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प्रॉटेस्टेन्ट सुधारवाद की पाँचवी शताब्दी, कृपा व पुनर्मिलन का सुअवसर

In Church on April 7, 2017 at 2:20 pm

 

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 07 अप्रैल सन् 2017 (सेदोक): सन्त पापा फ्राँसिस तथा परमधर्मपीठीय कार्यालयों के धर्माधिकारियों को चालीसा काल के उपलक्ष्य में सम्बोधित करते हुए अपने पाँचवे प्रवचन में फादर रानियेरो कान्तालामेस्सा ने कहा कि प्रॉटेस्टेन्ट सुधारवाद की पाँचवी शताब्दी कृपा एवं पुनर्मिलन का सुअवसर है।

1511-1512 ई. में हुए प्रॉटेस्टेण्ट सुधारवाद पर चिन्तन करते हुए फादर कान्तालामेस्सा ने कहा कि पवित्रआत्मा हमें ख्रीस्त एवं उनके पास्का रहस्य के पूर्ण सत्य तक ले जाते और साथ ही हमारे विश्वास के निर्णायक बिन्दु ख्रीस्त में विश्वास अर्थात् विश्वास के औचित्य के महत्वपूर्ण प्रश्न पर हमें आलोकित करते हैं।

उन्होंने कहा कि इतिहास पर तथा काथलिकों एवं प्रॉटेस्टेण्ट धर्मानुयायियों के बीच जारी वार्ताओं को प्रकाशित कर हम उचित रीति से प्रॉटेस्टेण्ट सुधारवाद की पाँचवी शताब्दी मनाने में समर्थ होंगे जो सम्पूर्ण कलीसिया के लिये कृपा एवं पुनर्मिलन का सुअवसर है।

इस बात की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए कि मार्टिन लूथर को रोमियों को लिखे सन्त पौल के पत्र के तीसरे अध्याय में निहित पाठ से प्रेरणा मिली थी, उन्होंने स्पष्ट किया कि “मुक्ति येसु मसीह में विश्वास के द्वारा मिलती है और यह मुक्ति उन सब के लिये है जो विश्वास करते हैं; क्योंकि सब ने पाप किया और सब ईश्वर की महिमा से वंचित किये गये। ईश्वर की कृपा से सब को मुफ़्त में मुक्ति का वरदान मिला है; क्योंकि येसु मसीह ने सब का उद्धार किया है।”

उन्होंने कहा, “विश्वास के औचित्य का धर्मसिद्धान्त”  इसी पर आधारित है। मार्टिन लूथर पीड़ा में थे, लगभग हताशा और ईश्वर के प्रति उनमें असंतोष उत्पन्न हो गया था इसलिये कि उनके सभी धार्मिक अनुष्ठान उन्हें ईश्वर के निकट लाने में असमर्थ से हो गये थे तथा उनका मन शांति में नहीं था। इसी बिन्दु पर उन्होंने रोमियों को लिखे सन्त पौल के पत्र से प्रेरणा प्राप्त की, विशेष रूप से पत्र के पहले अध्याय के 17 वें पद से जिसमें लिखा है, “धार्मिक मनुष्य अपने विश्वास द्वारा जीवन प्राप्त करता है।” फादर कान्तालामेस्सा ने कहा कि सन्त पौल की यह पंक्ति लूथर के लिये एक स्वतंत्र करनेवाला अनुभव सिद्ध हुआ।

उन्होंने कहा कि, दुर्भाग्यवश, उस युग की कलीसिया ख्रीस्त एवं कलीसिया के आरम्भिक आचार्यों द्वारा घोषित आधिकारिक धर्मशिक्षाओं एवं दया के कार्यों पर खरी उतरने के बजाय पापमोचन के लिये तीर्थयात्राओं के आयोजन, नोवेना प्रार्थनाओं, मोमबत्तियों के अर्पण तथा कलीसिया के लिये अनुदान आदि में लिप्त थी जिनसे मुक्ति दिलाने के लिये मार्टिन लूथर को सन्त पौल के पत्र में लिखित बातों का स्मरण दिलाना पड़ा।


(Juliet Genevive Christopher)

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