्तरवीं वर्षगांठ है अरब देशों में रोम के साथ संबंध स्थापित करने वाला पहला देश है। उन संबंधों की विशेषता हमेशा दोस्ती, सम्मान और पारस्परिक सहयोग की है। संत पापा ने आशा व्यक्त की, कि उनकी यात्रा से दोनों देशों के बीच संबंध और मजबूत होंगे। संत पापा ने विशेष रुप से फिलीस्तीन, इस्राएल, सीरिया लीबिया यमन इराक दणिण सूडान के लिए शांति की कामना की।

अंत में संत पापा ने वहाँ उपस्थित और मिस्र के सभी कोप्टिक ओर्थोडोक्स, ग्रीक बैजंटीन, अरमेनियन ओर्थोडोक्स, प्रोटेस्टेंट और काथलिक ख्रीस्तीयों का सप्रेम अभिवादन करते हुए कहा,″इस धरती के प्रेरित संत मारकुस, प्रभु की इच्छा एकता को बनाये रखने में आपका मार्गदर्शन करें।  आपकी उपस्थिति इस देश में नई या आकस्मिक नहीं है, लेकिन प्राचीन और मिस्र के इतिहास का अविभाज्य अंग है।″

संत पापा ने पुनः एकबार उनके स्वागत् के लिए शुक्रिया अदा कर, देश में शांति की शुभ कामना करते हुए अपना संदेश समाप्त किया।


(Margaret Sumita Minj)

मिस्र की यात्रा पर विभिन्न देशों को संत पापा का तार संदेश

In Church on April 28, 2017 at 1:56 pm

 

विमान, शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस मिस्र की प्रेरितिक यात्रा हेतु शुक्रवार 28 अप्रैल को रोम से काहिरा रवाना हुए। उन्होंने उड़ान के दौरान उन देशों को तार संदेश प्रेषित कर शुभकामनाएं अर्पित की जिनके ऊपर से होकर वे गुजरे।

संत पापा ने इटली के राष्ट्रपति सेरजो मत्तारेल्ला को प्रेषित संदेश में कहा, ″जब मैं शांति के तीर्थयात्री बनकर मिस्र जाने हेतु रोम से प्रस्थान कर रहा हूँ ताकि मैं वहाँ के काथलिक समुदाय तथा अन्य धर्म मानने वाले लोगों से मुलाकात कर सकूँ, माननीय राष्ट्रपति महोदय मैं आपका अभिवादन करता हूँ तथा इटलीवासियों को अपना आशीर्वाद प्रदान करता हूँ।″

संत पापा ने ग्रीस के ऊपर से उड़ान भरते हुए राष्ट्रपति प्रोकोपीस पौलोपौलोस के नाम प्रेषित तार संदेश में कहा, ″मिस्र में अपनी प्रेरितिक यात्रा हेतु जाते हुए जब मैं ग्रीस के ऊपर उड़ रहा हूँ मैं आपका तथा आपके सभी सह नागरिकों का अभिवादन करता हूँ। मैं प्रार्थना करता हूँ कि सर्वशक्तिमान ईश्वर आप सभी को शांति एवं संबल प्रदान करे। मैं पूरे राष्ट्र पर दिव्य आशीष की कामना करता हूँ।″


(Usha Tirkey)

मिस्र में सन्त पापा फ्राँसिस की यात्रा शुरू, पृष्ठभूमि

In Church on April 28, 2017 at 1:55 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 28 अप्रैल सन् 2017 (सेदोक): “मिस्र में शांति के तीर्थयात्री रूप में कल शुरु होनेवाली मेरी यात्रा के लिये प्रार्थना करें”। 27 अप्रैल को अपने ट्वीट पर प्रार्थना का आर्त निवेदन करने के उपरान्त, विश्वव्यापी काथलिक कलीसिया के परमधर्मगुरु, सन्त पापा फ्राँसिस शुक्रवार, 28 अप्रैल को रोम के फ्यूमीचीनो अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से, स्थानीय समयानुसार प्रातः पौने ग्यारह बजे मिस्र में अपनी दो दिवसीय यात्रा के लिये रवाना हो गये। आल इतालिया के ए-321 विमान पर सवा तीन घण्टों की उड़ान के बाद, मिस्र समयानुयार दोपहर के दो बजे सन्त पापा काहिरा अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पधारे। शनिवार देर सन्ध्या समाप्त होनेवाली यह प्रेरितिक यात्रा मिस्र में सन्त पापा फ्राँसिस की पहली तथा इटली से बाहर उनकी 18 वीं प्रेरितिक यात्रा है।

सातवीं शताब्दी से पूर्व, हालांकि, मिस्र एक ईसाई देश था मुसलमानों के आक्रमण के बाद शनैः शनैः यह एक मुस्लिम बहुल देश बन गया है। नौ करोड़ बीस लाख की कुल आबादी वाला मिस्र उत्तरी अफ्रीका एवं अरब जगत का सबसे अधिक आबादी वाला राष्ट्र है। सुन्नी मुस्लिम बहुल देश मिस्र में 90 प्रतिशत इस्लाम धर्मानुयायी, नौ प्रतिशत कॉप्टिक ख्रीस्तीय तथा एक प्रतिशत अन्य ख्रीस्तीय सम्प्रदायों के लोग हैं। राष्ट्र में केवल इस्लाम, ख्रीस्तीय एवं यहूदी धर्मों को आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। सन्त मारकुस के सुसमाचार प्रचार के परिणामस्वरूप पहली शताब्दी से अस्तित्व में आये एलेक्ज़ेनड्रिया के कॉप्टिक ऑरथोडोक्स चर्च तथा सन् 970 ई. में स्थापित अल अज़हर इस्लामिक स्कूल एवं विश्वविद्यालय यहाँ की दो प्रमुख धार्मिक संस्थाएं हैं।

दो दिवसीय मिस्र यात्रा का मुख्य आकर्षण है एक हज़ार वर्षीय प्राचीन प्रतिष्ठित सुन्नी इस्लामी  विश्वविद्यालय, अल अज़हर में प्रधान इमाम, शेख अहमद एल- तैयाब के साथ सन्त पापा फ्राँसिस की वैयक्तिक मुलाकात एवं विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय शांति सम्मेलन में उनका भाग लेना।

सन्त पापा फ्राँसिस इस बात पर बल देते रहे हैं कि ईसाई-मुस्लिम संवाद ही वह रास्ता है जिससे इस्लामी चरमपंथ पर काबू पाया जा सकता है। उस चरमपंथ को मात दे सकता है जिसने ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों को निशाना बनाकर उन्हें ईराक, सिरिया तथा मध्यपूर्व के अन्य देशों में 2000 वर्षों से जीवन यापन करते आये ख्रीस्तीयों को मार भगाया है।

हाल ही में मिस्र के ख्रीस्तीय गिरजाघरों पर हुए नृशंस हमलों की पृष्ठभूमि में सन्त पापा फ्राँसिस धर्म और कूटनीति के बीच संतुलन बनाने तथा मिस्र के मुसलमान नेताओं के साथ सम्बन्धों के सुधार का प्रयास कर रहे हैं। ईस्टर से एक सप्ताह पूर्व, 10 अप्रैल को खजूर इतवार के दिन इस्लामी चरमपंथियों द्वारा एलेक्ज़ेनड्रिया के दो कॉप्टिक गिरजाघरों पर हुए हमलों में कम से कम 45 व्यक्तियों के प्राण चले गये थे तथा दर्ज़नों घायल हो गये थे।

सन्त पापा फ्राँसिस की यात्रा के दौरान इसी वजह से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। राजधानी काहिरा के उन स्थलों के आस-पड़ोस में जहाँ-जहाँ सन्त पापा जानेवाले हैं तथा जहाँ वे शुक्रवार रात्रि पड़ाव कर रहे हैं, दूकानें बन्द कर दी गई हैं तथा पुलिस घर-घर जाकर जाँच –पड़ताल में लगी है। शनिवार को ख्रीस्तयाग अर्पण का आयोजन भी सेना के एक बहुसुरक्षित स्टेडियम में किया गया है।

वाटिकन के प्रवक्ता ग्रेग बुर्के ने पत्रकारों से कहा, “सन्त पापा फ्राँसिस सुरक्षा के प्रति अधिक चिन्तित नहीं हैं और इसीलिये यात्रा के दौरान वे बख़्तरबंद गाड़ी का उपयोग करने के बजाय एक साधारण मोटर गाड़ी का उपयोग कर रहे हैं।” इस सन्दर्भ में, वाटिकन राज्य सचिव कार्डिनल पियेत्रो पारोलीन ने कहा, “सन्त पापा इस यात्रा का परित्याग किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहते थे, वे उन परिस्थितियों में उपस्थित रहना चाहते हैं जहाँ लोग हिंसा से पीड़ित हैं, विशेष कर, मिस्र में वे शांति और मैत्रीपूर्ण वार्ता के सन्देशवाहक बनना चाहते हैं।”

कार्डिनल पारोलीन ने इस बात पर बल दिया कि मिस्र की सरकार को अपने सभी लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिये भले ही वे किसी भी धर्म, जाति अथवा समुदाय के ही क्यों न हों। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट है कि आतंकवाद का मुद्दा सम्पूर्ण विश्व के लिये एक वृहद चुनौती है इसलिये युवाओं में जीवन के मूल्यों को पोषित करना तथा हिंसा की निर्रथकता को उजागर करना नितान्त आवश्यक है।

इसी बीच, एलेक्ज़ेनड्रिया के कॉप्टिक चर्च के प्राधिधर्माध्यक्ष इब्राहीम इसाक सेद्राक ने वाटिकन  समाचार पत्र लोस्सरवात्तोरे रोमानो से की बातचीत में कहा, “इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि देश में हुए हाल के आतंकवादी हमलों से नागरिकों और, विशेष रूप से, ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों का मनोबल घटा है। लोग हिंसा के प्रति चिन्तित हैं जो लगातार ख्रीस्तीय पर्वों के इर्द-गिर्द होती रही है किन्तु इसके बावजूद हमारा विश्वास मज़बूत है इसलिये न केवल आयोजन स्तर पर अपितु सूझ-बूझ के साथ हमने इस यात्रा की तैयारी की है और हमारी प्रार्थना है कि प्रभु ईश्वर हमारे प्रिय सन्त पापा फ्राँसिस के हर कदम को सुरक्षा और सफलता प्रदान करें।

प्राधिधर्माध्यक्ष इब्राहीम सेद्राक ने कहा, “सन्त पापा इस यात्रा के दौरान अल अज़हर के प्रधान इमाम आल तैयाब तथा कॉप्टिक ऑरथोडोक्स कलीसिया के धर्मगुरु तावाद्रोस द्वितीय से मुलाकात कर मिस्र के काथलिकों के लिये ख्रीस्तयाग अर्पित करेंगे। हमारा विश्वास है कि उनकी मुलाकातें एवं उनके प्रवचन अन्तरधार्मिक सम्वाद को प्रोत्साहित कर, मिस्र के समस्त लोगों में शांति की अभिलाषा को जागृत करेंगे।”


(Juliet Genevive Christopher)

प्रेरक मोतीः सन्त पीटर चैनल (1803-1841)

In Church on April 28, 2017 at 1:53 pm

वाटिकन सिटी, 28 अप्रैल सन् 2017

पीटर चैनल ओसियाना के संरक्षक सन्त हैं उनका जन्म फ्राँस के बेल्ली धर्मप्रान्त में सन् 1803 ई. को हुआ था। पुरोहिताभिषेक के बाद पीटर चैनल को फ्राँस में दूर दराज की एक पल्ली में भेज दिया गया था। अपने समर्पण एवं अपनी लगन द्वारा उन्होंने तीन वर्षों में ही इस पल्ली में प्राण फूँककर इसमें नवीन ऊर्जा का संचार कर दिया था। हालांकि, अपने मिशनरी उत्साह के कारण वे पल्ली में टिके नहीं बल्कि सन् 1831 ई. में मरियम को समर्पित मैरिस्ट धर्मसमाज से जुड़ गये जिसका प्रमुख मिशन फ्राँस तथा विदेशों में सुसमाचार की उदघोषणा पर केन्द्रित था। कुछ समय के लिये पीटर चैनल को बेल्ली धर्मप्रान्तीय गुरुकुल में प्राध्यापक बना दिया गया जहाँ उन्होंने निष्ठापूर्वक पाँच वर्षों तक अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह किया।

सन् 1836 ई. में मैरिस्ट धर्मसमाज के कार्य प्रशान्त महासागर तक फैले तथा पीटर चैनल को मिशनरियों के एक छोटे से दल के नेतृत्व के लिये भेज दिया गया। दस माहों की कठिन यात्रा के उपरान्त उक्त दल दो भागों में विभक्त हो गया। पीटर उनके एक धर्मबन्धु तथा ब्रितानी लोकधर्मी थॉमस बूग फुतुना द्वीप चले गये। पहले पहल, फुतुना की जनजातियों तथा, नरभक्षता को निषिद्ध करनेवाले, उनके राजा न्यूलिकी ने, मिशनरियों का अपने बीच हार्दिक स्वागत किया। हालांकि, बाद में, जब राजा ने देखा कि पीटर एवं उनके साथी स्थानीय बोली बोलने लगे थे तथा लोगों का विश्वास जीतने लगे थे तब वह उनसे ईर्ष्या करने लगा। उसमें यह आशंकाएं उत्पन्न हो गई कि यदि लोगों ने ख्रीस्तीय विश्वास का आलिंगन किया तो वे राजा, शासक और महायाजक होने के अधिकारों को ही खो देगा। अस्तु, जब राजा के ही सुपुत्र ने ख्रीस्तीय धर्म को स्वीकार करने की इच्छा जताई तब उसका क्रोध भड़क उठा। उसने पीटर चैनल तथा उनके साथी मिशनरियों को मार डालने के लिये अपने योद्धाओं को भेज दिया। इस प्रकार, 28 अप्रैल सन् 1841 ई. को पीटर तथा उनके साथियों को फुतुना के उन्हीं लोगों ने मार डाला जिनके विकास एवं उत्थान के लिये वे वहाँ पहुँचे थे।

पीटर चैनल के समर्पित कार्यों ने प्रशान्त सागर स्थित फुतुना द्वीप के लोगों को इतना प्रभावित किया कि उनके निधन के बाद पाँच माहों के भीतर ही सम्पूर्ण द्वीप ने ख्रीस्तीय धर्म का आलिंगन कर लिया। शहीद सन्त पीटर चैनल का पर्व 28 अप्रैल को मनाया जाता है।

चिन्तनः सतत् प्रार्थना द्वारा प्रभु ख्रीस्त के प्रेम सन्देश की उदघोषणा का सम्बल प्राप्त करें तथा विश्व में न्याय, प्रेम एवं शांति की स्थापना में योगदान दें। 


(Juliet Genevive Christopher)

पुनर्जीवित येसु सदैव हमारे संग चलते हैं

In Church on April 26, 2017 at 3:00 pm

वाटिकन सिटी, बुधवार, 26 अप्रैल 2017 (सेदोक) संत पापा फ्राँसिस ने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस के प्रांगण में जमा हुए हज़ारों विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को आशा पर अपनी धर्मशिक्षा को आगे बढ़ते हुए कहा,

प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात

“मैं दुनिया के अंत तक तुम्हारे साथ हूँ।” (मत्ती. 28.20) यह संत मत्ती के अनुसार सुसमाचार का अंतिम वाक्य है जो हमारा ध्यान सुसमाचार के शुरुआती घोषणा की ओर करता है, “उसका नाम एम्मानुएल रखा जायेगा, जिसका अर्थ हैः ईश्वर हमारे साथ है।”(मती.1.23. इसा. 7.14) संत पापा ने कहा कि ईश्वर प्रति दिन हमारे साथ रहते हैं। वे दुनिया के अंत तक हमारे साथ चलते हैं। सुसमाचार इन दो वाक्यांशों में अर्थगर्भित है जो ईश्वर के नाम का रहस्य हमारे लिए प्रस्तुत करता है। ईश्वर हमारे जीवन से तटस्थ नहीं वरन वे हमारे जीवन के अंग हैं विशेषकर वे मानव का रुप धारण कर हमारे साथ रहते हैं। हमारा ईश्वर कोई अनुपस्थित ईश्वर नहीं जो कि सुदूर आकाश में रहता हो बल्कि वे एक संवेदनशील ईश्वर हैं जिनका हृदय मानव के लिए करुणामय प्रेम के ओत-प्रोत है। वे अपने को हम से अलग नहीं कर सकते हैं। हम मानव अपने जीवन में प्रेम के बंधन को तोड़ते देते हैं लेकिन ईश्वर ऐसा नहीं करते। हमारा हृदय सुषुप्त हो जाता है लेकिन ईश्वर का हृदय हमारे लिए प्रेम में सदा चमकता रहता है। हमारे ईश्वर हमारे साथ चलते हैं यद्यपि हम उन्होंने अपनी जीवन की दुर्घटनाओं में भूल जाते हैं। पिता हमें अपने में नहीं छोड़ते बल्कि वे अपने बेटे के संग हमारे जीवन में चलते हैं।

संत पापा ने कहा कि हमारा जीवन एक तीर्थयात्रा के समान है। हमारी आत्मा प्रवासी है। धर्मग्रंथ बाईबल यात्रियों और तीर्थयात्रियों की कहानियों से भरा हुआ है। आब्रहम का बुलावा इस आज्ञा के द्वारा शुरू होता है, “अपना देश छोड़ दो।”(उत्पि.12.1) विश्वास के पिता अपनी उस ज़मीर जिससे वे अच्छी तरह वाकिफ थे जो उसके समय में सभ्यता का विकास स्थल रहा, छोड़ देते हैं। उनकी संवेदनशील यात्रा में सभी चीजें के साथ साजिश की जाती है लेकिन वे सारी चीजों का परित्याग करते हैं। संत पापा ने कहा कि हम तब तक परिपक्व नहीं होते जब तक हम आकर्षक क्षितिज की ओर ध्यान नहीं देते हैं जो आकाश और पृथ्वी के बीच हमारे लिए एक सीमा बनती जो राह चलने वालों के मध्य हमें चलने का निमंत्रण देती है।

दुनिया में राह चलते वक्त मानव कभी अकेला नहीं रहता है। एक ख्रीस्त को अपने जीवन में कभी अकेलेपन का आभास नहीं करना चाहिए क्योंकि ईश्वर हमारे जीवन के अंतिम क्षण तक हमें अपनी प्रतीक्षा करने हेतु नहीं कहते हैं वरन वे हर दिन, हर क्षण हमारे साथ रहते हैं।

ईश्वर कब तक मानव की चिंता करते हैं? जब तक येसु ख्रीस्त हमारे साथ चलते हैं तब तक? धर्मग्रंथ हमें हमारी दुविधा का उत्तर देते हुए कहता है-दुनिया के अंत तक। स्वर्ग और पृथ्वी मिट जायेगी, मानव की आशा समाप्त हो जायेगी लेकिन ईश्वर का वचन जो सभी चीजों से महान है कभी व्यर्थ नहीं जायेगा। ईश्वर हमारे संग येसु ख्रीस्त के रुप में चलते हैं। हमारे जीवन में ऐसा कोई भी दिन नहीं है जहाँ हम ईश्वर के हृदय के निकट नहीं रहते हो। संत पापा ने कहा कि लेकिन आप में से बहुत से लोगों कहेंगे, “यह आप क्या कह रहें है?” उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा, “आप के जीवन में कोई भी ऐसा दिन नहीं जहाँ ईश्वर आप को अपने दिल के करीब नहीं रखें हों। वे हमारी चिंता करते हैं, वे हमारे साथ रहते और हमारे साथ चलते हैं, और वे क्यों हमारे साथ ऐसा करते हैं?” यह इसीलिए क्योंकि वे हमें बेइंतहा प्रेम करते हैं। उन्होंने कहा, “हमें इस बात को समझने की जरूरत है। वे हम से प्रेम करते हैं।” वे हमें उन सारी चीजों को प्रदान करते हैं जिनकी जरूरत हमें होती है। वे हमें परीक्षा और विपत्ति की घड़ी में यूँ ही नहीं छोड़ते हैं। हममें से बहुत कोई इसे ईश्वर का “पूर्वप्रबंधन” कहते हैं जहाँ हम ईश्वर को अपने करीब, अपने साथ चलते हुए पाते हैं जहाँ वे हमारे जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।

हम ख्रीस्तियों के लिए आशा कोई संयोग की बात नहीं है जहाँ हम अपने जीवन में एक सहायक को पाते और खुशी का अनुभव करते हैं। यह हमारी आशा को व्यक्त करती है जो अपने में धूमिल नहीं होती। हम इस बात से भ्रमित न हो कि वे जो अपने ईद-गिर्द की चीजों में विकास की बातें सोचते हैं वे ऐसा अपने बलबूते कर सकते हैं। ख्रीस्तीय आशा की जड़ें भविष्य की मनमोहक चीजों में निहित नहीं है बल्कि यह ईश्वर पर सुरक्षित है जो हमें येसु ख्रीस्त में प्रतिज्ञा करते हैं। यदि उन्होंने हम से यह प्रतिज्ञा की है कि वे हमारा साथ कभी नहीं छोड़ेंगे और वे हमें अपने साथ  बुलाते हैं तो हमें डर किस बात का है? इस प्रतिज्ञा के साथ हम ख्रीस्तीय उनकी उपस्थिति में  कहीं भी जा सकते हैं यहाँ तक की उन घालय क्षेत्रों में भी जहाँ की स्थिति ठीक नहीं है। स्तोत्र हमें कहता है, “चाहे अँधेरी घाटी हो कर जाना पड़े, मुझे किसी अनिष्ट की शंका नहीं क्योंकि तू मेरे साथ रहता है।” (स्तो. 23.4) यह हमारा ध्यान इस बात की ओर इंगित करता है कि जहाँ अँधेरा है वहाँ प्रकाश की जरूरत है। हमारा सहायक हमारा मार्ग प्रशस्त करता है वह हमें समुद्र की लहरों में फेंक देता और फिर हमारी ओर रस्सी फेंक कर हमें नाव की ओर आने में मदद करता है। हमारा विश्वास हमारे लिए सहायक के समान है जिसके द्वारा हम स्वर्ग राज्य में प्रवेश करने को आश्वस्त हैं। हम इस विश्वास रूपी रस्सी को पकड़े रहें जो हमें उस स्थान को ले जायेगी जहाँ हम जाना चाहते हैं।

संत पापा ने कहा कि वास्तव में हम अपनी शक्ति पर निहित रहते हैं और इसके कारण हमें बहुधा हताशा और हार का सामना करना पड़ता है। यह हमारे स्वार्थ को व्यक्त करता है लेकिन हमारी इस कमजोरी के बावजूद ईश्वर हमें नहीं छोड़ते हैं। वे हमारे साथ रहते जो हमें जीवन के मार्ग में आशावान और विश्वास के साथ आगे चलने हेतु मदद करता है। यह पुनर्जीवित प्रभु का हमारे लिए प्रेम है, प्रेम की जीत जो सारी चीजों में विजयी होती है।

इतना कहने के बाद संत पापा ने अपनी धर्म शिक्षा माला समाप्त की और सभी तीर्थयात्रियों और विश्वासियों का अभिवादन किया और सबों के ऊपर पुनर्जीवित प्रभु की खुशी और आनन्द की मंगलकामना करते हुए अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।


(Dilip Sanjay Ekka)

हम एक साथ भविष्य का निर्माण करते हैं, संत पापा फ्राँसिस

In Church on April 26, 2017 at 2:57 pm

वाटिकन सिटी, बुधवार, 26 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक) : संत पापा फ्राँसिस ने कनाडा के वैंकूवर में चल रहे वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्था के वार्षिक सम्मेलन के प्रतिभागियों को संदेश दिया।

टीईडी (प्रौद्योगिकी, मनोरंजन और डिजाइन) एक गैर-लाभकारी संस्था है जो छोटे वार्ता के रूप में विचारों को फैलाने के लिए समर्पित है। सन् 1984 में प्रौद्योगिकी, मनोरंजन और डिजाइन (टीईडी) पर विचार करने के रूप में शुरू हुआ और आज विभिन्न वक्ताओं की एक विस्तृत श्रृंखला से वार्ता प्रदान करता है। इस सम्मेलन में संदेश देने वाले पहले परमाध्यक्ष संत पापा फ्राँसिस हैं।

संत पापा फ्राँसिस को स्क्रीन में देखकर टेनिस सुपरस्टार सेरेना विलियम्स, उद्यमी एलोन मस्क, शतरंज चैंपियन गैरी कास्पारोव के साथ अन्य प्रतिभागी आश्चर्यचकित हुए। संत पापा ने 18 मिनट तक “आप भविष्य हैं” विषय पर संदेश दिया।

संत पापा ने कहा, “आप भविष्य हैं” मुझे यह विषय पसंद है क्योंकि कल को देखते हुए, यह आज हमें एक वार्ता खोलने के लिए आमंत्रित करता है, ‘आप’ के माध्यम से हम भविष्य को देख सकते हैं… भविष्य आपसे बना है क्योंकि जीवन दूसरों के साथ हमारे संबंधों के माध्यम से आगे बढ़ता है।”

अपने सामान्य और अनौपचारिक शैली में बोलते हुए संत पापा ने याद दिलाया कि कैसे सभी वस्तुएँ एक दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं और कैसे हम एक दूसरे के जीवन को प्रभावित करते हैं। संत पापा ने कहा, ″हममें से कोई भी स्वायत्त और स्वतंत्र नहीं है। हम सभी के साथ मिलकर ही भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।”

संत पापा के संदेश के दूसरा मुद्दा था, “कचरे की संस्कृति” को दूर करने के लिए “एक सच्ची एकता हेतु लोगों को शिक्षित करना,” जो लोगों की बजाय आर्थिक-तकनीकी प्रणाली पर केंद्रित है। हमें व्यक्तियों पर ध्यान केंद्रित करनी चाहिए।”

संत पापा ने आशा पर बात करते समय संत मदर तेरेसा और भले समारी का उदाहरण दिया। जिसे उन्होंने “एक विनम्र, छिपे हुए बीज के रूप में वर्णित किया, जो समय के साथ एक बड़े पेड़ में विकसित होता है।” आशा के अस्तित्व के लिए एक एकल व्यक्ति भी पर्याप्त है।

संत पापा फ्राँसिस ने तीसरे और अंतिम संदेश में “कोमलता की क्रांति” के बारे में कहा। कोमलता का मतलब है “दूसरे के समान स्तर पर होना।” उन्होंने कहा,″ यह कमजोरी नहीं, लेकिन ताकत है।” यह एकता तथा नम्रता का मार्ग है।”… और नम्रता के माध्यम से, यहां तक कि शक्ति भी एक सेवा बन जाती है और अच्छे कार्यों को करने की शक्ति देती है।

संत पापा ने इस बात की पुष्टि करते हुए अपना संदेश समाप्त किया कि मानव जाति का भविष्य राजनेताओं या बड़ी कंपनियों के हाथों में नहीं है परंतु हम सभी के हाथों में है जो ‘दूसरों’ को ‘आप’ और ‘खुद’ को ‘हम’ के हिस्से के रूप में पहचानते हैं।”  क्योंकि ″हम सभी को एक दूसरे की जरुरत है।″


(Margaret Sumita Minj)

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