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निराशा के क्षण येसु हमारे साथ होते हैं, संत पापा

In Church on April 29, 2017 at 3:54 pm

मिस्र, शनिवार, 29 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने मिस्र की प्रेरितिक यात्रा के दूसरे दिन 29 अप्रैल को मिस्र की राजधानी काहिरा स्थित ‘सैन्य स्टेडियम’ में ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

उन्होंने प्रवचन में कहा, ″आपको शांति मिले।″ पास्का के तीसरे रविवार का सुसमाचार पाठ, आज हमें एमाउस की यात्रा पर दो शिष्यों को प्रस्तुत करता है जो येरूसालेम से वापस जा रहे थे। संक्षेप में, इसे तीन शब्दों में प्रकट किया जा सकता है, मृत्यु, पुनरुत्थान और जीवन।

मृत्यु- दो शिष्य निराशा एवं मायूसी की हालत में सामान्य जीवन की ओर लौट रहे थे। प्रभु मर चुके हैं अतः उन्हें आशा का कोई निशान नहीं दिखाई पड़ा। वे निराश और आशाहीन महसूस कर रहे थे। वे वापस लौटने की यात्रा पर थे जो येसु के क्रूस पर ठोंके जाने की दर्दनाक पीड़ा से दूर होने का प्रयास था।

क्रूस की पीड़ा ″ठोकर″ एवं ″मूर्खता″ के समान थी (1 Cor 1,18; 2,2), ऐसा प्रतीत हुआ कि उनकी हर आशा दफना दी गयी है। उन्होंने जिसके ऊपर अपने जीवन का निर्माण किया था वह मर चुका है तथा अपनी पराजय के साथ उनकी सभी आकांक्षाओं को कब्र पर बंद कर लिया है।

इस प्रकार वे विश्वास करने में असमर्थ थे कि प्रभु और मुक्तिदाता जिन्होंने मुर्दों को जिलाया, बीमारों को चंगा किया, क्या उनकी मृत्यु इतनी अपमानजनक तरीके से हो सकती है। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने क्यों उन्हें इस अपमान से नहीं बचाया।

ख्रीस्त का क्रूस ईश्वर के प्रति लोगों के अपने विचार का क्रूस था तथा ख्रीस्त की मृत्यु वैसा ही था जैसा वे ईश्वर के बारे सोचते थे, किन्तु वास्तव में वे मर गये, दफनाये गये तथा कब्र में बंद हो गये जिनकी समझ सीमित थी।

संत पापा ने कहा कि कितनी बार हम अपने को अपाहिज बना देते हैं जब हम ईश्वर के प्रति अपने सोच से परे जाना नहीं चाहते और ईश्वर के स्वरूप की कल्पना मनुष्य की कल्पना के अनुसार करते हैं। हम कितनी बार यह विश्वास नहीं कर पाने के कारण निराश हो जाते हैं कि ईश्वर सत्ता और अधिकार का ईश्वर नहीं किन्तु प्रेम, क्षमा एवं जीवन के ईश्वर हैं।

शिष्यों ने येसु को रोटी तोड़ते समय, यूखरिस्त में पहचान लिया। संत पापा ने कहा कि जब तक हम हमारी दृष्टि को धूमिल कर देने वाले पर्दे को नहीं हटाएँगे तथा हमारे हृदय की कठोरता एवं हमारे पूर्वाग्रहों को नहीं तोड़ेंगे, तब तक हम ईश्वर के चेहरे को नहीं पहचान पायेंगे।

पुनरूत्थान- उदासी की घोर अंधेरी रात में, उनकी सबसे बड़ी निराशा के क्षण में, येसु अपने दो चेलों के पास पहुँचते हैं तथा उनके साथ चलते हैं। यह दिखलाने के लिए कि वे स्वयं मार्ग, सत्य और जीवन हैं। (यो.14:6). येसु उनकी निराशा को जीवन में बदल देते हैं क्योंकि जब मानवीय आशा समाप्त हो जाती है तभी वहाँ ईश्वर की आशा चमकने लगती है। ″जो मनुष्यों के लिए असम्भव है वह ईश्वर के लिए सम्भव है। (लूक 18:27; cf. 1:37).  जब हम असफलता एवं निस्सहाय होने के गर्त पर पहुँच जाते हैं, जब हम खुद को सर्वोत्तम एवं पूर्ण समझने के संदेह से ऊपर उठ जाते हैं तथा अपनी दुनिया में केंद्रित नहीं होते तब ईश्वर हमारे पास आते हैं तथा हमारी रात को प्रातः में बदल देते हैं, हमारी परेशानियों को आनन्द तथा हमारी मृत्यु को पुनरुत्थान में परिवर्तित कर देते हैं। वे हमारे कदमों को येरूसालेम की ओर ले चलते हैं जीवन की ओर तथा क्रूस की विजय की ओर। (इब्रा. 11:34).

पुनर्जीवित ख्रीस्त के साथ मुलाकात के बाद, शिष्य आनन्द, साहस तथा उत्साह से भर कर वापस लौटे। वे अब साक्ष्य देने के लिए तैयार थे। पुनर्जीवित ख्रीस्त ने अविश्वास एवं दुःख के उनके कब्र से उन्हें बाहर निकाला। क्रूसित एवं पुनर्जीवित ख्रीस्त से मुलाकात करने के बाद उन्होंने सम्पूर्ण सुसमाचार, संहिता एवं नबियों की भविष्यवाणी के अर्थ और परिपूर्णता को समझ लिया था।

संत पापा ने कहा कि जो लोग क्रूस के अनुभव एवं पुनरुत्थान की सच्चाई से होकर नहीं गुजरते हैं वे निराशा की स्थिति में अपने को कोसते हैं क्योंकि हम तब तक येसु से नहीं मिल सके जब तक कि ईश्वर के प्रति हमारे संकीर्ण विचार को क्रूसित नहीं कर देते जो उन्हें शक्तिशाली और सत्ताधारी के रूप में प्रकट करता है।

जीवन- पुनर्जीवित येसु के साथ मुलाकात ने उन दोनों शिष्यों का जीवन बदल दिया क्योंकि पुनर्जीवित ख्रीस्त से मुलाकात प्रत्येक का जीवन बदल देता तथा बांझ को फलप्रद बना देता है। पुनरुत्थान पर विश्वास कलीसिया की उपज नहीं है किन्तु खुद कलीसिया का जन्म पुनरुत्थान पर विश्वास से हुआ है जैसा कि संत पौलुस कहते हैं, ″यदि ख्रीस्त नहीं जी उठे हैं तब हमारी शिक्षा व्यर्थ है तथा आपका विश्वास भी व्यर्थ है।” (1 को. 15:14).

पुनर्जीवित प्रभु शिष्यों की नजरों से ओझल हो जाते हैं यह बतलाने के लिए कि हम येसु को पकड़ कर नहीं रख सकते जैसा कि वे इतिहास में प्रकट हुए। धन्य हैं वे जो बिना देखे विश्वास करते हैं। (यो. 21:29; cf. 20:17).  कलीसिया को जानने एवं विश्वास करने की आवश्यकता है कि उसमें येसु उपस्थित हैं तथा उन्होंने यूखरिस्त, सुसमाचार एवं संस्कारों के माध्यम से उसके लिए अपना जीवन अर्पित किया है। एमाउस के रास्ते पर शिष्यों ने इसका एहसास किया तथा वे येरूसालेम लौटे ताकि वे अपना अनुभव दूसरों को बांट सकें। ″हमने जी उठे येसु को देखा है … जी हाँ वे सचमुच जी उठे हैं। (cf. Lk 24:32).

एमाउस के रास्ते पर शिष्यों का अनुभव हमें सिखलाता है कि यदि हमारा हृदय ईश्वर एवं उनकी उपस्थिति के भय से भरा है तो पूजा स्थलों पर उपस्थित होना व्यर्थ है। प्रार्थना करना भी व्यर्थ है यदि हमारी प्रार्थना भाई-बहनों के प्रेम में परिवर्तित नहीं होती। हमारी सारी धार्मिकता ही व्यर्थ है यदि यह गहरी आस्था एवं उदारता से प्रेरित न हो। हमारे प्रतिरूप के बारे सोचना भी बेकार ही है जब ईश्वर हमारी आत्मा और हृदय देखते हैं। (cf. 1 सामु. 16:7) ईश्वर दिखावा पसंद नहीं करते। उनके  लिए बुरे अथवा दिखावे के विश्वासी बनने की अपेक्षा अविश्वासी रहना अच्छा है।

सच्चा विश्वास हमें अधिक उदार, अधिक दयालु, अधिक ईमानदार एवं अधिक मानवीय बनाता है। यह हमारे हृदय को बिना भेदभाव सभी से प्रेम करने हेतु प्रेरित करता है। यह दूसरों को दुश्मन के रूप नहीं देखने किन्तु प्यार के योग्य भाई-बहन के रूप में देखने तथा उनकी सेवा एवं मदद करने हेतु प्राणित करती है। यह मुलाकात, वार्ता, सम्मान एवं भाईचारा की संस्कृति को फैलाने, उसकी रक्षा करने एवं जीने हेतु प्रेरित करती है। यह हमें उन लोगों को क्षमा देने हेतु साहस प्रदान करती है जिन्होंने हमारी बुराई की है। उन लोगों की ओर हाथ बढ़ाने जो गिरे हैं, नंगे को पहनाने, भूखे को खिलाने तथा कैदियों से मुलाकात करने, अनाथों की सहायता करने और प्यासों को पानी पिलाने हेतु प्रेरित करती है। बुजूर्गों एवं जरूरतमंदों की सहायता हेतु आगे ले जाती है। (cf. मती. 25). सच्चा विश्वास हमें दूसरों के अधिकारों की रक्षा हेतु उसी उत्साह एवं उमंग के साथ प्रोत्साहन देता है जिस उत्साह से हम खुद की रक्षा करते हैं। निश्चय ही, हम जितना अधिक विश्वास एवं ज्ञान में बढ़ते हैं उतना ही अधिक विनम्रता में भी बढ़ते तथा अपने छोटे होने का एहसास कर पाते हैं।

संत पापा ने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, ″ईश्वर उसी विश्वास से प्रसन्न होते हैं जो जीवन द्वारा घोषित किया जाता है क्योंकि एक प्रकार का कट्टरपंथ स्वीकार्य हो सकता है जो चैरिटी का पथ अपनाये, अन्य कोई कट्टरपंथ ईश्वर से नहीं आता और न ही उन्हें प्रसन्न करता है।

अतः एमाउस के चेलों की तरह हम, आनन्द, साहस और विश्वास से भरकर हमारे अपने येरूसालेम की ओर लौटें अर्थात् अपने दैनिक जीवन की ओर, अपने परिवार, अपने कार्यों तथा अपने प्यारे देश की ओर। जी उठे ख्रीस्त के प्रकाश के लिए अपना हृदय खोलने से न डरें तथा उन्हें हमारी अनिश्चतताओं को हमारे तथा दूसरों के लिए सकारात्मक शक्ति में बदलने दें। मित्रों एवं शत्रुओं सभी से प्रेम करने से न डरें क्योंकि एक विश्वासी का बल एवं खजाना, प्रेम भरे जीवन में निहित होता है।

संत पापा ने प्रार्थना की कि हमारी माता मरियम एवं पवित्र परिवार, जिन्होंने इस सम्मानित भूमि पर विचरण किया है, हमारे हृदय को आलोकित करें तथा मिस्र की इस प्यारी धरती को आशीष प्रदान करें जिसने ख्रीस्तीयता के उदय के समय संत मारकुस द्वारा सुसमाचार प्रचार का स्वागत किया तथा समस्त इतिहास में कई शहीदों एवं अनगिनत संतों को प्रदान किया है। ख्रीस्त जी उठे हैं वे सचमुच जी उठे हैं।


(Usha Tirkey)

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