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संत पापा ने किया स्वीस गार्ड के नये सदस्यों का स्वागत

In Church on May 6, 2017 at 3:55 pm

 

वाटिकन सिटी, शनिवार, 6 मई 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार, 6 मई को वाटिकन स्थित कलेमेंटीन सभागार में परमधर्मपीठ के विशेष रक्षा दल स्वीस गार्ड हेतु नये सुरक्षा बलों की नियुक्ति समारोह के अवसर पर, उनका स्वागत करते हुए उन्हें शुभकामनाएँ दीं।

उन्हें सम्बोधित कर संत पापा ने कहा, ″इस समारोह के दिन आप लोगों से मुलाकात कर मैं प्रसन्न हूँ तथा उन नवनियुक्त जवानों का अभिवादन करता हूँ जो अपनी युवावस्था के कुछ साल संत पेत्रुस के उतराधिकारी की सेवा में बितायेंगे।″

संत पापा ने कहा, ″हरेक साल की भांति, आप दुखद किन्तु ‘साक्को दी रोमा’ की याद करते हैं जब स्वीस सुरक्षा बल ने संत पापा की रक्षा में अदम्य साहस के साथ अपने प्राणों की आहूति दी थी। आज आप उस शारीरिक बलिदान के लिए नहीं किन्तु दूसरे प्रकार के बलिदान के लिए बुलाये जा रहे हैं जो कम कठिन नहीं हैं अर्थात् विश्वास की रक्षा करने के लिए। यह इस पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार की शक्तियों से रक्षा करने हेतु आवश्यक सुरक्षा बल है, सबसे बढ़कर, दुनिया के उस राजा से लड़ना है जो झूठ का पिता है। संत पेत्रुस के अनुसर वह उस शेर की तरह है जो घूमता रहा ताकि लोगों को नष्ट कर सके।

संत पापा ने स्वीस सुरक्षा बल से कहा कि वे दृढ़ और साहसी बनें। ख्रीस्त के विश्वास एवं उनकी मुक्तिदायी वचनों से बल प्राप्त करें। उन्होंने कहा, ″कलीसिया में आप की उपस्थिति तथा वाटिकन में महत्वपूर्ण सेवा, ख्रीस्त के साहसी सैनिक की तरह बढ़ने हेतु एक सुनहरा अवसर है″ ताकि तीर्थयात्री एवं पर्यटक जिनसे आपकी मुलाकात होती है वे आपमें रचनात्मकता, परिशुद्धता और उत्तरदायित्व की गंभीरता का अनुभव कर सकें। साथ ही साथ एक उदार ख्रीस्तीय एवं विशुद्ध जीवन का साक्ष्य पा सकें।

संत पापा ने उन्हें निमंत्रण दिया कि वे इस अनन्त शहर में उदार भाईचारा तथा आदर्श ख्रीस्तीय जीवन जीते हुए, एक-दूसरे को सहयोग देने में बितायें जो विश्वास द्वारा प्रेरित हो। संत पापा ने कलीसिया के प्रति उनके मिशन की याद दिलाते हुए कहा कि यह मिशन उन्हें परमधर्मपीठ तथा कलीसिया द्वारा बपतिस्मा के माध्यम से सौंपा गया है जो उन्हें उस ख्रीस्त पर विश्वास हेतु बल प्रदान करता है जो मर गये और पुनः जी उठे हैं।

संत पापा ने कहा कि सुरक्षा बल को ईश प्रजा के लिए, मिशनरी शिष्य की भांति एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी है, उन्हें जहाँ वे कार्य करते हैं अथवा जहाँ वे तैनात किये गये हैं वहां सुसमाचार का साक्ष्य प्रस्तुत करना है। भले ही छोटे चिन्हों और हावभाव के द्वारा किन्तु हमेशा नया अर्थ देते हुए उसे प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है। इस प्रकार एक कुशल व्यवहार शैली का निर्माण होगा जो आपसी सौहार्द तथा अधिकारियों के साथ सम्मान पूर्ण भाव में बढ़ने हेतु मदद देगा और जो आतिथ्य सत्कार, दयालुता एवं धीरज की भावना के रूप में प्रकट होगा।

संत पापा ने स्वीस गार्ड के सभी जवानों से अपील की कि वे तत्परता के गुण में बढ़ें जिससे कि वे संत पापा एवं वाटिकन की सेवा के मूल्यवान कार्य को आगे ले सकें। संत पापा ने उन्हें अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया एवं शुभकामनाएं अर्पित की।

स्वीस गार्ड की वाटिकन में सेवा की यह छटवीं शतवर्षीय जयन्ती है।


(Usha Tirkey)

संत पापा ने स्वीजरलैंड के राष्ट्रपति से मुलाकात की

In Church on May 6, 2017 at 3:52 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 6 मई 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 6 को, वाटिकन के प्रेरितिक प्रसाद में स्वीजरलैंड की राष्ट्रपति डोरिस लौथर्ड से मुलाकात की।

वाटिकन प्रेस वक्तव्य में कहा गया कि संत पापा एवं स्वीजरलैंड के राष्ट्पति के बीच मुलाकात सौहार्दपूर्ण रही जिसमें दोनों पक्षों ने आपसी संबंध पर प्रकाश डाला तथा अच्छे संबंध पर गौर करते हुए उसे पुनः मजबूत करने की इच्छा जतायी।

कहा गया कि मुलाकात में काथलिक कलीसिया एवं समाज के बीच सहयोग को आँका गया।

वक्तव्य में यह भी कहा गया कि संत पापा एवं राष्ट्रपति ने कई अन्य बातों पर विचार किया, खासकर, शरणार्थियों का स्वागत, युवाओं की बेरोजगारी, आतंकवाद के विरूद्ध संघर्ष, पर्यावरण की रक्षा के प्रति समर्पण एवं भावी यूरोप पर।


(Usha Tirkey)

औपचारिकता और पुरोहितवाद के प्रलोभन से दूर रहें, संत पापा

In Church on May 6, 2017 at 3:50 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 6 मई 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार, 6 मई को कम्पानेल्ला के पोसिल्लीपो परमधर्मपीठीय समिनरी के गुरूकुल छात्रों, पुरोहितों एवं धर्माध्यक्षों से मुलाकात की।

सेमिनरी की स्थापना 1912 ई. में संत पापा पीयुस दसवें ने की थी तथा उसे जेस्विट पुरोहितों की देखरेख में समर्पित किया था।

संत पापा ने सेमिनरी के सभी प्रशिक्षकों को सम्बोधित कर कहा कि संत इग्नासियुस की शिक्षा पद्धति के अनुसार धर्मप्रांतीय पुरोहित को आध्यात्मिक प्रशिक्षण देना उनका मिशन है। उन्होंने कहा, ″निश्चय ही, यह चुनौतीपूर्ण है किन्तु उत्साहवर्धक भी, जिसकी जिम्मेदारी है भावी पुरोहित के मिशन को दिशा देना। संत इग्नासियुस की पद्धति के अनुसार शिक्षा देने का अर्थ है येसु ख्रीस्त को केंद्र मानते हुए व्यक्ति को सामंजस्यपूर्ण आत्मसात करने हेतु प्रोत्साहन देना।″ उन्होंने कहा कि यह प्रभु के साथ संबंध को महत्व देना है जो हमें मित्र पुकारते हैं। यह संबंध बुलाहट को मजबूत एवं प्रगाढ़ बनाता किन्तु अव्यवस्थित आध्यात्मिकता में पड़ने नहीं देता। यह इसीलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमें अपने आपको निरंतर जानने, स्वीकार करने एवं सुधारने की आवश्यकता है अतः सुधार करने से नहीं थकना चाहिए।

संत पापा ने बुलाहट की यात्रा को समझाने हेतु सिमोन पेत्रुस एवं प्रथम शिष्य का उदाहरण देते हुए कहा कि यह उनके प्रेम एवं मित्रतापूर्ण वार्ता के आस-पास घूमती है। हम येसु में मसीह को देखें जो हमारे जीवन के स्वामी हैं और वे हमें नया नाम प्रदान करते हैं। येसु के साथ मित्रता हमारी बुलाहट को घेर लेती तथा हमारी प्रेरिताई का पथ प्रशस्त करती है, जिसकी रक्षा पिता हमेशा करते हैं।

संत पापा ने कहा कि नये नाम हमें प्रत्यक्ष बनाते हैं। उन्होंने कहा कि चीजों को नाम लेकर पुकारना आत्मज्ञान का प्रथम चरण है और इस प्रकार, हम अपने मन में ईश्वर की इच्छा को पहचानते हैं।

संत पापा ने सभी गुरूकुल छात्रों को सम्बोधित कर कहा, ″चीजों को नाम लेकर पुकारने से न डरें, अपने जीवन की सच्चाई को देखने, उन्हें पारदर्शिता एवं सच्चाई के सामने खोलने से भयभीत न हों, विशेषकर, प्रशिक्षकों के सामने। औपचारिकता और पुरोहितवाद के प्रति झुकाव, दोहरी जिंदगी का मूल है।

संत पापा ने आत्म परख पर जोर देते हुए कहा कि सेमिनरी का समय, आत्मपरख का समय है। एक पुरोहित को सच्ची आत्मपरख का व्यक्ति बनना चाहिए क्योंकि वह विश्वासियों का नेतृत्व करता है अतः उसे समय के चिन्ह को पहचानना एवं भीड़ की उलझी आवाज में ईश्वर की पुकार को सुन सकना चाहिए। संत पापा ने आत्म परख अच्छी तरह कर पाने के लिए ईश वचन को सुनने की सलाह दी, साथ ही साथ, अपने अंदर की भावनाओं एवं डर के साथ अपने आपको जानने की आवश्यकता बतलायी। आत्मपरख के व्यक्ति बनने के लिए साहस की जरूरत है ताकि हम सच्चाई को स्वीकार कर सकें।

संत पापा ने आत्म परख को सीखने का अर्थ कठोर नियमों के संरक्षण में जाने के प्रलोभन से बचना बतलाया।

संत इग्नासियुस की शिक्षा अनुसार पुरोहितों के निर्माण हेतु अगला उपाय संत पापा ने बतलाया कि ईश्वर के राज्य के लिए हमेशा खुला होना। उत्तम करने हेतु प्रभु एवं भाइयों के लिए अधिक देने की चाह रखना जो उनके प्रशिक्षण को विस्तृत बनायेगा। वे मानवीय एवं आध्यात्मिक पक्ष को मजबूत करें। ईश राज्य की खोज करें। ईश राज्य की खोज करने का अर्थ है धार्मिकता की खोज करना, समुदाय के साथ अच्छा संबंध बनाना, सच्चे न्याय के लिए लालायित होना और अच्छाई की ओर अग्रसर होने हेतु आंतरिक स्वतंत्रता में बढ़ना।

संत पापा ने स्मरण दिलाया कि बुराई पैकेट से होकर प्रवेश करती है तथा घमंड की ओर बढ़ती है और सब कुछ का अंत कर देती है। युवा जिन्होंने पुरोहिताई का रास्ता चुना है उन्हें येसु से मित्रता बढ़ाने की आवश्यकता है, अपनी सादगी द्वारा ग़रीबों के प्रति स्नेह में बढ़ना है। संत पापा ने माता मरियम एवं संतों से प्रार्थना की कि उनकी बुलाहट की यात्रा आनन्द एवं निष्ठा से पूर्ण हो।


(Usha Tirkey)

संत पापा ने स्वीकारा ग्रीक मेलकाईट के प्राधिधर्माध्यक्ष का इस्तीफा

In Church on May 6, 2017 at 3:48 pm

 

वाटिकन सिटी, शनिवार, 6 मई 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 6 मई को ग्रीक मेलकाईट कलीसिया में अंतियोख के प्राधिधर्माध्यक्ष जॉर्ज तृतीया लाहाम के त्याग पत्र को स्वीकार किया।

संत पापा ने ससम्मान सेवानिवृत प्राधिधर्माध्यक्ष एवं धर्माध्यक्षों के नाम एक पत्र में लिखकर बतलाया कि ″विगत फरवरी माह में एक खास मुलाकात में प्राधिधर्माध्यक्ष ने उन्हें अपना त्याग पत्र प्रस्तुत किया था और जिसको उन्हें स्वीकार कर लिया है। पत्र में लिखा है ″प्रार्थना एवं सावधानी पूर्वक चिंतन के बाद मैं अनुभव करता हूँ कि उनके त्याग पत्र को स्वीकार किया जाना, ग्रीक मेलकाईट कलीसिया की भलाई के लिए उपयुक्त होगा।″

83 वर्षीय ससम्मान सेवा निवृत प्राधिधर्माध्यक्ष को उन्होंने अपने पत्र में कलीसिया के प्रति उनके उदार सेवा के लिए धन्यवाद देते हुए लिखा है, ″ईश प्रजा के उत्साही सेवक को कलीसिया की उदार सेवा हेतु धन्यवाद देते हैं एवं अंतरराष्ट्रीय समुदाय की देखभाल, खासकर, सीरिया संकट पर ध्यान देने हेतु शुक्रिया अदा करते हैं।

संत पापा ने ग्रीक मेलकाईट कलीसिया पर माता मरियम की मध्यस्थता द्वारा प्रार्थना की है एवं उन्हें अपना प्रेरितिक आशीर्वाद देते हुए ईश्वर से याचना की है कि यह कलीसिया कृपा का चिन्ह, भावी एकता हेतु प्रेरणा एवं सुसमाचार की साक्षी बनी रहे।


(Usha Tirkey)

संत पापा ने दी नम्र ख्रीस्तीय बनने की सलाह

In Church on May 6, 2017 at 3:47 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 6 मई 2017 (वीआर सेदोक): आज भी कलीसिया में कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने पापों को ढंकने के लिए अकड़पन का सहारा लेते हैं। यह बात संत पापा फ्राँसिस ने शुक्रवार 5 मई को वाटिकन स्थित प्रेरितिक आवास संत मर्था के प्रार्थनालय में ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए प्रवचन में कही।

प्रवचन में संत पापा ने प्रेरित चरित के उस अंश पर चिंतन किया जहाँ संत पौलुस के मन परिवर्तन की घटना को प्रस्तुत किया गया है। वे आरम्भ में एक कठोर अत्याचारी थे किन्तु बाद में सुसमाचार के दीन और धैर्यवान प्रचारक बने।

संत पापा ने कहा, ″साऊल नाम पहली बार उस समय प्रकट हुआ जब स्तेफन पर अत्याचार हो रहा था। साऊल इस घटना को देख रहा था। वह एक जवान, अकड़, सैद्धांतिक और कानून की कठोरता से “आश्वस्त” व्यक्ति था।″

उन्होंने कहा कि वह अकड़ वाला व्यक्ति था किन्तु वफादार। येसु उन लोगों को फटकारते थे जो कठोर और बेईमान थे।

संत पापा ने कहा, ″अकड़ लोग दोहरी जिंदगी जीते हैं। वे अपने को अच्छे और वफादार दिखाने का प्रयास करते हैं किन्तु जब उन्हें कोई नहीं देख रहा होता है तो वे गलत काम करते हैं।″ संत पापा ने साऊल के बारे कहा कि वह ईमानदार था, वह ईश्वर में विश्वास करता था। उन्होंने कहा कि कलीसिया में कई युवा आज अकड़पन के प्रलोभन में पड़ गये हैं। उनमें से कुछ ईमानदार हैं वे अच्छे भी हैं उन्हें प्रार्थना करना चाहिए कि प्रभु उन्हें विनम्रता के रास्ते पर आगे बढ़ने में मदद दे।

संत पापा ने कहा कि कुछ दूसरे प्रकार के लोग भी हैं जो अपनी कमजोरियों, पापों एवं व्यक्तिगत समस्याओं को ढंकने के लिए अकड़पन का सहारा लेते हैं तथा दूसरों की कीमत पर अपने आप का निर्माण करते हैं। इसी तरह साऊल बहुत अधिक कठोर हो गया था। इतना अधिक कि वह धर्म के विपरीत जाने वालों को बर्दास्त नहीं कर सकता था। अतः वह ख्रीस्तीयों को सताने लगा था किन्तु संत पापा ने कहा कि उसने बच्चों को जीने दिया जबकि आज बच्चों को भी नहीं बख्शा जा रहा है।

जब साऊल ख्रीस्तीयों पर अत्याचार करने के लिए दमिश्क जा रहा था तभी उसका मन परिवर्तन हुआ। येसु ने उसे पुकार कर कहा, ″साऊल साऊल तुम मुझे क्यों सता रहे हो?

संत पापा ने कहा कि वह जो अत्यन्त कठोर हो चुका था, एक बालक की तरह हो गया तथा अपने में परिवर्तन लाने हेतु प्रभु को पूरी छूट दे दी। यह प्रभु की विनम्रता की शक्ति है। इस तरह साऊल अब पौल बन गया जिन्होंने दुनिया के कोने-कोने में सुसमाचार का प्रचार किया तथा उसके लिए अत्याचार भी सहा।

संत पापा ने कहा, ″यही एक ख्रीस्तीय का जीवन है, हमें उस राह पर आगे बढ़ना है जो येसु द्वारा चिह्नित है, सुसमाचार प्रचार के रास्ते पर, अत्याचार के रास्ते पर, क्रूस के रास्ते पर और अंततः पुनरूत्थान के रास्ते पर।″

संत पापा ने विश्वासियों से प्रार्थना का आग्रह करते हुए कहा कि हम कलीसिया के उन कठोर लोगों के लिए प्रार्थना करें जो अकड़ हैं, जिनमें उत्साह है किन्तु गलत राह पर हैं। उन लोगों के लिए जो दिखावा के लिए करते हैं, जो दोहरी जिंदगी जीते हैं जिनकी कथनी और करनी में सामंजस्य नहीं है।


(Usha Tirkey)

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