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बैसाख उत्सव के उपलक्ष्य में बौद्ध धर्मावलम्बियों को संत पापा की शुभकामनाएं

In Church on April 22, 2017 at 3:10 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 22 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने बौद्ध धर्मावलम्बियों को एक संदेश प्रेषित कर उनके बड़े त्योहार बैसाख या बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं अर्पित की।

10 मई को मनाये जाने वाले इस त्योहार हेतु अंतरधार्मिक परिसंवाद सम्बधी परमधर्मपीठीय परिषद के अध्यक्ष कार्डिनल जॉँ लुईस तौरान ने एक संदेश प्रेषित कर कहा, ″बैसाख के इस अवसर पर हम अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ एवं प्रार्थनामय मंगलकामनाएँ अर्पित करते हैं। यह उत्सव आपके हृदयों, परिवारों, समुदायों एवं राष्ट्रों में आनन्द और शांति लाये।″

उन्होंने संदेश में लिखा, ″हम इस वर्ष शांति एवं अहिंसा की संस्कृति को प्रोत्साहन देने के अत्यावश्यक विषय पर चिंतन करना चाहेंगे। धर्म आज हमारे विश्व में सबसे आगे है, हालांकि कई बार विरोध के रूप में भी,″ जहाँ विभिन्न धर्मों को मानने वाले कई लोग शांति को प्रोत्साहन देने हेतु प्रतिबद्ध हैं, वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपनी हिंसा एवं घृणित कार्यों को न्याय संगत ठहराने के लिए धर्म का दुरुपयोग करते हैं। हम हिंसा के शिकार लोगों को चंगाई प्राप्त करते एवं मेल-मिलाप करते देख सकते हैं किन्तु दूसरों की हर स्मृति एवं निशान को मिटाने की कोशिश भी देख सकते हैं। एक ओर वैश्विक धार्मिक सहयोग का उद्भव है वहीं दूसरी ओर धर्म का राजनीतिकरण भी दिखाई पड़ता है। विश्वभर में गरीबी और भूख की समस्या है किन्तु दूसरी ओर दु:खद हथियारों की होड़ जारी है, इस प्रकार की परिस्थिति अहिंसा को अपनाने तथा हिंसा के सभी प्रकारों के बहिष्कार की मांग करती है।

संदेश में येसु ख्रीस्त एवं भगवान बुद्ध की शिक्षा का स्मरण दिलाते हुए कहा गया है कि वे दोनों अहिंसा के प्रोत्साहक एवं शांति निर्माता थे।

सभी बौद्ध धर्मावलम्बियों को सम्बोधित करते हुए संदेश में कहा गया है कि बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध ने अहिंसा एवं शांति के संदेश का प्रचार किया। उन्होंने सभी को स्नेह द्वारा क्रोध पर, अच्छाई द्वारा शैतानियत पर, उदारता द्वारा लालच पर तथा सच्चाई द्वारा झूठ पर विजय पाने की शिक्षा दी। उन्होंने कहा है कि जीत शत्रुता उत्पन्न करती एवं हार में दर्द होता है। जीत और हार दोनों को दरकिनार कर शांति पूर्वक जीवन व्यतीत किया जा सकता है। अतः उनका मानना था कि दूसरों पर जीतने की अपेक्षा अपने आप पर विजय पाना अधिक महत्वपूर्ण है।

इस महान शिक्षा के बावजूद हमारे समाज के कुछ लोग, अतीत के दुष्प्रभाव तथा हिंसा एवं संघर्ष के कारण वर्तमान के घाव से जूझ रहे हैं। इस घटना में घरेलू हिंसा, साथ ही साथ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक हिंसा  और पर्यावरण के खिलाफ हिंसा शामिल हैं। दुर्भाग्य से हिंसा अन्य सामाजिक बुराईयों को जन्म दे रही है अतः जीवन के हर क्षेत्र में अहिंसा के चयन की मांग बढ़ गयी है।

संदेश में हिंसा के कारणों का पता लगाने का अह्वान करते हुए कहा गया है कि हिंसा मानव हृदय से आती है तथा व्यक्तिगत बुराई संरचनात्मक बुराई हेतु प्रेरित करती है अतः हम हिंसा के कारणों पर अध्ययन करने, ख्रीस्तीयों एवं बौद्ध धर्मावलम्बियों को अपने हृदय के अंदर निहित बुराई से लड़ने की शिक्षा दिये जाने तथा बुराई से पीड़ित एवं बुराई को अंजाम देने वाले दोनों को मुक्त किये जाने, बुराई को प्रकाश में लाने तथा उन लोगों को चुनौती दिये जाने की आवश्यकता है जो हिंसा को अंजाम देते हैं। खासकर, बच्चों के मन और दिल को, पर्यावरण एवं सभी लोगों के साथ प्रेम तथा शांति से जीने का प्रशिक्षण दिया जाना बेहद जरूरी है। उन्हें यह बतलाना चाहिए कि न्याय के बिना शांति नहीं है तथा क्षमाशीलता के बिना सच्चा न्याय नहीं है।

संदेश में सभी से आग्रह किया गया है कि तनावों को दूर करने एवं टूटे समाज के निर्माण हेतु एकजुट होकर कार्य करें। मीडिया से अपील की गयी है कि वे नफरत भरे भाषण तथा पक्षपातपूर्ण और उत्तेजक रिपोर्टिंग को छोड़, शैक्षणिक सुधारों को प्रोत्साहन देने वाले समाचारों को प्रकाशित करें। वे इतिहास और शास्त्रीय ग्रंथों के गलत अर्थ पर भी ध्यान केंद्रित न करें। यह भी अपील की गयी है कि अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए हम विश्व शांति हेतु प्रार्थना करें।

अंततः निमंत्रण दिया गया है कि हम हमारे परिवारों, समाज, राजनीति, तथा धार्मिक संस्थाओं के विकास हेतु सक्रिय रूप से समर्पित हों तथा एक नये प्रकार की जीवन शैली को प्रोत्साहन दें जिसमें हिंसा का बहिष्कार तथा मानव व्यक्ति का सम्मान हो।


(Usha Tirkey)

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