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तीर्थस्थलों की जिम्मेदारी में परिवर्तन

In Church on April 1, 2017 at 2:59 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 1 अप्रील 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 1 अप्रील को “मोतू प्रोप्रियो” अर्थात् स्वप्रेरणा से रचित पत्र की घोषणा कर, विश्वभर के काथलिक तीर्थस्थलों एवं पवित्र स्थानों के निर्माण, देखरेख एवं प्रशासन की सामान्य जिम्मेदारी को नवीन सुसमाचार प्रचार हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति को हस्तांतरित किया।

सन्त पापा फ्राँसिस के “मोतू प्रोप्रियो”″संक्तवारियुम एक्लेसिया″ के अनुसार कलीसिया के तीर्थस्थलों और पुण्य स्थानों के विकास, उनकी देखरेख तथा सुरक्षा की प्रेरिताई पर याजकों के लिए बनी परमधर्मपीठीय समिति का दायित्व समाप्त हो जायेगा तथा यह कार्य नवीन सुसमाचार प्रचार हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति को हस्तांतरित किया जाएगा जिन्हें संत पापा हमारे समय में सुसमाचार प्रचार हेतु अत्यावश्यक स्थल मानते हैं।

अब नवीन सुसमाचार प्रचार हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति ही सीधे तरीके से अंतरराष्ट्रीय तीर्थस्थलों की स्थापना, प्रतिमाओं के प्रतिस्थापन, साथ ही साथ कलीसिया एवं विश्वासियों के जीवन में पवित्र स्थानों की भूमिका को बढ़ावा देने के उपायों के अध्ययन और कार्यान्वयन के लिए तथा धार्मिक स्थलों की विकास योजना को बढ़ावा देने और तीर्थस्थल के आंगिक प्रेरितिक योजना को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों आयोजनों एवं तीर्थयात्रियों के नवीकरण को बढ़ावा देने हेतु तीर्थस्थलों और धार्मिक कार्यों को प्रोत्साहन देने हेतु उत्तरदायी होगी।

साथ ही साथ, वह तीर्थस्थलों की देखभाल करने वालों एवं उसके समर्थकों के प्रशिक्षण के लिए भी उत्तरदायी होगी ताकि तीर्थस्थल की संस्कृति एवं कलात्मक तरक्की को बरकारार रखा जा सके।


(Usha Tirkey)

संत पापा ने स्पानी कॉलेज के विद्यार्थी पुरोहितों से मुलाकात की

In Church on April 1, 2017 at 2:58 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 1 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 1 अप्रील को वाटिकन स्थित क्लेमेंटीन सभागार में रोम के परमधर्मपीठीय स्पानी कॉलेज, संत जोसेफ के 160 पुरोहितों से मुलाकात की।

संस्था की स्थापना की 125 वीं वर्षगाँठ पर उनका अभिवादन करते हुए संत पापा ने कहा कि संस्था का जन्म पुरोहितों के प्रशिक्षण के उद्देश्य से किया गया है। उन्होंने पुरोहितों से कहा कि प्रशिक्षण का अर्थ है विनम्रता के साथ प्रभु के पास आना तथा उनसे पूछना है, ″आपकी इच्छा क्या है″? आप मुझसे क्या चाहते हैं?

संत पापा ने पुरोहितों के लिए धर्मग्रंथ के तीन शब्दों को प्रस्तुत किया जिनको येसु ने लेवी को उत्तर देते हुए कहा था, ″तुम अपने प्रभु ईश्वर को अपने सारे हृदय, सारी आत्मा एवं सारी शक्ति से प्रेम करो।″

संत पापा ने कहा कि सारे हृदय से प्यार करने का अर्थ है उदारता एवं स्वेच्छा पूर्वक, स्वार्थ रहित, अपनी रुचि एवं फायदा की खोज किये बिना प्रेम करना। प्रेरितिक उदारता का अर्थ है लोगों के साथ मिलने हेतु बाहर जाना, उन्हें समझना, स्वीकार करना तथा हृदय से क्षमा कर देना। किन्तु इस उदारता में अकेले बढ़ा नहीं जा सकता। यही कारण है कि ईश्वर हमें समुदाय में बुलाते हैं ताकि उदारतापूर्ण भाईचारे के विशेष संबंध के साथ सभी पुरोहित एक साथ आ सकें। इसके लिए पवित्र आत्मा की सहायता की आवश्यकता है, साथ ही व्यक्तिगत आध्यात्मिक प्रयास की भी। समुदाय में जीने हेतु व्यक्तिवाद से बाहर निकलने एवं विविधता के वरदान को जीने, पुरोहिताई में एकता बनाये रखने जो ईश्वर का चिन्ह है, की लगातार चुनौती है। संत पापा ने कहा कि जब वे एक साथ यूखरिस्त बलिदान अर्पित करते है तब भी वे संस्कारिक रूप से अपने हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम को प्रकट करते हैं।

संत पापा ने सम्पूर्ण आत्मा से प्रेम करने का अर्थ बतलाते हुए कहा कि इसका अर्थ है जीवन को अर्पित करने की चाह। इस मनोभाव को हमारे पूरे व्यक्तित्व से परिलक्षित होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संस्था के संस्थापक का यही मनोभाव था अतः पुरोहितों के प्रशिक्षण हेतु शिक्षा महत्वपूर्ण एवं आवश्यक होते हुए भी ज्ञान प्राप्त करना मात्र नहीं होना चाहिए बल्कि इसे जीवन के हर पहलुओं में परिलक्षित होना चाहिए। प्रशिक्षण उन्हें बढ़ने के साथ-साथ ईश्वर तथा भाइयों के करीब आने में मदद करे। संत पापा ने कहा कि एक शिष्य के रूप में सुसमाचार का प्रचार करने के लिए उन्हें आत्म परीक्षण की आदत में बढ़ना होगा जो उन्हें हर क्षण एवं हर कार्य को महत्व देने के लिए प्रेरित करेगा।

ईश्वर को प्रेम करने के तीसरे तरीके, अपनी सारी शक्ति से प्रेम करने के बारे संत पापा ने कहा कि यह हमें स्मरण दिलाता है कि जहाँ हमारी पूंजी होगी वहीं हमारा हृदय भी होगा। (मती. 6,21) हमारे हृदय में हमारी छोटी चीजें, हमारी सुरक्षा एवं अनुराग होता है जिसको त्यागते हुए हम ईश्वर को हाँ कह सकते हैं अथवा धनी युवक की तरह वापस लौट सकते हैं।

संत पापा ने कहा कि पुरोहित सामान्य एवं आरामदायक जीवन से संतुष्ट नहीं रह सकते जो उन्हें चिंता मुक्त एवं ख्रीस्त की निर्धनता की भावना से दूर रखे। हम ईश्वर के सच्चे संतान होने की स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए बुलाये गये हैं। जिसके लिए हमें संसार एवं संसार की वस्तुओं के बीच समुचित संबंध बनाये रखने की आवश्यकता है।

संत पापा ने सभी पुरोहितों को सलाह दी कि वे प्राप्त वरदानों के लिए सदा कृतज्ञता की भावना रखें, ग़रीबों एवं दुर्बलों के करीब रहें तथा सादगी और त्यागमय जीवन द्वारा सच्चे सामाजिक न्याय को प्रोत्साहन दें।


(Usha Tirkey)

पेरू के काथलिक विश्वविद्यालय को संत पापा का संदेश

In Church on April 1, 2017 at 2:55 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 1 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने पेरू के परमधर्मपीठीय काथलिक विश्व विद्यालय को उसकी शतवर्षीय जयन्ती के अवसर पर एक संदेश प्रेषित कर शुभकामनाएँ अर्पित की।

पेरू के परमधर्मपीठीय काथलिक विश्वविद्यालय के कुलपति कार्डिनल जोसेप्पे वारसाल्दी के नाम एक पत्र प्रेषित कर संत पापा ने कहा, ″मैं आपके साथ प्रभु को उनकी असीम भलाई से प्राप्त वरदानों के लिए धन्यवाद देने हेतु शरीक हूँ। इन सालों में प्यारे देश की कलीसिया और समाज की सेवा में यह समर्पित रहा।″

संत पापा ने कहा कि यह अवसर हमें इस विश्व विद्यालय की प्रकृति एवं उद्देश्य पर चिंतन करने का मौका दे रहा है। उन्होंने विश्वविद्यालय को एक समुदाय मानते हुए कहा कि यह मुख्य रूप से एक समुदाय है अर्थात् यह अपने समुदाय के सदस्यों को पहचानता है जिनका एक ही इतिहास है। समुदाय गठित और समेकित तब होता है जब यह एक साथ चलता एवं एकजुट रहता है, नियमों को मूल्य देता, उनकी रक्षा करता और साथ ही, वर्तमान में उन्हें जीता एवं भावी पीढ़ी के लिए हस्तांतरित करता है।

यह समुदाय शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं अभिभावकों से बना है। इन सभी की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं किन्तु वे विश्वस्त रूप से कार्य करने हेतु एक-दूसरे को मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि एक ही गुरु हैं येसु, अतः शिक्षक जो शिक्षा देने के लिए बुलाये गये हैं उन्हें येसु का अनुसरण करना चाहिए जो सभी को स्वयं अपनी शिक्षा देना चाहते थे एवं उनके साथ धीरज तथा विनम्रता से पेश आते थे। बेहतर प्रदर्शन हेतु आंतरिक तनाव हमें विनम्र बनाता तथा ईश्वर की कृपा की आवश्यकता महसूस कराता है।

संत पापा ने कहा कि शिक्षा देना और शिक्षा ग्रहण करना एक धीमी और सावधानीपूर्ण प्रक्रिया है जिसके लिए ध्यान एवं निरंतर प्रेम की आवश्यकता होती है क्योंकि यह सृष्टिकर्ता के साथ सहयोग का कार्य है जो अपनी बनायी हुई वस्तुओं को अपने ही हाथों आकार प्रदान करते हैं। इस पवित्र कार्य द्वारा ईश्वर जो पूर्ण हैं तथा अपनी हर रचना से प्रेम करते हैं उनकी प्रज्ञा एवं अच्छाई प्रकट होती है। अतः शिक्षक, विद्यार्थी एवं अभिभावक सभी का योगदान आवश्यक है।

संत पापा ने काथलिक विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण उद्देश्य की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि सुसमाचार प्रचार करने हेतु इसे पहले खुद को सुसमाचार प्रचार होगा। उन्होंने साक्ष्य के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि चूँकि ख्रीस्त के द्वारा प्रत्येक ख्रीस्तीय जीत लिये गये हैं यही साक्ष्य है। अतः ज्ञान हासिल करना मात्र काफी नहीं है बल्कि उसे जीवन में अमल करना है। उन्होंने कहा कि चूँकि हम मिशनरी शिष्य हैं अतः हमें दुनिया के लिए जीवित सुसमाचार बनना है। हमारे जीवन के उदाहरणों एवं भले कार्यों द्वारा ख्रीस्त को प्रकट करना है ताकि मनुष्य का जीवन बदल कर नवीन हो सके।

संत पापा ने कहा कि विश्वविद्यालय, जो अपनी उत्पत्ति, इतिहास और मिशन के द्वारा, संत पेत्रुस के उत्तराधिकारी के साथ एक विशेष संबंध बनाये हुए है, वह अपने उद्देश्यों को तभी हासिल कर सकता है जब वह संत पापा एवं विश्व कलीसिया के साथ मिलकर, सामाजिक संरचना को व्यावसायिकता और मानवता के साथ ला सके और उत्साह के साथ विश्वास और तर्क को जोड़ सके।


(Usha Tirkey)

संत पापा ने नेत्रहीन लोगों के लिए स्थापित केंद्र का दौरा किया

In Church on April 1, 2017 at 2:53 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 1 अप्रैल 2017 (वीआर अंग्रेजी): संत पापा फ्राँसिस ने शुक्रवार 31 मार्च को रोम स्थित नेत्रहीन लोगों के लिए स्थापित एक केंद्र सवोईया के संत अलेस्सिनो मर्ग्रीता का दौरा किया जो करुणा की जयन्ती वर्ष में दया के कार्यों का एक अंश था।

नेत्रहीन केंद्र वाटिकन के करीब है तथा जहाँ 37 वयस्क एवं वयोवृद्ध लोगों की देखभाल की जाती है। केंद्र के द्वारा दृष्टि दोष वाले 50 बच्चों को भी सेवा प्रदान की जाती है।

नेत्रहीनों के साथ मुलाकात करने के साथ-साथ संत पापा ने वहाँ के मेडिकल कर्मचारियों, स्वयंसेवकों तथा वहाँ रहने वाले अन्य लोगों से भी मुलाकात की। उन्होंने केंद्र को दान दिया तथा प्रार्थनालय के आतिथ्यों की पुस्तिका में हस्ताक्षर भी किये।


(Usha Tirkey)

मिस्र में संत पापा की प्रेरितिक यात्रा हेतु प्रतीक चिन्ह

In Church on April 1, 2017 at 2:51 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 1 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक): मिस्र में आगामी 28 से 29 अप्रील को संत पापा फ्राँसिस की प्रेरितिक यात्रा का प्रतीक चिन्ह, मिस्र की काथलिक कलीसिया ने प्रकाशित कर दिया गया है।

प्रतीक चिन्ह में तीन प्रमुख तत्वों को दर्शाया गया है, मिस्र, संत पापा एवं शांति।

प्रतीक चिन्ह के निचले भाग में अरबी एवं अंग्रेजी भाषा में लिखा है ″शांति के संत पापा शांति के मिस्र में।″

मिस्र देश को नील नदी से जाना जाता है जो जीवन का प्रतीक है। यह पिरामिड और स्फिंक्स, (एक कल्पित जन्तु जिसका शरीर सिंह का सा और मुंह स्त्री का सा होता है) से भी प्रसिद्ध है जो इस अफ्रीकी देश में सभ्यता के लम्बे इतिहास को प्रकाशित करता है।

प्रतीक चिन्ह के केंद्र में क्रूस एवं चंद्रमा है जो मिस्र के विभिन्न लोगों के बीच सह-अस्तित्व को प्रदर्शित करता है।

एक श्वेत कबूतर है जो शांति का प्रतीक है वह मानव प्राणी का महान वरदान एवं प्रेरणा का प्रतीक है तथा एकेश्वरवादी धर्मों का अभिवादन भी है। कबूतर को संत पापा की ओर से जाते हुए दिखलाया गया है जो शांति के संत पापा के रूप में शांति के देश में उनके आगमन की घोषणा कर रहा है।

 


(Usha Tirkey)

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